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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

हरिओम राजोरिया की कविताएँ


हरिओम राजोरिया नब्बे के दशक के एक बेहद महत्वपूर्ण कवि हैं. अब तक उनकी एक कविता पुस्तिका "यह एक सच है (1993)' और दो कविता संकलन "हंसीघर (मेधा प्रकाशन, 1998)" और "खाली कोना (ज्ञानपीठ, 2007)" प्रकाशित हुए हैं.  हिन्दी कविता परिदृश्य में जिस 'लोक' की बात अक्सर होती है, हरिओम की कविताएँ उसका अतिक्रमण भी करती हैं और उसका एक ऐसा अदेखा दृश्य भी प्रस्तुत करती हैं , जो लोक के नाम पर निर्मित एक खास तरह की छवि को ध्वस्त करता है. उनके यहाँ कस्बाई तथा ग्रामीण संस्कृति अपने पूरे रंग में सामने आती है. यह कोई मोनोलिथ 'लोक' नहीं है. इसके कई संस्तर हैं...बेहद संश्लिष्ट और बहुरंगी ...जिनके रस्ते चलकर वह हर बार उस मनुष्य तक की मुश्किल यात्रा करते हैं जो उनकी कविता की सबसे बड़ी चिंता का केन्द्र भी है और उनकी रचना-प्रक्रिया का अविभाज्य हिस्सा भी. उनकी सक्रियता और हस्तक्षेप की निरंतर कोशिश ने उन्हें अब तक "विशिष्ट" होने से बचाए रखा है, जिसे मैं अलग से रेखांकित किये जाने  योग्य मानता हूँ.


यहाँ उनकी कुछ छोटी और एक लंबी कविता...उनकी कुछ और कवितायें यहाँ क्लिक करके पढ़ें.





रफ्तार


(एक)

अलग-अलग लोगों के लिये
अलग-अलग तरह से काम करती है रफ्तार
एक वे जो भागती रेलगाड़ी पर सवार हैं
और जल्द पहुँचना चाहते हैं अपने घर

दूसरे वे जो कभी रेलगाड़ी में नहीं बैठे
जिनके अपने घर ही नहीं
डरे-सहमे से भागती गाड़ी को देखते हैं

एक रफ्तार आगे की तरफ बढ़ाती है कदम
दूसरी कान पर हथौड़े की तरह पड़ती है

(दो)

मैं उन तीन करोड़ बच्चों की बात कर रहा हूँ
जिनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है
जो स्कूल जाने की उमर में
खेतों से मटर की फलियाँ तोड़ते हैं
दुनिया भर के न जाने कितने काम
अनचाहे आ गए उनके हिस्से में

एक दिन यूँ कर बैठते हैं
रेल की पटरी से उठा लेते हैं गिट्टियाँ
और रेलगाड़ी पर टूट पड़ते हैं

ये घातक निशानेबाज
जिनके बदन पर कुल जमा
एक मैली पट्टे की चड्डी है
जो प्रतियोगी शब्द का तो अर्थ भी नहीं जानते
मेले-ठेलों में जिन्हें कभी
एक फुग्गा तक फोड़ने को नहीं मिला
गिट्टी के अचूक निशाने से
फोड़ देते हैं यात्रियों के सिर

क्या हो जाता है अचानक
कि भागती रेलगाड़ी की रफ्तार
आँखों को चुभने लगती है
यह एक ऐसी अपराधी रफ्तार है
जो किसी को भी एक दिन
मामूली होने के अहसास से भर देती है





बुलावा


जिस तरह के संबंधों के साथ
जिन लोगों के बीच मैं रहता हूँ
वहाँ तरह तरह के अवसरों पर
तरह तरह से आते हैं बुलावे

दरवाजे पर कार्ड फेंक जाता है कोई
परम पूज्यनीय कैलाशवासी पिता की है बरसी
फलाँ तिथि को है गंगापूजन सो जानना जी
कोई आकर कहता है -फूफाजी ने भेजी है गाड़ी
सब जनानी चलें संतेाषी माता के उद्यापन में
कभी किसी चचेरे भाई का आता है फोन
ग्रह शांति के लिए कर रहे हैं जाप
तुम न आ सको तो बहू को भेज देना

एक रंगीन आमंत्रण ऐसा भी आता है
छपा होता है जिसमें एक बड़ा घर
कभी पड़ोसी हाथ जोड़ करता है मनुहार
दुकान का उद्घाटन है भाईसाहब
आप भी पधारें भक्तांबर पाठ में
अनमना सा एक मित्र करता है शिकायत
आप तो हमें भूल ही गए
आपको छोड़ सब आए घर मिलने
फादर लौटे जब चारों धाम की यात्रा से

इस असंतुलित होते जाते समाज में
एक तरफ जड़ताएँ टूटती जाती हैं
तो दूसरी तरफ से
नई-नई मूर्खताएँ अपनी जड़ें बनाती हैं
आने जाने से फर्क नहीं पड़ता
अगर कोई बुरा भी मान जाता है
तो दूसरे ही दिन एक नया बुलावा आता है



भूल ही जाएँगे


भूल ही जाएँगे एक दिन
टिमटिमाते तारों के बीच
खिलखिलाकर हँसते चाँद को
काली रात की आँखों से
रुक-रुककर रिसते आँसुओं को
ओर बर्फीली हवाओं के बीच
दूर तक फैले घने अंधकार को

भूलना ही पड़ेगा आखिर
अपने दुर्दिनों में हुए अपमानों को
और राख के नीचे
दिपदिपाते हुए लाल अंगार को
एक दिन मान ही लेंगे
कि गुस्सा तो कैसा भी हो अच्छा नहीं
अपनी सहजता के खोल में छुपी
धारदार चालाकी के हाथों
एक दिन खेत हो जाएँगे हम

यही रह जाएगा कहने को
कि हम छले गए समय के हाथों
हम तो भूल ही जाएँगे
पंखुड़िया की दमकती ओजस्विता को
और तितलियाँ पकड़ने वाले हाथों में
लगे रह गए पीले रंग के कणों को ।


स्वप्न भर नहीं है यह नाटक


पथरीले रास्ते पर चला जा रहा ट्रेक्टर
पीठ किये हुए सिर झुकाए बैठीं नंगी पहाड़ियाँ
पीछे छूटती जा रही हैं चाँदनी में  
हम सब एक ट्राॅली में बैठे हैं
वह भी बैठी है बनारसी साड़ी पहिने
पाउडर पोत रखा है उसने चेहरे पर
और दो-दो रंगों की लिपिस्टिक लगा रखी है होंठों पर
एक विदेशी स्त्री बैठी है उसके पास
और हमारी बोली में बतिया रही है

पता नहीं कहाँ को जा रहे हैं हम
एक लड़का जोर-जोर से संवाद पढ़े जा रहा है
कुछ लोग हँस रहे हैं लड़के को देखकर
कोई कह रहा है-‘अब हमे शुरू करना चाहिए’
पर उसकी पलकें तो शर्म से झुकी हैं
मजदूरन बनकर भी वह सुंदर दिखना चाह रही है
विदेशी स्त्री कोंच रही है कि कुछ बोलो भी
इस तरह तो न हो पाएगी रिहर्सल
कोई कह रहा है कि दचके तो बहुत लग रहे हैं
ऐसे में कैसे पढ़ सकते हैं हम अपने संवाद

पता नहीं क्या-क्या हो रहा है
विचित्रताओं में कही कोई तालमेल नहीं
जंगल से एक बच्चे के रोने की आवाज आ रही है
और बबूल के रूखों पर
सहमे हुए तोते बैठे हैं

बड़े भाईसाहब चटाइयों का गठ्ठर लिए हैं कंधे पर
उनका चेहरा तीस साल पुराना है
थेगड़ा लगी पेंट पहिनी हुई है उन्होंने
और कह रहे हैं- ‘‘तुम अपना नाटक करना
और मैं अपनी चटाइयाँ बेचूँगा हाट में’’
विदेशी स्त्री कह रही है कि वह भी
सीताफल की एक खास किस्म के बीज लाई है
और अपनी दुकान सजाएगी हाट में
रोनी सूरत लिए बैठे हैं साहिबाबाद वाले फूफाजी
उनकी नौकरी छूट गई है
वे हाट में अपना गुड़ बेचने जा रहे हैं

बदहवास सा एक जन चिल्लाए जा रहा है
और तेज.....और तेज....जल्दी-जल्दी चलो
हमारे पीछे आ रहा है मधुमक्खियों का झुण्ड
पर उस आदमी की तरफ किसी का ध्यान नहीं
रामचरण मिस्त्री संचालक की नकल उतार रहा है
‘‘एक रुपया जी.एम. साहिबान की ओर से
राम का पाठ अदा करने वाले
चुन्ना खवास को प्राप्त हुआ है
मण्डल की ओर से मैं उन्हे धन्यवाद देता हूँ’’
एक जन चिल्ला रहा है
भैया इस ट्रेक्टर को जरा रुकवाओ तो सही
गोरी बहिनजी को शूऽऽशूऽऽ आ रही है

मैं डरा हुआ हूँ मधुमक्खियों से
और विदेशी स्त्री खुली बाहों को
कम्बल से ढँकने की कोशिश कर रहा हूँ
मेरा हाथ झटकते हुए वह हँसे जा रही है
मेरी बनियान पर अरहर की दाल के धब्बे हैं
मैं बनियान उतार रहा हूँ तो
उसके नीचे एक ऊनी स्वेटर निकल रहा है
स्वेटर के नीचे फिर एक रंगीन कमीज है                
मैं उतारता जा रहा हूँ कमीजें     
पर निकलती ही जा रहीं हैं
कमीज के भीतर से और नई कमीजें
मैं हाँफ रहा हूँ और घबराया हुआ हूँ
विदेशी स्त्री हँसे जा रही है लगातार
कोई कह रहा है- ‘‘देखो जंगल में आग लग गई है
और इन मूरख तोतों को कुछ खबर ही नहीं’’

दूर कहीं बाजे बज रहे हैं
पहाड़ के पीछे उठ रहे हैं रोशनियों के पुँज
कई जन भोंपू पर चीखे जा रहा है
पत्थरों से टकरा टकरा कर
सब दिशाओं में फैल रहे हैं शब्द-
‘‘हम सबसे खराब सोयाबीन को भी
सबसे ऊँचे दामों में खरीदेंगे
यह कोई चालू काँटा नहीं है भाईसाहब
यह तो कम्प्यूटर वाला काँटा है श्रीमान
खून चूसने वालों से सावधान
हम देंगे किसान के एक-एक दाने का दाम ’’

सबकुछ गड्डमगड्ड होता जा रहा है
विदेशी  स्त्री कह रही है कि देखो
तुम्हारे बालों से चूती पसीने की धार ने
तुम्हें एक मजदूरन के कितने करीब ला दिया है
और धूल से लथपथ यह तुम्हारी साड़ी
अब सिर्फ एक चिथड़ा जान पड़ती है

इधर मोहनलाल पगला गया है
और हवा से ऊलजलूल बातें कर रहा है-
‘‘इस लाल मुँह वाले लड़के को रस्सी से उतारो
किसने कहा था इतना कसकर लंगोट बाँधो
देखो कहीं रस्सी के दाब से
इसके अण्डकोष न फूट जाएँ
सम्हलो! वह गिरा... देखो वह गिरा...
वह लंका के ऊपर नहीं
हमारे ऊपर गिर रहा है’’

एक भोंपू पर लंगुरिया बज रही है
तो दूसरे भोंपू पर कुछ लोग राई गा रहे हैं-
‘‘भैया भरत से न मिले
ढूँढ़े तीनई लोक...भैया भरत से....
तीसरे भोंपू पर फिर वही शब्द हैं-
‘‘यह डाबर चना है भाईसाहब
इसे हर कोई नहीं पचा सकता
इसे साहिब लोग ही खाते हैं
काबुली घोड़े ही इसे पचा पाते हैं
जो भाई अपनी तौल करवा चुके हैं
वो बगल को हो जाएँ
और सब भाइयों से गुजारिश है
कि वे हमारी दुकान में जरूर आएँ’’

था भोंपू किसी हँसोड़ ने थाम लिया है
और वह बेसुरी होली गा रहा है-
‘‘ताती जलेबी दूदा के लाड़ू
खाबत नइएँ, बलम रूठे
ठठरी के लगे......’’
हँसोड़ा अब कुछ और मजे में आ गया है
और गाते-गाते ही भोंपू पर
मन्दिर के पुजारी को चिढ़ा रहा है-
’’हे! पुजना सोच न करो
हे! मंगता सोच न करो
हे! खउआ सोच न करो
खुल गई खुसनियाँ, खुल जान दो’’

ट्रेक्टर में कुछ सन्नाटा है
उसकी आँखों में लाल डोरे तैर रहे हैं
विदेषी स्त्री उसे हिचकोलों में सहारा दे रही है
कुछ कहने के लिए मजदूरन के होंठ हिले हैं-
‘‘उड़ जाओ सुआ!
मुझ पर तो कर लो भरोसा
किसी न किसी पर तो करना पड़ता है भरोसा
हालाँकि डर बहुत है
शोर भी कितना है हर तरफ
कि सहम कर चुप बैठ जाने में भला है
पर इस तरह ही चुप बैठे रहे सहमे हुए
तो झुलस जाओगे जंगल की आग में
उड़ जाओ सुआ!
उड़ जाओ मेरे ललना
अगर कहीं तुम उड़ो तो
उनके नीम पर कभी मत बैठना
वे तुमसे कहेंगे -’’बोल बेटा सीऽऽऽताराम’’
और कहीं तुम चुप रहे
तो उखाड़ लेंगे तुम्हारे पंख
उड़ जाओ सुआ! उड़ जाओ!
सारे आसमान पर छा जाओ
फैल जाओ सब दिशाओं में’’

उठा का उठा रह गया उसका हाथ
इधर रामचरण को कुछ हो रहा है
उसकी आँखें बाहर निकल आई हैं
और थूक उचटाता हुआ वह
हवा को चेतावनी दे रहा है-
’’बचोऽऽ देखो! वो हमारे ठीक पीछे हैं
कितनी तेजी से बढ़ रही हैं मधुमख्खियाँ
सम्हलो! नहीं तो आ जाओगे इनकी चपेट में
चेहरे ढाँप लो! चेहरे ढाँप लो!
कम से कम चेहरे तो बचे रहें’’

रामचरण की कोई नहीं सुन रहा
विदेशी स्त्री कह रही है कि कविता क्यों रोक दी
कविता नहीं यह सच है
और सच को तो आना ही चाहिए नाटक में
हिचकोले खाते हुए भी जारी रखना है इसे
नाटक में लय, संगीत, संवाद, अभिनेता और अंतर्विरोध से पहले
सच का होना कितना जरूरी है

कितना सारा मुर्दाशंख पोत लिया है मोहन लाल ने
आँखों की कोरों में लगाए हैं काजर के डिठौने
और पेट से बाँध लिया है एक मटका
उसने फूफाजी को नीचे पटक लिया है
और दोंनो हाथों में उनका चेहरा लिए
वह फफक-फफक कर रो रहा है-
’’उठो मेरे प्राणनाथ! उठो!
एक बार....सिर्फ एक बार लगा लो गले
कैसे बिलख रही हूँ तुम्हारे वियोग में
कितने बाण मारे हैं उस वनवासी ने
सिर धड़ से अलग कर दिया
कल ही तो तीन घड़े सोमरस पीया था तुमने
और मेरे हाथ की पुंआर की भाजी खाकर सोये थे
सुषेण की जड़ी-बूटियाँ तुम्हें लगती नहीं
और हरनारायण की सुई से तुम डरते हो
राक्षस जात में कौन मानता है स्त्रियों का कहा
तुम आ ही गए दादा भाई की बातों में
उठो मेरे प्राणनाथ! उठो!
एक बार तो निरख लो अपनी प्राणप्यारी को
ये आर्य किसी को नहीं छोड़ेंगे
ये आर्य सब कुछ नष्ट कर देंगे एक दिन
हमारी पहचान, सभ्यता और हमारे रोजगार’’

रोशनियों के नजदीक पहुँच रहे हैं हम
और भोंपुओं की आवाज तेज होती जा रही है
संकरे रास्ते वाली पहाड़ी घाटी पर
हुरऽऽहुरऽऽ करता हुआ चढ़ रहा ट्रेक्टर
चाँदनी में घुल रहे हैं जादुई शब्द
भोंपू फिर बोल रहा है-
’’जिन भाइयों का हिसाब हो चुका है
वे अभी घर न जाएँ
आँख भर एक बार जरूर देखें हमारी दुकान
देखने का कोई दाम नहीं है
मोल-भाव का कोई काम नहीं है
दुकानें तो बहुत देखी होंगी भाईसाहब
पर ऐसी ठण्डाई नहीं देखी होगी कहीं

जो लेना है,ले जाओ
जितना लेना है, उतना ले जाओ
सामान ही सामान है
सामान ही सामान है...
सुई से लेकर ट्रेक्टर तक ले लो
और फिर यह दुकान तो इतनी बड़ी है
कि तुम्हारे सारे बाजार इसमें समा जाएँगे’’

बड़े भाईसाहब मेरा कंधा झिंझोड़ रहे हैं
उन्होंने एक कोने में खींच लिया है मुझे
और अपना गुस्सा दबाते हुए पूछ रहे हैं-
’’अब किसका इंतजार कर रहे हो ?
कपडे़ पहिन लो और जल्दी करो!
नाटक हो या स्वप्न पर यह सच है
कि वे लोग तो अब आ ही चुके हैं
और अब हमारे ठीक सामने हैं
नाटक ही होता रहेगा या अब भी कुछ करेंगे
कब से कहे जा रहा हूँ कि इन्हें रोको
मादरचोदों को मत घुसने दो हमारे घरों में
रोकोऽऽ इन्हें रोको
तिलचट्टे हैं ये तिलचट्टे
माटी के घरों को चट कर जाएँगे एक दिन’’ ।



9 comments:

' मिसिर' ने कहा…

नाटक हो या स्वप्न पर यह सच है
कि वे लोग तो अब आ ही चुके हैं
और अब हमारे ठीक सामने हैं
नाटक ही होता रहेगा या अब भी कुछ करेंगे
कब से कहे जा रहा हूँ कि इन्हें रोको
मादरचोदों को मत घुसने दो हमारे घरों में
रोकोऽऽ इन्हें रोको
तिलचट्टे हैं ये तिलचट्टे
माटी के घरों को चट कर जाएँगे एक दिन’’ ।

निश्शब्द , अवाक ,हतप्रभ कर दिया कविता ने ! कवि को खड़े होकर सलाम करता हूँ ! अशोक जी आपका बहुत बहुत आभार ! आज मैं साक्षात कविता से मिला !

ramji ने कहा…

पहली दोनों कविताये कमाल की हैं ...| हमारे समय के बिलकुल नब्ज पर इनकी उंगली है |....इसे पढ़ते हुए देवताले जी याद आने लगते हैं ...| बेहतरीन हरिओम जी ...फिर लम्बी कविता में भी आपने हमारे परिदृश्य का सटीक खाका खींचा है ...बहुत बधाई आपको ...

सदा ने कहा…

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

कल 18/04/2012 को आपके इस ब्‍लॉग को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


... सपना अपने घर का ...

Amit sharma upmanyu ने कहा…

बहुत अच्छी कवितायें. विशेषकर लंबी कविता तो गज़ब है!

shashi purwar ने कहा…

waah sahi sarthak prastuti .......satik chitran hardik badhai

अजेय ने कहा…

अंतिम कविता अकथ को कह डालने का माद्दा रखती है . यही एक तरीक़ा है . यही . आभार इस सपने को *याद* रखने और यहाँ दर्ज करने के लिए .

Premchand Gandhi ने कहा…

हरिओम राजोरिया निश्‍चय ही नवें दशक के महत्‍वपूर्ण कवियों में हैं। प्रचार, प्रसार और पुरस्‍कार जैसे प्रसंगों से अक्‍सर परे रहते हैं और ऊबड़-खाबड़ जीवन के खुरदुरे पक्षों को कविता में संभव बनाते हैं। यहां प्रस्‍तुत कविताएं उनकी चिंताओं का व्‍यापक फलक दर्शाती हैं। लंबी कविता तो अवाक कर देती है... उनके प्रति मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

आशुतोष कुमार ने कहा…

इन बेहतरीन कविताओं को पढवाने का शुक्रिया. पहली और अंतिम कविता को मैं रेखांकित करना चाहूँगा. हरिओम जीवन की साधारण अनुभवों को वर्गीय अंतर- दृष्टि से तराश कर कविता के रंगमंच पर एक असाधारण ट्रेज़ी-कॉमिक नाटक का रूप दे रहे हैं .उन्हे हमारा सलाम .

Onkar ने कहा…

bahut sundar prastuti

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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