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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

परेशान दोस्तों के लिए एक कविता


परेशान दोस्तों के लिए एक कविता

चला जाऊँगा एक दिन
जैसे हर दिन चला जाता है कभी न लौटने के लिए
चला जाऊँगा जैसे चला जाता है सभा के बीच से उठकर कोई
जैसे उम्र के साथ जिंदगी से चले जाते हैं सपने तमाम
जैसे किसी के होठों पर एक प्यास रख उम्र चली जाती है

इतने परेशान न हो मेरे दोस्तों
कभी सोचा था बस तुम ही होगे साथ और चलते रहेंगे क़दम खुद ब खुद
बहुत चाहा था तुम्हारे कदमो से चलना
किसी पीछे छूट गए सा चला जाऊँगा एक दिन दृश्य से
बस कुछ दिन और मेरे ये कड़वे बोल
बस कुछ दिन और मेरी ये छटपटाहट
बस कुछ दिन और मेरे ये बेहूदा सवालात
फिर सब कुछ हो जाएगा सामान्य
खत्म हो जाऊँगा किसी मुश्किल किताब सा

कितने दिन जलेगी दोनों सिरों से जलती अशक्त मोमबत्ती
भभक कर बुझ जाऊँगा एक दिन सौंपकर तुम्हें तुम्हारे हिस्से का अन्धेरा

उम्र का क्या है खत्म ही हो जाती है एक दिन
सिर्फ साँसों के खत्म होने से ही तो नहीं होता खत्म कोई इंसान
एक दिन खत्म हो जाऊँगा जैसे खत्म हो जाती है बहुत दिन बाद मिले दोस्तों की बातें
एक दिन रीत जाउंगा जैसे रीत जाते है गर्मियों में तालाब
एक मुसलसल असुविधा है मेरा होना
तिरस्कारों के बोझ से दब खत्म हो जायेगी यह भी एक दिन
दृश्य में होता हुआ हो जाऊँगा एक दिन अदृश्य
अँधेरे के साथ जिस तरह खत्म होती जाती हैं परछाईयाँ

एक दिन चला जाउंगा मैं भी
जैसे हर दिन चला जाता है कभी न लौटने के लिए....

14 comments:

परमेन्द्र सिंह ने कहा…

अशोक भाई ! जाने की बात करके परेशान दोस्तों को और क्यों परेशान करते हो ? बेहद उदास कर देने वाली, कुछ वाजिब सवाल छोड़ती कविता !

उत्‍तमराव क्षीरसागर ने कहा…

अवसाद.....

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

dard...chhalk raha hai

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही अलग से मूड में रची गयी है रचना...
ऐसे ख्याल गाहे-बगाहे आते ही रहते हैं मन में....

Shiv Nath Kumar ने कहा…

दर्द भरी कविता .....!!

वन्दना ने कहा…

सच कहा सभी को एक दिन जाना है मगर गहरी रचना है बहुत कुछ कहती है।

abhi ने कहा…

निशब्द!!

मीनाक्षी ने कहा…

छटपटाहट और व्याकुलता का भाव ...!!

प्रज्ञा पांडेय ने कहा…

bahut tadap ke saath aaye hain bhaaw. badhaayi

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

बहुत हताशा और अवसाद झलकता है, झलकता क्या टपक रहा है. पाठक के मन को भी न जाने कैसा-कैसा कर देती है.

अपर्णा मनोज ने कहा…

अशोक पहले भी इस कविता ने व्यथित किया था , और आज सुबह -सुबह फिर वही ...

pankaj mishra ने कहा…

कोई क्यों ??
जाने के बाद भी
कभी पूरा नहीं जाता
क्यों थोड़ा वहीँ रह जाता है
जिस्म के भीतर
कोई काँटा
जैसे
टूट जाए
और
दर्द रह जाए |
ये , कैसा रिश्ता तुम से है.......(कोई यूँ ही नहीं चला जाता /कभी न आने के लिए ) तबीयत कुछ ..........पढ़ने के बाद ...असरदार ..याद रह जाने वाली

suren ने कहा…

घटना में रह कर उससे बाहर आने की छटपटाहट लिए इस कविता में अशोक जी कहते है ...चला जाऊंगा एक दिन ..... यूँही चले जाने के लिए नहीं बल्कि एक ऐसी रिक्तता छोड़ कर जिसे भरना नामुमकिन होगा ,चले जाना..से उत्पन्न अभाव वाचक पीडाएं ऐसे व्यक्त की गयी है की आप वाह ! नहीं करेंगे ....उद्दिग्न हो जायेंगे और उस अंतहीन शून्य में भाव ढूँढेंगे जैसे कसमसाता प्रेमी चाँद के सुराख़ में पागलों की तरह झांकता है .......

suren ने कहा…

घटना में रह कर उससे बाहर आने की छटपटाहट लिए इस कविता में अशोक जी कहते है ...चला जाऊंगा एक दिन ..... यूँही चले जाने के लिए नहीं बल्कि एक ऐसी रिक्तता छोड़ कर जिसे भरना नामुमकिन होगा ,चले जाना..से उत्पन्न अभाव वाचक पीडाएं ऐसे व्यक्त की गयी है की आप वाह ! नहीं करेंगे ....उद्दिग्न हो जायेंगे और उस अंतहीन शून्य में भाव ढूँढेंगे जैसे कसमसाता प्रेमी चाँद के सुराख़ में पागलों की तरह झांकता है .......

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