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सोमवार, 18 मई 2009

मौन

(यह कविता कथाक्रम के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुई है। लखनऊ से निकलने वाली इस पत्रिका में कविता का कालम वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना जी देखते हैं।)


हडप्पा की लिपि की तरह
अब तक नहीं पढी जा सकी
मौन की भाषा…



पानी सा रंगहीन नहीं होता मौन
आवाज़ की तरह
इसके भी होते हैं हज़ार रंग



बही के पन्नों पर लगा अंगूठा
एकलव्य का ही नहीं होता हमेशा

आलीशान इमारतों के दरवाज़ों पर
सलाम करते हांथों में
नफ़रत का दरिया होता है अक्सर



पलता रहता है नासूर सा
घर की अभेद दीवारों के भीतर
एक औरत के सीने में

पसर जाता है शब्दों के बीच
निर्वात सा
और सोख लेता है सारा जीवनद्रव्य



उतना निःशब्द नहीं होता मौन
उतना मासूम और शालीन
जितना कि
सुनाई देता है अक्सर

23 comments:

sidheshwer ने कहा…

जी हाँ, 'कथाक्रम' में पढ़ी यह कविता- बहुत बढ़िया साहब , जो मौन है वही तो मुखर है ,बाकी तो भाव नही शब्द भर है !

अनुपम अग्रवाल ने कहा…

मौन की भाषा के रंग दिखाती अच्छी रचना.

बधाई

venus kesari ने कहा…

पानी सा रंगहीन नहीं होता मौन
आवाज़ की तरह
इसके भी होते हैं हज़ार रंग

सुन्दर भाव

वीनस केसरी

मीत ने कहा…

गुरु जी ! प्रणाम !! कहाँ छपी कहाँ नहीं छपी ... किस ने देखी .. किस ने नहीं देखी, इन बातों से आज तक ज्यादा मतलब नहीं रहा ...अब तक .. ईश्वर करे ऐसा ही रहे ... लेकिन जहां जहां ... जब जब ..... कुछ दिल को छू गया .. रहा नहीं गया ... सो ............

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

ashok ji

main kya kahun , maun hi chha gaya hai .. aapki is poem ko padhkar .. maun ki apni abhivyakti haoti hai ...

aapke lekhan ko salaam karta hoon bhai..

vijay

डॉ .अनुराग ने कहा…

पसर जाता है शब्दों के बीच
निर्वात सा
और सोख लेता है सारा जीवनद्रव्य

उतना निःशब्द नहीं होता मौन
उतना मासूम और शालीन
जितना कि
सुनाई देता है अक्सर







अद्भुत ..देखिये ना .कितना मुखर है मौन !

smriti ने कहा…

fir ek baar bahut hi khubsurat rachna......vakai maun ke bhi apne hi shabd hote hai, apni abhivyakti hoti hai...

उतना निःशब्द नहीं होता मौन
उतना मासूम और शालीन
जितना कि
सुनाई देता है अक्सर

aur kai baar ek maun hazaro shabdo ka kaam kar jata hai........

varsha ने कहा…

उतना निःशब्द नहीं होता मौन... achche shabd diye aapne moun ko.

सुभाष नीरव ने कहा…

Ek khoobsurat, sammohit karne vali kavita ! Badhayee !

neera ने कहा…

निशब्द! इस कविता के मौन को सिर्फ सोखा जा सकता है, छुआ जा सकता है महसूस किया जा सकता है बस कुछ कहा नहीं जा सकता...

sanjay vyas ने कहा…

पंक्तिया मौन को एक आकार-सा देती है और मौन मुखर हो उठता है, कहीं भीतर तक चीरती है उसकी आवाज़...

Udan Tashtari ने कहा…

उतना निःशब्द नहीं होता मौन
उतना मासूम और शालीन
जितना कि
सुनाई देता है अक्सर


--बहुत गहरे उतर गई यह पंक्तियाँ..जबरदस्त रचना!! बहुत बधाई.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

उतना निःशब्द नहीं होता मौन
उतना मासूम और शालीन
जितना कि
सुनाई देता है अक्सर

मौन की भी आवाज कितनी मुखर, कितनी स्पष्ट है.............लाजवाब कविता, अध्बुध ..............

साहिल ने कहा…

na padhi ja sakne ke bawazood
bahut mukhar aur teekhi
bebaaq hoti hai maun ki bhasha

agar rah jaaye lambe arse tak
to jhakjhorne lagta hai maun
toofan ke pahle ki shaanti
aksar saabit hoti hai
maun ki bhasha.

aapki kavita padhte hi kuchh shabd man me ghumadne lage unhi ka nishkarsh hain ye panktiya.

Ashok bhai mujhe lagta hai ki is kavita ko aur bhi behtar karne ka vichar shayad aapke man me bhi hoga. baharhaal shukriya ek achchhi kavita ke liye.

बेनामी ने कहा…

sundar rachna aur ek baar fir yahi khunga ki moun ki bhasa ko padhne ka sahas bhi to hona chahiye kyuki ek aurat ke seene me chipe drd ko sunne ka sahas kahaa hai........
aur moun ko jis tarah mukhr kiya hai wah bahut achcha hai


fazalsathiya@gmail.com

शरद कोकास ने कहा…

हडप्पा की लिपि का ना पढा जाना मेरा बहुत ही प्रिय बिम्ब है इसे मैने पुरातत्ववेत्ता मे भी लिया है बिलकुल अलग सन्दर्भ में,देखियेगा. लम्बे अंतराल के बाद पत्रिकाओं में आपकी वापसी अच्छी लग रही है

गौतम राजरिशी ने कहा…

आह!
क्या लिखते हो आप...
"बही के पन्नों पर लगा अंगूठा/एकलव्य का ही नहीं होता हमेशा"
सच को कहना इतने सहज भाव से कि पढ़नेवाला एकदम से असहज हो उठे अद्‍भुत कला है।

shikha varshney ने कहा…

Bahut adhbhut bhav hain aapke lekhan main ....
maunswarn saman hai....
bahut achcha likha hai.

प्रदीप कांत ने कहा…

पानी सा रंगहीन नहीं होता मौन
आवाज़ की तरह
इसके भी होते हैं हज़ार रंग

मौन की भाषा मुखर है

विभाव ने कहा…

"निज मन की विथा मन ही राखो गोय" की रहीम द्वारा दर्ज विवशता को आपने अपनी कविता में नए अंदाज में आज के समय के विद्रुप परिस्थिति से जोड़कर प्रासंगिक बना दिया है।
अगर आपकी अनुमति हो तो मैं यह कविता दूसरों को दिखाना, पढ़ाना व सुनाना चाहता हूं।

बेनामी ने कहा…

kya baat hai!

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

अरे, वाह! आप तो सचमुच बहुत अच्छे रचनाकार हैं - आपकी यह रचना बता रही है! इसे पढ़कर प्रसन्नता हुई!

बेनामी ने कहा…

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