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शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

सिर्फ थकी आंखों में आते हैं स्वप्न!

राबर्ट डब्ल्यू बुस का चित्र 'डिकेन्स ड्रीम्स',गुगल सर्च से साभार


आंखें

न जाने कितने दिनों से
किसी अनजानी चीज़ की तलाश में

घंटो खंगालती है कम्प्यूटर की स्क्रीन
किताबें न जाने कितनी बार उलट-पुलट डालीं
घर का हर कोना…अख़बार की हर ख़बर
शहर की तमाम गलियों में भटकती फिरतीं
कितने चेहरे, कितने दृश्य,
कितनी ही आवाज़ों से टकराकर लौटीं मायूस
चलती ही जा रही हैं जबसे ख़ुलीं

कितने ही चश्मे थककर चूर हो गये
ऊब गये कितने ही दृश्य
कितनों ने कहा- हमें आराम करने दो इस सुनसान गुफा में
कितने हाट-बाज़ार अपनी सारी चमक लिये
लौटे इनके दर से मायूस
कितने ही शब्द अंजन की तरह बह गये चुपचाप

इतिहास के अबूझ गिरि-गह्वरों में
गिरती-पड़ती-संभलती फिरती किसी बंजारे सी
सभालतीं एक-एक पत्थर
उन पर बने चित्र
और शब्द कुछ अबूझ
बेझिझक उतर पड़तीं महासागरों की अनन्त गहराईयों में
आकाशगंगाओं में तैरतीं अविराम

अजीब सी तलाश एक मुसलसल
अजीब सी प्यास कि बढ़ जाती है बुझते ही
मैं पूछता हूं अक्सरथक नहीं जाती तुम
और किसी मदमस्त नशेड़ी की तरह आता है झूमता सा जवाब
सिर्फ़ थकी आंखों में ही आते हैं स्वप्न!

14 comments:

अनिल कान्त ने कहा…

अच्छी कविता पढने का सुख ही अलग है

Travel Trade Service ने कहा…

Ashok ji sundar lag aji aap ka vivachan ...Regards..Nirmal Paneri

Ashok ने कहा…

Bhahut hi Gajab ki rachna hai Pandey Ji.

varsha ने कहा…

सिर्फ थकी आंखों में आते हैं स्वप्न....kisi madmast nashedi ki tarah aata hai jawab...vaah vaah.

rashmi ravija ने कहा…

अजीब सी तलाश एक मुसलसल
अजीब सी प्यास कि बढ़ जाती है बुझते ही

यह छटपटाहट ही कायम रखती है, जिजीविषा...वरना ख़्वाबों में ही वक़्त गुजरे.
सुन्दर कविता

शरद कोकास ने कहा…

कविता अपनी अंतिम पंक्तियों में और खुलती है और यह भी कि प्यास बढ़ाती है ।
मतलब यह कि इतना विस्तार देकर फिर सिमत जाती है । लेकिन पूर्णता तक तो पहुंच ही जाती है , कुछ हड़बड़ी मे सही ।

amoljadhao ने कहा…

The last stanza is really very good, ise lajawab ke bina koi word nahi mere paas

सागर ने कहा…

कविता पहले ही पढ़ ली गयी थी, पर ना जाने क्यों मैं आपकी इस कविता से तारतम्यता नहीं बिठा पा रहा हों... दिल कह नहीं रहा की सिर्फ थकी आँखों में ही आते हैं स्वप्ना... मैं संभवतः असमर्थ हूँ समझ पाने में सर.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

कोई बात नहीं सागर…वह मेरी व्यंजना है…ज़रूरी नहीं कि तुम्हें भी सही लगे…मैं बस यह कहना चाह रहा था कि सिर्फ़ श्रम ही बेहतर दुनिया के स्वप्न देख सकता है…स्वप्न का अर्थ भी तो हर आदमी के लिये अलग-अलग है ना…देखने वाले तो बिना नींद के भी स्वपन देख लेते हैं…

MONEY PLANT GROUP ने कहा…

ACHCHI KAVITA LIKHI HAI. मेरा नाम अरुण तिवारी है और मैं सूरत से हूँ। मैं सूरत से उत्तर प्रदेश में साड़ी का बिज़नस करना चाहता हू। क्या आप मेरी मदत कर सकते है ?

arun_2006_4u@yahoo.co.in

neera ने कहा…

स्वप्न और तलाश कभी ना बुझने वाली मर्ग तृष्णा.. सार्थक जीवन के
अमूल्य तत्व... सशक्त कविता... कविता की कुछः पंक्तियाँ बहुत अपनी सी लगती हैं... जैसे ...कितने ही शब्द अंजन की तरह बह गए चुपचाप.... अजीब सी प्यास कि बढ़ जाती है बुझते ही...

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

sirf thaki aankho me hi aata hai swapn!! badi sateek baat kahi sir aapne...:)

प्रदीप कांत ने कहा…

कितने ही चश्में थक कर हो गये चूर
कितने ही दृश्य ऊब गये


बेहतरीन प्रयोग अशोक भाई

असीम ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति

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