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गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश




तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश
गुज़र जाना चाहता हूं
सारे  देश- देशान्तरों से
पार कर लेना चाहता हूं
नदियां, पहाड़ और महासागर सभी
जान लेना चाहता हूं
शब्दों के सारे आयाम
ध्वनियों की सारी आवृतियां
दृश्य के सारे चमत्कार
अदृश्य के सारे रहस्य.

तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश
इस तरह चाहता हूं तुम्हारा साथ
जैसे वीणा के साथ उंगलियां प्रवीण
जैसे शब्द के साथ संदर्भ
जैसे गीत के साथ स्वर
जैसे रूदन के साथ अश्रु
जैसे गहन अंधकार के साथ उम्मीद
और जैसे हर हार के साथ मज़बूत होती ज़िद

बस महसूसते हुए तुम्हारा साथ
साझा करता तुम्हारी आंखों से स्वप्न
पैरो से मिलाता पदचाप
और साथ साथ गाता हुआ मुक्तिगान
तोड़ देना चाहता हूं सारे बन्ध

तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश
ख़ुद से शुरू करना चाहता हूं
संघर्षों का सिलसिला
और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये।

28 comments:

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

ashok ji

jab se aapka mail aaya , tab se hi padh raha hoon .... bhai ,aaj aapke kalam ko salaam , aapki us soch ko salaam , jisne ye bhaav bahari kavita ka srujan kiya .... waah waah kah kar is kavita ko choti nahi karunga ... ye kavita saare hi tareefo se upar hai ....

abhaar

vijay

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत ही दृढ़ निश्चयी कविता है। प्रेमिका यदि जनता हो तो!

आशुतोष दुबे ने कहा…

bahut sundar rachna hai.
हिन्दीकुंज

वाणी गीत ने कहा…

ख़ुद से शुरू करना चाहता हूं
संघर्षों का सिलसिला
और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये....

बहुत सुन्दर गीत ...

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

और जैसे हर हार के साथ मज़बूत होती ज़िद

तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश
ख़ुद से शुरू करना चाहता हूं
संघर्षों का सिलसिला
और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये।


ये पंक्तियाँ बार बार खींच कर लायेंगी यहाँ

सागर ने कहा…

सुबह की शुरुआत इस मधुर कविता के साथ करते बहुत अच्छा लगा... समझ रखने वालों के साथ यही समस्या है वो साधारण चीजों को भी असाधारण तरीके से समझाते हैं मसलन :-

जैसे वीणा के साथ उंगलियां प्रवीण
जैसे शब्द के साथ संदर्भ
जैसे गीत के साथ स्वर
जैसे रूदन के साथ अश्रु
जैसे गहन अंधकार के साथ उम्मीद
और जैसे हर हार के साथ मज़बूत होती ज़िद

दिन भर गुनने के लिए दे दिया... शुक्रिया.

Rangnath Singh ने कहा…

बहुत बढ़िया।

डॉ .अनुराग ने कहा…

दिलचस्प..............!

पारूल ने कहा…

और जैसे हर हार के साथ मज़बूत होती ज़िद...

:)

varsha ने कहा…

....और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये।
sirf prem karnewala hi likh sata hai yah panktiyan.

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

......
और साथ साथ गाता हुआ मुक्तिगान
तोड़ देना चाहता हूं सारे बन्ध....

तुम्हे प्रेम करते हुए...
अहर्निश....

neera ने कहा…

कविता में प्रेम किस कदर ज़िंदा है हर शब्द में गूंजता और महकता है और अंत में समर्पण ...
जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये।

सीप में मोती कि तरह!!!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

इस कविता को पढ़ कर अनुभूत करने के अलावा कुछ कहने की जरूरत भी महसूस हो सकती है क्या !
हाँ बाद में उच्चारित किया जा सकता है इसे आँखे बन्दकर...सोचते, महसूसते हुए बहुत कुछ !

आभार ।

rashmi ravija ने कहा…

और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये।
बस प्रेम से यही शक्ति मिलनी चाहिए...बहुत ही सुन्दर भाव हैं कविता के..

बेनामी ने कहा…

bahut sunder .............man romanchit ho gaya hai padkar

वन्दना ने कहा…

"तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश"
is title mein hi bahut kuch aa gaya aur kavita to jaise bahut kuch sochne ko majboor karti hai..........mehsoosne ko majboor karti hai........kin shabdon mein tarif karoon...........sare to aayam mohabbat ke sama gaye hain chand lafzon mein hi............lajawaab prastuti.

Pawan Meraj ने कहा…

ashok bhai ..... vallah hak!,
Shandar maja aa gaya

usha rai ने कहा…

ख़ुद से शुरू करना चाहता हूं
संघर्षों का सिलसिला
और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये।!!!
बहुत ही सशक्त प्रेमगीत !
अद्भुत और सम्मोहक
कविता ने दिल छू लिया बधाई !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये ..

खुद को जीतने के संघर्ष में सहज जुट जाना ... किसी दूसरे को प्राप्त करने के लिए ... प्रेम की पराकाष्ठा है ..

प्रदीप कांत ने कहा…

तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश
ख़ुद से शुरू करना चाहता हूं
संघर्षों का सिलसिला
और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये।

सचमुच दृढ़ निश्चयी कविता है।

शरद कोकास ने कहा…

मुझे शब्द युग्म बहुत पसन्द आये ।

Raj Ranjan ने कहा…

अनुभूतियाँ जब मन की गहिराई से निकलती है तो जो शब्द निकलते है वो तपते रेगिस्तान में पड़ने वाली बारिश कि बूंदों के सामान होती है....
आपकी कविता मन मस्तिस्क पर गहरे तक असर डालने वाली है.....

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता..मेरे मन को भाई

***************
'पाखी की दुनिया' में इस बार "मम्मी-पापा की लाडली"

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

प्रेम की प्रकृति
पूरी रीति-नीति

बिना अनीति के

सब कुछ जीती।

वर्षा ने कहा…

बड़ी ख़ूबसूरत प्रेम कविता, प्रेम जितना ही

neetu arora ने कहा…

wonderful poetry about the wonderful feeling of love.........

neetu arora ने कहा…

wonderful poetry about the wonderful feeling of love.........

neetu arora ने कहा…

wonderful poetry about the wonderful feeling of love.........

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