वैश्विक गांव के पंच परमेश्वर


पहला कुछ नहीं खरीदता
न कुछ बेचता है
बनाना तो दूर की बात है
बिगाड़ने तक का शऊर नहीं है उसे
पर तय वही करता है
कि क्या बनेगा- कितना बनेगा- कब बनेगा
खरीदेगा कौन- कौन बेचेगा


दूसरा कुछ नहीं पढ़ता
न कुछ लिखता है
परीक्षायें और डिग्रियाँ तो खैर जाने दें
किताबों से रहा नहीं कभी उसका वास्ता
पर तय वही करता है
कि कौन पढ़ेगा- क्या पढ़ेगा- कैसे पढ़ेगा
पास कौन होगा- कौन फेल

तीसरा कुछ नहीं खेलता
जोर से चल दे भर तो बढ़ जाता है रक्तचाप
धूल तक से बचना होता है उसे
पर तय वही करता है
कि कौन खेलेगा- क्या खेलेगा- कब खेलेगा
जीतेगा कौन- कौन हारेगा

चौथा किसी से नहीं लड़ता
दरअसल ’शुद्ध ’शाकाहारी है
बंदूक की ट्रिगर चलाना तो दूर की बात है
गुलेल तक चलाने में कांप जाता है
पर तय वही करता है
कि कौन लड़ेगा -किससे लड़ेगा - कब लड़ेगा
मारेगा कौन - कौन

और पाँचवां सिर्फ चारों का नाम तय करता है।

टिप्पणियाँ

Aseem N ने कहा…
wah..bahut acha kaha..satya vachan hai..karta hoi aur hai..karwata koi aur hai..
सुशील कुमार ने कहा…
यही तो विडम्बना है जनतन्त्र की भी कि जो कुछ भी नहीं करता वही हमारा अगुवा बन जाता है और हमें संचालित करता है। अच्छी और सफल कविता संवेदना को कुरदने में। लय की संगति कविता मे नवप्रभावोन्विति का उन्मेष कर पाठक को अंत तक बाँधे रखती है। धन्यवाद।
bahadur patel ने कहा…
bhai bahut hi achchhi kavita hai.kitana satik chitran kiya hai aapane. bahut achchhe-se political samajh ke sath kavita likhi hai.
is kavita ko padhate hu mujhe dhumil ki kavita yaad aayi..
ek aadami roti belata hai.
badhai.
sandhyagupta ने कहा…
Jis baat ko kehne me kitne hi pristh rangne padte use kitni sahajta se aapne chand panktiyon me kah diya . badhai.
BrijmohanShrivastava ने कहा…
एक अच्छा व्यंग्य

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