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शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

साहित्यिक महामानव मुर्दाबाद

इस बार बडे व्यथित मन से गोरख पान्डे की एक ग़ज़ल लगा रहा हूं। पता नहीं कि वजन वगैरह बराबर है या नहीं। आप इसे ग़ज़ल ना मानना चाहें तो न माने…महत्वपूर्ण इसकी अर्थवत्ता है)

रफ़्ता-रफ़्ता नज़रबंदी का ज़ादू घटता जाए है
रुख से उनके रफ़्ता-रफ़्ता परदा उतरता जाए है

ऊंचे से ऊंचे उससे भी ऊंचे और ऊंचे जो रहते हैं
उनके नीचे का खालीपन कंधों से पटता जाए है

गालिब-मीर कि दिल्ली देखी, देख के हम हैरान हुए
उनका शहर लोहे का बना था फूलों से कटता जाए है

ये तो अंधेरों के मालिक हैं हम उनको भी जाने हैं
जिनका सूरज डूबता जाये तख़्ता पलटता जाए है।

12 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

ग़ज़ल की क्या कही, बात में दम हो तो रुप कोई भी क्यों न हो।

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

पता नहीं हम लोग गोरख पांडे, हंसराज रहबर और मन्मथनाथ गुप्त को क्यों याद करना नहीं चाहते? लेकिन आपने गोरख पांडे को इस गजल के माध्यम से याद किया। मेरा शुक्रिया।

अपराजिता ने कहा…

बहुत दिनों के बाद गोरख पाण्डे की इन पंक्तियों को पढ़ने का मौका मिला। शुक्रिया

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

sahee hai yaha koi naee baat nahee hai

शरद कोकास

अरविन्द श्रीवास्तव ने कहा…

गोरख पांडे की गजल के साथ ही परिकथा में आपकी कहानी- पाँच सौ का नोट और छुट्टे पैसे के लिये आभार...

रंगनाथ सिंह ने कहा…

gorakh pande ki kavitavo ka har rup me svagat h.

aap gorakh pande ko vyaktigat rup se jante the to unse juda koi sansmaran lagaye.

varsha ने कहा…

गालिब-मीर कि दिल्ली देखी, देख के हम हैरान हुए
उनका शहर लोहे का बना था फूलों से कटता जाए है
beautiful..........

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

रंगनाथ जी
मेरा भी उनसे वैसे ही परिचय है जैसे आपका है।
व्यक्तिगत कैसे होता…जब तक समझने बूझने लायक हुआ वह जा चुके थे

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

aapke maadhyam se prapt gorakh pandayji ki gazal sir aankho par.
gazal ke vyakaran ke baare me mujh jesa budhhu kuchh jaanataa nahi, mujhe to ras lene me mazaa ataa he aour aaya.
dhnyavaad

प्रदीप कांत ने कहा…

गालिब-मीर कि दिल्ली देखी, देख के हम हैरान हुए
उनका शहर लोहे का बना था फूलों से कटता जाए है

!!!!!!!!!!!!!!!!!

शरद कोकास ने कहा…

मेरी टिप्प्णी मे शायद किसी तकनीकी गडबडी की वज़ह से कुछ आया नही. मै कहना चाहता था कि दरअसल गोरख पांडेय की रचनाओं में जो आग है वह किसी शिल्प की मोहताज़ नही है

गौतम राजरिशी ने कहा…

शरद जी की बातों से हमारी भी सहमति....गोरख पांडे को पढ़ना तो...

शुक्रिया अशोक भाई

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