अभी हाल में

:


विजेट आपके ब्लॉग पर

शुक्रवार, 25 मई 2012

अटल अभिशाप स्वयं प्रमथ्यु बन माथे चढ़ाता

(यह एक राजनीतिक कार्यकर्ता की कविता है. जीवन संघर्षों के ताप से निकली, एक प्रतिबद्ध कवि की कविता. मीठी-मीठी बातों और अबूझ बिम्बों के लदान वाली कविताओं के दौर में यह ताप पाठकों को असुविधा में डालेगा ही)


अग्निजेता 

  • गिरिजेश तिवारी
अल्हड है, अक्खड़ है, मस्त है, फक्कड़ है,
ठहाके लगाता है, हँसता-हँसाता है;
पाँवों में छाले हैं, हाथों में घट्ठे हैं,
यही एक मानुस, सभी उल्लू के पट्ठे हैं.
है विनम्र बहुत, मगर छेड़ कर तो देख लो खुद ही ज़रा-सा;
दे देता प्रतिभट को मुँहतोड़ टक्कर है.
काम जब भी करता है,
देख कर इसे क्योंकर
आलसी जमातों को जीना अखरता है?

रोता है, अकेले में अहकता है,
किन्तु सबके सामने यह चहकता है;
बहक जाते हैं सभी, पर नहीं यह तो बहकता है.
सीखने की ललक से अकुला रहा है, समस्याओं से निरन्तर उलझता है.
ज्ञान का आगार है, पर नहीं विज्ञापन किया करता;
बाँटता है स्वयं को, पर नहीं यह ज्ञापन दिया करता.

तुम मुसीबत में फँसो, तो देख लेना,
साथ में यह भी तुम्हारे डटा होगा;
गीत वैभव के बजाने जब लगोगे,
धीरता से चुप लगा तब हटा होगा.

घर में बूढ़ी माँ पड़ी बीमार सोती, खाँसती रहती, कलपती, सतत रोती.
है चिकित्सा-गुफा गहरी, पाटना इसके लिये मुमकिन नहीं है.
डाक्टरों की फीस महँगी, कम्पनी की दवा महँगी;
और पैथोलोजिकल हैं टेस्ट जितने, खून पीने के तरीके बने उतने.
यह गलाता है सुबह से शाम तक तो हड्डियों को,
पर कहाँ से ला सकेगा रोज नोटों की अनेकोँ गड्डियों को?
आह भर कर मातृ-ऋण को याद करता,
पर नहीं फिर भी कभी फरियाद करता;
बस यही एक कामना करता -
"मरे माँ, नरक की पीड़ा न झेले, मत कराहे, तोड़ बन्धन मुक्त हो ले."

भूख, बेकारी, व्यथा सब झेलता है,
हर कदम पर जिन्दगी से खेलता है,
मृत्यु का पन्जा जकड़ता, ठेलता है,
शत्रु से प्रतिक्षण घिरा है, धारदार प्रहार करता;
शान से हर पल जिया है, आन पर है सदा मरता.

दम्भ का, पाखण्ड का उपहास करता,
जनविरोधी मान्यता पर व्यंग्य भरता;
नाचता है, झूमता है जन-दिशा पर,
गर्व करता है स्वयं पर नहीं पूरब की प्रभा पर.

शस्त्रधारी पुलिस के सम्मुख
यही नारे लगाता आ रहा है,
लाठियों के, गोलियों के, अश्रुगैसों के
बवण्डर में सदा अगुवा रहा है;
जेल जाता रहा है छाती फुला कर,
फाँसियों पर झूलता है गीत गा कर;
बीज बोता चल रहा है शान्ति का यह,
उच्च स्वर में मन्त्र पढ़ता क्रान्ति का यह.

मचलता है, उछलता है नोच लेने को ध्वजा श्वेताम्बरी शोषक दलों से,
छीन लेना चाहता है अग्नि का आतप सुरेशों के बलों से,
सूर्य के रथ को लगा कर बाजुओं की शक्ति यह आगे बढ़ाता,
अग्निजेता है!
अटल अभिशाप स्वयं प्रमथ्यु बन माथे चढ़ाता.

रात-रात जाग-जाग भैरवी सुनाता है,
मायावी निद्रा से जन को जगाता है,
बार-बार छापामार युद्धगीत गा-गा कर,
काल को अकाल ही ललकारता, बुलाता है,
तमाचे लगाता है, तमाचे लगाता है. लड़ तुम भी रहे हो! लड़ हम भी रहे हैं!! 

लड़ तुम भी रहे हो! लड़ हम भी रहे हैं!!
मगर हमारे अस्त्र-शस्त्र और तौर-तरीके जुदा-जुदा हैं.
तुम बम बरसाते हो, हम अक्षर बरसाते हैं. तुम गोलियाँ चलाते हो, हम कलम चलाते हैं.
तुम नफ़रत की आग फैलाते हो, हम प्यार के फूल खिला आहत हृदय को हिम्मत बंधाते हैं.
तुम घर-बार, खेत-खलिहान, गाँव-नगर, जंगल-मैदान, स्कूल-अस्पताल, मंदिर-मस्जिद-गुरद्वारे - सब के सब जलाते हो,
हम घर बनाते हैं.
तुम मृत्यु के निर्मम देवता के बेरहम दूत हो, हम क्रान्ति के बाज और शान्ति के कबूतर उड़ाते हैं.
तुम इतिहास के रथ-चक्र को जकड़ने की ज़ुर्रत के साथ उसके आगे खड़े हो,
हम इतिहास के रथ-चक्र को आगे बढ़ाने को अड़े हैं.
तुम मार डालने के लिये ही जिन्दा हो, हम हैं जिजीविषा की सेवा में मर-मिटने पर आमादा.
तुम मुट्ठी-भर हो और हो हज़ारों-लाखों नौकरों के भरोसे, हम करोड़ो-अरबों हैं, बन्धु हैं, जन हैं,
धरती के धन हैं.


तुम खून बहाते हो, हम पसीना.
हम अपने सहारे जी लेते हैं, तुम हो जीने के लिये भी हमारा ही सहारा लेने को मजबूर.
तुम धरती से जीवन को ही लील लेना चाहते हो लूट की अपनी अन्धी हविश में,
हम धरती पर स्वर्ग बनाने को श्रम-रत हैं, आतुर हैं.
अन्ततोगत्वा हमारी धरती के स्वर्ग पर कब्ज़ा तुम देव-गण का नहीं, हम सभी जन-गण का ही होगा.
तुम्हारी क्रूर करनी के चलते टपकते हैं मासूम आँखों से खामोश आँसू,
हम उन आँसुओं से बनाते हैं अंगारे ताकि खाक कर दें तुम्हारी साजिशें.
मानवता की समूची विरासत है हमारी थाती, क्या इस वज्र के अमोघ प्रहार को सहने को तैयार है तुम्हारी छाती?


तुम अपने घमण्ड में चूर बारी-बारी से हम सब को करते चले जा रहे हो अपमानित, कलंकित और आरोपित,
हम अपनी विनम्रता के ज़रिये सम्मान से ऊँचा कर देते हैं अपनी विभूतियों के स्वाभिमानी मस्तक.
तुम चलवाते हो जहाज, टैंक, तोपें, मशीनगनें, रॉकेट, तारपीडो और तरह-तरह की कारें,
हम चलाते हैं झाड़ू, गैंते, फावड़े, कुदालें, हल, खुरपियाँ, छेनियाँ, हथौड़े, साइकिलें, बस, जीप, ट्रैक्टर, ट्रक और टैंकर.
हमारे-तुम्हारे बीच का फ़र्क महज़ इतना ही है कि हम चलाते हैं और तुम चलवाते हो.
तुम्हारा मकसद मन्दी की मार से बचने के लिये अति-उत्पादन को बर्बाद करते जाना है,
हमारा मकसद जिन्दगी की खिदमत की खातिर उत्पादन, और उत्पादन, और और और उत्पादन करते चले जाना है.
तुम आमादा हो हमारी जिन्दगी को ज़हर बनाने पर, मगर हम ही तो हैं अमृत के पुत्र!


हिंस्र धन-पशु हो तुम, नितान्त बर्बर आदमखोर,
हुआ है जब से तुम्हारा अवतार हर बार हर जगह हमला ही किया है तुमने,
और हमने है किया महज प्रतिवाद, प्रतिरोध, प्रतिशोध और प्रतिहिंसा.
हराया है हर बार हर जगह धरती के हर कोने-अंतरे में हमने तुमको धूल चटायी है.
इतिहास का हर पन्ना हमारी विजय के गौरव-गीत सुनाता है
और बिलखता है तुम्हारी क्रूर, कुटिल, कुत्सित विध्वंसक करनी-करतूत पर.
कोरिया से वियतनाम तक, हुनान से स्तालिनग्राद तक, गंगा के तट से वोल्गा के किनारे तक,
वाशिंगटन के किले से पूना की जेल तक, अफगानिस्तान से ईराक तक, क्यूबा से नेपाल तक,
फ़्रांस से गाजा-पट्टी तक, मिस्र से लीबिया तक, आकुपाई आन्दोलन से अन्ना आन्दोलन तक
याद है हमको खूब-खूब और तुमको भी नहीं ही भूला होना चाहिये कि हर टक्कर में जीत हमारी हुई हार तुम्हारी.


प्रचण्ड है हमारा पथ, शाइनिंग है हमारा पाथ, मगर तुम भी तो मजबूर हो अपनी फितरत से, बर्बाद होने तक लड़ोगे ही.
महाबली मानव के पतित दुश्मनो! लड़ो, लड़ो, लड़ो! लड़ तुम भी रहे हो! लड़ हम भी रहे हैं!!


हम लड़ते हैं जीतने के लिये और तुम बर्बाद होने के लिये.
तीसरे विश्व-युद्ध के कुरुक्षेत्र में श्रम और पूँजी के दोनों ध्रुवों की आमने-सामने खड़ी है अट्ठारह अक्षौहिणी
आपादमस्तक शस्त्र-सन्नद्ध वीरगति की मंशा की प्रतिबद्धता से लैस.
एक ओर है सफ़ेद झण्डा अन्याय का - दुर्योधन का, झण्डे के नीचे खड़े हुंकार रहे हैं बूढ़े भीष्म और द्रोण.
और दूसरी ओर है महावीरी झण्डा लाल, और लाल झण्डे के नीचे ललकारता है निःशस्त्र सारथी कृष्ण
साथ में खड़ा है शहादत या विजय में से एक का प्याला पीने को आकुल अक्षय तरकस के धारदार बाणों से लैस धनुर्धर अर्जुन.
धर्मयुद्ध हुआ था, हुआ है और हो रहा है अभी भी, मगर अब है वर्गयुद्ध की यह आखिरी जंग.
इतिहास में पहली बार थोक भाव से चप्पलें खाना शुरू कर चुके हैं तुम्हारे शकुनि और शिखण्डी.
अब तो तुम्हारा विनाश ही कर देगा पटाक्षेप आदमी का खून पीने वाली व्यवस्था के युद्ध-व्यापार का भी.
उगता प्रतीत हो रहा है अब तो प्राची का नन्हा लाल गोला
और हैं थरथराते आतंक के घने काले अन्धकार के आवरण में धरती के गोले को लपेटने वाले ज़ुल्म के आतंकित काले दैत्य.

7 comments:

पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा…

मार्मिक कविता है, अशोक, बधाई कवि और संपादक दोनों को..

Misir Arun ने कहा…

बनावट से परे एक सच्ची कविता साक्षात उपस्थित,कवि होती है ! जैसे वेगवती जलधारा सीधी बहती है गिरजेश जी की कविता ऐसी ही हहराती उद्दाम नदी की तरह है ! यह शत्रु पर सीधे आक्षेप ही नहीं करती उसके विरुद्ध सतत संघर्ष की उद्घोषणा भी करती है ! रोमांचित कर देने वाली कविताएं ! आभार !

Premchand Gandhi ने कहा…

बहुत महत्‍वपूर्ण कविता है अशोक भाई। जब चारों ओर नकली और बेवजह जटिल बिंबों से भरपूर कविताओं का बोलबाला है, इन्‍हें पढ़ना खुद को संघर्षों में शामिल पाना है। बधाई और शुभकामनाएं।

ramji ने कहा…

तेवर पसंद आया ...और बात भी ..पहली कविता में छंदों का किया गया आशिक प्रयोग भी बेहतर है ...

संतोष चौबे ने कहा…

गिरिजेश जी की जनपक्षधर प्रतिबध्दता अप्रश्नेय,असंदिग्ध रही है , इनको व्यक्तिगत रूप से जानने के कारण यह कह सकता हूँ कि एक समर्थ रचनाकार के रूप में इनकी संभावनाओं को उचित पहचान मिलना शेष है ..बहुत प्रभावोत्पादक कविता

बादल सरोज ने कहा…

चाकू तुम्हारे भी हाथ में हैं-हमारे भी
मगर तुम उस से जिबह कर डालना चाहते हो
इंसानियत को.
काट पीट देना चाहते हो उसकी बाकी शिराएँ
और चूस लेना चाहते हो शेष बचा रुधिर....
जब कि हम इस चाकू का इस्तेमाल
उस अतिविलंबित शल्यक्रिया के लिए करना चाहते हैं
जो अपरिहार्य है-जीवन की एकमात्र संभावना है.
यह क्रिया है जो प्रक्रिया में तो है
मगर अब तक अधूरी है.
"मरहम से क्या होगा ये फोड़ा नासूरी है
अब तो इसकी चीर फाड़ करना मजबूरी है-
अब तुम कहो कि ये तो हिंसा है-
होगी,लेकिन बहुत जरूरी है"
(आखिरी चार पंक्ति कवि मुकुट बिहारी सरोज की हैं )

सईद अयूब ने कहा…

गिरिजेश तिवारी जैसा ज़मीन से जुड़ा हुआ व्यक्ति जब कुछ लिखता है तो वह कोरी लफ्फाज़ी या कल्पना का एक वितान कभी नहीं हो सकता. वह उसके ज़मीनी अनुभवों का सार होता है, निचोड़ होता है. अभी कवितायेँ पढ़ी नहीं, शाम को आराम से पढूँगा पर गिरजेश भाई जिस प्रकार से लोगों के बीच जाकर, नए लोगों को साथ ला ला कर लगातार सामाजिक मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं, वह सराहनीय तो है ही, अनुकरणीय भी है.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

फेसबुक से आये साथी

 
Copyright (c) 2010 असुविधा.... and Powered by Blogger.