बुधवार, 14 दिसम्बर 2011

जिन रगों में में बहते थे अरमान से


कल रात फोन पर ही जय नारायण बुधवार जी ने यह गज़ल सुनाई तो मैंने तय कर लिया कि इसे आप सब तक पहुंचाना है. वज़ह शायद यह कि यह गज़ल  मेरे हालिया मानसिक हालात से भी रेजोनेट करती है. शायद एक जैसे समय में तमाम एक जैसा सोचने वालों के मानसिक हालात एक जैसे ही होते हों...पर उसे इस खूबसूरती से दर्ज करने की काबिलीयत सबमें नहीं होती. 





                                                 
 जिन रगों में में बहते थे अरमान से
हैं वहीं पसरे हुए सामान-से
धार रखवाते थे हम जिस सान पर
झुक गयी वह आज कितनी शान से 
उम्र भर जिसमें सफ़र करता रहा 
आज डूबी नाव वो सम्मान से 
जब किताबें बंद दरवाजे बनें 
निकलता है रास्ता अनुमान से 
चोटों से मजबूत जो होता रहा 
मर गया वो शख्स एक मुस्कान से 
रहनुमा गुमराह हों बेशक मगर 
खेलेंगे ये खेल हम जी जान से  

10 टिप्पणियाँ:

गीता पंडित ने कहा…

जिन रगों में में बहते थे अरमान से
हैं वहीं पसरे हुए सामान से ...

क्या बात कही... हर शेर अच्छा लगा...
बधाई आपको और आभार अशोक जी, पढवाने के लियें..

अपर्णा मनोज ने कहा…

ख़ूबसूरत गज़ल ..

वन्दना ने कहा…

बहुत खूबसूरत गज़ल।

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

बेहतरीन.. !

Kavita Vachaknavee ने कहा…

गजल तो बेहतरीन है ; किन्तु सुन कर लिखने में कई त्रुटियाँ हो गई हैं, जिनके कारण गजल का मीटर कई जगह छिन्न भिन्न हो गया है।

singhSDM ने कहा…

बस इतना ही कहूँगा कि एक दम से दिल को छू जाने वाली ग़ज़ल .....! वैसे कविता जी कि बात एक दम सही है.....!~
मगर ये सब चलता रहता है...इससे ग़ज़ल की प्रभावशीलता में कमी नहीं आती.

singhSDM ने कहा…

बस इतना ही कहूँगा कि एक दम से दिल को छू जाने वाली ग़ज़ल .....! वैसे कविता जी कि बात एक दम सही है.....!~
मगर ये सब चलता रहता है...इससे ग़ज़ल की प्रभावशीलता में कमी नहीं आती.

Onkar ने कहा…

Bahut sundar panktiyan

Mamta Bajpai ने कहा…

बढिया गजल ..बधाई

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।
....पढवाने के लियें आभार अशोक जी