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रविवार, 29 नवंबर 2009

मै कलमा पढ़कर सुरैया नही बनना चाहती


( यह कविता गुजराती की मशहूर कवियत्री और सामाजिक कार्यकर्ता सरूप बेन की है। इसे गुजराती से हिन्दी में अनुदित मैंने किया है...बाकी तो बात ही बोले तो बेहतर )


क्या है वज़ह मेरे जीने की


नहीं

मै क़लमा पढकर सुरैया नहीं बनना चाहती

कि इस देश की तमाम सुरैया, फ़ातिमा, शहनाज़ या अमीना से

अलग नहीं मैं, असंबद्ध नहीं,जुदा नहीं

जब-जब इस देश के दुःशासनों के हाथों

सरेआम खींचा जाता है उनका दुपट्टा

मै निर्वस्त्र हो जाती हूं


जब-जब हिंस्त्र पशु छूते हैं उनकी देह

मसलते हैं, उधेडते हैं

चींथते हैं, रौदतें हैं, चूसते हैं

जबरन करते हैं प्रवेश

तार-तार कर लहूलुहान कर डालते हैं

तब-तब मैं भी घायल होती हूं

उन सैकडों हज़ारों सांप्रदायिक अष्त्रों से


जब-जब चीरकर सगर्भाओं के पेट

ये बाहर खींच लाते हैं मानवजाति का बीज

तब-तब मैं भी कट जाती हूं

उजड जाती हूं और नष्ट हो जाती हूं समूल


जब-जब गैस के सिलिण्डर

अन्नपूर्णा से नरभक्षी पशु बन जाते हैं

तब-तब मै भी जार-जार हो जाती हूं

भष्मीभूत, राख-झडती हुई राख

जब-जब अनाथ बच्चे कलपते हैं दूध के लिये

तब-तब मेरी छाती छलकती है इन सबके लिये


जब-जब ये लोग तलवार, कुल्हाडी या आरी से चीर डालते हैं

रहमान, सुलेमान,इरफ़ान,अमान या इमरान को

तब-तब सूना हो जाता है मेरा आंचल, बिस्तर ख़ाली

और मेंहदी भरे हाथों से रंग के साथ-साथ

उतर जाती है मेरी त्वचा भी


मेरे अहमदाबाद के

शाहपुर,दरियापुर,ज़ुहापुरा,ज़ार्डनरोड

बेहराम्पुरा और आलमपुरा से लेकर

बडोदा के हालोल, चांपानेर, पानवड, गोधरा तक

सुलग रही है पूरी पूर्वी पट्टी

फिर क्या वज़ह बचती है मेरे जीने की?


सब्र करो

तुम क्यों मरोगे कवि

तुम्हारा तो नहीं हुआ सर्वनाश

किसी सुरैया, सलमान या शाहपुर की तरह

तुम तो सरूप हो ना-- सरुपबेन योगेशभाई ध्रुव

सुख ही सुख हैं तुम्हें

इतनी बढिया सुविधा मिली है जीने और लिखने की

फिर इतना तो करो कम से कम

सुरैया, सलमान और शाहपुर के भविष्य की सुरक्षा के लिये

अब तो उठाओ हाथों में क़लम हथियार की तरह

कवि! कहो…हो तैयार!

19 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

महत्वपूर्ण कविता है।

neera ने कहा…

स्त्रीत्व और मानवता की यह चित्कार रोंगटे खड़े करने वाली है ... इतना सकून जरूर मिला है अनुवाद करने वाले ने कवियत्री और कविता दोनों के साथ न्याय किया है..

रचना ने कहा…

padhvaane kae liyae thanks
kavita sashkt haen agar original padhna aata to keh saktey anuvaad achcha yaa bura haen par hindi prastuti behtar haen yae kehsatae haen , bandh kar raktee haen

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

कहां हो चचा अशोक वाजपेई इस कविता को पढ़कर सीखो कि जन की कविता कैसे लिखी जाती है।
महत्वपूर्ण कविता है।

प्रदीप कांत ने कहा…

रोंगटे खड़े करने वाली कविता

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

बहुत महत्त्वपूर्ण कविता पढवाई अशोक भाई आपने - ख़ास कर तब, जब की वह गुजरात से है. शुक्रिया.

mahinder pal ने कहा…

bahut hi behtareen anuvad kiya hai . badhai !

आभा ने कहा…

महत्त्वपूर्ण कविता पढवाई अशोक भाई .......शुक्रिया.

शरद कोकास ने कहा…

इस तरह की कविता सरूप बेन ही लिख सकती है इसलिये कि इसमे टी.वी. में देखे हुए दृश्य नहीं हैं ..भले ही इसमें काव्यशास्त्रियों को स्थूलता नज़र आये लेकिन संवेदना को इसी तरह प्रवाहमान किया जा सकता है । अशोक जी का अनुवाद भी बढिया है ।

varsha ने कहा…

awe soo keoon ...hoon to awaak choon..

sandhyagupta ने कहा…

Gambhir chintan ko prerit karti hai yah rachna.Anuvad bhavanukul hai.

सुलभ सतरंगी ने कहा…

ये एक जन क्रंदन है.

अनुवाद में कहीं शब्दों का संग्यावाचक अतिवाद दिखता है. हो सकता ये वास्तविक संवेदना की मांग हो तभी तो कविता खुल कर बाहर आई है.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

जब-जब गैस के सिलिण्डर

अन्नपूर्णा से नरभक्षी पशु बन जाते हैं

तब-तब मै भी जार-जार हो जाती हूं

भष्मीभूत, राख-झडती हुई राख

जब-जब अनाथ बच्चे कलपते हैं दूध के लिये

तब-तब मेरी छाती छलकती है इन सबके लिये

नतमस्तक हूँ ......!!

Dhiresh ने कहा…

पढ़कर बेचैन हूँ.

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

बेचैनी को बढ़ाने वाली और रूह से सवाल करने वाली दग्ध पंक्तियां....

pawan meraj ने कहा…

kavita to shandaar hai hi anuvaad bhi achchha hua hai

गौतम राजरिशी ने कहा…

अभी-अभी शरद कोकास जी कि मर्म-स्पर्शी कविता से बेचैन हुए मन को निजात देने "असुविधा" पे आया, तो.....ओह!

कविता बात तो कह रही है जो कहना चाहती है और बड़े तेवर से कह रही है झकझोरती हुई पूरे वजूद को.....लेकिन कहीं कोई लय, कोई प्रवाह है जो टूट रहा है, जो इस पूरे तेवर को कविता होने से रोक रहा है। शायद इसलिये मैं खुद को विदेशी कविता या अन्य भाषाओं की कविता को पढ़ने से रोकता हूँ...एक तो हिंदी में ही इतना कुछ पढ़ने को शेष है और फिर शायद अनुवाद कविता का असल प्रवाह खो देते हैं....।

tarav amit ने कहा…

कविता वास्तव में झिंझोड़ देती है ... प्रवाह शायद वैसा नहीं है जैसा सामान्य नदी में होता है ! ये हिचकोलों से भरी,हिलती,लहराती उठा के पटक देने वाली नदी का प्रवाह है !
"कवि! कहो…हो तैयार!"-इस उठापटक के लिए ?

Suman ने कहा…

nice

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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