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सोमवार, 5 दिसंबर 2011

ईश्वर के साथ बैठ कर भुट्टे खाने की जंगली इच्छा - बाबुषा कोहली


बाबुषा कोहली  की कविताओं पर लिखना आसान नहीं. सबसे पहले तो यह कि उसे किसी तयशुदा फ्रेम में नहीं रखा जा सकता है. उसकी कविताएँ बाहर से देखने में एक मस्तमौला मन की मस्ती लग सकती है...लेकिन जैसे-जैसे आप भीतर प्रवेश करते हैं वैसे-वैसे आपको उन कविताओं के शिल्प, शब्द-चयन और कथ्य के साथ किये गए ट्रीटमेंट के पीछे की मेहनत दिखाई देती है जो किसी चमत्कार की आकाँक्षा से नहीं बल्कि उसकी जेनुइन तड़प से निकले हैं. उसकी चिंताओं में पता नहीं क्या-क्या है...वह क्या-क्या और कैसे-कैसे सोचती रहती है और उस तलाश में कितना कुछ करती है, कभी उसकी कविताओं पर विस्तार से लिखने का मन है...अभी सीधे उसकी कविताएँ.




दस दिन और ग्यारह रातें 


कठोर हैं लाल स्याही के वे छल्ले

जो छिले हुए कैलेंडर की ओर बिना देखे
कुछ तिथियों की परिक्रमा करते हैं....
निर्लज्ज है वे तिथियाँ
जो रेत के दरिया में आधे डूबे
'ऑज़ीमैनडियास' के पैरों के जोड़े की मानिंद तनी हुयी हैं

एक क्षण है जिस पर कांटेदार बाड़ बंधी है
इस क्षण के ह्रदय में ही समाहित है एक युग
जो कटता नहीं / पर एक दिन कट ही जाएगा
क्रॉसिंग पर कारों का शोर सुनते हुए

कई बार पकड़ना चाहा
देह से उगी परछाईं को
जो सड़क पर लम्बवत खिसकती थी
उस दिन मेरे ही भीतर लुप्त हुयी

एक भीड़ भरी सड़क के बीचोंबीच अस्त हुआ सूर्य
कुछ ही दिनों में फिर उगेगा
मेरी परछाईं फिर आकार लेगी
ग्रहण समाप्त होते ही चबा लूंगी
तुलसी के पत्ते
जो मैंने पानी में डाल रखे हैं

छोटी छोटी अँगुलियों वाली एक लड़की के लिए
(जिसे 'मिल्स एंड बून' में कोई दिलचस्पी न होगी)
एक दिन खोल दूँगी वो संदूकची
जो असंख्य कथाओं से भरी पड़ी है

एक छिले हुए कैलेंडर की धूल पोंछ दी जाएगी
वो जानेगी एक दिन
कैसे हुआ था प्रग्रह के पूर्व सूर्य का अश्रु स्नान !

वो जानेगी
जीवन पृथ्‍वी की तरह होगा
शेष के फन की तरह होगा प्रेम
जिस पर टिकती है पृथ्‍वी.

आठवां दिन


उस दिन कमरे के भीतर झुलसा देने वाली धूप थी
जबकि सड़कों पर कोहरे के श्वित जंगल के सिवा कुछ भी न था
अज्ञात पते से आयी एक चिट्ठी तकिये के नीचे चुपचाप सो गयी
शहर की सारी घड़ियाँ यूँ बौरायी मानो कोलैन्दा खाए बैठी हों

किसी के आगमन का भ्रम पैदा करने वाला कागा
उस दिन भी छत की मुंडेर पर बैठा था
कि पूर्व से आते हुए एक विषद्रुह ने उसका ह्रदय बेध दिया

मैं क्षितिज को धरती पर
गलीचे की तरह बिछा देना चाहती हूँ
जो स्वप्न भरी दो जोड़ी आँखों को
अनंत काल से छलता आया है
उस पर जमी हुयी धूल को बुहार कर वहीं टंगा दूँगी
पुनः देखना चाहती हूँ
क्या अब भी वह पहले सा दिखता है ?

यहाँ से तुम और मैं विपरीत दिशाओं की ओर आगे बढ़ेंगे
तुम सोने की तारों से जड़ी हुयी 'अल डोराडो' की सड़कों पर चलना
कोकई पंखों वाली तितलियाँ तुम्हारे आगे उड़ते हुए
तुम्हें गंतव्य तक ले जायेंगी

इसके उलट मैं 'अल अमरजा ' चुनती हूँ !

जिह्वा पर काली चाय का कड़वा स्वाद
और काँधे पर माँ के हाथ का स्पर्श
मेरी लम्बी और दुरूह यात्राओं में
सदा साथ बने रहे हैं
(तब भी जबकि मैं स्वयं अपने साथ न थी )

ईश्वर के साथ बैठ कर भुट्टे खाने की
मेरी जंगली इच्छा पूर्ण होने वाली है
गोकि मेरे काले बाल और झुर्रीरहित विंशंक मुख
उसे सदियों तक विस्मेर रखेंगे
( उसके चेहरे के बारे में अब तक मैंने कोई अनुमान नहीं लगाया)

एक मिट्टी का घड़ा
(जो स्वयं को पितरहा समझता था )
आज विवर्तित हुआ है
सड़क के उस पार बैठा पथोरा
अपने सधे हुए हाथों से अब भी विरच रहा है
नए नए घड़े ..

किसी स्वर्ण महल के भीतर बैठे हुए
एक दिन तुम्हारे सिर के ऊपर बरगद उगेगा
एक दिन तुम भीज जाओगे
यह सोचते हुए -
कि धरती प्रेम में डूबी किसी स्त्री जैसी
लचीली और अस्थिर है

एक दिन ' अल डोराडो' और 'अल अमरजा'
आपस में अपने स्थान बदल लेंगे
संभवतः वो एक कोलाहल से भरा हुआ व्यस्त दिन होगा

जबकि मैं
ईश्वर की पीठ पर टिके हुए
भुट्टे खा रही होउंगी !


चौथा आदमी


वहाँ चार आदमी थे
पहला - शब्दों से भरा हुआ था
उसके मुंह से ही नहीं
नाक, कान और आँखों से भी 
शब्द टपकते थे !
शब्दों के ढेर पर खड़ा 
उसे गीता कंठस्थ थी ;
परन्तु उसे कृष्ण का पता न था !

दूसरा - अर्थों से भरा हुआ था !
वह हर समय
परिभाषाएं गढ़ता
मौसम-खगोल-रहस्य
आकाश- पाताल
भूगोल, राजनीति
कला, प्रेम की
व्याख्या करता
अर्थों को खोजती उसकी नज़रें 
मेरे उभारों और
गोलाइयों की विवेचना करती थीं !

तीसरा - मौन से भरा हुआ था
उसके माथे पर  चन्दन चमकता
उसके मौन के चारों ओर 
अपार भीड़ थी
उसे पूजा जाता था 
उसका तना हुआ चेहरा देख लगता था
उसने अपनी जुबान का 
गला दबा रखा हो 
उसकी जबान को छोड़ 
बाक़ी सब कुछ बोलता था
उसके मौन में बहुत शोर था

चौथा आदमी -
वह खालीपन से भरा हुआ था !
घुटनों के बल बैठा 
आकाश को निहारता
उसकी ख़ाली आँखें भरी हुयी थीं 
खींचतीं थीं 
जैसे ल्युनैटिक्स को 
खींचता है चाँद 

और मैं खिंच गयी थी !
उसके ख़ालीपन में मैंने 
छलांग लगा दी !
हम एक के भीतर एक थे
पर दो थे !
हमारी सटी हुई त्‍वचाएं जल्द ही 
ऐसी महीन रेशमी चादर में 
बदल गयीं
कि हवाएं उसके आर-पार जाती थीं !
बौछारें वहां मुक़ाम बना टिक जाती थीं
हम दोनों की सटी हुई त्‍वचाओं के बीच भी 
हमने ख़ाली ही छोड़ी थी वो ख़ाली जगह
अब -
उस ख़ाली जगह में;
गिलहरियाँ फुदकती हैं ,
पपीहे गीत गाते हैं ;
तितलियों का रंग वहीं बनता है 
चाँद की कलाएं बदलने के बाद वहीं आकर रहती हैं
वहीं बहती रहती है शराब ,
झरने वहीं से फूटते हैं 

और एक दरवेश ;
एक हाथ से आकाश थामे ;
दूसरे से धरती सम्भाले -
अपनी ही धुरी पर
घूमता रहता है गोल-गोल !

कुछ डिब्बाबंद ख़याल 

ज़्यादातर स्त्रियों की नहीं होतीं ,
आँखें ,कान या नाक -
वे होती हैं 
मात्र  गहरी -अंधी सुरंगें !



गाय पॉलीथीन खा गयी 
आदमी सूअर खा गया 
औरत खा गयी 
अपना ही गुलाबी कलेजा -
हर कोई  खुद को मारने पर उतारू था !

*
सुख के गुच्छे जितने घने थे
दुःख की जड़ें उतनी गहरी !
रात के तीसरे पहर में जागते हुए 
ऐसे ही कभी उसने
सापेक्षता के सिद्धांत के बारे में सोचा होगा !

*


मैंने उड़ने दिया 
सुनहरे पंखों वाली इच्छाओं को ,
लुभावनी कलाबाज़ी के साथ 
एक ऊंची  उड़ान-
फिर वे खो  गयीं अदृश्य 
अनंत आकाश में !

*

मैंने नहीं मारा इच्छा को 
कि -
वो बेचारी तो 
खुद ही अमर नहीं !



मेरे खून से ख़तम हो रहा है लोहा 
ऐसा डॉक्टर ने कहा -
मुझे लगा 
बढ़ रहा है हर दिन 

*
मैं फ़्रांस हूँ और यह असंभव है कि मैं कभी साइबेरिया हो जाऊं !
मेरे गुम्बदों पर सोने के तार जड़े हुए हैं और मेरे अस्तित्व पर बर्फ नहीं गिरती .
मेरा हर श्वास नूतन है
विश्व के कुछ हिस्सों के लिए प्रेरक
कुछ के लिए घातक हूं मैं
मेरे प्रति तटस्थ दृष्टिकोण रखना असंभव है




संपर्क - "baabusha" <baabusha@gmail.com>

31 comments:

' मिसिर' ने कहा…

ऐसा लगता है कि बबूषा कोहली की विचार यात्रा भीतर की ओर मन के सभी स्तरों के पार जाकर स्थिरता के झुर्रीविहीन आकाश तक पँहुच गयी है ! यहाँ से जब भी अभिव्यक्ति होती है , शब्दों से होती हुई और उनकी संकीर्णताओं से निकल दृश्य-बिम्बों के माध्यम से गोचर होने लगती है ! रूप अर्थित होने लगता है और अर्थ रूपायित होने लगता है !
अद्भुत और विलक्षण शब्द विन्यास ! घाट की ओर उतरती भोर के धुंधलके में डूबी सीढ़ियों जैसी कविताये ! आभार ,अशोक जी का प्रस्तुतीकरण के लिए और बबूषा जी को बधाई !

अजेय ने कहा…

चेतना के जिस तल पर बैठ कर बाबुषा अपनी *बात* कहना चाह रही है उस *बात* के बारे कुछ कहना असम्भव है.क्यो कि वह बात खुद ही मुकम्मल होना चाहती और अंततः खुद ही खारिज भी हो जाना चाह रही है. उस बात को देखने के लिए हमारे पास जो लेंस हैं,कहने के लिए जो श्ब्द हैं वे कमज़ोर हैं . वो बात अगोचर है, अकथ भी..... लेकिन उस की गंध हम सूँघ सक्ते हैं ......उस की ध्वनियाँ हम सुंन सकते हैं ......उस बात को हम छू भी सकते हैं ....लेकिन शायद पूरी कोशिशो के बावजूद कह नही सकते ....कोई नही कह पाता ; बाबुषा भी नही . लेकिन जब वह बहने लगती है तो हमे लगता है मानो उस ने कुछ कहा...... इसी लिए बाबुषा को * बहना * कहता हूँ .....

" आखिरी बात तो अभी कही जानी है

यह जो कुछ कहा है
आखिरी बात कहने के लिए ही कहा है।

आखिरी बात तो दोस्त
बरसात की तरह कही जाएगी
बौछारों में
और जो परनाले चलेंगे
पिछली तमाम बातें उनमें बह जाएंगी।

बातों -बातों में बातों की
बेबुनियाद इमारतें ढह जाएंगी
फिर उसके बाद कोई बात कहने की
ज़रूरत नहीं रह जाएगी

आखिरी बात कहने के लिए ही
जिए जा रहा हूँ
जीता रहूँगा
आखिरी बात कहे जाने तक"

1999

Pratibha Katiyar ने कहा…

बाबुशा की कविताओं की रेंज काफी विस्तृत है और संवेदना व विचार का सही तालमेल. सीधे असर करती हैं कवितायेँ...

प्रदीप जिलवाने ने कहा…

घुमते-घामते आज आपके ब्लॉग पर आया तो कुछ नयेपन की कविताएं पढ़ने को मिली... बाबुषा प्रतिभाशाली है, यह उनकी कविताओं से साफ झलकता है... उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं - प्रदीप जिलवाने

mukti ने कहा…

ओह! मैं बाबुषा को इतने विस्तार से पहली बार पढ़ रही हूँ. अक्सर फेसबुक पर कुछ पंक्तियाँ पढ़ी हैं. मैं तो अवाक् हूँ. एकदम ताजी हवा के झोंके सी कवितायें हैं.

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

बेलौस विलक्षणता...
इनके लिखे शब्द जब भी निगाह से गुजरते हैं...
सहज ही ठहरने की बेचैनी से भर देते हैं...

Vandana Sharma ने कहा…

बाबुशा की कवितायें हमेशा बाध्य करतीं हैं कि उन्हें पढ़ा जाये, उन्हें सोचा जाए और याद रखा जाए इस से ज्यादा क्या चाहिए किसी कवि को ..मुझे उनकी शैली भाती है ...

सिद्धान्त ने कहा…

बाबुषा की कविताओं को पढ़कर उनके वैचारिक गैर-परम्परावादी होने का असल पता लगता है, एक Broad Range विचारधारा की उपस्थिति को भी वे अभिसिंचित करती जाती हैं. हालांकि उन पर बहुतेरे लैटिन-अमेरिकी और यूरोपीय कवियों का प्रभाव साफ दिख रहा है फिर भी वे वर्तमान-लाइनअप से एकदम अलग कविताएँ लिख रही है.

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

बहुत सटीक टिप्पणी की है अशोक ने, कविताओं से पहले. बाबुषा को पढ़ना एक नए और अनूठे अनुभव संसार से गुज़रने-जैसा होता है. भिड़ते ही तो वह चौंकाती हैं, पर जैसे-जैसे कविता में डुबकी लगाना शुरू होता है, वैसे ही उसकी अर्थ-छवियां एक-एक कर खुलने लगती हैं, धीरे-धीरे और क्रमशः. उनकी सबसे बड़ी खूबी है, भाषा पर अद्भुत अधिकार. और मज़ा यह है कि जो कहना है उसके लिए सर्वाधिक मुहावरा हासिल कर लेती हैं. लगता ही नहीं कि 'स्विच-ओवर' के लिए कोई विशेष प्रयत्न करना पड़ा है. मुझे बाबुषा का काव्य-व्यक्तित्व निरंतर विकसित होते दिख रहा है, पिछले कई महीनों से.

ramji ने कहा…

अद्भुत है ये....एक अलग तरह का ताजापन लिए ...बधाई बाबुषा को

sidheshwer ने कहा…

बाबुषा की कवितायें पढ़ते हुए त्वरित टिप्पणी करना मुश्किल होता है। आज दोपहर बाद ये कवितायें पढ़ीं और उनके रिजोनेंस से रू-ब-रू होता रहा। अभी कुछ देर पहले इन्हें फिर से पढ़ा है और फिर कुछ ध्वनित हो रहा है अलग तरह का। इन कविताओं में 'झुलसा देने वाली धूप' के बीच 'एक मिट्टी का घड़ा' है जिसके बाहर - भीतर बहुत सारी 'खाली' जगहें हैं। कविता की आँख इन खाली जगहों दीप्ति और अंधकार दोनो पर पर है।

कवि बाबुषा से बहुत उम्मीदें हैं..

गीता पंडित ने कहा…

प्रभावित करती हैं बाबूषा की रचनाएं... देर तक सोचने के लियें विवश भी....

बधाई ..
आभार अशोक जी...

अरूण साथी ने कहा…

अद्भुत!!!!!!!!!

प्रदीप कांत ने कहा…

हर कोई खुद को मारने पर उतारू था ......

बबूषा की कविताएँ इस तरह से पहली बार पढने को मिली है।


अपनी कहन में नये पन के साथ अच्छी कविताएँ हैं

santosh ने कहा…

कविताएँ पढने पर पढने पर चमत्कृत जैसा हुआ जा रहा हूँ! कुछ कुछ एलीटिज्म का भाव भी इन कविताओं से छन कर मेरे अन्दर आ रहा है ! पता नहीं क्यों लेकिन कुछ अपने करीब की नहीं लगती ये कविताएँ ! कुछ कुछ सपनों और कल्पना का बोध जैसा प्रतीत होता है ! कहीं कहीं लगा की कुछ शब्द निरर्थक हैं और कभी कभी लगा कुछ शब्दों को ही पकड़ के बैठ जाऊं ! बीच बीच में लगा मेरे अन्दर कविता की समझ कम है और फिर अपने आप से कहा की आखिर इतनी सुन्दर उपमाओं की वाह वाही करने में भी क्या हर्ज़ है ! कविता पढवाने के लिए अशोक जी का आभार और बाबुशा जी को बधाई!

अपर्णा मनोज ने कहा…

बाबुषा की कविताएँ अवचेतन के उजास से बाहर आई बहुत परिपक्व और अधुनातन कविताएँ हैं . इनका शिल्प परिपाटी से अलग है . चमत्कार यहाँ कुछ इस तरह दीखता है जैसे किसी तिल्लस्मी गुफ़ा में बार-बार आप जाते हों और अचानक गुफ़ा के बाहर की धूप आपको खुले मैदान में खड़ा कर दे .
बाबुषा को पढ़ने का सुख अलग है . बेशकीमती कविताएँ हैं ...

समीर यादव ने कहा…

वाह, पढ़ने पर विस्मित और उसके बाद आल्हादित करने के साथ संतुष्टि देती रचनाएं ..अशोक भाई धन्यवाद आपको. बाबुषा को बधाइयां शुभकामनायें.

ANJU SHARMA ने कहा…

अद्भुत और अद्भुत और अद्भुत ..........

ANJU SHARMA ने कहा…

अद्भुत और अद्भुत और अद्भुत ..........

shayak alok ने कहा…

बाबुषा के खुद के शब्दों में... -''ये नींद में लिखी हुयी बकवास है..जाने वे लोग इसे कविता क्यों समझते हैं !''......... बाबुषा का रचना संसार एकदम एकाकी है और मालुम पड़ता है कि गहरे ध्यान की अवस्था में कमोबेश कवितायेँ घटित होती रहती हैं उनके आस पास... बाबुषा अपनी पंक्तियों से आपको दूर खिंच के ले जाती हैं और फिर तुरंत से आपको झिंझोर के जगा देती हैं... इनकी शैली में एक ताजापन है..अनुवादित कविताओं की शैली के कुछ करीब...अनुवादित कविताओं की शैली की तरह कभी एकदम व्यापक सा होता भाव तो कहीं अधूरा सा..टुकड़ा टुकड़ा.. बाबुषा एक लकीर खिंच रही हैं कविताओं और 'कविताओं'' के बीच.. शुभकामनाएं..

shayak alok ने कहा…

बाबुषा के खुद के शब्दों में... -''ये नींद में लिखी हुयी बकवास है..जाने वे लोग इसे कविता क्यों समझते हैं !''......... बाबुषा का रचना संसार एकदम एकाकी है और मालुम पड़ता है कि गहरे ध्यान की अवस्था में कमोबेश कवितायेँ घटित होती रहती हैं उनके आस पास... बाबुषा अपनी पंक्तियों से आपको दूर खिंच के ले जाती हैं और फिर तुरंत से आपको झिंझोर के जगा देती हैं... इनकी शैली में एक ताजापन है..अनुवादित कविताओं की शैली के कुछ करीब...अनुवादित कविताओं की शैली की तरह कभी एकदम व्यापक सा होता भाव तो कहीं अधूरा सा..टुकड़ा टुकड़ा.. बाबुषा एक लकीर खिंच रही हैं कविताओं और 'कविताओं'' के बीच.. शुभकामनाएं..

leena malhotra ने कहा…

कवितायेँ बहुत गहरी प्रतीत होती हैं.. चित्र दर चित्र शब्दों के गहरे में बहते अर्थ खुलते हैं बिम्ब रूपक अनूठापन लिए हुए हमें एक विस्तार में ले जाते हैं .. बाबुषा को बधाई.. आभार अशोक

Avinash Chandra ने कहा…

बहुत प्रभावित करने वाली कविताएँ हैं, हर शब्द एक अनायास आकर्षण में बाँधता है।

कल्पना पंत ने कहा…

अद्भुत अहसास कराती हैं बाबुषा की कविताएँ. अपार सम्भावनाओं से ओतप्रोत!

असीम ने कहा…

क्या इसे ऐसे नहीं कह सकते हैं -- इश्वर के साथ बैठ कर भुट्टे खाने कि 'ईश्वरीय' इच्छा जो हमारी पाशविक 'इच्छा' से कहीं ज्यादा बलवान है. जैसे एक जानवर 'भुट्टा' नहीं खा सकता वो केवल 'भुट्टे खाने कि कल्पना' ही कर सकता है...पर 'मनुष्य' भुट्टा खा कर भी इश्वर में लीन रह सकता है, उसी तरह "इश्वर के साथ बैठ कर भुट्टे खाने कि जंगली इच्छा" आपकी कल्पना कि ऊँची उड़ान को परिलक्षित करता है

साभार
असीम

नीरज बसलियाल ने कहा…

बाबुषा को पढ़ना बस अच्छा लगता, हर बार | क्यूँ ? किस लिए ? इन सबका कोई जवाब नहीं | बस लगता है |

ok ने कहा…

Naye tewar ki kavitayen

neera ने कहा…

बाबुशा की कवितायें औरत की आत्मा का दर्पण हैं जहाँ खुद को देखकर तड़प और चोंक जाता है औरत का ज़मीर.... बाबुशा को बधाई ... अशोक जी आप कितने माहिर हो गए हैं खान से हीरे चुनने में!!

शिव शम्भु शर्मा ने कहा…

भाष्कर ग्रुप की एक नई पत्रिका "अहा जिन्दगी " मे आपकी कुछ कविताये पढी तब से यह सोच रहा हूं कि इतना अच्छा आखिर कर आपने कैसे लिखा । शुक्रिया आभार आपका ।

शिव शम्भु शर्मा ने कहा…

भाष्कर ग्रुप की एक नई पत्रिका "अहा जिन्दगी " मे आपकी कुछ कविताये पढी तब से यह सोच रहा हूं कि इतना अच्छा आखिर कर आपने कैसे लिखा । शुक्रिया आभार आपका ।

शिव शम्भु शर्मा ने कहा…

भाष्कर ग्रुप की एक नई पत्रिका "अहा जिन्दगी " मे आपकी कुछ कविताये पढी तब से यह सोच रहा हूं कि इतना अच्छा आखिर कर आपने कैसे लिखा । शुक्रिया आभार आपका ।

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