बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

कुबेर चुप नहीं बैठा होगा - एक दोस्त की श्रद्धांजलि



कुबेर जी का जाना हम सब के लिए एक आघात था...इतने ऊर्जावान व्यक्ति के इस तरह चले जाने से सारा साहित्य-जगत अवाक है. उनके अभिन्न मित्र जय नारायण बुधवार जी की यह कविता उस मनःस्थिति को बयान करती है जिससे इनके तमाम दोस्त गुजर रहे हैं.

कुबेर चुप नहीं बैठा होगा
रात  के दूसरे पहर 
गहरी नींद में प्रवेश करती 
मठाधीशों के खिलाफ अनवरत जिरह 
साहित्य की राजनीति के विरुद्ध दर्दीला आक्रोश 
आंसुओं से भीगी ,प्यार से पगी 
दोस्ती की असीम प्यास लिए जगा कर नींद से 
छोड़ जाती थी सवालों की खुमारी के साथ 
आसमानी आवाज
निश्चिंत होकर सोये गहरी नींद 
साहित्य का मोहल्ला 
चला गया 
खलल पैदा करने वाला जादूगर 
पथरीली व्यस्था की धसकती जमीन पर 
बसाता  सृजन का आनंदलोक 
लडाता वैचारिक पंजे 
हिलाता रहा तंत्र की चूलें 
नदी में रह कर लेता मगर से बैर 
पूरी बिरादरी के वास्ते 
आँखों में लगाये स्वचालित कैमरा
विचारों के तने पर 
चढ़ाता बिम्बों की बेल 
संगीत की लहरों पर 
नृत्य की लय में डूबता 
रंगों की क्यारी में कविता की कलम लगाता
वरवर राव   से रोरिख 
हिरण्यमय कार्लेकर से रात में हारमोनियम 
विज्ञान व्रत से उमाशंकर चौधरी
विजेंद्र से अरविन्द नारायण दास
निराला से रामविलास
नागार्जुन से त्रिलोचन
उसके सीने में बसे थे सहस्त्रों द्वीप
बारी बारी से विचरता
अपनी सल्तनत में स्वाधीन
रात के तीसरे पहर
जगाने वाला चौकीदार अपनी लाठी लिए
चला गया है
किसी दूसरे लोक में खोजने नए द्वीप
कुबेर चुप नहीं बैठा होगा...

6 टिप्पणियाँ:

' मिसिर' ने कहा…

.......... रात के तीसरे पहर जगाने वाला चौकीदार .........चला गया है नए द्वीपों को खोजने !
मार्मिक कविता ! दिवंगत कुबेर दत्त को भाव-भीनी श्रद्धांजलि !

Dr. Alka Singh ने कहा…

कुबेर दत्त को श्रधांजलि देते हुए जयनारायण बुधवार की ये कविता यक़ीनन सराहनीय है और सही मायनों मे एक श्रधांजलि
निराला से रामविलास
नागार्जुन से त्रिलोचन
उसके सीने मे बसे थे सहस्त्रों द्वीप
बारी बारी से विचरता अपनी सल्तनत मे स्वाधीन
ये लाइन यह बताती है के एक दोस्त को किस कदर कुबेर के होने का अहसास था और उसके जाने के अहसास के शब्द
के -
रात के तीसरे पहर जगाने वाला चौकीदार लाठी लिए
चला गया
यकीन से कहूँ तो इस दर्द को एक अच्छा दोस्त ही महसूस कर सकता है. मैं इसे सिर्फ कविता नहीं मानती यह कविता से आगे की बात है. बहुत शुक्रिया अशोक भाई बहुत बहुत शुक्रिया. आपकी वाल और आपका ब्लॉग दोनों जिन्दा होने का अहसास कराते हैं

Dr Alka Singh ने कहा…

कुबेर दत्त को श्रधांजलि देते हुए जयनारायण बुधवार की ये कविता यक़ीनन सराहनीय है और सही मायनों मे एक श्रधांजलि
निराला से रामविलास
नागार्जुन से त्रिलोचन
उसके सीने मे बसे थे सहस्त्रों द्वीप
बारी बारी से विचरता अपनी सल्तनत मे स्वाधीन
ये लाइन यह बताती है के एक दोस्त को किस कदर कुबेर के होने का अहसास था और उसके जाने के अहसास के शब्द
के -
रात के तीसरे पहर जगाने वाला चौकीदार लाठी लिए
चला गया
यकीन से कहूँ तो इस दर्द को एक अच्छा दोस्त ही महसूस कर सकता है. मैं इसे सिर्फ कविता नहीं मानती यह कविता से आगे की बात है. बहुत शुक्रिया अशोक भाई बहुत बहुत शुक्रिया. आपकी वाल और आपका ब्लॉग दोनों जिन्दा होने का अहसास कराते हैं

Umesh ने कहा…

भाव-लोक में ले जाकर विचलित कर देने वाली बेहतरीन कविता! कुबेर जी को सच्ची श्रद्धान्जलि यही है। यह जयनारायण जी जैसा उनका अभिन्न मित्र ही कर सकता था। धन्यवाद जयनारायण जी तथा अशोक भाई को इस श्रद्धांजलि प्रवाह के लिए, जिसमें हम भी गोता लगा सके, और यह महसूस कर सके कि कुबेर जी को मौत चुप नहीं करा सकती और वे आगे भी हमसे बतियाते रहेंगे अपनी कविताओं के माध्यम से।

Patali-The-Village ने कहा…

मार्मिक कविता|
दिवंगत कुबेर दत्त को भाव-भीनी श्रद्धांजलि|

उमेश महादोषी ने कहा…

एक ऊर्जावान और ह्रदयों में धधकती आग को शब्द देने वाले व्यक्तित्व का अचानक चला जाना स्तब्ध तो कर ही जाता है, उसकी जगह को भरना भी आसन नहीं होता है. जय नारायण जी की कविता के माध्यम से आपने मार्मिक श्रद्धांजलि दी है. कुबेर जी को मेरी भी हार्दिक श्रद्धांजलि.