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सोमवार, 18 अप्रैल 2011

मनीषा कुलश्रेष्ठ की कवितायें






(मनीषा कुलश्रेष्ठ को हम सब एक शानदार कहानीकार के रूप में जानते हैं...आज इनके कवि रूप से आपका परिचय करा रहा हूँ. इन कविताओं को पढ़ते हुए आपको संवेदना के उन स्रोतों का सटीक पता चलता है जहां से मनीषा का मारक गद्य जन्म लेता है. मसलन 'सिमोन की डांट' कविता में स्त्री विमर्श के समकालीन दलदल के बीच उसके सबसे सकारात्मक पहलू को 'औरत की आजादी उसके पर्स में होती है' जैसे समृद्ध काव्यात्मक वाक्य के साथ वह अपना वक्तव्य बिलकुल साफगोई के साथ रखती हैं. अपने हालिया उपन्यास शिगाफ, बौनी होती परछाईं, कठपुतलियाँ और 'कुछ भी तो रूमानी नहीं' जैसे कहानी संग्रहों से एक विशिष्ट पहचान बना चुकी मनीषा जी की ये कवितायें उनसे और अधिक की उम्मीद जगती हैं.)

सिमोन की डांट


वह कह देता है _
'' मेरा पैसा, मेरा घर, मेरे निर्णय”
बन्द ताश के पत्ते लिए
जीतता जाता है
स्त्री कह नहीं पाती
बस सोच कर रह जाती है
'' मेरी देह, मेरी इच्छाएं, मेरे निर्णय!''


हर कोई देखता है उसके खुले हुए ताश के पत्ते
उसकी हार!
कंटीली फेन्स में फंसे मेमने सा
घातक होता है
पिंजरे से बाहर निकल कर
पर फैलाने का डर

पैसे पर आकर मात खाती है वह
अकसर सीमोन की डांट खाती है
'कहा था न,
औरत की आजादी उसके पर्स में होती है.

वह सिटपिटाती है -
'' पर्स तो है, मगर खाली है.
टूटी चप्पल जुडवाने के लिये तक तो
उसकी राह देखती हूँ.''

निकलना चाहती है वह
घर की देहरी से बाहर एक बार
ढूंढने को अपनी
खोई हुई आदिम आत्मनिर्भरता
जाने कहां, कैसे मिलेगी
दबी रखी होगी कहीं
परत दर परत चट्टानों के भीतर
जीवाश्म की तरह



कमल अधखिला

प्यार करना तो
मेरी पहली झुर्री को भी
पहली रूपहली लट को भी
करना

जो उग आए
आँखों के नीचे स्याही
याद रखना वो रातें
जो इस सफर में हमने
जाग के बिताईं

कभी न देना प्रेम में गुलाब
या लाल कार्नेशन
देना तो
जड़ों में दलदली मिट्टी लिये
कमल देना अधंखिला

प्यार करना तो ओट रखना अपनी हथेलियों की
कि गुज़रती उम्र की थरथराती लौ चुकते तेल और तेज़ हवा को अँगूठा दिखा कर
यहीं - कहीं ठिठक जाए

बाकी रहे वह एक सुख तब भी
कि जब कभी डुबोए स्मृति अपनी जलती उँगलियों के पोर
एलबमों के पन्नों में
ख्याल रखना
फीकी नहीं पड़ने पाए वह शोख़ हँसी



रोक लो प्रेम को तिकोना होने से



जब भी,
हम साथ हुए
उड ग़ई सर की छत
अकसर हम मिले
पथरीले फुटपाथों पर
बस स्टॉप के निर्जन कोने में

जब भी हम साथ हुए
ढूंढते रहे एकान्त
एक छत, एक कमरा
या यूं ही घूमते रहे आवारा
घण्टों मोटरसाईकल पर

आज भी सालों बाद
हम आमने सामने हैं
पर
बदली नहीं परिस्थितियां
न छत है, न उपयुक्त शालीन जगह
बैठ कर बात कर लेने भर को
यूं कहने को अपने अपने आरामदेह घर हैं
पर उन परिधियों में परस्पर मेरा तुम्हारा
प्रवेश निषिध्द है

आज भी हम खडे हैं
बस स्टॉप के इसी कोने में
प्रश्न वही है, ज्यों का त्यों
कहा/ चलें?

देखो,
मेरी मानो तो
बाज आओ
मत बोओ बीज
आने वाले दिनों के
रोक दो यहीं
प्रेम की बिगडती आकृति को
और बिगडने से
रोक लो प्रेम को तिकोना होने से


एक गूढ़ कविता

मैंने तुम्हें देखा दूर से
पीठ बाए खड़े थे
देखते गौर से आसमान
के कैनवास को
परखते बदलते रंगों को,
रोशनी के वृत्त में
ख़ड़े थे एक नायक की भंगिमा में
देह से उत्सर्ज़ित हो रही थी एक भाषा,
उस भाषा में कहीं छिपे हैं
मानो, ब्रह्माण्ड के समस्त रहस्य
जिन्हें तुम एक दिन मुझ पर व्यक्त करोगे
खोजी हुई फुरसत के पलों में
मैं ख़ड़े होने की उस आराम की मुद्रा में पाती हूँ
एक आवेग अंतरधारा - सा बहता
मैं भीगूँगी उसमें जब नींद से भाग कर
छिप कर जाग रही होउँगी
तुम्हारी बाँहों के जंगल में

उस उत्सर्जित भाषा में डूबती
दूर खड़ी हुई मैं लिख रही हूँ
एक गूढ़ कविता
जिसे व्याख्यायित करेगा समय

22 comments:

' मिसिर' ने कहा…

सुन्दर कवितायेँ ! स्त्री-पुरुष सम्बन्ध,अस्मिताओं का टकराव ,प्रेम की असहजता आदि
कवियत्रियों के बीच के अति संवेदनशील मुद्दे रहें हैं ! इन्हीं विषयों पर किन्तु स्पष्ट और
मौलिक कवितायें देखने को मिलीं !
मनीषा जी और अशोक जी आप दोनों इसके लिए बधाई के पात्र हैं !

वन्दना ने कहा…

आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है.........http://tetalaa.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

गहन विषय कविताओं के ..अच्छी प्रस्तुति

सुनील गज्जाणी ने कहा…

नमस्कार !
मनीषा जी आप को उदय पुर एकेडेमी द्वारा पुराक्रिष्ट होने पे बहुत बहुत बधाई ! आप की कविताए पढ़ी अच्छी अभिव्यक्ति लगी , साधुवाद .
सादर

विजय गौड़ ने कहा…

ek mahtwpurn kahanikar ki kavitain padhwane ke liye aabhar ashok. maine tou sirf kahaniya hi padhi hai aaj tak. haa idhar aaya upanyas shigaf padhna baki hai.

rashmi ravija ने कहा…

सहज सरल शब्दों में बहुत ही गहन अभिव्यक्ति

बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि है..मनीषा कुलश्रेष्ठ की ....उनकी रचनाएं पढवाने का शुक्रिया

Sunil Kumar ने कहा…

मनीषा जी आपकी कवितायेँ स्त्री पुरुष संबंधों को उद्घाटित करती है शब्दों का चयन बहुत सुन्दर और प्रशंसनीय अभिव्यक्ति , बधाई ...

Basant ने कहा…

मनीषा जी ने उन संबंधों पर कवितायें लिखने का खतरा उठाया जहां अति भावुक होने की गुंजायश रहती है. इस भावुकता से कविता शिल्प और कथ्य दोनों में लिजलिजी सी हो सकती है. इन कविताओं में ऐसा नहीं है. कथ्य और शिल्प में प्रभावी कसावट है और एक रवानगी है. मैं ऐसी रचनाएं तलाशता हूँ , पढता हूँ बहुत मन से . यह बात अलग है की ज़्यादातर इस विषय पर लिखते समय इतनी सम्पृक्ति और असम्प्रिक्ति साथ- साथ रख नहीं पाता. बधाई मनीषा जी. आप की अन्य कवितायें खोज कर पढूंगा.

महेश वर्मा ने कहा…

उस भाषा में कहीं छिपे हैं/ मानो, ब्रह्मांड के समस्त रहस्य /जिन्हें तुम एक दिन मुझ पर व्यक्त करोगे ..सुन्दर कविता , कवि और प्रकाशक को बधाई

k.joglekar ने कहा…

बहुत अच्छी रचनाये.खास तौर पर अशोक जी का शुक्रिया. इन रचनाओं को पढ़वाने के लिए.

chandra prakash rai ने कहा…

bahut hi achhi kavitayen hai aap ki .dil ko choo jati hai sabhi kavitayen ,sampoorn kavitayen hai aap ki rachnayen

manisha ने कहा…

आप सभी का आभार, मुझे उम्मीद नहीं थी कि ये कविताएँ सराही जाएँगी. बहुत अच्छा लगा आप सभी की सकारात्मक टिप्प्णियों को पढ़ कर. मनीषा कुलश्रेष्ठ

manisha ने कहा…

इतने प्रेरणास्पद शब्दों के लिए आप सभी का आभार. धन्यवाद अशोक, अच्छी प्रस्तुति है ब्लॉग की. मनीषा कुलश्रेष्ठ

अजेय ने कहा…

' प्यार करना तो ' वाली कविता ......

गीता पंडित (शमा) ने कहा…

कहीं दुराव नहीं ...कहीं छिपाव नहीं...
अंतर्मन की सतह पर होती उद्वेलना को लेखनी ने बड़े सलीके से प्रकट किया...

प्रेम जो जीवन का अभिन्न अंग है जिसके बिना जीवन संभव नहीं...उसी की सशक्त प्रस्तुति.....बधाई मनीषा जी....
और आभार अशोक जी का..."असुविधा" का.....सुंदर ब्लॉग है...मन को भा रहा है...
शुभ - कामनाएँ...

सुमन केशरी ने कहा…

कीचड़ पगा अधखिला कमल और हथेलियों की ओट एक औरत ही मांग सकती है...पढ़ कर अच्छा लगा...अपनी सी बात...सीमोन से फिर मुलाकात...

विमलेश त्रिपाठी ने कहा…

achhi kavitayen... badhai

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

कमाल की कविताएँ। आनंद आ गया।
मानव रचित विडंबनाएँ हमें क्यों मजबूर कर देती हैं?

वर्षा ने कहा…

स्त्री की आज़ादी उसके पर्स में है...पहली ही कविता पढ़ सकी बस...बहुत अच्छी लगी, बाकी फिर पढ़ूंगी

Rahul Albela ने कहा…

स्त्री और अपुरुष के अंतर्संबंधों को नए समीकरणों के साथ परिभाषित करती कविताएँ ,
पढ़कर अच्छा लगा,

Naresh Chandrkar ने कहा…

कविताएं अच्छी है ......... रोक लो प्यार को तिकोना होने से बहुत अनूठी है ...

प्रज्ञा पांडेय ने कहा…

maneesha ke bhasha aur abhivyakti ki atulniya kshamata hai .harek kavita bahut sunder hai gahan bhaawon men piroyi hui ..

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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