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मैं कैसे उन्हें दीवाना कह दूं…

चित्र
ये किन हाथों में पत्थर हैं? (अख़बार में छपी इस तस्वीर को देखकर)
ये कौन से हाथ हैं पत्थरों में लिथड़े ये कैसे चेहरे हैं पथराये हुए ये कैसी आंखे हैं नीले पत्थर की कौन सी मंज़िल है आधी सदी से बदहवास चलते इन पत्थर पहने पावों की
यह कौन सी जगह है किसकी है यह धरती किस देश का कौन सा हिस्सा किसकी सेना है और जनता किसकी कि दोनों ओर बस पत्थर ही पत्थर ये कौन अभागे लोग कि जिनके लिये दिल्ली का दिल भी पत्थर है…
किसका ख़ून है यह पत्थरों पर जो बस अख़बारों के पहले पन्ने पर काला होकर जम जाता है किनकी लाशें हैं ये जिनसे होकर दिल्ली का रस्ता जाता है मैं किस रस्ते से इन तक पहुंचूं किस भाषा में इनसे पूछूं कैसा दुख यह जिसका मर्सिया आधी सदी से ज़ारी है यह कौन सा गुस्सा कौन सी ज़िद है जो ख़ुद अपनी जान पे भारी है
मैं कैसे उन्हें दीवाना कह दूं… जिनकी आंखों का पानी जमकर सूख गया है जिनके होठों पर बोल नहीं बस एक पथरीला गुस्सा है जिनके हाथों का हुनर कसा है बस एक सुलगते पत्थर पर वह पत्थर जिसकी मंजिल भी बस पत्थर पहने सिर है एक
मै कैसे उन्हें दीवाना कह दूं…

कागज पर कलम से लगे उसके हाथ…

यह कविता बहुत पहले लिखी थी…फिर वर्तमान साहित्य में छपी भी…पर इसे लेकर हमेशा संशय रहा…पता नहीं इसका शिल्प इसे कविता होने भी देता है या नहीं…आप देखिये



काम पर कांता
सुबह पांच बजे...
रात बस अभी निकली है देहरी से नींद गांव की सीम तक विदा करना चाहती है मेहमान को पर.... साढ़े छह पर आती है राजू की बस !

साढ़े आठ बजे...
सब जा चुके हैं !
काम पर निकलने से पहले ही दर्द उतरने लगा है नसों में ये किसकी शक्ल है आइने में ? वर्षों हो गये ख़ुद का देखे हुए अरे....पौने नौ बज गये !

दस बजे...
कौन सी जगह है यह? बरसों पहले आई थी जहां थोड़े से खुले आसमान की तलाश में परम्परा के उफनते नालों को लांघ और आज तक हूं अपरिचित !
कसाईघर तक में अधिकार है कोसने का्… सरापने का पर यहां सिर्फ़ मुस्करा सकती हूं तब भी जब उस टकले अफ़सर की आंखे गले के नीचे सरक रही होती हैं या वो कल का छोकरा चपरासी सहला देता है उंगलियां फाईल देते-देते
और तब भी जब सारी मेहनत बौनी पड़ जाती है शाम की काॅफी ठुकरा देने पर !


शाम छह बजे...
जहां लौट कर जाना है मेरा अपना स्वर्ग
इंतज़ार मंे होगा बेटे का होमवर्क जूठे बर्तन / रात का मेनू और शायद कोई मेहमान भी !

रात ग्यार…

टूटे तारों की धूल के बीच

चित्र
असुविधा पर इस बार प्रस्तुत हैं युवा कवि मनोज कुमार झा की कवितायें। भारतभूषण पुरस्कार से सम्मानित मनोज युवा कविता परिदृश्य के बीच अपनी बेहद व्यंजनात्मक भाषा और एक सर्वथा नवीन शिल्प से अपनी अलग जगह बनाते हैं। जल्द ही आप उनकी और कवितायें पढ़ेंगे, वैसे उनकी कुछ और कवितायें यहां पढ़ी जा सकती हैं।







टूटे तारों की धूल के बीच

मैं कनेर के फूल के लिए आया यहाँ
और कटहल के पत्ते ले जाने गाभिन बकरियों के लिए
और कुछ भी शेष नहीं मेरा इस मसान में

पितामह किस मृत्यु की बात करते हो
जैसा कहते हैं कि लुढ़के पाए गए थे
सूखे कीचड़ से भरी सरकारी नाली में
या लगा था उन्हें भाला जो किसी ने जंगली
सूअर पर फेंका था
या सच है कि उतर गए थे मरे हुए कुँए में भाँग में लथपथ

सौरी से बँधी माँ को क्या पता उन जुड़वे
नौनिहालों की
उन दोनों की रूलाई टूटी कि तभी टूट गए स्मृति के सूते अनेक
वो मरे शायद पिता न जो फेंकी माँ की पीठ पर
लकड़ी की पुरानी कुर्सी
माँ ने ही खा ली थी चूल्हे की मिट्टी बहुत ज्यादा
या डाक्टर ने सूई दे दी वही जो वो पड़ोसी के
बीमार बैल के लिए लाया था

विगत यह बार-बार उठता समुद्र
और मैं नमक की एक ढ़ेला कभी फेन में घूमता
त…