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रविवार, 5 जुलाई 2009

चूल्हा

( हिन्दी में पीढा, चौकी, कुदाल जैसी अतीत हो चुकी चीजों पर लिखी अतीतग्रस्त कविताओं की लम्बी शृंखला है। चूल्हा भी ऐसा ही पवित्र प्रतीक है ... पर मै जब इसे देखता हूँ तो यह अलग ही दीखता है)



चूल्हे की याद करता हूँ
तो याद आती है
ताखे पर टिमटिमाती ढिबरी
जलते - बुझते गोइंठे * की
जुगनू सी नाचती लुत्तियां
और इन सबकी आंच में
दिपदिपाता माँ का संवलाया चेहरा

उन गीतों की उदास धुनें
अब तक गूंजती हैं
स्मृतियों की अनंत गुहा में
लीपते हुए जिन्हें गाया करती थीं बुआ

छत तक जमी कालिख
दीवारों की सीलन
पसीने की गुम्साइन गंध
आँखों के माडे
दादी के ताने
चिढ- गुस्सा- उकताहट - आंसू

इतना कुछ आता हैयाद चूल्हे के साथ
कि उस सोंधे स्वाद से
मितलाने लगता है जी…
* कण्डा

21 comments:

‘नज़र’ ने कहा…

बहुत ही सच्ची कविता है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुन्दर और यथार्थ कविता। स्त्री की तत्कालीन परिस्थितियों को अंकित करती हुई।

समय ने कहा…

‘इतना कुछ आता हैयाद चूल्हे के साथ
कि उस सोंधे स्वाद से
मितलाने लगता है जी…’

इन आखिरी पंक्तियों ने बन रही मानसिकता को एक दम से झकझोर कर सुन्न कर दिया।

रंगनाथ सिंह ने कहा…

बहुत संवेदनषील कविता है।

neera ने कहा…

सोंधे स्वाद की खुशबू इतनी दूर तलक आई है
शुक्रिया!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

बेहतर कविता । अनोखी दृष्टि । आभार ।

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

bahut dino baad aayaa, kintu chatkrat hue bager nahi rahaa./.../
yaado me base pratiko me choolhe ke sang aapne kuchh aour pratiko ko ukera he..jo dil ko chhu jaati he. dhibri, goithe, littiya, gobar,(kanda)....waah ji waah.. gaanv ki yaad , maa kaa daaman sabkuchh to saamne aa gayaa.

neera ने कहा…

दोबारा पढने और दिन के उजाले में दिखाई दी धुँए के साथ उड़ती औरत की बेबसी, घुटन और आंसू...
आपकी कविताओं से छलकती संवेदना प्रभावित करती है साथ ही कवि की सूक्ष्म द्रष्टि... उन एतिहासिक अनुभवों, चित्रों और पलों को सहज शब्दों में बाँध पानी के ऊपर औरत की तस्वीर खींच देना...

Sushila Puri ने कहा…

bahut hi sundar........ashok ji aapne to seedhe mujhe ganw me phuncha diya ..............hardik bdhai

M VERMA ने कहा…

बारीक रचना. तमाम संवेदनाए सजीव हो उठी. कौन कहता है "पीढा, चौकी, कुदाल" अतीत हो चुकी है. यह तो संवेदनाओ को कुरेदने के लिये आज भी औजार है.
बहुत खूबसूरत रचना

pragya ने कहा…

chulhe ko aapne bade soundhe pan se yaad dilaya . bahut sunder.

शरद कोकास ने कहा…

हम सुविधाभोगी हो गये हैं ठीक भी है मनुष्य बेहतरी के प्रयास करता है चूल्हे से लेकर माईक्रोवेव तक के सफर में हमारे लिये चूल्हे को याद करना नॉस्टेल्जिक हो सकता है लेकिन जिनके लिये अभी कई साल चूल्हे से मुक्ति सम्भव नहीं है उनके लिये? अच्छी कविता है अशोक इस तरह की अन्य कवितायें भी दो . समयांतर आज आई है तुम्हारा लेख देखता हूँ .

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

vahi to sharad bhai

chulha hamare liye ek pavitra nastalgic pratik ho sakta hai par ise bhogane vaalon ke liye yah kasht kaa hii sabab hai....

purani vyavstha ki yaaden unhen hi sukh pahunchati hain jo iske kashto ke sahbhagi nahi the

विभाव ने कहा…

चूल्हा हम जैसे शहरियों के लिए हो सकता है नोस्टेलजिया, लेकिन आज भी इस यथार्थ में भारत का बहुत बड़ा हिस्सा रमा हुआ है। उनके लिए यह सामान्य सहज एवं अनिवार्य है। वो ना सही कम से कम हम तो सचेत हो सकते हैं। अपने सरोकारों को इनसे जोड़ सकते हैं।

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

ashok ji

namaskar

main kya likhun , us din subah se aaj tak kai baar ise padh liya par man shaant nahi hua..padhkar maan ki yaad aa jaati thi aur aankhe geeli ho jaati thi ..

aapko sach me mera pranaam .. aapki lekhni ko main salaam karta hoon bhai saheb...

bhaavnaaye aur shabdo ke dwara unko ujagar karna ....

itni shashkt rachna ki main apne beete hue kal me chala gaya , jahan abhaav the, garibhi ka jor tha , phir bhi maa chulhe par roti bana kar khilati thi

sab kuch vaisa hi hua hai , jaise aapne likha hai ...

bahut bahut dino ke baad kisi kavita ne itna andolit kiya hai ...

main aur meri patni ise kai baar padh chuke hai .. ab wo muhe mana karti hai ki aur na padhu kyonki phir main rone lag jaata hoon maan ki yaad me ...


just hats off to you ashok ji

vijay

varsha ने कहा…

इतना कुछ आता हैयाद चूल्हे के साथ
कि उस सोंधे स्वाद से
मितलाने लगता है जी…

ओम आर्य ने कहा…

मुझे साथ में यह भी याद आया अशोक भाई की उन गोइठों को सुलगाते-सुलगाते कैसे धुएँ से डबडबा जाती थी मां की आँखें...बहुत हीं भावमय पेंटिंग !!

अलक्षित ने कहा…

बहुत खूब, जवाब नहीं।

गौतम राजरिशी ने कहा…

आह!
पढ़ते ही निकली ये आह!!
महज तारीफ़ करके छोड़ दूं तो कैसे हो...आप जानते हो मैं आपका फैन हूँ..
ये अनूठापन जो आपका है वो विशिष्ट बनाता है आपको औरों से, उस भीड़ से जो अकविता, नई कविता, मुक्तछंद के नाम पर जो मन आये परोसते रहते हैं...

हम सलाम करते हैं अशोक जी! you are superb sir!!

प्रदीप कांत ने कहा…

‘इतना कुछ आता हैयाद चूल्हे के साथ
कि उस सोंधे स्वाद से
मितलाने लगता है जी…’

!!!!!!!!!!!!!!!!

Murari Pareek ने कहा…

कमाल है चूल्हे की याद से इतना याद आता है ! L.P.G. की गंध से भी याद आएगा पर अभी वक़्त है, जब बिजली से और अन्य साधनों से खाना बनने लगेगा तो L.P.G. का भी भाग्य संवरेगा ! हा हा हा

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