कल रात फोन पर ही जय नारायण बुधवार जी ने यह गज़ल सुनाई तो मैंने तय कर लिया कि इसे आप सब तक पहुंचाना है. वज़ह शायद यह कि यह गज़ल मेरे हालिया मानसिक हालात से भी रेजोनेट करती है. शायद एक जैसे समय में तमाम एक जैसा सोचने वालों के मानसिक हालात एक जैसे ही होते हों...पर उसे इस खूबसूरती से दर्ज करने की काबिलीयत सबमें नहीं होती.
जिन रगों में में बहते थे अरमान से
हैं वहीं पसरे हुए सामान-से
धार रखवाते थे हम जिस सान पर
झुक गयी वह आज कितनी शान से
उम्र भर जिसमें सफ़र करता रहा
आज डूबी नाव वो सम्मान से
जब किताबें बंद दरवाजे बनें
निकलता है रास्ता अनुमान से
चोटों से मजबूत जो होता रहा
मर गया वो शख्स एक मुस्कान से
रहनुमा गुमराह हों बेशक मगर
खेलेंगे ये खेल हम जी जान से

10 टिप्पणियाँ:
जिन रगों में में बहते थे अरमान से
हैं वहीं पसरे हुए सामान से ...
क्या बात कही... हर शेर अच्छा लगा...
बधाई आपको और आभार अशोक जी, पढवाने के लियें..
ख़ूबसूरत गज़ल ..
बहुत खूबसूरत गज़ल।
बेहतरीन.. !
गजल तो बेहतरीन है ; किन्तु सुन कर लिखने में कई त्रुटियाँ हो गई हैं, जिनके कारण गजल का मीटर कई जगह छिन्न भिन्न हो गया है।
बस इतना ही कहूँगा कि एक दम से दिल को छू जाने वाली ग़ज़ल .....! वैसे कविता जी कि बात एक दम सही है.....!~
मगर ये सब चलता रहता है...इससे ग़ज़ल की प्रभावशीलता में कमी नहीं आती.
बस इतना ही कहूँगा कि एक दम से दिल को छू जाने वाली ग़ज़ल .....! वैसे कविता जी कि बात एक दम सही है.....!~
मगर ये सब चलता रहता है...इससे ग़ज़ल की प्रभावशीलता में कमी नहीं आती.
Bahut sundar panktiyan
बढिया गजल ..बधाई
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ।
....पढवाने के लियें आभार अशोक जी
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