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बुधवार, 26 नवंबर 2008

सबसे बुरे दिन

सबसे बुरे दिन नहीं थे वे
जब घर के नाम पर
चौकी थी एक छह बाई चार की
बमुश्किलन समा पाते थे जिसमे दो जि+स्म
लेकिन मन चातक सा उड़ता रहता था अबाध!

बुरे नहीं वे दिन भी
जब ज़रूरतों ने कर दिया था इतना मजबूर
कि लटपटा जाती थी जबान बार बार
और वे भी नहीं
जब दोस्तों की चाय में
दूध की जगह मिलानी होती थी मज+बूरियां.

कतई बुरे नहीं थे वे दिन
जब नहीं थी दरवाजे पर कोई नेमप्लेट
और नेमप्लेटों वाले तमाम दरवाजे
बन्द थे हमारे लिये.

इतने बुरे तो खैर नहीं हैं ये भी दिन
तमाम समझौतों और मजबूरियों के बावजूद
आ ही जाती है सात-आठ घण्टों की गहरी नींद
और नींद में वही अजीब अजीब सपने
सुबह अखबार पढ़कर अब भी खीजता है मन
और फाइलों पर टिप्पणियाँ लिखकर ऊबी कलम
अब भी हुलस कर लिखती है कविता.

बुरे होंगे वे दिन
अगर रहना पड़ा सुविधाओं के जंगल में निपट अकेला
दोस्तों की शक्लें हो गई बिल्कुल ग्राहकों सीं
नेमप्लेट के आतंक में दुबक गया मेरा नाम
नींद सपनों की जगह गोलियों की हो गई गुलाम
और कविता लिखी गई फाईलों की टिप्पणियांे सी.

बहुत बुरे होंगे वे दिन
जब रात की होगी बिल्कुल देह जैसी
और उम्मीद की चेकबुक जैसी
वि’वास होगा किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का विज्ञापन
खुशी घर का कोई नया सामान
और समझौते मजबूरी नहीं बन जायेंगे आदत.

लेकिन सबसे बुरे होंगे वे दिन
जब आने लगेगें इन दिनों के सपने!

5 comments:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सार्थक और सामयिक रचना है।बधाई।

बुरे होंगे वे दिन
अगर रहना पड़ा सुविधाओं के जंगल में निपट अकेला
दोस्तों की शक्लें हो गई बिल्कुल ग्राहकों सीं
नेमप्लेट के आतंक में दुबक गया मेरा नाम
नींद सपनों की जगह गोलियों की हो गई गुलाम
और कविता लिखी गई फाईलों की टिप्पणियांे सी.

archana ने कहा…

padate padate PASH yad aa gaye. 'Sabase bura hota hai sapano ka mar jana.'

archana ने कहा…

padate padate PASH yad aa gaye. 'Sabase bura hota hai sapano ka mar jana.'

सुशील कुमार ने कहा…

अशोक कुमार पाण्डेय की कविता ‘सबसे बुरे दिन’ उन बुरे दिनों के प्रति आदमी को सचेत करता है जहाँ आदमीयत की गंध का उसके कठिन समय की विकट परिस्थिति में बनावटी पूँजी-गंधों से दब कर कहीं खो जाने का डर बना रहता है। पर यह संशय आज के पूँजी केन्द्रित वातवरण के व्यामोह में फँसे समाज में बिल्कुल जायज है। दरअसल इस कविता में सुविधाभोगी वर्ग के प्रच्छन्न हेतुओं के प्रति एक आंतरिक विद्रोह का भाव है जो मन के तरंगों में एक सकारात्मक विक्षोभ की आवृतियाँ पैदा करता है। कविता पढ़कर आदमी यह सोचने को उद्धत होता है कि वह अपने अभाव के दिन तो किसी तरह हँस- खेल कर जी ही सकता है पर भोग-प्रमाद की सुविधाओं की लालच से बने दिन का एक पल भी जीना दूभर हो जायेगा क्योंकि धन हमारे चारो ओर मायाजाल की ऐसी श्रेणियाँ रचता है जिसमें वस्तु ही प्रधान होता है,आदमी के बजाय। वह आर्थिक श्रेणियों का आधार-मात्र और कहें कि उसका पिच्छ्लग्गू बनकर रह जाता है। कविता में अभिव्यक्ति का ढंग भी अनूठा है जो पाठक को अंत तक लीन रखता है। कवि की शब्दों में वह ताक़त है जिससे कवि की संवेदना निजी होते हुये भी पाठक की संवेदना में घुल जाता है और कवि के कहने का सत्व पाठक के विचार का तत्व बन जाता है। एक अच्छी कविता के लिये अशोक कुमार पाण्डेय जी को बधाई।-सुशील कुमार।

neera ने कहा…

सच! खूब कहा आपने..

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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