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गुरुवार, 8 जनवरी 2009

आग


इस आग से
नहीं पक सकती एक भी रोटी
इस आग मे जले आलुओं से
नही बुझ सकती किसी होरी की आग
नही काटी जा सकती इस आग मे
धुंधलाई सर्दियों की एक भी शाम

इस आग के चतुर्दिक
न शोकगीत गाये जा सकते हैं
न किये जा सकते हैं उल्लास के नृत्य

कोई सभ्यता नही बस सकती
इसके इर्दगिर्द हज़ार वर्षों मे भी
इस आग में झुलसे जंगलो में
फ़िर कभी नही उगती कोई कोंपल
किसी फूल सा नही होता इसका रंग
नही देखा जा सकता इसकी रोशनी में कोई दृश्य
दृश्यों को सोख जाती है यह आग!

सपनों में भी
सूर्य जितना दूर ही देखना चाहता हूँ
बीस करोड़ डिग्री सेल्सिअस की यह आग !!

7 comments:

neera ने कहा…

बहूत सुंदर कविता आज का सच बयां करती..

सुशील कुमार ने कहा…

सुंदर बिम्ब,कविता की लय और संगति भी लाजबाब। युद्ध की विभिषिका से दूर रहने का प्रच्छन्न संकेत। अमानुषिक वृति पर प्रहार।अशोक जी कविता की छांदस प्रकृति पर पूरा ध्यान देते है।

Bahadur Patel ने कहा…

bahut achchhi kavita ke liye meri badhi le.

सपनों में भी
सूर्य जितना दूर ही देखना चाहता हूँ
बीस करोड़ डिग्री सेल्सिअस की यह आग !!

main to sapano me bbi nahin dekhana chahata is tarah ki aag.
bachana chahata hoon antriksh ki chhoti se choti jagah bhi is aag se.
bahut badhiya hai bhai.
badhai.

Krishna Patel ने कहा…

इस आग से
नहीं पक सकती एक भी रोटी
इस आग मे जले आलुओं से
नही बुझ सकती किसी होरी की आग
नही काटी जा सकती इस आग मे
धुंधलाई सर्दियों की एक भी शाम

bahut achchhi kavita hai.aap ase hi likhte rhiye.

sandhyagupta ने कहा…

Yeh wo aag hai jis me keval vinash ka hi manjar dekha ja sakta hai.Kavi ne jin pratikon ke madhyam se is vibhishika ka chitran kiya hai wah atyant sukshm aur sahaj hai.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

आग का राग
कौन सकेगा भाग
इससे बचकर
छिपकर, बिना झुलसे
उलझ कर ही गिरेगा।

प्रदीप कांत ने कहा…

सपनों में भी
सूर्य जितना दूर ही देखना चाहता हूँ
बीस करोड़ डिग्री सेल्सिअस की यह आग !!

!!!!!!!!!!

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