अभी हाल में

:


विजेट आपके ब्लॉग पर

शनिवार, 27 जनवरी 2001

विवेक निराला की लंबी कविता


चार पुरूश और स्वर्ण युगों पर षोकगीत
1

हम चार दोस्त थे,
बिल्कुल आवारा, लेकिन
संस्कृति के प्रष्नों को
अपने कन्धे पर उठाए
संस्कृतिकर्मी कहलाने को उत्सुक।

हम अपने इतिहास को
लेकर सिर धुनते
हम जीवन के ठाठ अनष्वर
बिनते-चुनते।

हम प्रष्नाकुल
दीवारों पर जगह-जगह
प्रष्नचिन्ह टांगें
हम भोले बचपन-से
अपने-अपने उत्तर मांगें।

सत्ता के गलियारों की
आपा-धापी में
अक्सर वन्दन अभिनन्दन
कीर्तन-भजन-पूजन।
हम निर्जन में जैसे बन्दी
बहुत अकेले
पांवों में चलने की सूजन।

परम विकट पथ चुना हुआ
अपना ही था
यह थकान-सुस्ती-ढीलापन
अपना ही था
रेषे-रेषे बिखरा जीवन
अपना ही था।

सन्नाटे में
प्रष्न-उत्तरों की उधेड़बुन
सभी षास्त्र-ग्रन्थों को पढ़-गुन
आगे बढ़ते अपनी ही धुन।

यूं तो संगी विरले मिलते हैं
फिर भी दोस्त बने थे चारों
कवि, किस्सा-गो
इतिहासकार और खबरनवीस।

किस्सा-गो, वह प्रथम पुरुश
बेलगाम घोड़ों पर
हर समय सवार
किधर जाएगा, किसे खबर ?

उसके हाथों में काठ की
दो तलवारें हैं
माथे पर दुष्चिन्ताओं
की सतरें हैं
खुद कहता है- षापित है
उसने भी मुट्ठी तानी थी
दुर्वासा के षाप से इतना थर्राया
अब एड़ियां घिसा करता है।

फूट रहा है कोढ़
इसलिए अंगौछा ओढ़
चिड़ीमार-सा
परिन्दे पकड़ता है, उड़ता है
अकेले में कुनमुनाता है
रोज एक नया किस्सा सुनाता है।

द्वितीय पुरुश-
वह कवि जिसने
आस्तीन में सांप की तरह
आंखों में सपने पाले हैं
उनमें से कुछ को ही
सच होते देखा।
कुछ सपने नाकामी के
कुछ भयावने
कुछ सपने
सपने तो क्या, गड़बड़झाले हैं।

फिर भी नाउम्मीद नहीं है
उम्मीदों की फसल काटकर
अपनी खाली जेबों को भर
वह आगे बढ़ता जाता है।

अपने समय के जितना भीतर
उतना बाहर
वह वामन अपने छोटे क़दमों से ही
युग-युग को नापा करता है।
छन्दों को तोड़ता-जोड़ता
जीवन की लय
पकड़ता-छोड़ता
प्रियवाची काव्य-पुरुश।

तृतीय पुरुश-
इतिहासकार वह स्वतन्त्र।
बहुत अहिंसक
युगों-युगों की राख कुरेदता
सत्य-षोधक।

उसका जीवन अभिषप्त षिला
जिस पर नहीं लिखा गया
कोई लेख
कद-काठी का
गर्वोन्नत विजय स्तम्भ।
साम्राज्यों के उत्थान-पतन
की बातें करता
राज-व्यवस्थाओं का
वह विष्लेशक
अपनी झोली में
जब भी हाथ डालता है
एक नायाब चीज़ निकालता है।
काले-लाल-धूसर मृदभाण्ड
सोने, चांदी, चमड़े के सिक्के
कटी-फटी प्रतिमा
अथवा अन्नादि के जले हुए कण।

अपने औजारों से वह
हथियारों को परखा करता
लिए हुए एक सन्दूकची
चलता-फिरता
सभ्यता का सांस्कृतिक अजायबघर।

चैथा पुरुश- पत्रकार
स्कूप तलाषता
दौड़ता-भागता
सम्पादकों पर लानतें भेजता
मालिक को गरियाता।
चोरी-डाका-दुराचार
थाना-कचहरी-तहसीलदार
सबको साधते पस्त
लोकतन्त्र का चैथा पाया।

अपने समाज का वह प्रहरी
समझा करता है
सत्ता की
सब चालें गहरी।
पूर्वजन्म के नारदोचित
संस्कारों से
जगह पर, समय पर उपस्थित।

       2
हम थे चार पुरुश
आपस में लड़ते-झगड़ते
स्वर्णयुग का हर यूटोपिया
ळमको आकर्शित करता था।
कुत्ते की तरह हांफते हुए
हम उस तक
किसी भी सूरत में
पहुंच जाना चाहते थे।

बदहाल, लगभग मनुश्य विरोधी
स्थितियों में
अपने जीवन को झेलते
अपने एक जैसे जीवन को काटते।

हमने अपने को ही खाकर
भूख मिटाई
हमने अपना लहू चाटकर
प्यास बुझाई
खुद को समिधा मानकर
हमने आहुति दी
तिल-तिल
देह गलाते गए
अन्तस् को जलाते गए।

हमने तक़लीफों को छूकर
महसूस किया
पीड़ा को सीने में धरकर
समझा है
जो कुछ भी देखा और जाना
जितने अंषों तक
हमने सत्य को पहचाना
उतने तक
वैसा कहने के खतरे उठाए।

अपने समय को
नपंुसक कहकर
हम किसी स्वर्णयुग की
जालिम कल्पना में तल्लीन थे।
अपने सीमित और भोंथरे
हथियारों पर
हम बहुत गर्व करते थे।

हम लड़ाकू थे
एकदम मौलिक
विचारों की लड़ाई में
समान रूप से निपुण
हम चारों
पीठ पीछे वार नहीं करते थे
हम प्रतिपक्ष को
पूरा मौका देते थे,
इसलिए अपने को नैतिक कहना
हमें अधिकार की तरह लगता था।

हम विचार को
विचार से परास्त करना
चाहते हुए भी
बार-बार खुद हार जाते थे
क्योंकि प्रतिपक्ष
विचारों की लड़ाई को
अपने कूड़ेदान से षुरू करता था
और चाकू पर
लाकर खत्म कर देता था।

दरअसल
मायावी था हमारा षत्रु
वह नए रूप धरता जाता था
और उसकी षिनाख़्त मुष्किल थी।

अपने सबसे अच्छे समय
के हम लोभी
मरुस्थल में गिरते-पड़ते
कितनी ही आंखों में गड़ते
हर सूर्योदय के बाद
जब हम निकलते
तो यह सोचकर कि लेकर
आएंगे कोई न कोई स्वर्णकाल
या तो मौत हमें वापस
एक साथ मिलने नहीं देगी।

इस तरह हमने
उन तमाम लोगों को बेवज़ह
डरा दिया था
जे हमें कुछ दिन और
ज्ीवित देखना चाहते थे।
वे लोग
अपने अच्छे दिनों के
न आने से खीझे हुए
पोलियो के कारण
दोनों पांव की ताक़त खोये
रोगी की तरह
अपने हाथों में
हवाई चप्पलों के साथ
घिसट रहे थे।

बेहद छरे हुए खभ्भड़
वे सिर्फ़
इस देष का नागरिक
बने रहने की
जद्दोजहद कर रहे थे।
वे एक अदद
मतदाता पहचान-पत्र
हासिल करने के लिए
बार-बार फोटो खिंचा रहे थे
परन्तु हर बार उनकी मानवाकृति
बैल में बदल जाती थी।

वे सब
हमारे ही प्रियजन थे
और हमारा
अवांछित भविश्य हो सकते थे।

कुछ लोग बिल्कुल चुप थे
जिन्होंने कई बार
नाजुक मौकों पर हमें
आत्महत्या का परामर्ष दिया
वे सब आत्म-वध को भी
क्रान्ति मान चुके लोग थे।

हमसे पहले भी आए थे
सब सच-सच कहने वाले
दुनिया को अपना
षोधा सच बतलाने वाले
दुःख है तो
दुःख का कारण समझाने वाले
समतल धरती को
गोल-गोल दिखलाने वाले।
       3

वसन्त की पहली सुबह
जब हम जागे
हमें सामने खड़ा मिला
एक दिव्य पुरुश।
ऐसा जिसे देखते ही
उमड़ पड़े श्रद्धा।

उसकी लाल-लाल आंखों
के भीतर एक साथ
चारों ने झांका
और किसी सम्मोहन में
बंधकर बैठ गए
अपने से वंचित।

उसने हमसे कुछ भी न कहा
इस तरह हमारे साथ रहा
उतने समय में भीतर-बाहर
कि हम आतंकित होने लगे थे।

उसका होना
एक तड़प का होना था
एक छटपटाहट
उसके साथ चली आई थी
हमारे भीतर
इसीलिए भय था।

हम चाहते थे कि बने रहें
हम जैसे हैं, वैसे ही
तो क्या हर्ज़ है ?

लेकिन, वह न तो हमें
और न दुनिया को
इस तरह देख सकता था।
वह मौन में भी
सिर चढ़ कर बोलता जैसे
वह बोलता तो
श्रोता बेचैन हो उठते
वह अदृष्य होता
तो और गहरा जाता उसका एहसास।

वह महात्मा नहीं
ज्ञानी नहीं वह
नास्तिक नहीं
अभिमानी नहीं
कोई नजूमी नहीं, वह प्रियंवद।

वह चाहता था
कि हम जिएं उसकी तरह
मगर वैसे हम जी नहीं सकते थे
वह चाहता था
कि हम सोचें उसकी तरह
मगर वैसे हम सोच नहीं सकते थे
वह चाहता था
कि हम हो जाएं उसकी तरह
मगर हम उसकी तरह
व्याप्त नहीं हो सकते थे।

अपनी छोटी-छोटी
सीमाओं के हम कै़दी
उसका कहा नहीं मान पाये अभी।
हमने हृदय से
उसके अभिनन्दन किये
असहायता की सारी लाचारी के साथ
फिर मिलने के आष्वासन पर
हम चारों
अलग-अलग दिषाओं में चले।

          4

हम चार दोस्त
चार दिषाओं में
बीते कल की डोर पकड़ कर
अतीत के कुण्डों में
डुबकियां लगाते
काष! हाथ आ जाए
कोई स्वर्णयुग।

प्रथम पुरुश ने
कूच किया सरयू की ओर
किस्सा-गो वह
रामराज के किस्से में
डूबा-उतराया
कई माह सरयू के तट पर
कभी-कभी
जल भीतर घुस कर
रहा खोजता एक स्वर्णयुग।


उसे एक स्त्री मिली
स्वर्ण प्रतिमा में बदली हुई
अपनी मांग में
किसी राजा के नाम का सिन्दूर भरे हुए
उसके दोनों ओर
दो बच्चे थे मरे हुए।
एक ऋशि मिले
अपने ष्वेत केष खुजलाते
और लगभग षाप की तरह
मिली हुई लम्बी उम्र पर पछताते।

उसे एक हिरणी मिली
किसी राजकुमार की छट्ठी में
सीझे हुए
अपने हिरण की गन्ध से व्याकुल
इधर-उधर भागती
उसे एक धोबन मिली
सब दाग़ धोती
रात-रात भर रोती-जागती
विगत कल में, सरयू जल में।

होता तो मिलता
न स्वर्णयुग राम का।

कनक भवन की परिक्रमा कर
मक़तूल षम्बूकों से डर
सरयम से मुंह मोड़
अपना अंगौछा छोड़ वह भागा।

सरयू में गोते खाकर
जाना उसने अवध में जाकर
रामराज स्वर्णयुग होता
तो सरयू भर पानी में
क्यों डूब मरते भगवान ?

द्वितीय पुरुश-कवि
चला गया उज्जयिनी
महाकाल के मन्दिर में गिरा
वह जाकर, गष खाकर।

मालवा के आकाष में
उसने मेघों से होड़ लगाई
भटकता रहा बहुत दिनों तक
कालिदास की उज्जयिनी में
मेघदूत, यक्ष अथवा
विरहिणी प्रिया को
न पाता हुआ कवि
लौटा महाकाल के पास
न वैसी उज्जयिनी
न वैसे चन्द्रगुप्त न कालिदास।

स्वर्णयुग भी वह क्या भला
जिसमें कोई
सिसकियां भर-भर रोता हो
कोई गान भी गाता हो
तो दुःख से फट पड़ते हों मेघ
कोई भीतर-भीतर जलता हो
और बढ़ जाता हो
पूरी पृथ्वी का तापमान।

बिना किसी तर्क
आगत और विगत का फर्क़
इस सोने का
इस युग का हो बेड़ा गर्क़
हाय कितना विश
कैसा नर्क !

कवि बेहद निराष हुआ
और पहले से ज़्यादा
उम्रदराज़ दिखता हुआ
वहां से लौटा।

अपने सुख और श्री से वंचित
गंवा कर अपना
सब कुछ संचित
भीख मांगते मिले
कवि-कुल-गौरव कालिदास।

तृतीय पुरुश
उस इतिहासकार ने
मुस्कुराते हुए अग्नि में प्रवेष किया।
स्वर्णयुग लाने की खातिर
वह खुद गोया कुन्दन बन
जाना चाहता था
यह था पूर्ण समर्पण उसका।

अग्निद्वार पार कर
पहुंचा यमुना-तट पर
मुग़ल काल में।

कहां गया वह मुगल स्वर्णयुग
ढंूढ़ा फिरा वह
दीन-ए-इलाही
मगर मिली बस उसे तबाही।

मिले उसे
छोटी-सी कुटिया में
लगभग अज्ञातवास झेलते
मानस पर जमा
धूल की परतें
पोंछ-पांछ कर साफ करते
जर्जर तुलसी।

विनय पत्रिका का अकाल
इतिहासकार को
पहली बार दीखा।

पहली बार ही उसने जाना
जैसे मिट्टी की
परतों के नीचे और परत
वैसे ही इतिहास के नीचे
एक और इतिहास।

कह ही दिया जाता है अकथ्य।
एक सत्ता के समानान्तर
दूसरी सत्ता
सत्य की, साहित्य की।

अबुल फजल, अल बरूनी
स्मिथ, हेग, टाॅड वगैरह
जब लिखते हैं इतिहास
मुस्कुराते हैं स्वर्णयुग।

कोई स्वर्णयुग
जब मक़बरे में तब्दील
होता है
तब सिरहाने के पत्थर पर
चीखता है झूठा समाधिलेख।

हताष इतिहासकार
वह तृतीय पुरुश
सीकरी के
एक लाल पत्थर
पर सिर पटक कर
रोने लगा।
उड़ चले खून के छींटे
टूट गया विष्वास
उसके फटे हुए सिर के साथ।

समय के षिलालेख पर
दर्ज़ हो षायद कभी
एक टूटा हुआ इतिहासकार
और उसके रक्त से
हुआ और गहरा वह लाल पत्थर।

खून से भीगा
इतिहासकार
डूबते सूर्य की तरह लौटा।

चैथा पुरुश
लोकतन्त्र का चैथा पाया थामे
हवा को सूंघता
और वायु के साथ ही
पहुंचा नेहरू के युग में।

आधुनिक भारत के
स्वर्णयुग की तलाष में
टकराया भूल से
किसी की छाती में
गड़े त्रिषूल से।

छूरों और कटारों से
लुकता-छिपता वह भागा
खुली आंख
स्वर्णयुग ढंूढ़ा
तभी दीखा कोने मे
ंहे राम ! कहता एक बूढ़ा।

अचानक दृष्य बदला
और उसने देखा
खून की एक गहरी लकीर
जहां बांट रही थी
इस महादेष को
ठीक वहीं
गोली चली
और मारा गया इतिहास-पुरुश,
अकाल-पुरुश वह वृद्ध।

उसकी आंखे
कीचड़ से चिपचिपी हो चलीं
उसके नथुनों में
प्राणवायु के साथ
घुसने लगी सड़ रही लाषों की दुर्गन्ध।

जरायमपेषा लोगों का
पूरा जमघट लगा हुआ था।

आष्चर्य और सन्ताप
के मिश्रण से
वह भरभरा कर गिर पड़ा।

खुदाई खिदमतग़ारों की
मदद से किसी तरह
एक रेलवे स्टेषन
पहुंचकर उसने पाया
कि यह षहर चंडीगढ़ था
और उसका
‘प्रेस-पास’ कहीं गिर चुका था।

वायु-गमन के बाद
रेल से पहली बार बिना टिकट
यात्रा में
पकड़े जाने के भय से
वह गन्तव्य स्टेषन से पहले ही
आउटर पर
चलती ट्ेन से कूद पड़ा
और अपने हाथ-पांव तुड़वा बैठा।

           5
हम चार पुरुश
चार दिषाओं में
जल, नभ, अग्नि और वायु
से आत्म-लज्जित
खाली हाथ लौटे हुए
जब मिले
तो एक दूसरे से गले लग-लग
खूब देर तक रोते रहे।

षिषिर की घोर रात में
कांपते हुए
चार पुरुश हम
उस वसन्त का स्मरण करते
जिसमें मिला था दिव्य-पुरुश।

यह अंधेरी रात थी
और हमस ब षीत से आतंकित
तभी हमें ईषान कोण से
आता हुआ
जलती हुई मषाल-सा
दीखा वह दिव्य-पुरुश।

उससे हमने अपने सब
दुखड़े कह डाले
अपना-अपना आंखों देखा
सच बतलाया
हमने अपने घाव दिखाये
अपने भयावह अनुभव
उससे बांटते-बांटते
हम चारों
एक बार फिर रो पड़े।

विलाप और करुणा के बीच
सिगरेट सुलगाते हुए
दिव्य-पुरुश घूमा।

एक लम्बा कष खींचकर
हमारी ओर पीठ कर
जोर से बोलना षुरू किया उसने
वक्तव्य दे रहा हो मानो
संबोधित करते हुए पूरा हिन्दुस्तान-
‘‘किसी स्वर्णयुग के
दमकते हुए सोने की
नक्काषी के भीतर
अगणित घाव
अनवरत रक्तस्राव।

सबसे जोखिम है इतिहास
में उत्खनन।

सिंहासनों पर
बदलते हैं षासक जैसे-जैसे
सल्तनतें बदलती हैं
वैसे-वैसे निश्ठाएं
और काल के पत्र पर
सरकारी मुहर के साथ
अंकित हो जाता है
अंगार के समान चमकता एक स्वर्णयुग।

किसी भी कालखण्ड के
ज़ख्म कभी नहीं भरते
वक़्त भर भी नहीं सकता
कोई ज़ख्म
किसी युग के ज़ख्मों स
रिसता हुआ लहू
इतिहास से ज़्यादा
साहित्य में दाखिल होता है।

किसे कहते हो स्वर्णयुग-
जिसमें जागता है कवि
रात-रात भर
या वह जिसमें
रातें नागिन-सी डसा करती हैं
वह कौन सा स्वर्णयुग
जिसमें कोई फरियादी
निरन्तर रोने और
कभी भी नींद भर न सोने
की षिकायत करता है।

कौन वह स्वर्णिम काल
जहां दुर्भिक्ष-अकाल
फटता है धरती का कलेजा
एक भूमिजा स्त्री
हार कर फिर
धरती में समा जाती है।
अथवा समानता की मांग पर
एक दलित
क़त्ल कर दिया जाता हो जिसमें।

इतिहास से बाहर
एक कविता
कै़द कर लेती है
इतिहास-पुरुशों के
जूतों तक के निषान।

इतिहास में सुरक्षित होंगे
अषोक महान् हो कर
वहीं, कहीं आस-पास
समुद्रगुप्त, विक्रमादित्य, अकबर
कितने षक, कितने हूण
कनिश्क के साथ कितने कुशाण
मंगोल, चोल, चन्देल
परमार, सिसोदिया और चैहान।

लेकिन वह कौन स्वर्णिम अतीत
जब कोई कुचलवा दिया जाता है
उन्मत्त हाथी के पांवों तले
किसी का हाथ
काट लिया जाता है।

किस काल में होता है प्लावन
पोत में बचाए जाते हैं
किसी तरह बीज-ज्ञान
कब फटते हैं ज्वालामुखी
भूमि कब होती है कम्पायमान।

सब कुछ निसिद्ध
होता है किस समय
खत्म हो जाते हैं
सारे अधिकार
षेश रह जाते हैं बस कर्तव्य।

आप समझते होंग
वह कौन-सा समय होता है
जब अंधेरा
जीवन का
बीजषब्द बनता जाता है
हिंसक पषु
खुलेआम घूमा करते हैं।

स्वर्णयुग
जो तुमनेे चाहे
मेरे लेखे
वह कठिन समय, वह बुरा समय।

स्वर्णयुग के लिए
पीछे मत लौटो मेरे बच्चों
आगे बढ़ो
तुम्हारे बिना
कोई स्वर्णयुग होगा कैसे ?
तुम अपने भावी सपनों
का निर्माण करो
मायावी अतीत कारा है
इससे बाहर निकलो।’’

इतना कह उस दिव्य-पुरुश ने
अपने बांए हाथ को झटका
सिगरेट
बुझ चुकी थी अब तक
जिसे उसने मसल कर फेंका।

इससे पहले
कि उसके लम्बे वक्तव्य से
बाहर आ हम
कुछ कह पाते
वह कांपते हुए
एक प्रकाषवृत्त में बदला
और फिर गुम हो गया।

        6
कई-कई दिनों के जागे
हम चारों जो विफल अभागे
निष्चिन्त हो कर सोये
बहुत दिनों तक खोए-खोए
भावी जीवन के स्वप्नों में
उठे तो फिर भूख के साथ।

हम अपने समय से
खाये हुए लात
करना चाहें अब
नए दिनों की बात
मगर अब भी मुष्किलें बहुत थीं।

गांधी अब महज़
एक मजबूरी का नाम था
ब्रह्मचर्य-नहीं वर्य
नपुंसक बनाता जो
अहिंसा के नाम पर
कनपटी पर तमाचे
ऐसे में कौन अब
गांधी को बांचे।
मजबूरी का नाम था
पूरा विचार ही
लाचार और बेकाम था।

अब उसके नाम पर
डोलता नहीं पत्ता
घिस-घिस कर नाम उसका
चोंथ-नोच डाली सत्ता
ये बदलाव के दिन
अलबत्ताण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्।

षक्तिपात
समय आपात
संवैधानिक अधिकार ही
करते आघात।

लोहिया और जयप्रकाष
अंधकार में हारे
व्यर्थ हो चुके जैसे
चिन्तक सब लस्त-पस्त
संगठित आन्दोलन
हुए पथभ्रश्ट-न्यस्त।

नक्सलबाड़ी के
षहीद मजदूर-किसान
आत्महत्या को विवष नौजवान
अधूरे ही रहे ख़्वाब
हर बार हर सवाल
रह जाता लाजवाब।

षासक और सन्त
एकमेक हो गए
करते हुए घोशणा-
इतिहास का अन्त
विचारों का अन्त
हा हन्त! हा हन्त!
कपिता का अन्त
प्रभु-महन्त !

जब ईष्वर बौराया
जंगल-जंगल भटके
जब आतंकी हत्यारे
उसके पीछे दौड़ें
जब ईष्वर को भी
मुष्किल से जान बचानी हो
जब भक्तों ने ही
तख्तों की हठ ठानी हो
वह कठिन समय, हमारा समय।

चमकता हुआ बाज़ार
लपलपाते हुए हथियार
लील लेने को तैयार
समूचा संसार।

मरता हुआ मेसोपोटामिया
घुटता हुआ कोरिया, ईरान
लातीन अमरीका, दक्षिण अफ्रीका
भूखा इथोपिया
क्यूबा, वियतनाम
ऐसे ही कितने नाम।

अतीत से बाहर
हमारा वर्तमान कितना भयावना
साम्राज्यवादी कर
गहते केष
गिरवी होता जाता
हमारा प्यारा देष।

स्पेषल इकनाॅमिक जोन
लखटकिया कार
मोबाइल फोन
चिन्ता से बाहर
आटा, किरासिन, नोन
स्पेषल इकनाॅमिक जोन।

किसान बेज़मीन
अपने स्वत्व से हीन
होकर मांगते-फिरते मुआवज़ा
भीख की तरह।
भोगने को अभिषप्त सज़ा
लाठियां, हत्या, बलात्कार
व्यापक नरसंहार
और एक आतंककारी मौन
स्पेषल इकनाॅमिक जोन।

रक्तपात और लूट
देख-देख, टूट-टूट
फिर से एक बार जुड़े,
हम जैसे बहुत लोग
भागते-फिरते हैं छिपे
ऐसे ही लोगों की गही बांह
हम चारों दोस्तों को
सूझी एक नयी राह
हम चारों साथ मुड़े।

       7
हम चार दोस्त
निकले वन की ओर।
वन दरोगा की आंख बचाकर
एक गिरे पेड़ को
खींचकर लाए।
बनाए उसे चीर कर चैले
फिर उपलों के ऊपर धरकर
चिता बनाई।

चैराहे पर
सिनेमा के पोस्टर
चिपकाने के लिए
रखी हुई बांस की सीढ़ी
को हमने लालच से देखा।

उसकी डांड़ों को तोड
कर हमने
उसे मूंज से बांधा
और टिकठी की षक्ल दी।

हम चार पुरुशों ने
उस पर
लिटा दिए
अपने-अपने अतीत के स्वर्णयुग।
हम चारों ने
अर्थी को अपने
पुनर्षक्तिसम्पन्न कन्धे दिये।
हमने अपने स्वर्णयुगों की
चिता जलाई
अपने-अपने मोह
को राख होते हुए देखा।

हम चार पुरुशों ने
हम चार दोस्तों ने
मृत स्वर्णयुगों पर
मिलकर गीत लिखा।

मोहभंग से
ऊपर उठकर
मानो हंसते हुए स्वयं पर
वह षोकगीत यहां
फिर से गा नहीं सकते।

                             

                            सम्पर्क सूत्र: निराला निवास, 265, छोटी वासुकी, दारागंज,
                                     इलाहाबाद-211006  मोबाइल 09415289529

1 comments:

' मिसिर' ने कहा…

हमारे सपनों का स्वर्ण-युग अतीत में नहीं ,वह भविष्य में है। वह मनुष्य के अस्तित्व के औचित्य में है। वह हमारे जिन्दा रहने की वजह है।
एक अच्छी कविता ,जो यदि कहानी के रूप में आती तो अधिक प्रभावी होती।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

फेसबुक से आये साथी

 
Copyright (c) 2010 असुविधा.... and Powered by Blogger.