अभी हाल में

:


विजेट आपके ब्लॉग पर

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

तुम्हे कैसे याद करूँ भगत सिंह?











जिन खेतों में तुमने बोई थी बंदूकें
उनमे उगी हैं नीली पड़ चुकी लाशें

जिन कारखानों में उगता था
तुम्हारी उम्मीद का लाल सूरज
वहां दिन को रोशनी
रात के अंधेरों से मिलती है

ज़िन्दगी से ऐसी थी तुम्हारी मोहब्बत
कि कांपी तक नही जबान
सू ऐ दार पर
इंक़लाब जिंदाबाद कहते
अभी एक सदी भी नही गुज़री
और ज़िन्दगी हो गयी है इतनी बेमानी
कि पूरी एक पीढी जी रही है
ज़हर के सहारे

तुमने देखना चाहा था
जिन हाथों में सुर्ख परचम
कुछ करने की नपुंसक सी तुष्टि में
रोज़ भरे जा रहे हैं
अख़बारों के पन्ने

तुम जिन्हें दे गए थे
एक मुडे हुए पन्ने वाले किताब
सजाकर रख दी है उन्होंने
घर की सबसे खुफिया आलमारी मैं

तुम्हारी तस्वीर ज़रूर निकल आयी है
इस साल जुलूसों में रंग-बिरंगे झंडों के साथ

सब बैचेन हैं
तुम्हारी सवाल करती आंखों पर
अपने अपने चश्मे सजाने को
तुम्हारी घूरती आँखें डरती हैं उन्हें
और तुम्हारी बातें गुज़रे ज़माने की लगती हैं

अवतार बनने की होड़ में
तुम्हारी तकरीरों में मनचाहे रंग

रंग-बिरंगे त्यौहारों के इस देश में
तुम्हारा जन्म भी एक उत्सव है

मै किस भीड़ में हो जाऊँ शामिल

तुम्हे कैसे याद करुँ भगत सिंह
जबकि जानता हूँ की तुम्हे याद करना
अपनी आत्मा को केंचुलों से निकल लाना है

कौन सा ख्वाब दूँ मै
अपनी बेटी की आंखों में
कौन सी मिट्टी लाकर रख दूँ
उसके सिरहाने

जलियांवाला बाग़ फैलते-फैलते
... हिन्दुस्तान बन गया है

9 comments:

bahadur patel ने कहा…

achchha hai.plz shabd pustikaran hatayen.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

शुक्रिया बहादुर भाई...हटा दिया वो झंझट अब आराम से टिप्पणिया करें

aseem ने कहा…

achi kavita hai..vivechna aur detailed tippadi baad me doonga

bahadur patel ने कहा…

election me laga tha abhi chhutkar aaya hoon.kavitaon ko blog par achchhe se prastut kiya hai.jhanjhat se mukt kiya. thanks.
mere blog parpadharen.

गौतम राजरिशी ने कहा…

आपकी लेखनी का जादू कुछ ऐसा चला है अशोक जी कि कुछ कहते नहीं बन रहा....

तो आज आपके पहले पोस्ट से पढ़ना शुरू कर रहा हूँ।

कविता की आखिरी पंक्ति झकझोर देती है

Santosh Kuamr Maurya ने कहा…

अंतर्मन को जिन्झोंड देने वाली कविता.

Vandana Sharma ने कहा…

''जबकि जानता हूँ कि तुम्हे याद करना
अपनी आत्मा को केंचुलों से निकाल लाना है'' ..पाठक को चेलेंज देती ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं मुझे ..बढ़िया, भाई ..

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

आखिरी पंक्तियां बेहद मार्मिक हैं. कवि- मन की व्यथा का बयान करती हैं, तो उसकी हताशा और लाचारी का भी.

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

आखिरी पंक्तियां बेहद मार्मिक हैं. कवि-मन की इच्छा-आकांक्षा के साथ-साथ, समय-प्रदत्त उसकी लाचारी और हताशा को भी दर्शाती हैं.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

फेसबुक से आये साथी

 
Copyright (c) 2010 असुविधा.... and Powered by Blogger.