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मंगलवार, 12 जून 2012

शिरीष कुमार मौर्य की ताज़ा कविताएँ





शिरीष से लगभग छीनी गयी इन कविताओं को असुविधा पर पेश करते हुए एक अजीब सा संतोष हो रहा है. वह उन लोगों में से हैं जिनसे मेरा परिचय केवल कविताओं के माध्यम से है. बिना अब तक रु-ब-रू मिले,  खुद को उनका पाठक कहते हुए मुझे वैसा ही संतोष मिलता है जैसा खुद को उनका दोस्त कहते हुए. उनका ब्लॉग अनुनाद, उन शुरुआती ब्लाग्स में से था/है , जिन्होंने हिन्दी और विश्व कविता को उसके पूरे ठाट के साथ पेश किया और अब भी कर रहा है. समकालीन कविता के अपने हमउम्रों के बीच शिरीष को मैंने हमेशा ऐसा कवि पाया, जिस तक पहुंचना जितना आसान होता है उससे बाहर निकलना उतना ही मुश्किल. जो सबसे पहली चीज़ आकर्षित करती है वह है उनकी भाषा. पहले पाठ में एकदम सीधी-सादी लगती, लेकिन जैसे-जैसे आप उसमें उतरते हैं, वह अर्थों की ऐसी परतें खोलती चलती है कि उसके लिए मैं शायद विष्णु खरे द्वारा कहीं उपयोग किया गया मुहाविरा 'धोखादेह सादगी' उपयोग करता हूँ.  अपने कई समकालीनों से इतर उनका पद्य (और गद्य भी) उद्धरणों और बिम्बों के बोझ से बोझिल नहीं. उनके बिम्ब न तो सुदूर किसी देश से आते हैं न ही पीली पड़ चुकी उन उदास किताबों से जिनके अर्थ झड चुके हैं. वे इसी दुनिया से आते हैं. संवेदनाओं का उनका संसार इसी दुनिया को बचा ले जाने और बेहतर बनाने की जद्दोजेहद से बना है. यहीं से उपजता है उनका कमिटमेंट. वह अपनी प्रतिबद्धता को कहीं छुपाने या धुंधला करने की कोशिश नहीं करते, न ही उसे शोर की कृत्रिमता के साथ दर्ज कराने की जिद.

अगर इन्हीं कविताओं को देखें तो 'जीवन के तलघर में' मुश्किल होते जा रहे समय में  ज़िंदा रहने की वजूहात में अपनी पत्नी और बच्चे के साथ वह कुत्ता भी शामिल है जिसे वह अपना छोटा बेटा कहते हैं. यह एक पूरी दुनिया का बिम्ब है, जिसे लिए वह अगले दिन संभावनाओं के साथ उठते हैं. इसीलिए इस बाज़ार समय में भी ऐसे कवि के लिए 'चमड़ी बदल पाना मुमकिन नहीं'. लिखने को तो न जाने कितना लिखा जाना चाहिए, पर अब तक न लिख पाने के आलस्य और शर्म के बरक्स (हालांकि बकौल शिरीष 'जो जितना प्यारा हो उस पर लिखना उतना मुश्किल है') अभी बस यह वादा कि उनकी समग्र कविताओं पर एक आलेख जल्द ही.



जीवन के तलघर में 

अपने बेटे की आंखों में चमकता हूं मैं
कभी मुस्‍तक़बिल
तो कभी अतीत बनकर
उसे मेरी ज़रूरत है
उसकी ख़ातिर मेरे हाड़-मांस को अभी
बचे रहना है भरपूर


पत्‍नी की आंखों में भर आता पानी
मेरा प्‍यासा कंठ जब पुकारता है उसे
मेरी ऐंठती मांस-पेशियों को
अपनी असम्‍भव कोमल उंगलियों से
राहत देना चाहती है वह
जोड़ना चाहती है
टूटती-छूटती सांसों को
उसकी समकालीन कोशिशों में
धीरे-धीरे कराहता है मेरा आगत
विगत विकट चिंघाड़ता है

मेरे  कुछ नहीं कर रहे  हाथों को  को
अकथ-अबूझ प्‍यार में बंद आंखों के साथ
लगातार चाटता है मेरा कुत्‍ता
जिसे मैं पता नहीं कैसे और कब
छोटा बेटा कहने लगा हूं

जीवन होता जा रहा निजी इतना
कि भुतहा होने के क़रीब

तय कर दी गई दिनचर्या के तहत
जब मैं सो जाता हूं
एक मृत शरीर की गंध आती है मुझसे

रात मर जाने के बाद
सुबह मैं जी पाता हूं
संसार में जाता हुआ कुछ उम्‍मीदों-सम्‍भावनाओं से लदा

जीवन के तलघर में विकल पुकारती है मेरी आत्‍मा –
‘चमड़ी बदल पाना अब मुमकिन नहीं मियां तुम्‍हारे लिए
मुमकिन है
तो बस गए दिनों की ग़र्द झाड़ देना
और कपड़े बदल लेना जो दुनिया ने दिए तुमको’





रास्‍ता बनवाने वाले रास्‍ता बनाने वाले 

रास्‍ता बनवाने वाले
रास्‍ता बनवा रहे हैं

रास्‍ता बनाने वाले
रास्‍ता बना रहे हैं

बनवाने वाले रास्‍ते से दूर खड़े हैं
मिट्टी-गिट्टी-डामर वगैरह कच्‍चे माल से उन्‍हें कपड़े गंदे होने
और चोट लगने का ख़तरा है

बनाने वाले रास्‍ते में धंसे पड़े हैं
किसी-किसी के पांव में पट्टी बंधी है
गर्म डामर का धुंआ पी रहे हैं
कितनी विचित्र और सार्थक बात है यह
कि कहीं न जाते हुए
वे अपना जीवन
रास्‍ता बनाने में जी रहे है



ऐसे ही बनवाए जा रहे और बनाए जा रहे
कुछ रास्‍तों से गुज़रता मैं
दरअसल अब महीनों से स्‍थगित अपनी कविता की तरफ़
लौट आने के बारे में सोच रहा हूं

लिखवाने वाले बैठे हैं
दूर टेलीविज़न स्‍टूडियो के सोफ़ों पर
समारोहों में सभाध्‍यक्षों के आसन पर
विचार और संवेदना की वाहक कहानेवाली पत्रिकाओं के
पन्‍नों पर

वे लिखवा रहे हैं
भले मुग़ालता हो उन्‍हें पर वे लिखवा रहे हैं

लिखने वाले परेशान हैं
एक ही रास्‍ते को बार-बार खोदते
तोड़ते-बनाते
वे कहीं पहुंच नहीं रहे है
मुझ जैसे कुछ तो पहुंचना भी नहीं चाहते कहीं
आख़िर  को कविता
कहीं से निकलकर
कहीं पहुंच जाना भर तो नहीं

अभी
इस रात की जिस मेज़ पर
मैं अपनी कविता की तरफ़ लौट आने के बारे में सोच रहा हूं
वहां भूरी-भूरी ख़ाक-धूल  और स्‍याही ताल  के बीच
कुछ रफ़ू कुछ थिगड़े  पर
एक बड़ी-सी लाल चींटी है
अपने बेटे के मैग्‍नीफाइंग ग्‍लास से देखता हूं उसे मैं
उत्‍सुकता से भरकर

उसके अगले पैर उठे हुए हैं
थराथरा रही हैं दो पतली सूंड़ें
कठोर है उसका कब्‍ज़े जैसा जबड़ा
वह बेहद लाल है
और काट भी सकती है
अपनी तरफ़ बढ़ते किसी भी
गुस्‍ताख़ हाथ पर।



नए मठों में  नए गढ़ों में 

नए मठों में
मेरे भीतर उलझनों के कई पुराने चेहरे हैं
कुछ नए आकार ले रहे हैं

नए गढ़ों में
मेरे भीतर हिम्‍मत के भी चेहरे हैं अनेक
अजेय मित्र-मेधाएं
रक्‍तालोक स्‍नात अगुआ कुछ

कुछ उठे हुए हाथ
तनी हुई मुट्ठी
वो भी अपने गढ़े तीन सितारों की छांव तले
बरसों पहले की गहराती रातों में
सफ़ेद दीवारों पर ये सब बनाता घूमता था मैं

बरसों बाद
मुझे इस सबके सपने आते हैं

असेम्‍बलिंग-डीअसेम्‍बलिंग
कंस्‍ट्रक्‍शन-डीकंस्‍ट्रक्‍शन का काम नहीं है यह

समूचे को रचने और बचाने की सबसे कठिन-कोमल लगातार जद्दोजहद है एक
जितनी प्‍यारी उतनी कठोर

इधर देखता हूं
अभिव्‍यक्ति के मठों और गढ़ों में घुसकर
वहां झिलमिला रहे
कितने ही कम्‍प्‍यूटर
कितने ही सजे-बजे कमरों में
कितनी ही सजी-धजी मेज़ों पर

समझाते हैं मिल-जुल कर
हम जैसों को –
‘चेहरे नहीं, उठे हुए हाथ नहीं, तनी हुई मुट्ठी नहीं
विचार के अब गुप्‍तांग निकल आए हैं
बहस उन पर होनी चाहिए’

26 comments:

Dr. Rajrani Sharma ने कहा…

गजब ,अनुभुतियों को झिझोड कर रख दिया ।

राकेश अचल ने कहा…

ये कविताएँ छंद विहीन होकर भी लहराती नजर आतीं है,इनसे कोई भी अनगढ़ ,अनपढ़ तादात्म बैठा सकता है.शुभकामनायें

वंदना शुक्ला ने कहा…

bahut achhee kavitayen ....dhanywaad ashok padhvane ke liye

ramji ने कहा…

इन्हें छीनकर आपने अच्छा किया ...इनसे गुजरना अपने आपको भीतर तक टटोलने जैसा है ..और जब कोई कविता आपको अपने भीतर उतार देती है , तो समझिए कि वह हमें कुछ और मानवीय बनाने की तरफ ले जा रही है | ..बधाई शिरीष जी को ...

' मिसिर' ने कहा…

बेहद सशक्त और प्रभाव शाली कवितायें ! शिरीश जी को बधाई और आपका आभार !

Santosh ने कहा…

ओह ...विचलित कर देने वाली कविताएँ ! यह सचमुच "असुविधा " पैदा करती हैं ! अशोक जी को आभार और शिरीष जी को बधाई!

दीपिका रानी ने कहा…

बहुत बढ़िया.... उनके ब्लॉग से भी घूम आए हम तो।

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

दोस्‍त 'धनुष पर चिडि़या' मेरी नहीं चन्‍द्रकान्‍त देवताले की किताब है।
***
और हां ये हमारी छीनझपट भी अपने में एक जटिल कविता ही है।

अजेय ने कहा…

विचार के गुप्ताँगों पर बह्स होनी चाहिए . अच्छा कहा.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

नए मुहावरे की कविताएं हैं।

पारुल "पुखराज" ने कहा…

"उनके बिम्ब न तो सुदूर किसी देश से आते हैं न ही पीली पड़ चुकी उन उदास किताबों से जिनके अर्थ झड चुके हैं."bilkul theek baat aur shayad isiliye unki kavitaen kabhi paraayi nahin lagtin..shukriya padhvane ka

ANJU SHARMA ने कहा…

वाह! सुंदर कवितायेँ! पढवाने के लिए आपका शुक्रिया..... सच है 'असुविधा' नाम और इनके कहन में साम्य भी है और इनमें निहित बेचैनी सीधे और सरल कित्नु छाप छोड़ने वाले बिम्बों के माध्यम से सहज ही संप्रेषित होती है.....हर कविता एक ऐसे मोड़ पर ख़त्म होती है जहाँ आप सकते की स्थिति में होते हैं और जहाँ से आगे की सोच खुद पाठक को तय करनी होती है......बधाई shirish जी को.....

Amit sharma upmanyu ने कहा…

वाह! बेहद सशक्त अभिव्यक्तियाँ! "रास्ते" वाली कविता इस तरह की परिस्तिथियों पर बहुत विशिष्ट काव्यात्मक अभिव्यक्ति है.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

शिरीष भाई,
धनुष पर चिड़िया' देवताले जी की ही किताब है, पर कवर बता रहा है कि संपादक आप हैं :)

मुकेश पाण्डेय चन्दन ने कहा…

ashok ji aur shirish ji dono ko badhai ! anupam !!!

Premchand Gandhi ने कहा…

गिरीश भाई उन चुनिंदा कवियों में हैं, जिनकी कविताओं की मैं बाट देखता रहता हूं। अच्‍छा किया कि आपने छीनकर ही सही, हमारे लिए यहां प्रस्‍तुत की। अब कविताओं के बारे में क्‍या कहूं, बस इतना कि 'दिल अभी भरा नही...'

pakheru ने कहा…

शिरीष कुमार मौर्य की यह कवितापन से सघन संवेद्य कवितायेँ रचनात्मक रूप से इतनी जनोन्मुख हैं कि अगर यह छीनी नहीं जातीं तो भी जन तक पहुंचतीं.

चेतना पर इनकी स्पर्शानुभूति इन कविताओं की ताकत है.

अशोक गुप्ता

addictionofcinema ने कहा…

गिरीश की कविताओं का हमेशा इंतजार रहता है और वह हर बार कुछ नया देते हैं. बहुत कवितायेँ है जिन पर बात करने के लिए काफ़ी वक्त चाहिए...

Nityanand Gayen ने कहा…

सशक्त कवितायेँ ....

Nityanand Gayen ने कहा…

सशक्त कवितायेँ

गोपाल राठी ने कहा…

शिरीष की इन कविताओं को अशोक कुमार पाण्डेय के माध्यम से पेश करते हुए एक अजीब सी ख़ुशी हो रही है.l वह उन लोगों में से हैं जिन्हें मै बचपन से जानता हू..जब वे कवि भी नहीं थे l.
इस उदीयमान युवा कवि की शख्सियत के विकास के साक्षी होने का हमारा सौभाग्य है l.रिश्ते में तो हम शिरीष के चाचा है पर कविताये पढ़ कर भतीजा बनने को जी चाहता है l
उम्दा कविताओ के लिए शिरीष को बधाई ,और अशोक जी को धन्यवाद

प्रदीप कांत ने कहा…

जीवन के तलघर में

मेरे कुछ नहीं कर रहे हाथों को को
अकथ-अबूझ प्याहर में बंद आंखों के साथ
लगातार चाटता है मेरा कुत्ता
जिसे मैं पता नहीं कैसे और कब
छोटा बेटा कहने लगा हूं

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इंसान से इंसान के बीच बढती जा रही दूरी का मार्मिक दर्द
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रास्ता_ बनवाने वाले रास्ता_ बनाने वाले

अभी
इस रात की जिस मेज़ पर
मैं अपनी कविता की तरफ़ लौट आने के बारे में सोच रहा हूं
वहां भूरी-भूरी ख़ाक-धूल और स्याहही ताल के बीच
कुछ रफ़ू कुछ थिगड़े पर
एक बड़ी-सी लाल चींटी है
अपने बेटे के मैग्नीलफाइंग ग्ला स से देखता हूं उसे मैं
उत्सुबकता से भरकर

उसके अगले पैर उठे हुए हैं
थराथरा रही हैं दो पतली सूंड़ें
कठोर है उसका कब्ज़ेत जैसा जबड़ा
वह बेहद लाल है
और काट भी सकती है
अपनी तरफ़ बढ़ते किसी भी
गुस्तारख़ हाथ पर।
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कविता में दिखाई देता यह प्रतिरोध!!! शिरीष भाई से इतनी अच्छी कविताएँ छीनकर पढवाने का शुक्रिया...

neera ने कहा…

कविताओं की गहराई अंगुली पकड़ ले जाती है चेतना के उस कोने में जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं...

आशुतोष कुमार ने कहा…

निराश हुआ . अब सोचिये मत . लौट आइये अपनी कविता के पास , शिरीष .

विशाल श्रीवास्तव ने कहा…

ये कवितायेँ अवसाद के जंगल से गुजरते हुए पेड़ों के शिखरों से छन कर आती आशा की धूप के टुकड़ों का सा दृश्य हैं.. मैं इस बात से आश्वस्त हुआ हूँ कि कवि को एक समय के बाद जिस तरह कुछ चीजों को छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए . उस तरफ आपकी यात्रा शुरू हो चुकी है.. लोग इस तरह की कविताओं से असहमत भी हो सकते हैं क्यूंकि इनमे वो 'चामत्कारिक चमक' तो नहीं है. पर मुझे पूरा भरोसा है कि जिस प्रौढता की तरफ ये बढती दिख रही हैं वह अधिक महत्त्वपूर्ण है.

विशाल श्रीवास्तव ने कहा…

ये कवितायेँ अवसाद के जंगल से गुजरते हुए पेड़ों के शिखरों से छन कर आती आशा की धूप के टुकड़ों का सा दृश्य हैं.. मैं इस बात से आश्वस्त हुआ हूँ कि कवि को एक समय के बाद जिस तरह कुछ चीजों को छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए . उस तरफ आपकी यात्रा शुरू हो चुकी है.. लोग इस तरह की कविताओं से असहमत भी हो सकते हैं क्यूंकि इनमे वो 'चामत्कारिक चमक' तो नहीं है. पर मुझे पूरा भरोसा है कि जिस प्रौढता की तरफ ये बढती दिख रही हैं वह अधिक महत्त्वपूर्ण है.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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