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सोमवार, 7 मई 2012

प्रेमचंद गांधी की लंबी कविता


जैम्पेद्रोनी की पेंटिंग यहाँ से साभार

 
प्रेमचंद  गांधी की कविताएँ आप पहले भी असुविधा पर पढ़ चुके हैं. वह उन कवियों में से हैं जो प्रचलित काव्य विषयों की सीमाओं को लगातार तोड़ रहे हैं, भाषा के सवाल पर उनकी यह लंबी कविता हो या 'नास्तिकों की भाषा' शीर्षक से प्रकाशित कविता हो, उन्हें बार-बार लंबी कविताओं की शरण में जाना पड़ रहा है, जो एक तरफ उनके कवि की परिपक्वता की ओर इशारा करता है तो दूसरी तरफ उनके भीतर लगातार जारी अंतर्द्वंद्व की ओर भी इशारा करता है. इस लंबी कविता में भाषा के सवाल के बहाने वह हिन्दी के समकालीन बौद्धिक परिवेश पर कुछ ज़रूरी सवाल खड़े करते हैं. जब वह कहते हैं कि ' बिल्‍कुल अभागा देश था वह/जहां कविता सिर्फ धर्मग्रंथों में बची रह गई थी/ कविता के नाम पर/ धर्मग्रंथ ही बिकते थे वहां/ क्‍योंकि वहीं थी शायद / छंद की थोड़ी-सी गंध/ इस तरह बजबजाती थी /छंद की गंध उस देश में कि/ कविता-पाठ से पहले /जलानी पड़ती थीं अगरबत्तियां, तो वर्षों से स्थगित एक असुविधाजनक सवाल उठा रहे होते हैं. आत्ममुग्ध और अपढ़ आलोचकों से तो खैर जवाब की उम्मीद उन्हें भी नहीं होगी, लेकिन पाठकों से तो इन सवालों से जद्दोजेहद की उम्मीद की ही जाती है.

भाषा की बारादरी


एक
संज्ञाओं को
सर्वनाम होने से बचाओ कवियो
तुम भाषा के अभियंता हो
बचाओ भाषा की इमारत को
व्‍याकरण के पुल को
जर्जर होने से बचाओ


ये जो मीडिया में बैठे हैं
शब्‍दों के अप्रशिक्षित कामगार
एक जीते-जागते इंसान को
व्‍यक्ति और जन में बदल रहे हैं
कहो उनसे जाकर कि
एक व्‍यक्ति ने नहीं
गोपाल ने फांसी लगाई
एक विवाहिता ने नहीं
दमयंती ने ज़हर खाया

वे हमारी भाषा की इमारत से
निकाल देते हैं बरसों पुरानी खिड़की
और ठोक देते हैं एक विण्‍डो
वे तोड़कर गिरा देते हैं
एक मेहराबदार छज्‍जा
और बना देते हैं बालकनी

उनसे जाकर कहो कवियो
क्‍यों हमारी भाषा की
मां-बहन कर रहे हो
कहो कि एक दिन इसी मलबे में
दफ्न हो जाएगी हिंदी पत्रकारिता
लड़ो कि वरना खत्‍म हो जाएगी हिंदी कविता।


दो
विशेषणों की भरमार थी
वह एक ऐसा युग था
निंदा और प्रशंसा के चरम पर
पतनशील उस कालखण्‍ड में
कवि जितने निरीह थे
कविता उससे कहीं ज्‍यादा लाचार। 


तीन
दंभी, आत्‍मरतिग्रस्‍त और कुंजीछाप
समाचार संपादकों के हाथों में था
शब्‍दों का भविष्‍य उस युग में

उनके पास थी एक पूरी फौज
शब्‍दों के कसाइयों की
जो हलाल और झटके में
फर्क ना करते हुए
जिबह कर डालते कोई भी शब्‍द
लहूलुहान शब्‍दों के लोथड़ों को
फिर वे कंप्‍यूटरीकृत कसाईबाड़े में छीलते-काटते
धो-पोंछ कर बेजान शब्‍दों को
वे रंगों से सजाते
समाचार और विचारों में पिरोते
और एक रंगीन दर्शनीय लेकिन निष्‍प्राण
संसार पेश कर देते

पाठकों के लिए
पांच मिनट का काम था
उस रंगीन संसार से गुजरना
इतना सुंदर कब्रिस्‍तान था
उस युग में शब्‍दों का।


चार

जब कवि-लेखक बचा रहे थे
लोक के आलोक को
समूची संवेदना के साथ
कुछ लोग और आ गए बचाव में
उन्‍होंने कहा, यह हमारी जाति का है
यह कविता, यह संगीत
इसे किसी को नहीं दिया जा सकता

इस तरह लोक का आलोक
जाति के नाम पर
बाकी के लिए निषिद्ध कर दिया गया।


पांच

कुछ कवि थे उस युग में
जो आजीवन अलापते रहे
लोक का राग
एक मृतप्राय: भाषा में खोजते रहे प्रेरणा
जबकि जीवन था इतना संश्लिष्‍ट कि
सदियों पुरानी भाषा में संभव नहीं था
उसकी मुश्किलों का हल ढूंढ़ना

वाल्‍मीकि से लेकर कालिदास-भवभूति तक
चुप थे उस युग में
और कवि थे कि पूछे जा रहे थे
साम्राज्‍यवाद से लड़ने की युक्तियां

महाकवियों की दुर्दशा का युग था वह
फिर भी कुछ आलोचक थे
जो बांट रहे थे
महाकवि की पदवियां।

छह

सरहदें बेमानी हो गई थीं
शब्‍दों की आवाजाही इतनी सुगम
जैसे परिंदों की उड़ान

अनुवाद में सब कुछ संभव था
वह अनुवाद का पूरा युग था

अनुवाद पढ़ने के लिए
इतना अधीर नहीं थे लेखक
जितना अनूदित होने के लिए
कुछ तो ऐसे भी थे जिनका
अपनी ही भाषा में
ठीक से होना था अनुवाद

अनूदित होने की ललक इतनी थी कि
लेखक खुद ही सीखने लगे थे भाषाएं
मशीनी अनुवाद को भी गर्व से
कहते थे लेखक दूसरी भाषा में जाना

दूसरी भाषाओं में
कुछ इस तरह जा रहे थे लेखक
जैसे सब कुछ तहस-नहस करने के बाद
अमेरिकी सेना लौट रही हो
किसी युद्ध के मैदान से

अपनी ही भाषा को
अनुवाद का युद्धस्‍थल बना देने का
एक युग था वह असमाप्‍त।

सात

आलोचक निष्क्रिय थे
रचनाकार ही थे व्‍यस्‍त
व्‍याख्‍यान और भाषणों में ही
महदूद रह गई थी आलोचना

रचना को कई कोणों से खोजने वाली
एक अद्भुत कला को बचाने में
जुटे थे उस युग के रचनाकार
जैसे दंगे-फसाद के दिनों में
मोहल्‍ले वाले ही लगाते हैं गश्‍त।


आठ

बेधड़क और निर्द्वंद्व भाव से
लिखने का महायुग था वह
गृहस्‍थी से फुरसत मिलते ही
हो जाती थीं कई लेखिकाएं तैयार

कलम जिनके लिए बन चुकी थी
प्रतिरोध का हथियार वे भी
और वे भी
जिनके लिए लिखना एक शगल था
अक्‍लमंदी के बजाय सुंदरता दिखाने का

इन स्त्रियों के पास था
एक अपूर्व-अव्‍यक्‍त संसार
आभासी दुनिया ने दिया उन्‍हें
एक भरा-पूरा पाठक संसार

बावजूद तमाम कानूनों और नैतिक बंधनों के
लेखिकाओं के पीछे ही पड़े रहते थे पाठक
वाहवाही का प्रशंसनीय दरबार था
सुंदर स्त्रियों की सामान्‍य तुकबंदियां ही नहीं
उड़ाई हुई पंक्तियां भी
गहरी और मर्मस्‍पर्शी होती थीं उस काल में

ऐसा स्‍त्रीलोभी संसार था वह
जहां रचना का स्‍तर
लिंग से तय होता था
जबकि लिंग परीक्षण निषिद्ध था।

नौ

कुछ लोग थे
जो अपनी मातृभाषा के लिए लड़ रहे थे
जिनसे छूट चुकी थी मातृभाषा
वे उनका उपहास उड़ाते हुए
विरोध कर रहे थे

भाषाई झगड़ों में
खो रही थी सांस्‍कृतिक अस्मिता
और संस्‍कृति के प्रहरी
निक्‍कर-टोपी में
डण्‍डा लिए चहलकदमी कर रहे थे

दस

एक भाषा को धर्म के आधार पर
सरहद पार भेज दिया गया था
और उसे पढ़ने-बोलने वालों को
हिकारत से देखा जाता था

एक मीठी जुबान को लेकर
इतनी कड़वी-कसैली अफवाहें थीं कि
लोग उसकी लिपि बदलने पर उतारू थे

कब का ढह चुका था रोमन साम्राज्‍य
पर कुछ लोग थे
सरहद के आर और पार
जिन्‍हें सब कुछ रोमन में ही चाहिए था।

ग्‍यारह

अर्थ-विछिन्‍न और अनुपयोगी
करार कर दिए गए शब्‍दों का मलबा है
भाषा की बारादरी के पास
इस सूखे हुए जलाशय में
जैसे हड़प्‍पा और मोहन्‍जोदड़ो में
ठीकरी और ईंटों का मलबा

कुछ लोग अभी भी आते हैं यहां
बेशकीमती शब्‍दों के अवशेष बीनने
यह रहा टूटा हुआ चषक
एक कोने में उपेक्षित पड़े हैं प्राणनाथ

गौर से देखो
यह प्राचीन शब्‍दकोशों का
जीर्णशीर्ण पुस्‍तकागार है।

बारह

कब का बीत चुका था मध्‍यकाल
यह था महा-गद्यकाल
जिसमें समाप्‍त हो चुकी थी
प्रतीक और संकेतों को
संक्षेप में समझने की प्रज्ञा

कुछ लेखक थे इस काल में
जो महाकाव्‍यों को उपन्‍यास में बदल रहे थे
तो कुछ उपन्‍यासों को धारावाहिकों में
कालिदास न जाने कैसे बच गए थे
इस युग के गद्यकारों से।


तेरह

बिल्‍कुल अभागा देश था वह
जहां कविता सिर्फ धर्मग्रंथों में बची रह गई थी
कविता के नाम पर
धर्मग्रंथ ही बिकते थे वहां
क्‍योंकि वहीं थी शायद
छंद की थोड़ी-सी गंध

इस तरह बजबजाती थी
छंद की गंध उस देश में कि
कविता-पाठ से पहले
जलानी पड़ती थीं अगरबत्तियां

कितना विकट काल था उस देश का
जहां कविता का काम
वहां की महान भाषा में
मृत्‍यु के बाद
सिर्फ शांतिपाठ का रह गया था

कविता के ऐसे दुर्दिन थे कि
निर्द्वंद्व भाव से हर शोक सभा में
होता था कविता-पाठ
और कविगण थे कि
खुदी से पूछते रहते थे
क्‍या कविता का भी होगा
एक दिन शांतिपाठ ?

चौदह

जो जिस भाषा में लिखता था
उसी में कमतर था
प्रसिद्धि उसे उसी भाषा में मिली
जिसे घृणा से देखता था वह

घृणा और सफलता का
ऐसा समन्‍वय था उस युग में कि
लोग बेलगाम जुबान को ही समझने लगे थे
सफलता का अंतिम उपाय।


पंद्रह

जब संबंधों में ही समाप्‍त हो चुका था माधुर्य
ऐसा एक युग था वह
फिर भी कुछ लोग खोज रहे थे
छंदों में माधुर्य

छंद का फंद इतना जटिल कि
कवि होने की पहली शर्त था
गवैया होना
यूं स्‍वामी हरिदास के बाद
नहीं पाया गया कोई गायक कवि

छंदों में रचने वाले
गवैये भी खोजते थे
एक अच्‍छा गायक
और गायक खोजते थे
अच्‍छा लिखने वाला।

सोलह

अपने ही समय को
कहना पड़ता था भूतकाल
अपने ही देश को बताना होता था मगध
कैसी लाचारी थी कवि की
या कि भाषा और समय की

भविष्‍य हमेशा की तरह
अकल्‍पनीय था उस युग में
लोगों के पास जीवन में
भले ही कम रही हों उम्‍मीदें
साहित्‍य के बारे में वे पूरे आश्‍वस्‍त थे।

सत्रह

विश्‍वविद्यालयों की संख्‍या की तरह
बढ रही थी अध्‍यापकों की तनख्‍वाहें
भरा-पूरा था भाषा का कारोबार
मातृभाषा के सिवा
दूसरी भाषाएं पढने-पढाने का युग था वह

लोग इसी में खुश थे कि
दुनिया भर में पढी जा रही थी
उनकी अपनी मातृभाषा
जिसे खुद दोयम समझते थे

भाषा की देवी के
घोर अपमान का युग था वह
जिसमें विदेशियों की दिलचस्‍पी
महज कारोबार तक सीमित थी
और जो एक समूची जाति थी भाषा की
उसने गैर जरूरी बना दिया था
अपनी ही भाषा को

उस भाषा में रोजगार
सिर्फ अध्‍यापन में बचा रह गया था
जिसमें पढाने के अलावा सब कुछ होता था

अठारह

सिनेमा में ही बचे रह गए थे
छंद और तुक
इतना बेतुका था समय

कुछ ब्राण्‍डेड किस्‍म के कवि थे
जो बनाते थे रेडीमेड गीत हर मौके के लिए
और कुछ खोजते थे सिनेमा में अवसर

उन्‍नीस

कुछ कवि हमेशा ही रहते थे
अनंत की खोज में

अन्‍नदाताओं की खुदकुशी के दिनों में भी
अनंतवादी तलाश रहे थे
देह, संबंध और आत्‍मा के रहस्‍य
उनकी अनंत की यात्रा में
शामिल थे बस निजी दुख
पराया दुख नहीं सालता था उन्‍हें।

बीस

कविता के नाम पर
एक तरफ था कारोबार
सैंकडों करोड का मंच पर
जहां कविता पनाह मांगती थी

जनता कविता मांगती थी
और चुटकुलों से पेट भरती थी

एक महान भाषा का
हास्‍य युग था वह
जहां मंच पर कुछ का कब्‍जा था
कविता की खाली जमीन थी
आयोजकों के पास नकली पट्टे थे
कवियों के नाम पर भाण्‍ड थे
चुटकुलों के लट्ठ लिए
निर्द्वंद्व भाव से वे
विमानों में उडते थे और
जमीन पर कराहती थी काव्‍य संवेदना।



२६ मई, १९६५ को जन्मे प्रेमचंद गांधी जयपुर में रहते हैं और राजस्थान प्रलेस के महासचिव हैं. उनका एक कविता संकलन 'इस सिम्फनी में' प्रकाशित है. उन्हें मिले सम्मान हैं- पं0 गोकुलचन्द्र राव सम्मान - सांस्कृतिक लेखन के लिए(2005);जवाहर कला केन्द्र, जयपुर द्वारा लघु नाटक ‘रोशनी की आवाज’ पुरस्कृत (2004); राजेन्द्र बोहरा स्मृति काव्य पुरस्कार ‘इस सिम्फनी में’ के लिए (2007); लक्ष्मण प्रसाद मण्डलोई सम्मान ‘इस सिम्फनी में’ के लिए (2007) 





14 comments:

केशव तिवारी ने कहा…

अपने समय से संवाद करती महत्वपूर्ण कविताएँ...

अपर्णा मनोज ने कहा…

बहुत अच्छी कविताएँ हैं प्रेमचंद जी . कविता और कवि के दर्द की इससे बेहतर व्यंजना क्या होगी . व्यंग्य की पीठ पर कविता के ज़ख्मों के निशान यहाँ दिखाई देते हैं . ये व्यथित करती हैं .. आपको पढ़ना सुखद .

दिगंबर ने कहा…

कथ्य और शिल्प, दोनों ताजगी से भरे/भर देने वाले.

kumar anupam ने कहा…

Lajawab Kavita Hai. Bahut Badhai.

kumar anupam ने कहा…

Lajawab Kavita Hai. Bahut Badhai.

ramji ने कहा…

लम्बी कवितायें मुझे प्रिय हैं , क्योकि उसमे एक बड़े परिदृश्य को समेटने की सुविधा तो होती ही है , एक बड़े परिदृश्य पर लेखकीय तनावों और दबावों की परीक्षा भी देनी होती है ...कहना न होगा प्रेम भाई इसमें पूरी तरह से खरे उतरते रहे हैं , और यहाँ भी उतरे हैं ...| अभी कुछ दिनों पहले हमने 'नास्तिको की भाषा' कविता पढ़ी थी , और अब भाषा की बारादरी...| इस कविता में आये सवाल भाषा से अधिक समाज के बारे में हैं ....हमारे जन जीवन के बारे में हैं ,...हम समय के जिस मुहाने पर खड़े हैं , उसके बारे में हैं , और जाहिर है की जब भाषा की बात हो रही है , तो उसके बारे में भी है |...हमारा समाज इन दिनों जिस मनः स्थिति से गुजरा रहा है , प्रेम जी उसे बखूबी पकड़ा है ....| पत्रकार , संपादक , स्त्री लेखन पर हमारे समाज का नजरिया , अकादमिक जगत , लोक की बाजीगरी , अनुवाद का छलावा , धर्मग्रंथो का दिखावा , हास्य के नाम पर फूहड़पन जैसे विषयों को प्रेम भाई ने बखूबी उकेरा है ....मजा आ गया इसे पढ़कर ...बेहतरीन मित्र ...बधाई आपको ...

mridula pradhan ने कहा…

bahot khoobsurti ke saath likhi hai....

pahli bar ने कहा…

प्रेमचंद्र गांधी अपनी इस लंबी कविता के जरिये कई महत्त्वपूर्ण सवाल उठाने में सफल रहे हैं. बीस खण्डों की यह कविता भाषा और कविता के सवाल को जिस शिद्दत से उठाती है वह काबिले गौर है. क्या यह विडम्बना नहीं कि अपने ही समय को भूतकाल कहना पड़े और उसी क्रम हजारों साल पहले के मगध को अपना देश बताना पड़े.यह भाषा की लाचारी है,समय की या सही मायनों में कहें तो इस देश की बेचारगी है जो २१ वीं सदी में होने के बावजूद आदिम युग में जीने के लिए अभिशप्त है. दिक्कत तो यह है कि हम कवि होने का बाना भले ही ओढ़ लें लेकिन अपनी मानसिकता से जाति, वर्ण,धर्म को कहाँ अलग कर पाते हैं.वह हर पल सर चढ कर बोलता रहता है.हमारी परम्परा ही है खाने के दांत कुछ और दिखाने के कुछ और की.कवि-लेखक का अहमकपना भी विचित्र है.जो अनुवाद पढने के लिए नहीं बल्कि अनूदित होने के लिए अधीर है.सामंतवादी शैली की भोडी नक़ल कर हम अपने को बड़ा आदमी होने के यूटोपिया में सहज ही ढाल लेते हैं.जब कि हमें यह पता ही नहीं कि रोमन साम्राज्य कब का ढह चुका है.
बेहतर कविता के लिए प्रेमचंद्र जी को बधाई एवं प्रस्तुतीकरण के लिए अशोक जी का आभार.

शिव शम्भु शर्मा ने कहा…

गांधी जी आभार,.. अच्छा लगा बेबाक बयान शैली पर ऎतिहासिक दृष्टिकोण से कविता को देखने का आपका यह बिन्दास प्रयास हैं , महाकाव्य के समय की स्थितियां मुझे बहुत अच्छी लगी ,पर मुझे ऎसा लगता है ,बहुत कुछ अच्छा भी था जिसका जिक्र होना चाहिये था परन्तु कविता मे कवि की निजी सोच व परख ही सर्वोपरि होनी चाहिये । आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

'अपनी माटी' वेबपत्रिका ने कहा…

hamaari bhi badhai

पृथ्‍वी ने कहा…

आज के समय में इस कविता को पढ़ना अलग तरह का अनुभव है. गूंगे का गुड़ जैसा..

नवनीत पाण्डे ने कहा…

अपने समय की यथार्थ व विसंगतियों से मुठभेड़ करती गांधी जी की यह कविता इस समय बहुत ही प्रासंगिक लग रही है।

Onkar ने कहा…

bahut prabhavshali rachnayen

addictionofcinema ने कहा…

badi kavitayen kavi ki range batane ke sath sath kavita ke vikas aur dasha disha ke prati bhi ashwast ya dukhi karti hain, Premchand ji ki kavitayen har tarah se ashwast bhi karti hain aur unki vaicharikta aur agrah bhi nishchint karte hain, unhe bahut badhai

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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