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शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

तैयारी एक लम्बी यात्रा की !

हर यात्रा में शामिल है लौटना
अपने-अपने तरीके से

लौटता है कोई रोज़ द़फ़्तर से
पीठ पर लादे अपमानो की गठरी
और पोस्टडेटेड चेक़ों में
क़तरा-क़तरा बिकी सुरक्षा ओढ़कर
सो जाता हैं स्वप्नहीन नींद में ।

कोई लौटता है
प्यार की भरपूर तलाश के बाद
गले में बांधे शर्तों का पत्थर
और डूब जाता है
सात फेरों के दलदल में.
लौटता है
महानगर की अनवरत भागती सडकों से निकल
बरगद की ठहरी सी छाया में
और अगले ही पल सोचने लगता है
लौटने के बारे में।

लौटता है
नई ज़मीन की तलाश मे निकला कवि
उदास हाथों में पुरस्कार संभाले।
एक अधूरी कविता निकलती है
बाज़ार में शब्द तलाशती
और लौट आती है भकुआई सी।

लौट जाते हैं
जंगलों की तलाश में निकले बादल
खेतों की मेढ़ से....

अजीब समय है यह दोस्तों
अनन्त अनचाही यात्राओं में
हर कोई जी रहा हो जैसे विस्थापन
और ऐसे में बेहद ख़तरनाक है लौटना
अगर नहीं है वह
तैयारी एक लम्बी यात्रा की !

11 comments:

Apoorv ने कहा…

बेहतरीन कविता..वापसी के सच को बयाँ करती..
वैसे लौटने के कई सकारात्मक पक्ष भी होते हैं!!

neera ने कहा…

यथार्थ और सच्चाई के अनंत रंग अक्सर आपकी कविताओं में चमकते हैं खुली आँखों वो खटकते हैं आँखे मूंद लो तो झंझोड़ते हैं...

Udan Tashtari ने कहा…

अद्भुत रचना!!

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

आपकी लेखन शैली का कायला हूँ, बधाई.

विभाव ने कहा…

कविता में कल्पना से अधिक अनुभव शामिल है। अति सुंदर। बधाई।

ओम आर्य ने कहा…

WAAPASI KI BAAT BAHUT HI KHUBSOORAT HAI ..............JAISA KI APOORV JI NE KAHA HAI WAPASI KAI SAMBHAWANAO KO JANM DETI HAI .........BAHUT HI SUNDAR ABHIWYAKTI

varsha ने कहा…

हर कोई जी रहा हो जैसे विस्थापन

kam भकुआई सी nahin aapki yah kavita.

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

sach he, loutana hota hi he, lambi yaatra..anvarat chali rahti he/ knhi thamna nahi, rukanaa nahi/ jeevan aour mratyu..koi is yatra ko rok nahi pataa...///

khubsoorat se shbdo ki is yatra me yah rachna bhi dil ke kareeb lagi yaani gambheer aour satya.

sandhyagupta ने कहा…

Nishabd hoon.Bas.

प्रदीप कांत ने कहा…

लौटता है
नई ज़मीन की तलाश मे निकला कवि
उदास हाथों में पुरस्कार संभाले।
एक अधूरी कविता निकलती है
बाज़ार में शब्द तलाशती
और लौट आती है भकुआई सी।

हमेशा की तरह सच और यथार्थ.

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

ashok ji

aapki is kavita ne kahin bheetar choo liya hai mujhe ... i am speachless ..

no words can describe this outburst of emotions ..aap bahut acha likhte hai .. mujhe aapse seekhna hai ..

dhanywad

vijay
www.poemofvijay.blogspot.com

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