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शनिवार, 8 अगस्त 2009

एक सैनिक की मौत


(The Spanish struggle is the fight of reaction against the people, against freedom. My whole life as an artist has been nothing more than a continuous struggle against reaction and the death of art. How could anybody think for a moment that I could be in agreement with reaction and death? ... In the panel on which I am working, which I shall call Guernica, and in all my recent works of art, I clearly express my abhorrence of the military caste which has sunk Spain in an ocean of pain and death... Pablo picasso on Guernica)

तीन रंगो के
लगभग सम्मानित से कपड़े में लिपटा
लौट आया है मेरा दोस्त

अखबारों के पन्नों
और दूरदर्शन के रूपहले परदों पर
भरपूर गौरवान्वित होने के बाद
उदास बैठै हैं पिता
थककर स्वरहीन हो गया है मां का रूदन
सूनी मांग और बच्चों की निरीह भूख के बीच
बार-बार फूट पड़ती है पत्नी

कभी-कभी एक किस्से का अंत
कितनी अंतहीन कहानियों का आरंभ होता है

और किस्सा भी क्या?
किसी बेनाम से शहर में बेरौनक सा बचपन
फिर सपनीली उम्र आते-आते
सिमट जाना सारे सपनो का
इर्द-गिर्द एक अदद नौकरी के

अब इसे संयोग कहिये या दुर्योग
या फिर केवल योग
कि दे’शभक्ति नौकरी की मजबूरी थी
और नौकरी जिंदगी की
इसीलिये भरती की भगदड़ में दब जाना महज हादसा है
और फंस जाना बारूदी सुरंगो में’ शहादत!

बचपन में कुत्तों के डर से रास्ते बदल देने वाला मेरा दोस्त
आठ को मार कर मरा था बारह
दु’शमनों के बीच फंसे आदमी के पास
बहादुरी के अलावा और चारा भी क्या है?

वैसे कोई युद्ध नहीं था
वहाँ जहाँ शहीद हुआ था मेरा दोस्त
दरअसल उस दिन अखबारों के पहले पन्ने पर
दोनो राष्ट्राध्यक्षों का आलिंगनबद्ध चित्र था
और उसी दिन ठीक उसी वक्त

देश के सबसे तेज चैनल पर चल रही थी
क्रिकेट के दोस्ताना संघर्षों पर चर्चा
एक दूसरे चैनल पर दोनों दे’शों के म’शहूर ’शायर
एक सी भाषा में कह रहे थे
लगभग एक सी गजलें तीसरे पर छूट रहे थे
हंसी के बेतहा’शा फव्वारे सीमाओं को तोड़कर
और तीनों पर अनवरत प्रवाहित
सैकड़ों नियमित खबरों की भीड़ मे दबी थीं
अलग-अलग वर्दियों में
एक ही कंपनी की गोलियों से बिंधी नौ बेनाम ला’शों
-
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अजीब खेल है कि
वजीरों की दोस्ती प्यादों की लाशों पर पनपती है
और जंग तो जंग’ शाति भी लहू पीती है!

13 comments:

गौतम राजरिशी ने कहा…

मैं तो आया था "अंतिम इच्छा" को पढ़ने...अचानक ये नया पोस्ट दिख गया, कविता आपकी ये जाने कितनी बार पढ़ चुका हूँ। मैं और मेरी अर्धांगिनी दोनों ने कई-कई बार पढ़ा है आपकी इस कविता को।
फिर से एक कचोट मन की परतों को खरोचता हुआ....समझाना कठिन होगा, किसी के लिये समझना भी....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अंतर्विरोध को ठीक से प्रस्तुत करती कविता। बधाई!

varsha ने कहा…

देशभक्ति नौकरी की मजबूरी थी
और नौकरी जिंदगी की.......kavita achchi hai....

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

ye bhi uttam.. ap jab bhi likhte hai man se likhte hai

neera ने कहा…

दोस्त, बाप, पत्नी, बच्चों का दर्द उकेरती... आत्मा विहीन समाज, राजनीति, मिडिया को आईने में उतारती एक अच्छी कविता...
सच! शान्ति भी लहू पीती है!!!

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

ashok ji

kya kahun ..... main nishabd hoon . kavita padhkar meri aankhe nam ho gayi .... sach to ye hai ki is desh me aazaadi ki keemat chukaane waalon ki koi keemat nahi hai aur ab dheere dheere ye desh banana country ban gaya hai jahan hamari sanvendnaaye poori tarh se mar gayi hai ....

aur main to ye bhi kahunga ki hum sab bhi lagbhag mare hue hi hai ...

main aapko is kavita ke liye salaam karta hoon aur naman karta hoon ....

namaskar .

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

sandhyagupta ने कहा…

Nishabd hoon!

Pawan Meraj ने कहा…

कुछ चन्द कवितायें ही है जो देश-भक्ती के झूठे आवरण के नीचे छिपी सच्चाइ की पड़ताल कर पाती है … एक शान्दार कविता के लिए बधाई

भूतनाथ ने कहा…

अजीब खेल है कि
वजीरों की दोस्ती प्यादों की लाशों पर पनपती है
और जंग तो जंग’ शाति भी लहू पीती है!main ek bargi to nirvaak ho gayaa samajh hi nahin aayaa ki kya kahun...kya likhun....!!aaj chnd panktiyaan likhi thi vahi de rahaa hun....!!

क्या हुआ जो मुहँ में घास है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो चोरों के सर पर ताज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो गरीबों के हिस्से में कोढ़ ओर खाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो अब हमें देशद्रोहियों पर नाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो सोने के दामों में बिक रहा अनाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो आधे देश में आतंकवादियों का राज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या जो कदम-कदम पे स्त्री की लुट रही लाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर आम आदमी हो रहा बर्बाद है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर शासन से सारी जनता नाराज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो देश के अंजाम का बहुत बुरा आगाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
इस लोकतंत्र में हर तरफ से आ रही गालियों की आवाज़ है
बस इसी तरह से मेरा यह देश आजाद है....!!!!

dr.r.ramkumar ने कहा…

Achchhi bhavpravan aur pravahi rachna hai -

संजीव गौतम ने कहा…

भाई कमाल का लिखते हैं आप आपके बारे में जानकर अच्छा लगा.

प्रदीप कांत ने कहा…

कभी-कभी एक किस्से का अंत
कितनी अंतहीन कहानियों का आरंभ होता है

BAHUT GAHARE ARTH.

Nishant ने कहा…

कविता अच्छी कहने से कुछ ऐसा लगता है, कि हम औपचारिकता लाद रहे हैं...चूँकि मैंने आपके बहुत से लेख पढ़े हैं, और आपकी गहरी दखल उसमें है इसमें कोई दो राय नहीं,,,वसुधा का १८५७ पर केन्द्रित अंक में भी आपके लेख पढ़े, पसंद आये........कविता के बारे मैं इतना कह सकता हूँ.......कविता के आरम्भ में धूमिल का हल्का सा बिम्ब आया है.....खासकर " राजकमल चौधरी के लिए".......अर्जुन वाली कविता मुझे बहुत अच्छी लगी......

Nishant kaushik


www.taaham.blogspot.com

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