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सोमवार, 13 अप्रैल 2009

कहां होंगी जगन की अम्मा ?

सतरंगे प्लास्टिक में सिमटे सौ ग्राम अंकल चिप्स के लिये

ठुनकती बिटिया के सामने थोड़ा शर्मिन्दा सा जेबें टटोलते
अचानक पहुंच जाता हूं बचपन के उस छोटे से कस्बे में

जहां भूजे की सोंधी सी महक से बैचैन हो ठुनकता था मैं

और मां बांस की रंगीन सी डलिया में दो मुठ्ठी चने डाल भेज देती थीं भड़भूजे पर

जहां इंतजार में होती थीं सुलगती हुइ हांड़ियों के बीच जगन की अम्मा।


तमाम दूसरी औरतों की तरह कोइ अपना निजी नाम नहीं था उनका

प्रेम या क्रोध के नितांत निजी क्षणों में भी बस जगन की अम्मा थीं वह

हालांकि पांच बेटियां भी थीं उनकीं एक पति भी रहा होगा जरूर

पर कभी जरूरत ही नहीं महसूस हुई उसे जानने की

हमारे लिये बस हंड़िया में दहकता बालू और उसमे खदकता भूजा था उनकी पहचान.


हालांकि उन दिनों दूरदर्शन के इकलौते चैनल पर नहीं था कहीं उसका विज्ञापन

हमारी अपनी नंदन,पराग या चंपक में भी नहीं

अव्वल तो थी हीं नहीं इतनी होर्दिंगे

और जो थीं उन पर कहीं नहीं था इनका जिक्र

पर मां के दूध और रक्त से मिला था मानो इसका स्वाद

तमाम खुशबुओं में सबसे सम्मोहक थी इसकी खुशबू

और तमाम दृश्यों में सबसे खूबसूरत था वह दृश्य


मुठि्ठयां भर भर कर फांकते हुए इसे हमने खेले बचपन के तमाम खेल

उंघती आंखो से हल किये गणित के प्रमेय

रि’तेदारों के घर रस के साथ यही मिला अक्सर

एक डलिया में बांटकर खाते बने हमारे पहले दोस्त

फ्राक में छुपा हमारी पहली प्रेमिकाओं ने यही दिया उपहार की तरह

यही खाते खाते पहले पहल पढ़े डिब्बाबंद खाने और शीतल पेयों के विज्ञापन!


और फिर जब सपने तलाशते पहुंचे महानगरों की अनजान गलियों के उदास कमरों में

आतीं रहीं अक्सर जगन की अम्मा मां के साथ पिता के थके हुए कंधो पर

पर धीरे धीरे घटने लगा उस खुशबू का सम्मोहन

और फिर खो गया समय की धुंध में तमाम दूसरी चीजों की तरह.


बरसों हुए अब तो उस गली से गुजरे

पता ही नहीं चला कब बदल गयी बांस की डलिया प्लास्टिक की प्लेटों में

और रस भूजा - चाय नमकीन में!



अब कहां होंगी जगन की अम्मा?

बुझे चूल्हे की कब्र पर तो कबके बन गये मकान

और उस कस्बे में अब तक नहीं खुली चिप्स की फैक्ट्री

और खुल भी जाती तो कहां होती जगह जगन की अम्मा के लिए?



क्या कर रहे होंगे आजकल मुहल्ले भर के बच्चों की डलिया में मुस्कान भर देने वाले हांथ?

आत्महत्या के आखिरी विकल्प के पहले होती हैं अनेक भयावह संभावनायें....



जेबें टटोलते मेरे शर्मिंदा हांथो को देखते हुए गौर से

दुकानदार ने बिटिया को पकड़ा दिये है- अंकल चिप्स!

30 comments:

Uday Prakash ने कहा…

बहुत ही मार्मिक लेकिन अपने समय के यथार्थ की संभवत: सबसे प्रकट और सबसे भयावह विडंबना को सहज आख्यानात्मक रोचकता के साथ व्यक्त करती एक स्मरणीय कविता. अभी कल ही मैंने नार्मन सोलोमान का लेख पढ़ा, जिसमें उसने कहा था कि राजनीति, बाज़ार और मीडिया की सारी ताकतें हमारी स्मृतियों को 'संपादित' (एडिट) करने में लगी हैं', ऐसे विस्मरण और स्मृति-भ्रम के दौर में 'जगन की अम्मा' और उसके चूल्हे की ओर जाना 'अंकल सैम के चिप्स' के साम्राज्य से अपनी अस्मिता बचाने जैसा प्रयत्न है.
इतनी बेहतीन कविता के लिए बधाई. हांलाकि समकालीन हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि-गण इस कविता में 'बचाने' के क्लीशे की खोज़ करते हुए, इसके वृहत्तर सामजिक संदर्भों से अआंखें मूंद कर अपनी घाघ जमुहाई की गुफा में जा सकते हैं.

neera ने कहा…

बेनाम होते हुए भी जगन की अम्मा का अपना अलग अस्तित्व है कितनी बारीकी से उसको उकेरा है सजीव किया है इस कविता में...

Shikha Deepak ने कहा…

जगन की अम्मा...........बहुत ही मार्मिक और भावपूर्ण लेखन। अच्छा लगा।

बेनामी ने कहा…

ashok ji

namaskar

sach kahun to, is kavita ko padhkar bahut baichen sa ho gaya hoon , man nahi maana; to apni patni aur apni choti si bitiya ko sunaya .. yaar ,bahut accha likhe ho .. kya kahun , na tareef ke liye shabd mil pa rahen hai aur na hi main is kavita me se bahaar aa pa raha hoon.. kitna sundar aur vyatit shabd chitran hai , mere dost..

main aapko kavita likhne ke liye badhai nahi doonga , itni acchi kavita ke liye badhai chota sa shabd hai .. main aapki lekhni ko salaam karta hoon ..

namaskar aur dhanyawad ki aapne is kavita ke dwara mujhe thodi der ke liye thaharne par mazboor kiya .

aapka

vijay kumar sapatti

varsha ने कहा…

फ्राक में छुपा हमारी पहली प्रेमिकाओं ने यही दिया उपहार की तरह .. kisi apne ne mujhe bhi bataya tha ki unke liye bhi frock me chupa kar koi amiyan lata tha.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

कहीं गुम कर देती है आपकी यह रचना ..बेहद सुन्दर यादो के संग बुनी हुई और बहुत कहती सुनती हुई ..बेहद पसंद आई

smriti ने कहा…

Ashok ji bahut hi acha likha hai... aaj ka pasarta bazarvad usme gum hoti hamari paramparaye aur dam todti insani zindgiyo ka sateek chitran dikhta hai apke is naye lekhan me....

बेनामी ने कहा…

priy ashok ji namaskar,
sarvpratham itne sahaj shabdo me apni baat aapne rakhi iske liye aap badhaai ke paatr hai....
sach me aaj ke is bhag daud ke mahoul me aapne jis tarh se jagan ki amma ke chulhe ko sbke samne rakhaa hai vah bahut achcha prayas hai........
Fazalsmriti

Bahadur Patel ने कहा…

uday prakash ji ne bahut achchhe se kaha.
vakai achchhi kavita hai.
par isako thik se post nahin kiya hai.font aur peron ka thik se upayog karo.

प्रदीप कांत ने कहा…

तमाम दूसरी औरतों की तरह कोइ अपना निजी नाम नहीं था उनका

प्रेम या क्रोध के नितांत निजी क्षणों में भी बस जगन की अम्मा थीं वह

हालांकि पांच बेटियां भी थीं उनकीं एक पति भी रहा होगा जरूर

पर कभी जरूरत ही नहीं महसूस हुई उसे जानने की

हमारे लिये बस हंड़िया में दहकता बालू और उसमे खदकता भूजा था उनकी पहचान.

- बाजार की भयावाह्ता पर एक गम्भीर चिन्तन और सोचने पर मजबूर करती कविता.

अक्षर जब शब्द बनते हैं ने कहा…

हमारे समय की नित्य खोती संवेदनायें और बाज़ारवाद से चोटिल होती भावनाओं को केन्द्र में रखकर एक अच्छी कविता लिखी है अशोक पाण्डेय ने। बधाई।- सुशील कुमार (sk.dumka@gmail.com)

मुसाफिर जाट ने कहा…

पांडे जी,
बीते दिनों और वर्तमान का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है.

साहिल ने कहा…

बहुत ही प्रासंगिक। बाज़ार किस तरह स्मृतियों को धुंधला रहा है, इस सन्दर्भ में भी और सिर्फ़ बेटे के नाम से जानी जाने वाली माँ, शर्मिंदा से जेबें टटोलने के सन्दर्भ में भी। एक साथ कई सारे विषयों पर जबरदस्त कविता।
बधाई।

Babli ने कहा…

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

uday prakashji ne kah diya jo mere dimaag me uth raha tha..
kher..
rachna marmik aour saargarbhit artho se lipti hui he..bahut kuchh apne aap si kahti hui...
sundar

sandhyagupta ने कहा…

Kaphi prabhav chodti hai aapki yah rachna.Badhai.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

जगन की अम्‍मा

आजकल जग की गन में हैं

वो गन नोटों की है

वोटों की है और

उससे लगी चोटों की है।


अम्‍मा जो स्‍मृति है

बसी है अभी तक मन में

कल होगी ब्‍लॉग के आंगन

स्‍मृति प्रांगण में।


अभी बहुत कुछ है जो

रह गया है जैसे

लोटपोट, चंदामामा वगैरह

जो पढ़ते रहे हैं बचपन में आप।


और वो गिल्‍ली डंडा

जो खूब खेला है आपने

पर बच्‍चों ने पकड़ लिया है क्रिकेट

जिस पर गेंद बल्‍ला ही नहीं खेलते
खेलते हैं सट्टा भी भरपूर

सट्टे का अड्डा है क्रिकेट हुजूर।

sureeli sharma ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने .बधाई

Sachin Malhotra ने कहा…

very nice blog.....

i have made a blog..
plz visit us my blog...
money saving....
http://savingsonline.blogspot.com/

thank you..

शोभना चौरे ने कहा…

हां इंतजार में होती थीं सुलगती हुइ हांड़ियों के बीच जगन की अम्मा।
jagan ki amma abhi bhi vhi hai uska svrup badal gya hai .
bahut hi marmikpost
dil ko chu lene vali
badhai

सचिन इंदौर ने कहा…

पेड, पत्तियों और चांद की नित नई कलाओं पर लिखी जा रही हों कविताएं ऐसे में निस्संदेह जगन की अम्मा के इर्द गिर्द बुनी गई यह कविता भरोसा देती है. जगन की अम्मा की कविता के केंद्र में वापसी तय की जाए. हम अपने असली चेहरे को बहुत पीछे धकेल देते हैं कविता को.
अशोक भाई को धन्यवाद

नीरज कुमार बौंठियाल ने कहा…

बेहद खुबसूरत है यह कविता. मन में कई सवाल पैदा कर गयी और कुछ भावी आशंकाएं भी पैदा कर गयी इस उपभोगतावादी संस्कृति में गिरते जीवन मूल्यों बीच

कुमार मुकुल ने कहा…

bahut marmik hai aapki kavita,kavtakosh meri ak kavita hai -pede ramotar ke-gyarah september wale sangrah me hai,padhiaga

Sushila Puri ने कहा…

अशोक जी !
आपकी कविता आज के समय की शातिर चालाकियों को बेनकाब करती है ,बधाई .......... अभी अभी कथाक्रम में आपकी कविता -'मौन' पढ़ी वो भी बेहद सुंदर है . मेरा ब्लॉग भी देखें .

Abhishek Mishra ने कहा…

Aisi hi kuch bhavnayein meri yadon mein bhi basi hain. Accchi lagi rachna.

Ajay ने कहा…

Hi! Ashok,
Nice poem to remember our past. The things have really changed with time & presently, lots are lost from past.

शरद कोकास ने कहा…

हंड़िया में दहकता बालू और उसमे खदकता भूजा यह जगन की अम्मा की ही नही हम सब की पहचान है जिसे हम धीरे धीरे खोते जा रहे है.पहचान की यह तलाश व्यर्थ ही नही है.यहाँ स्मृतियों के प्रति कोई पुर्वाग्रह भी नही है न ही आधुनिकता का कोई अन्ध विरोध.अत्यंत सहज ढंग से अपनी पहचान और स्मृतियों को बचाने का यह एक स्वाभाविक प्रयास है.यह कविता में भी अगर हो रहा है तो बहुत ज़रूरी है. बहर्हाल इस diction में आपकी कविता ज्यादा अच्छी लगती है अन्य की अपेक्षा.

गौतम राजरिशी ने कहा…

पढ़ते ही अपने गाँव चला गया...एक जगन की अम्मा उधर भी रहती हैं-नाम बदल कर। "सुधिया के माय" के नाम से जानी जाती है...

क्या लिखते हो कविवर आप, हम तो दीवाने हो गये हैं आपके।

बेनामी ने कहा…

owned!!!!

Padm Singh ने कहा…

अच्छी कविता !

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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