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शुक्रवार, 18 मई 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय की लंबी कविता



एक कहानीकार के रूप में विमल चन्द्र पाण्डेय एक सुपरिचित नाम हैं. कहानियों में अपनी विशिष्ट भाषा, प्रखर राजनीतिक स्वर और अपने परिवेश की जटिलताओं को बखूबी व्यक्त करते हुए अपनी पीढ़ी के स्वप्नों और मोहभंगों को चित्रित करने वाले विमल की कविताएँ पढ़ना मेरे लिए सुखद था. उनकी कविताएँ पढ़ते हुए मुझे उनमें न केवल एक ईमानदार अभिव्यक्ति की तड़प दिखी बल्कि शिल्प और भाषा के स्तर पर एक ऐसी सजगता भी दिखी जो अनावश्यक सरलीकरण के सहारे बड़बोलेपन में तब्दील हो जाने की जगह अपने समय की जटिल विडम्बनाओं को कविता के फार्मेट में दर्ज करती है. उनके यहाँ युवा होना सिर्फ उम्र का मामला नहीं है. "मुझे ठीक उनसठ साल पहले पैदा होना था ताकि मैं अपने पिता का दोस्त होता" जैसी पंक्तियाँ यूं ही नहीं आतीं. कुर्सियों, पलंगों से रहित इस कवि के घर में बस एक कालीन है भदोही से मंगाया हुआ...जहाँ वह आपके साथ बैठना चाहता है, जहाँ तीन मुँहों और विशाल उदर वाले ब्रह्मालोचक के लिए कोई ऊँचा स्थान नहीं...असल में यह लंबी कविता अलग से एक आलेख की मांग करती है. यहाँ इस पर बहुत कुछ लिख देना पाठक से अपना अर्थ ग्रहण करने का अधिकार छीन लेना होगा. तो बस विमल का असुविधा पर स्वागत!




बुसिफालस^^^                                                                                            
1.

अब नींद के लिये किसे पुकारूं
सिर के बीचोंबीच एक दर्द

चारों तरफ टीवी, गाड़ियों और मशीनों के साथ
शोर अधिकारों का, कि कर्तव्यों  का
इतना घना कि कान को आवाज़ नहीं सूझती
जैसे न सूझे अंधेरे में हाथ को गला
गोलियों को लक्ष्य, तलवारों को पेट
पिता की नरकट की कलम मेरे लिये एक लम्बे फल वाले चाकू की तरह है
जिसे देखना उनकी अनुपस्थिति को देखना

चीज़ें कैसे इतने काल तक ज़िंदा रहती हैं पार्थ ?
चीज़ें यानि बेजान ?
हमारे भीतर जान है तो क्या उखाड़ ले रहे हैं हम ?

अनंत तक जीना कोई शौक नहीं है पर कुछ आभामंडलों के बुझने से पहले
मैं खुद को बुझा देने की इच्छा रखता हूं
मैं अभी इस युग में पैदा ही नहीं होना चाहता था
जहां आप कुछ महसूस ही नहीं करते और चेहरे या तो बहुत भावहीन हैं या बहुत क्रूर

मुझे ठीक उनसठ साल पहले पैदा होना था ताकि मैं अपने पिता का दोस्त होता
और उन्हें मना कर देता खुद को पैदा करने से
कोई युग अपने में संपूर्ण नहीं होता
सतयुग द्वापर और त्रेता कलियुग के ही अलग-अलग नाम हैं
कलियुग को बदनाम न किया जाये हमारी हरामजदगियों के कारण
ये इल्तिज़ा की उसने कल रात मेरे सपने में आकर !

2.

दुष्यंत और शकुंतला को लेकर मेरे मन में बहुत सारे सवाल हैं
किससे पूछूं ?

असली जवाब उस मछली से मिलेगा जिस पर लगाया गया अंगूठी निगल जाने का आरोप
या फिर कालिदास का पुनर्जन्म लिये उस बालक से मिलने उसके गांव चला जा सकता है
जिसे दिखा-दिखा कर इंडिया टीवी जैसे चैनलों की दुकान चल रही है

दुकान बोलने पर किसी ने बताया कि कल पंद्रह अगस्त है और यह दिन देश के लिये बहुत महत्वपूर्ण है
जिस चीज़ में हमें यकीन न हो उसे इतना चीख-चीख कर क्यों बताते हैं हम
किस उल्लू के पट्ठे ने कहा था कि चिल्ला कर बोलने से झूठ भी सच हो जाता है
यह उसके लिये मेरा गुस्सा मिश्रित सम्मान है
कितने दूरदर्शी होते हैं कुछ लोग !!!

मेरे भीतर साल के दो दिनों में देश के लिये बहुत कुछ करने का जोश उमड़ता है
और एक दिन अहिंसा करने का
हालांकि अहिंसा करना हिंसा करने की तरह नहीं है
कि तलवारें लेकर नहीं गये, दरवाजे़ के सामने जाकर गालियां नहीं दीं
नहीं तोड़े सारे किवाड़ और नहीं उड़ायी सबकी गर्दनें
लीजिये साहब ! कर दी अहिंसा

बंदूके बोने वाले भगत सिंह का खेत स्कीम में आ गया है
देखिये कितनी खूबसूरत सड़कें गुज़रेंगी उससे होकर
बंदूकों की फसल नष्ट करने का इससे अच्छा तरीका क्या होगा
अब दूसरी फसल ढूंढो दोस्त और कोई दूसरा खेत
पट्टे का विकल्प भी खुला है और मेरे खेतों के लिये भी ढूंढ देना कोई मजूर

जो बाबा की मौत के बाद से ही परती पड़े हैं
बंदूकें कितनी बोएंगे यार, गोलियों के बीज हमसे छीनते जा रहे हैं वे
बीटी कपास और बीटी बैंगन की तरह जब बीटी गोलियां होंगी
तो जाकर लाइन लगाकर खरीद लाइयेगा कुछ कारतूस ताकि
बंदूकों की फसल का कुछ उपयोग हो सके

3.

अकेला कमरे में बैठा मच्छरों से जूझ रहा हूं
ये मच्छर मेरी आत्मा में काटते हैं
निशान ऐसा ही कि अगले जन्म तक रहेगा
इस हिसाब से आप आसानी से पता कर सकते हैं कि पिछले जन्म में क्या था मैं

सपने सच हो जाने के बाद जल्दी ही अनाकर्षक लगने लगते थे
उसे पाने के बाद जिस अगली चीज़ का सपना हम देखते थे
उसके बारे में यह मानने को तैयार नहीं होते थे कि वह भी अंततः ऐसा ही होगा

हम जानते थे सब राज़ दुनिया के
लेकिन जीने के बहाने खोजना इतना ज़रूरी कि उलझाये रखते थे खुद को उसी में
कोई ठोस कारण न होने के बावजूद हम सुंदरता देखते ही जाते थे
दैत्याकार पेड़ों में, बेढब पहाड़ों में और सुबह खिल कर शाम मुरझा जाने वाले फूलों में
वे मुझे निराशावादी कहते थे तो मैं समझ जाता था कि उन्होंने सुंदरता देखने की आदत डाली ली है
जीने के लिये एकमात्र यही आदत भी पड़ जाये तो काट सकते हैं लम्बी ज़िंदगी
वरना असुंदरता को है कदम-कदम

मरने के बहाने झउआ भर अभी गिना दूं कहिये तो
छोड़िये साहब ! मुझे निराशावादी कहिये और घर जाकर एक कप गरम ताने पीकर
कुछ झूठी खबरें देखिये
चाहें तो फिल्मी गाने सुनिये
कई नये-नये चैनल शुरू हुये हैं इधर गानों के
किसी पर तो आपकी पसंद का गाना आयेगा
लेकिन सावधान !
अगर कहीं नहीं मिला तो फिर आखिरकार टीवी बंद करते हुये मेरी ही बात गूंजेगी आपके मन में

नमक का दारोगा नाम की कहानी सबसे नापसंद है मुझे
जिसमें खलनायक की दया से जीतने का अभिनय करता है नायक
मेरे आदर्श लोग जब मेरा दिल दुखाते हैं तो ज़्यादा टूटती हैं उम्मीदें
लगता है गोया अब किसके पास जाया जाये
किससे कहा जाये कि आदरणीय !
सिर्फ़ आपसे ही बची है अब उम्मीद !!

4.

तो क्या समझा जाये इस युग में आदर्श की अवधारणा सिर्फ़ प्राइमरी पाठशाला के लिये सुरक्षित है ?
वायुमंडल में कितना कुछ मौजूद है बिना कीमत और आक्सीजन की तो बात ही क्या
सारी परिभाषाएं यथास्थान रखी हुयी हैं
सिर्फ़ आदर्श की कोई आदर्श परिभाषा नहीं है
जिस तरह नहीं है गुलाबजामुन में गुलाब
पुलों में सीमेंट, पे्रम में सहिष्णुता और मृत्यु में मुक्ति
आप चुप रहेंगे तो भी आपकी सोच की लहरें मुझ तक आती रहती हैं श्रीमान !

आप एक समय मेरे आदर्श रहे हैं
अब आपके परदे उघड़ने के बावजूद मैं आपको देख कर सलाम में हाथ उठाता हूं
तो यह मेरा बड़प्पन नहीं लालच है
मां के सैकड़ों बार कहने के बावजूद खंडित मूर्तियों को जल्दी नहीं करता विसर्जित गंगा में
आपका खंडित होना दरअसल हमारी बराबरी में आना है

अब बताइये क्या हाल चाल ?
बाल बच्चे ? कहानी कविताएं आलोचनाएं सब चकाचक ?
बालों का गिरना कम हुआ ?
पेट अब भी खराब ही रहता है या गरम पानी वाले नुस्खे ने कुछ फायदा पहुंचाया है ?
तीन मुंहों के साथ एक पेट मैनेज करने में परेशानी नहीं होती आपको श्री ब्रह्मालोचक जी  ?

5.

हमारे भीतर बहुत कुछ था जिसे समझना बचा था अभी
देखा देखी पाप और देखा देखी पुण्य वाले कहावत को समझना इतना आसान भी नहीं था
बंद रेलवे के फाटकों के नीचे से साइकिल घसीट कर पार करते हम जान पर खेलते थे
तो इसका मतलब यह नहीं था कि कोई अंग्रेज इंतजार कर रहा था हमारा

अपनी जिंदगियों से उबे हुये हम लोग चाहते थे कोई रोमांच
कविताएं धीरे-धीरे नेताओं की तरह होती जाती थीं या देश की तरह
उनसे कोई उम्मीद नहीं की जाती थी लेकिन उन्हें वोट दिया जाता था
वे झूठे वादे करती थीं और कुछ देशभक्त भगवा पहन कर हाथों में अस्त्र ले उतर आये थे

कविता अपने कविताभक्तों के एहसानों तले दबती जा रही थी
जैसे देश दब रहा था देशभक्तों के एहसानों तले
मुझपर सवार होकर विश्वविजय की आकांक्षा रखने वाले
बहादुर और पराक्रमी लोगों को मालूम नहीं था मेरे अस्तित्व का मूल्य !

मैं एक छोटा सा पुर्जा हो सकता हूं आपकी बड़ी मशीन का
लेकिन मेरे न होने पर टूट जायेगा आपका विश्वविजय का सपना !

मेरी गति से है आपकी गति
मेरे शौर्य को कहा जाता है आपका शौर्य
मेरी मेहनत आपका सौभाग्य....वाह हिनहिनहिन हिनहिन
ये व्यंग्य की हिनहिनाहट है जिसे समझने के लिये जरूरी है
कि आप एक बार मेरी जगह आकर खड़े हों और मैं आप पर सवारी करूं
सिकंदर महान !

6.

अस्पतालों या श्मशानों में होने वाली विरक्ति हमें बीच-बीच में घेरती रही
लेकिन हम बुद्ध नहीं थे बल्कि वह दिन था बुध

अगर आप समझ नहीं सकते इस असंगत पंक्ति का अर्थ तो ये समझिये
दुख व्यक्त करने या खुशी मनाने की फुरसत मिल सकती है सिर्फ़ इतवार को
ऐसा सोमवार से शनिवार तक तो लगता ही है
अस्पताल के अपने मेडिकल स्टोर से दवाइयां खरीदने पर 15 प्रतिशत की छूट थी
ये 50 प्रतिशत भी होती तो हम क्यों लेते यार
दवाइयां क्या जमा करने वाली चीज़ थीं ?

यही भाव जाग जाये आपके भीतर सोने, ज़मीन या शेयर को लेकर
तो गांधीजी की एकदम नान प्रेक्टिक्ल बात भी सही हो जाये आज के कलियुग में

कलियुग से आप तो परिचित ही होंगे
ये आज के समय को कहते हैं जिसने लम्बे समय से दाढ़ी नहीं बनायी
इस कलियुग में सबके कांसेप्ट गड़बड़ हो गये हैं
क्या आपको नहीं लगता माई लार्ड
कि अगर हम दवाइयों की तरह इकट्ठा करने लगें ज़मीनें, गहने और पैसे
तो कलियुग नाम सुनने में माधुरी दीक्षित जितना मीठा लगने लगेगा
सोने और संतरे में एक समानता है और एक ही फर्क़
दोनों से दांत या जीवन खट्टा हो सकता है और दूसरे का जूस निकाल कर जब चाहें पी सकते हैं

7.

तटस्थता!
हमारे युग को एक शब्द में व्यक्त करने के लिये यह सबसे कारगर है
बहसें, विरोध, धरने, जुलूस सब कुछ बहुतायत में यहां मिलेगा आपको
सिवाय कुछ ऐसी फालतू चीज़ों के
जो प्रयोग न किये जाने के कारण एपेंडिक्स की तरह खत्म हो गयी हैं

चेहरे का नमक और आंख का पानी ऐसी ही चीज़ें हैं
चेहरे का नमक अब पैकेट में आता है और उसमें आयोडीन भी है
आपकी पीढ़ियों को नहीं होगा अब घेंघा, बधाई हो !

अगर नमक की कमी से निम्न रक्तचाप हो जाये तो इस बात की खुशी मनाइये
कि नहीं हुआ गले में शंख निकलने वाला वह खतरनाक रोग
आंख का पानी अब बोतल में है
दिक्कत यह नहीं है यार
समस्या इतनी ही कि जब प्रिंट रेट है बारह तो मैं तुम्हें पंद्रह क्यों दूं
अरे साहब, तीन रुपये ठंडा करने का चार्ज है
पानी को ठंडा करने का भी पैसा लगता है यार यहां तो
और देखो लोगों का खून फ्री फंड में ठंडा हुआ जा रहा है
अधिक दिनों तक ज़िंदा रहने की दवा का नाम बताया मैंने आपको सबसे उपर
उसे लेकर आप रात को चैन की नींद सो सकते हैं

अगर आप किसी कला से जुड़े हैं तो तटस्थता आपके लिये आपके कला अभ्यास की तरह है
जम के करिये अभ्यास और गोली मारिये दुनिया को
हरमुनिया बजाकर

8.

आपके वंश को चलाये रखने की जद्दोजहद में जब मारी गयी आपकी दो बेटियां गर्भ में
उसी वक़्त कल्पना चावला की मौत हुयी थी
एक अंजान श्राप था कि अंतरिक्ष में जाने वाली एक और लड़की को
जिस दिन गर्भ में ही मार दिया जायेगा
उसी दिन मौत होगी वहां पहुंचने वाली पहली लड़की की

9.

यार चेतक !
लड़ाइयां तो घोड़े ही लड़ते हैं और नाम किसी और का होता है
तुम तो फिर भी प्रसिद्ध हो
रण बीच चौकड़ी भर-भर कर तुम निराले बन गये थे
इस बाबत कम से कम एक कविता है और कुछ किंवदंतियां भी

लेकिन मेरे उपर कुछ नहीं लिखा गया
जबकि मेरे मरते ही टूट गया था उस महान योद्धा के विश्वविजय का सपना
तो मेरी कुछ तो कीमत होगी बास !

अब इस कवि को देखो
मेरे उपर तभी कविता लिखने की सुध आयी इसे
जब इसके उपर सवार होकर किसी ने जीतने की कोशिश की दुनिया को
कविताओं की भी हालत घोड़ों जैसी हो गयी है दोस्त
थोड़े सूखे चने खिलाकर इतनी विराट उम्मीदें पाल रहे हैं वे
कि खड़े-खड़े सोने में भी डर लगता है अब तो

10.

इस युग में जो तत्व सबसे तेज़ खत्म हो रहा है
वह न पानी है न तेल
इनके तो कुंए हैं
सबसे तेज़ी से खत्म हो रहा है धैर्य
सबसे तेज़ी से चुक रही है सहनशक्ति
सबसे तेज़ी से गल रही है सहिष्णुता
देश के सबसे बड़े विवाद कार्टूनों के मोहताज़ हो गये हैं

किसी से दोस्ती टूट जाने पर नहीं छपती हैं रचनाएं
प्यार का इज़हार न माने जाने पर फेंके जाते हैं तेज़ाब
पृथ्वी किस वजह से बची हुयी है अब तक यह एक अज्ञात तथ्य था
अब क्यों पृथ्वी के खत्म होने की भविष्यवाणियां बार-बार हो रही हैं
यह भी काफी लोगों के समझ के बाहर की बात है
हे शैतान ! अब भी ?

कुछ लोगों को प्रश्नों के उस पार भेजा जा चुका है
कुछ औरों को भेजा जाना है वहां जल्दी ही
वहां जाने के बाद उन पर कोई बात नहीं की जा सकती
उनकी सिर्फ़ पूजा की जा सकती है और दिखाया जा सकता है धूप
भरी दुपहरी में !

11.

हे मेरे समय के महान कवियों !
कविता का प्रयोग कर मत बचाइये सभ्यताओं को
उन्हें वैसे भी नष्ट होना है
कुछ कर सकें अपनी रचनात्मकता से तो इतनी ही शक्ति दें
कि वे कह सकें आम को आम
घात को घात
हरामखोरी को हरामखोरी
भाषा में सौंदर्य नष्ट होने की कीमत पर भी।

12.

मेरे मित्र
ये दोतरफा रास्ता अब नहीं चलेगा
कि इसी दुनिया में रहते हुये भी तुम अभिनय करो ऐसा
कि तुम्हें पता ही नही कि मेरी आत्मा पर कैसे क्षुद्रताओ  के कोड़े बरसाये जा रहे हैं हर पल

ये वही आत्मा है दोस्त
जिसके बारे में तुम्हारा कहना था कि ये दूध से भी उजली है
तुम्हें आगे आना होगा या फिर अपने खांचे तय करने होंगे
तुम या तो मेरे दोस्त रह सकते हो
या फिर टिकट खिड़की पर बैठे उस आदमी की तरह
जो मुस्करा कर मुझे देखता है
हम अदृश्य गंदगियों से भरे समय में सांस ले रहे हैं

दोस्ती में डिप्लोमेसी नहीं चलेगी
अब तक मेरे मित्र
या तो मेरे बराबर में खड़े रहो
या फिर अपनी कुर्सी सफ़र में भी चिपकाए चलो अपने पिछवाड़े से
यहां एक घोषणा कर दूं सबकी जानकारी के लिये
मेरे घर में न कुर्सियां मेज़ हैं न पलंग
मैंने पूरे घर में सिर्फ़ भदोही से मंगाया एक कालीन बिछा रखा है



 ^^^ सिकन्दर के घोड़े का नाम था बुसिफालास 

21 comments:

Vandana Sharma ने कहा…

बहुत कम लिखावटें ऐसी होती हैं जिन्हें पढकर लगे कि भाई .......................बस्स्स्स- गज्ज्ज़ब और आखिर में आप सोचते हो कि भाई हमारे कहने के लिए भी कुछ छोड़ा होता ..सादगी,गहन संवेदना और मार्मिकता

ramji ने कहा…

बेहतरीन विमल ...इस कविता ने तो जैसे रोमांचित ही कर दिया ....| इसमें विमल की समझ और पक्षधरता इतने मुखर तरीके से झलकती है , की दिल खुश हो जाता है..| भाषा आपकी हमेशा ही लाजबाब रही है , उसके साथ यहाँ जिस तरह से आपने कथ्य और शिल्प का प्रयोग किया है , वह कमाल का है | कितना उद्धरित करू समझ में नहीं आता ...| कलियुग का फलसफा , बन्दूको को बोने का उदाहरण , नमक का दरोगा नाम कहानी , ब्रह्मलोचक का जिक्र , सोना -शेयर और जमीन का दाम , तटस्थता , धैर्य और कुर्सी जैसी कई जगहें रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है | उत्तर प्रदेश की खिड़की कहानी और इलाहबाद पर चल रहे आपके संस्मरण के बाद आयी इस कविता ने आपके स्तर को काफी ऊँचा उठा दिया है ...यहाँ तक पहुचने की बधाई आपको और साथ ही यह चुनौती भी की यह स्तर बना रहे ........

ramji ने कहा…

और हां....असुविधा का यह नया रूप भी स्वागत योग्य है

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

शुक्रिया रामजी भाई :)

Premchand Gandhi ने कहा…

इस कविता ने मुझे बहुत प्रभावित किया भाई।... इधर मैं भी लंबी कविताओं में उलझा हुआ हूं सो इसलिये पढ़ते हुए अपनी-सी लगी... इसकी सघनता ने बहुत उद्वेलित किया... अभी पहले पाठ में इतना ही... सच में लंबी कविताएं कई बार पढ़ने के लिए होती हैं...

Santosh ने कहा…

तड़प गहरी है और आवाज़ भी ...विमल जी को पढवाने के लिए शुक्रिया अशोक जी !

manisha ने कहा…

बहुत सी अच्छी पंक्तियाँ रेखांकित करने का मन हुआ शकुंतला को लेकर ...और सुन्दरता को सराहने को बाध्य हम और चेतक और परती पड़े खेतों पर बहुत खूब लिखा, इतना खूब कि समय की विवशता रेखांकित हो गयी. ...बहुत बधाई विमल. अशोक असुविधा का नया प्रारूप भाया मगर कट - पेस्ट की गुंजाईश छोड़ दो ताकि पंक्तियाँ रेखांकित की जा सकें. रही बात कॉपी करने की तो इस कॉपी प्रोटेक्शन का कोई फायदा नहीं...आजकल सब जानते हैं....:)

durgesh ने कहा…

i love u vcp...

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

लीजिए मनीषा जी, हटा दिया ताला :)

आशुतोष कुमार ने कहा…

वन्दना शर्मा से सहमत!.जान पडता है कविता इस महान संकल्प के साथ लिखी गयी है कि भविष्य के लिए कुछ भी छूट न पाए !!..... कवि की शहर- डायरी भी दिलचस्पी के साथ पढ़ी जा रही है .

' मिसिर' ने कहा…

इस कविता से गुजरना किसी भट्टी से गुजरने जैसा रहा ! एक विक्षोभ भरे मन से निकले दाँत किचकिचाते हुए शब्द ! विमल चंद्र पांडे जी की यह सशक्त कविता प्रभावित कर गई ! अशोक जी का आभार ! नई ब्लाग-सज्जा सुंदर है !

विजय गौड़ ने कहा…

यह सभी कविताएं अलग अलग कविताएं लग रही हैं मुझे। एक लम्बी कविता तो नहीं। मेरा मानना है कि एक कविता बेशक कितनी लम्बी हो और कितनी ही स्थितियों तक उसकी परास हो लेकिन एक केन्द्रिय कथा बिन्दु की स्थिति में ही उसे एक लम्बी कविता माना जा सकता है। अलग अलग कविता मान लेने से भी कविताओं का महत्व कम नहीं हो जाता है। ज्यादातर कविताएं उल्लेखनीय लगी। हां कुछ बहुत सतही व्याखायायें करती हुई भी। समग्र प्रभाव उम्दा ही हुआ पर। बधाई।

तिथि दानी ने कहा…

न सिर्फ़ चिंतन करने बल्कि कुछ सशक्त कदम उठाए जाने को प्रेरित करती बेहतरीन कविता। लेखक की कड़ी मेहनत साफ़ झलकती है। शुभकामनाएँ विमल जी को , ऐसे ही लिखते रहें और अशोक जी को भी बधाई कि आपने इतनी अनूठी कविता से सबका परिचय कराया।

Onkar ने कहा…

bahut prabhavshali prastuti

राजेश उत्‍साही ने कहा…

न तो यहां कोई कविता की समीक्षा करता नजर आता है और न वहां जहां कविता लिखी ही नहीं जा रही है। दोनों ही जगह लोग अपने आप में बड़बड़ा रहे हैं और टिप्‍पणीकार हैं कि बस एक के पीछे एक हां में हों मिलाए चले जा रहे हैं।

बेनामी ने कहा…

विमल भाई का लेखन मुझे हमेशा अच्छा लगता है...
प्रांजल धर

बेनामी ने कहा…

विमल भाई का लेखन मुझे हमेशा अच्छा लगता है...
प्रांजल धर

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - बामुलिहाज़ा होशियार …101 …अप शताब्दी बुलेट एक्सप्रेस पधार रही है

अजेय ने कहा…

हम आम को आम , घात को घात और हराम खोरी को हराम खोरी कह सकें ...... आमिन !!

नंद भारद्वाज ने कहा…

विमलचन्‍द्र पाण्‍डेय को मैं एक युवा कथाकार के रूप में महत्‍वपूर्ण मानता हूं, उनकी यह लंबी कविता 'बुसिफालस'(मुझे इस शब्‍द का अर्थ नहीं मालूम) को दो अन्‍तराल देकर पढ़ने के बावजूद तय नहीं कर पाया कि इसे किस तरह लिया जाना चाहिये, अपने समय की (पहले के समयों की भी) बहुत-सी सूचनाओं, असंगतियों, विषमताओं, नाइन्‍साफियों, विद्रूपताओं, राजनैतिक-सामाजिक स्थितियों आदि को एक बेतरतीब कोलाज के रूप में यहां प्रस्‍तुत किया गया है, टुकड़ों- टुकड़ों में वे बहुत-सी बातें कहते हैं, चारों ओर जो असंगत घटित हो रहा है, उसके बारे में उनका असंतोष भी प्रकट हो रहा है, इसके बावजूद इसे एक कविता के रूप में ग्रहण करना मेरे लिए जाने क्‍यों सहज नहीं है, विमल की रचनाशीलता के प्रति अपने लगाव के बावजूद पहली बार यह दुविधा महसूस की, तो सोचा इसे आप सभी के सामने व्‍यक्‍त कर देने में हर्ज नहीं है।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

सर, कविता के अंत में बुसिफालास का अर्थ दिया है मैंने...असल में अर्थ की कई कड़ियाँ उससे भी खुलती हैं.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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