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सोमवार, 2 जुलाई 2012

लीलाधर मंडलोई : प्रकृति की गोद में धड़कता एक कवि-हृदय

अंजू शर्मा उभरती हुई युवा कवियत्री हैं और दिल्ली में इन दिनों कविता के आयोजनों में खूब सक्रिय. लीलाधर मंडलोई की कविताओं पर एक लघु टिप्पणी उन्होंने विशेष तौर पर असुविधा के लिए लिखी है, साथ ही कविताओं का चयन भी उन्हीं का है.




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साहित्यिक अवदान के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक सम्मान और पुरस्कारों (पुश्किन सम्मान, शमशेर सम्मान, रजा, नागार्जुन, दुष्यंत कुमार और रामविलास शर्मा सम्मान, साहित्य अकादमी से साहित्यकार और कृति सम्मान) से सम्मानित लीलाधर मंडलोई जी उर्फ़ दादा से मेरी पहचान महज ६ मुलाकात पुरानी है! दो तरफ़ा होते हुए भी हर बार महज एकतरफा रही क्योंकि हर बार मैंने सिर्फ उन्हें सुना! मैंने पाया कि कवि लीलाधर के साथ साथ व्यक्ति लीलाधर भी कम दिलचस्प नहीं हैं! वे एक करिश्माई वक्ता हैं, उन्हें सुनना इसलिए भी अच्छा लगता है कि वे सहज सम्प्रेषण के कारण श्रोता के साथ जो तादाम्य स्थापित कर लेते हैं वह अपने आप में अद्भुत है! 
१९५३ में मध्य प्रदेश के छिंदवाडा कसबे में जन्मे एक ऐसे बालक के लिए जिसके माता-पिता कोयले की खदान में मजदूर थे, जिसका सारा बचपन सतपुड़ा की घाटी में संघर्ष में बीता, जिंदगी कभी इतनी आसान नहीं थी! सतपुड़ा के जन-जीवन, जीवन शैली, जीव-जंतु, पेड़-पौधे सभी ने उन पर अपनी अमित छाप छोड़ी! आदिवासियों और कोयला खान मजूरों का साथ आज भी उनके अंतर्मन में रचा बसा है! उन्ही के शब्दों में "मेरा जीवन सतपुड़ा का ऋणी है! कविताओं में और उससे बाहर भी! सतपुड़ा के जंगल, दृश्य, मौसम, पशु-पक्षी, नदी-तालाब, और लोग-बाग मेरी स्मृतियों से कभी जाते नहीं! सतपुड़ा मेरे जीवन की पहली पाठशाला है! इसमें जब भी लौटता हूँ, कविता में नया हो उठता हूँ! मेरी ऐंद्रिकता, रोमान और अध्यात्म सतपुड़ा के कारण ही है! सतपुड़ा के बाहर भी, वह बहुत हद तक सतपुड़ा ही है! जब प्रकृति बोलती है तो सतपुड़ा ही दुःख-सुख में बोलता है!" 

वे कहते हैं......
पहली बारिश के बाद
केलि का झुटपुटा यह
आकाश में सिहरन
आलिंगन का मनोहारी दृश्य
इतना उत्ताप 
कि त्याग के अपने पंख
समागम की सुखद समाधि
बाद इस अपूर्व सुख के
रेंगते हुए धरती की शरण
अब खड़ा होगा
संतति के स्वागत में
मनोरम दीमक घर 
आगे वे बताते हैं......"मेरे रागात्मक संबध और स्वप्निलता का लोक, सतपुड़ा के आलोक में जन्में हैं! और कविताओं की जमीन में भी सतपुड़ा गहरे तक विद्यमान है! मेरी तमाम इन्द्रियों को सतपुड़ा ही जीवंत-जाग्रत रखता आया है! कहना न होगा मेरी इन्द्रियां यदि आज भी कविता को उजास से भर पाती हैं तो उनमें सतपुड़ा कहीं-न-कहीं अपनी भूमिका निभा रहा होता है! मैं जब भी कविता को प्रकृति में रचता हूँ, सतपुड़ा अपने वैभव के साथ कहीं जरूर मेरे भीतर धड़क उठता है! और मैं उसके अनुभवों से गुज़र कर ही नए अनुभवों को जान पाता हूँ! प्रकृति के रहस्यों को जानना, उसे बचने की कोशिश भी है, जो कदाचित मेरी कवितायेँ करती होंगी! वे प्रकृति और मनुष्य के अद्भुत रिश्तों पर बात करते हुए, सृष्टि की अपरिहार्यता को रेखांकित करती हैं! ये कवितायेँ सृष्टि की पीड़ा, यातना और आगत त्रासदी के प्रति सचेत हैं! गहरे प्रेम और वेदना से उपजी इन कविताओं में कवि के मन को अगर आप पढ़ सकें तो प्रकृति की सिम्त लौटने का विचार जरूर बनेगा! अगर ऐसा कुछ हो पाया तो उनकी कोई भूमिका होगी, अन्यथा ये भी खो जाएँगी जैसे सृष्टि से बहुत कुछ धीरे धीरे ख़त्म होता जा रहा है!"
सतपुड़ा के श्रमशील मनुष्य सदा उनकी कविताओं में उपस्थित रहे! बाद के समय में वे भोपाल और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से लेकर बहुत सी जगहों पर गए जहाँ प्रकृति बाहें फैलाये उनके स्वागत में रही, और वहां की प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति ने उनके काव्य बोध को न केवल समृद्ध ही किया अपितु जीवन-पर्यंत उस पर असर बनाये रखा है! वे बताते हैं कि अंदमान और निकोबार द्वीप समूह में उन दिनों न तो ज्यादा सुविधाएँ हुआ करती थी और न यातायात के साधन ही बहुतायत में होते थे! ऐसे में वे अपने साथ जरूरी सामान मच्छरदानी, बिस्तर, स्टोव आदि लेकर चलते थे! जाते समय जहाज उन्हें किसी द्वीप पर छोड़ दिया करता था और ४-५ में लौटने पर उसी के द्वारा वे अपनी वापसी सुनिश्चित किया करते थे! इन ४-५ दिनों में प्रकृति और समुद्र के सान्निध्य में बिताये पलों में उन्होंने प्रकृति, जन-जीवन और जीवों का बहुत गहनता से अध्ययन किया, यही कारण है कि उनकी कविताओं में उनकी जीवन शैली, रस्में, रीति-रिवाज़ यहाँ तक कि जीव-जंतु बहुतायत में छाये रहते हैं! आईये उनकी प्रकृति और जन-जीवन से जुडी कुछ कवितायेँ पढ़ते हैं. - अंजू शर्मा 

घरेलू मक्खी 


जो न होता मेरे पास पिता का मेग्निफाईंग ग्लास
कैसे देख पता तुम्हारा सौन्दर्य 
और इतना पुलकित होता

कितने साफ-सुथरे और सुंदर तुम्हारे पंख
इन पर कितने आकर्षक पैटर्न बने हैं
ईश्वर की क्या अद्भुत रचना है तुम्हारे संयुक्त नेत्र

तुम्हारी संरचना में एक कलात्मक ज्यामिति है
अनूठी गति और लय में डूबी है तुम्हारी देह 
की उडती हो तो जैसे चमत्कार कोई
हवा में परिक्रमा करते हुए, नृत्य कितना मनोरम

इतनी अधिक चपलता के बावजूद
क्या खूब सचेत दृष्टि
कि मालूम तुम्हे उतरने कि सटीक प्रविधियां 
के भी लैंडिंग दुर्घटना इतिहास में दर्ज नहीं

तुम्हारी भिन-भिन से नफरत करने वाले हम
संचालित हैं अपने अज्ञान और अन्धविश्वास से
हमारा सौन्दर्यबोध भी इतना प्रदूषित 
कि नहीं मान पाते उसके होने को
प्रकृति का एक खूबसूरत उपहार

देखो वह उडी और ये बैठ गयी 
मेरे होंठो पर
अब उसका नर्मगुदास स्पर्श है
जो जन्म के पहले दिन के
बेटी के स्पर्श की तरह जिन्दा है 

तानागिरू* 


और दिनों से एकदम अलग है आज का दिन यहाँ

सुबह-सुबह निकलेगा पहली बार आज
उठाये तीर-कमान अपने बलिष्ठ कंधे पर
और प्रतीक्ष में होंगे सब बच्चे, जवान, बूढ़े 

झूम उठेगा समूचा गाँव 
मार के लौटेगा जब नुकीले दांतों वाला खतरनाक सूअर 
उसके जीवन का अद्भुत समय है
की होगा आरूढ़ शिकार के सीने पर
निकलेगा रक्त, जमाएगा खून के थक्के 
और खायेगा आनंद-विभोर हो पहले पहल
(अपने शिकार को गर्व से खाने का पहला दिन है आज) 

बीस दिनों तक रोज़ जायेगा जंगलों में अकेला
और मार लायेगा एक से एक खतरनाक सूअर वह
प्रतीक्षा में ओंगियों का गाँव
रोज़ देखेगा उसका भरपूर जवान होना 
और संस्कारों से एकदम अलग है 'तानागिरू'
डुगांगक्रीक की सबसे बड़ी खबर है आज
की अभी अभी एक लड़का हुआ है जवान

और इस तरह एक और रक्षक ओंगियों का

* तानागिरू : अंदमान की दुर्लभ जनजाति ओंगी का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार समारोह है तानागिरू ! यह ओंगी के जवान सिद्ध होने पर आयोजित किया जाता है!

मनुष्य जल 


हरी मखमली चादर पे उछरी 
वाह! ये कसीदाकारी रंगों की
मेरी स्मृति भी बरसों बरस बाद इतनी हरी
और पांखियों की ये शहद आवाजें
इतना अधिक मधुर स्वर इनमें 
कि जो इधर 'जय श्रीराम' के उच्चार में गायब

इस हरी दुनिया के ऐन बीच
एक ठूंठ-सी देहवाले पेड़ पर यह कौन?
अरे! यह तो वही, एकदम वही हाँ! बाज!!
स्वाभिमान में उठी इतनी सुंदर गर्दन
किसी और की भला कैसे मुमकिन 
उसकी चोंच के भीतर आगफूल जीभ
आँखों में सैनिक चौकन्नापन

इतिहास के नायक और फ़िल्मी हीरो के
हाथ पर नहीं बैठा वह 
न ही उसके पंजे में दबा कोई जंतु
ठूंठ की निशब्द जगह में जो उदासी फैली
उसे भरता हुआ वह समागन*

गुम रहा अपनी ग्रीवा इत-उत

मैं कोई शिकारी नहीं
न मेरे हाथ में कोई जाल या कि बन्दूक
फिर भी कैसी थी वह आशंका आँखों में
एक अजब सी बेचैनी
कि पंखों के फडफड़ाने की ध्वनि के साथ ही
देखा मैंने उसे आसमान चीरते हुए

मेरे पाँव एकाएक उस ठूंठ की तरफ उठे 
जहाँ वह था, मुझे भी चाहिए होना
कि सूख चुका बहुत अधिक जहाँ 
पक्षी जल के अलावा चाहिए होना मनुष्य जल कुछ 

*समागन : अत्यंत प्रिय व्यक्ति 

नदी 


लाख कोशिश की
कि चल जाये 
दवाइयों का जादू 
सेवा से हो जाये ठीक

माँ की ऑंखें 
उस गंगाजली पर थी

जिसे भर लायी थी वे
अपनी पिछली यात्रा में

धर्म में रहा हो उनका विश्वास
ऐसा देखा नहीं

वे बचे-खुचे दिनों में 
रखे रहीं उस कुदाल को
जिससे थोडा उन्होंने कोयला
पच्चीस बरस तक अँधेरी खानों में

माँ जल से उगी हैं
नदी को वे माँ समझती थी 

घोड़ानक्कास 


घोड़ानक्कास से ज्यादा उदास है कोई जगह इस शहर में यहाँ 
घोड़े इतने कम दिखने में कि मरे बहुत
और इस तरह घोड़ानक्कास मरा

जाने किस खटके में तहमदबाज भोपाली किस-किसकी तलाश में गायब
मौजूद इक्का-दुक्का तो कुछ ऐसे बेंतबाजों की तरह डोलते-घिघियाते 
ढूंढते अपने पुराने कद्रदान 
रिझाते याद दिलाते तांगे का नव्वाबी मज़ा

मुई राजधानी बाक़ायदा बड़ों के काबिल हुई
घोड़ानक्कास नए खटराग में जैसे भूल बैठा क़व्वाली की नशीली रातें
भूला नमक में बोलती चाय का लुत्फ़
जैसे बीत गयी घोड़े के टापों की पकीली लय करीब

फर्राटे भरते ऑटो-मिनी बसों के बीच
गईं वो मटरगश्तियाँ, वो फब्तियां गयीं
उठी पीतल की नक्काशीवाली वो दुकानें 
पहियों को रंगरोगन करते वो लोग उठे

चली वो वार्निश की गंध चली और वो
हॉर्सपॉवर की इबारत कि जिसपे नाज़ हमें

नाल उतरी सी खड़े हैं घोड़े
उंघते बचे-खुचे से तहमदबाज़
लो गया कैफ का मुहल्ला गया और 
वो गुलियादाई की गली भी गयी 

आखिरी सांसे हैं ये कल्चर की
अब वो अख़लाक़ की दीवानगी कहाँ

नज़र लग गयी इसे ज़माने की
संभलकर चलना यहाँ सड़कों पर
ठहरकर हँसना यहाँ सड़कों पर
काली छायाएं डोलती हैं यहाँ, नया भोपाल है यह भाई मियां!!

4 comments:

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल के चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आकर चर्चामंच की शोभा बढायें

Amit sharma upmanyu ने कहा…

बहुत बढ़िया रचनाएँ

Premchand Gandhi ने कहा…

मंडलोई जी मेरे प्रिय कवियों में हैं... उनकी ये कविताएं मुझे भी बहुत प्रिय हैं। अंजू जी ने बहुत अच्‍छी टिप्‍पणी लिखी है। मंडलोई जी को पढ़ना मेरे लिए खुद की कविता को मज़बू करना है। आभार।

neera ने कहा…

जीव -जंतु के प्रति इतनी संवेदनशीलता ने कविताओं को अद्वतीय श्रेणी में खड़ा कर दिया है...

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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