हिन्दी में माँ पर तो बहुत कविताएँ लिखी गयीं हैं लेकिन पिता पर उतनी कविताएँ नहीं हैं. ऐसे में वंदना शर्मा की पिता पर लिखी यह कविता एक पुत्री की स्नेहिल स्मृतियों से आगे जाती है. पिता के प्रति अगाध श्रद्धा के बावजूद पिता को एक मनुष्य के रूप में उसके तमाम गुन-दोषों के साथ देखती यह कविता बार-बार पढ़े जाने की मांग करती है.
पिता
सोचती हूँ
यदि पिता पर लिखनी पड़े कोई कविता,तो क्या लिखूंगी
पिता पर लिखी गयी..
किसी भी कविता में,एक प्रश्न निश्चित आयेगा
कि क्या सचमुच मन्नतें नही होतीं बेटियाँ ....
तब उम्मीद के उस साल मेरा न आना,क्यूँ उदास कर गया पिता को
मेरे लिए सोचे गए नाम का हिस्सा,अग्रज को देते हुए,क्यों वे खुश नही थे !
जैसे ही आयेंगे पिता,कविता में
लिखने तो होंगे परिक्षा परिणामों के वे दिन,प्रतियोगिताओं की जीतें
या बड़े घरों के प्रस्तावों पर,वे विनम्र इन्कार पिता के ..
गर्व के उन क्षणों में,कभी नही भूले पिता,माँ को यह जताना
कि कितनी मिलती है उनकी बेटी उनसे और जरा नही है माँ के जैसी !
पिता पर लिखी गई किसी भी कविता को हैरान कर देंगे पिता
जो भटके हुए बादल से,तमाम लाभों को,डालते रहे मेरे हिस्से
इस तर्क के साथ कि जिस वर्ष आई थी मै,कसबे में बिजली भी आई थी
जरुरी तकाजों को परे हटा,वे लाये पोलर का पंखा
जो देता रहा ताजी हवा, ठीक पिता की ही तरह !
पिता पर लिखते हुए किसी भी कविता में जिक्र तो आयेगा
उन तमाम काली रातों का कि जिनके दरवाजों की कुण्डी से
बंधी रहीं,अनगिन चिंताएँ,धड़कता रहा माँ का ह्रदय,घडी की टिक टिक सा
कि जाने कब हो जाएँ राजद्रोह में बंदी,कच्ची ग्रहस्थी के पाए !
कविता में टहलेंगे चिंतित पिता,
जानकर सोता हुआ
द्रढ हाथ,बहुत हौले से सिर पर फेरते,
हाँ वे हमें कभी नही दे पाए,सिरहाने की,थोड़ी भी चिंता !
जब भी लिखूंगी वह कविता
धवल हो जाएगी लज्जा..
कि जब निर्धन पालित शिष्यों और बड़े हो रहे बच्चों से
होड़ ले रहे खर्चों की खातिर,विवश पिता का,एक ट्यूशन करना
नगरसेठ से,गाढे श्रम के,कुछ सौ रुपये लेकर आना
देख लिया था दूर गाँव के जानकार ने !
मुहँ दबाकर हंस पड़ेगी वह कविता
जिसमे होंगी ब्याह सगाई की तारीखें,आज़ादी के जश्न सरीखी
नही खुलते थे तब बस्ते,बस खुलते थे खाने के डिब्बे
क्यों कि छुटपन की किताबें, जगतीं थीं पिता के पदचाप से
और सो जातीं थीं, खर्राटों की, शुभसूचना के नाद से !
माँ के गणेश या रामकथा पर,
हँसते हुए पिता,कविता में गा ही जायेंगे
हाँ कभी नही जाने दिया,पढ़ती बिटिया को, मेलों ठेलों शादी ब्याहों में
हँसतीं हूँ, जब साथ नही देता मन,जागरणों,बन्ने,लाडो या जच्चा के गीतों में
और नजर आती हूँ, निरी मूढ़ सी,महिला संगीतों में !
पिता को कैसे लिख पाएगी कविता
जिन्हें, समझ नही पाते,नाती पोते
क्यों सुबह शाम का समाधान
बस गेहूं की दो चुपड़ी रोटी
छोड़कर,बर्गर पिज्जा !
वृद्ध एकाकी पिता पर लिखते हुए
भर आएँगी कविता की आँखें
है कहाँ,किसी को फुर्सत,
जो सुन सके,बीते अभाव की बातें
पिता, जिन्हें याद कर नही मिलते वह चिन्ह
जिनका होना है अपराध
कुल गोत्र ब्राह्मण रहा, है इतना भर याद !
और अंत में, मन ही मन पिघलेगी कविता
उन पिता पर,जो त्यौहारों पर,कभी नही करते माँ जैसी जिद
किन्तु सुबह होते ही करते बेचैन प्रतीक्षा
द्वार पर बजते ही,गाड़ियों के होर्न.
बहुत गौर से लगते पढने पढ़ी पढ़ाई पुस्तक
या कोई अखबार, पढ़ चुके होते जिसे, कई कई बार कई कई बार !!!
14 टिप्पणियाँ:
aapki ki adbhut roop se sundar hai aur pita ko samgrtaa men dekhatii hai .. bhaawon anubhaawon ke saath .
aapki ki adbhut roop se sundar hai aur pita ko samgrtaa men dekhatii hai .. bhaawon anubhaawon ke saath .
निस्संदेह संवेदना के अंतर्तम स्तर को छूने वाली कृति................पिता ऐसे ही होते आये है
वंदना ने मुश्किल काम को अंजाम दिया है. जीवन की जितनी-सारी घटनाएं हो सकती हैं, स्मृति में टिकी-जमी, उन्हें इस तरह उकेरना पूरी रागात्मकता के साथ, कोई बहुत आसान काम नहीं होता. पिता आए हैं कई कविताओं में, पर बड़े सपाट और इकहरे चरित्र चित्रण की शक्ल में. बेटी अपने पिता की जितनी छवियों और भाव भंगिमाओं के साथ जीती है, साथ न रहते हुए भी जी सकती है,वह शायद बेटों की कुव्वत के परे की चीज़ है.मैं अपनी कहूं , इस कविता से गुज़रते हुए न जाने कितने पिताओं को इस पिता में समाहित होते देख पाया हूं. एक बहुत शानदार पिता-केंद्रित कविता से मिलवाने के लिए वंदना और अशोक को बधाई-आभार. पता नहीं कहना चाहिए या नहीं, फिर भी कह देता हूं क्योंकि उंगलियों (कलम की नोक का मुहावरा तो पुराना पड़ गया !)पर आई बात को कह देना ही चाहिए. मुझे वंदना की अबतक की पढ़ी कविताओं में यह कविता 'मील का पत्थर' लगी है.
ऐसी कविता जिसे बार-बार पढ़ने की इच्छा होती है, शायद ही कोई इससे अछूता रह सके, इतनी सरलता और सहजता से आपने सबकुछ समेट लिया है...ये कविता कभी बासी नहीं होने वाली.. अद्भुत...मोहनजी आपने बिल्कुल ठीक कहा है...इस कविता से गुज़रते हुए न जाने कितने पिताओं को इस पिता में समाहित होते देख पाया हूं....सच में ये कविता मील का पत्थर ही है...विश्वास है कि आगे कई ऐसे मौके आएंगे....
पिता पर एक दुर्लभ पूर्ण कविया
अद्भुत !
स्त्रीवाद के झमेले में बार-बार पुरूष होने की मार खा रहे पिता के लिए बेटी की यह् कविता अमृत की तरह है...!!! वंदना को बधाई!
बेहद प्रभावपूर्ण व खुबसूरत...
pita par ek bhavpurna kavita
सचमुच दुर्लभ!
पिता के जीवन की यात्रा आत्मा सहित कविता में बहती नज़र आती है और इसकी सहजता, सरलता, संवेदना की प्रतिध्वनि पाठक को छूती है...
पिता के जीवन की यात्रा आत्मा सहित कविता में बहती नज़र आती है और इसकी सहजता, सरलता, संवेदना की प्रतिध्वनि पाठक को छूती है...
प्रभावी कविता!
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