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शनिवार, 28 जुलाई 2012

उमा शंकर चौधरी की कवितायें



उमाशंकर चौधरी हिन्दी की युवा पीढ़ी के बहुचर्चित और बहुपुरस्कृत कवियों में से हैं. साथ ही,वह उन कवियों में से भी हैं जिन्होंने कविता और कहानी दोनों को बड़ी कुशलता से साधा है. उनकी कविताओं में जीवन की तमाम विडंबनाओं के दृश्य अपनी पूरी डिटेल्स के साथ आते हैं. कई बार वह दोनों विधाओं में आवाजाही करते से लगते हैं. ग्रामीण और कस्बाई जीवन के साथ राजनैतिक परिदृश्य पर उनका सीधा और तीक्ष्ण व्यंग्य उन्हें एक ज़रूरी कवि बनाता है. असुविधा पर आज उनकी कुछ नई-पुरानी कवितायें


आग

                           
वह बच्ची, जिसकी उम्र
दस- बारह वर्ष के करीब है और जिसने
अपनी दो कोमल उंगलियों के बीच
फंसा रखे हैं पत्थर के दो चिकने टुकड़े
इस भीड़ भरी बस में
निकालने की करती है कोशिश
अपने गले से
अनुराधा पौडवाल की आवाज

पत्थर के इन दो चिकने टुकड़ों से
निकालती है वह
ढ़ेर सारी फिल्मी धुनें,
भगवान के भजन और
सफर के गीत

इस भीड़ भरी बस में भी
लोग सुनते हैं उसके छोटे गले से
अनुराध पौडवाल की छोटी आवाज
और देखते हैं
बहुत ही तेज गति से चलने वाली
उसकी दो उंगलियों के बीच
पत्थरों का आपस में टकराना

उस बच्ची को नहीं है मालूम
पत्थर के इन्हीं दो टुकड़ों से, जिनसे
वह निकालती है फिल्मों की धुनें और
जीवित रहने की थोड़ी सी गुंजाइश
उन्हीं पत्थरों के टकराने से निकलती है
चिंगारी
उस बच्ची को नहीं है मालूम, जब
इस सृष्टि की हुई शुरुआत, तब
लोगों ने बसने से पहले, सबसे पहले
ईजाद की थी आग
इन्हीं दो पत्थरों को टकराकर



अब खून नहीं डर बह रहा है

हर छोटे से छोटा धमाका भी अगर तुम्हें
लगता है बम का धमाका और
तुम्हारी  रुह कांप जाती है, तब समझो तुम कि
तुम्हारी धमनियों में अब
खून नहीं डर बह रहा है।

वह बच्चा जो क्रिकेट की जीत की खुशी में
फोड़ रहा है एक छोटा सा पटाखा
और तुम कांप जाते हो
तब समझो तुम कि अब खून नहीं डर बह रहा है।

क्या तुमने बंद कमरे में सुनी है
राह चलते उस औरत के कान से गिरे झुमके की
झन्न से आवाज
और उस बच्चे के बारे में क्या कहोगे
जिसका गुब्बारा सिर्फ इसलिए फूट जाता है कि
वह हरी दूब की नोंक से टकरा जाता हे।

क्या तुम सचमुच डर नहीं गये थे
जब तुम्हारी टूटियों से महीनों बाद निकल पड़ी थी अचानक
पानी की एक धार।

सच यह है कि चिड़ियों की चहचहाहट
पत्तियों की सरसराहट या फिर
साइकिल की टायर से निकलने वाली हवा की आवाज
और फिर दूध पीते बच्चे के मुंह से निकलने वाली
एक पतली सी आवाज से अब
जुड़ गई है तुम्हारी धड़कन की तार।

सच यह है कि अब तुम्हारी धड़कन तक
पहुंचने वाले खून ने अचानक से बदल ली है
अपनी शक्ल।

अगर तुम बीच चौराहे  पर यह कहोगे कि
तुम्हारी धमनियों में अब
खून नहीं डर बह रहा है तब
वह तुमसे पूछेगा डर का रंग और
जब तुम उससे कह दोगे झक्क सफेद,
तब वह बंद कमरे में सिरिंज से निकालेगा खून की दो बूंद
और फिर वह पछाड़ खाकर गिर जायेगा
उसी बंद कमरे में।

क्या यह बंद कमरा वाकई लोकतंत्र की लेबोरेटरी नहीं है?



पुरुष की स्मृति में कभी बूढी नहीं होतीं लड़कियां

                                                   
 लड़कियां अपनी मौत से भी
 नहीं मरती है,
 पुरुष की स्मृति में
 और न ही लड़कियां, अपनी ढलती उम्र से
 होती हैं बूढी,
 पुरुष की स्मृति में

 यूं पत्नियां, अपने घर में अक्सर
 अपने पतियों पर लगातीं हैं
 उसकी स्मृति के कमज़ोर होने का
 आरोप
 जब पुरुष भूल जाते हैं
 शेविंग करवाकर सैलून से लौटते हुए,
 पत्नी के बार-बार याद दिलाने के बावजूद
 अपने साथ लाना एक किलो दूध और दो रूपये का कपूर
 पुरुषों की स्मृति अक्सर
 धोखा देती है, तब, जब
 रसोई घर में अचानक एक दिन
 ढूंढना पड़ जाये चायपत्ती का छोटा-सा
 डिब्बा

 पुरुष की स्मृति में अब भी है
 उस जवान लड़की की देह
 जो उसके मकान के ठीक पीछे के मकान में
 रहती थी, और जिसे वह
 कभी पहले, अपने बाथरूम से बाल्टी के ऊपर खड़े होकर
 रोशनदान से झांका करता था,
 इस आह के साथ कि वह लड़की
 जिस लोहे की रेलिंग पर
 अपने दोनों स्तनों को रखकर खड़ी है,
 काश वह लोहा मैं ही होता

 वह लड़की जो झुककर खड़ी होती थी
 अपनी बाल्कनी की रेलिंग पर और
 अपने बाथरूम से झांक रहे पुरूष को
 दिखती थी उसकी छाती में सुरंग की ओर जाती
 पतली-सी लकीर
 उसका पिछले कई वर्षों पहले निधन हो गया था
 तेज जांडिस  से
 लेकिन सच यह है कि आज भी
 रात के घुप्प अँधेरे  में
 उस पुरुष को दीखती है जस की तस
 ठस्स काले सांप की तरह वह सुरंग
 और वह पुरुष अपने बिस्तर पर बेचैन हो उठता है
 और फिसल कर
 पानी की छोटी-छाटी बूंदों की तरह
 घुस जाना चाहता है भीतर
 उस सुरंग में

 अपनी मौत के कई वर्षों  बाद भी
 पुरुष की स्मृति में
 न ही मर पाई और न ही
 बूढ़ी हो पाई वह जवान लड़की।

 पुरुष की स्मृति में न ही
 झुर्रियां पड़ पायीं छाती की उन गोरी जगहों पर
 और न ही पिचक कर झूल पाये वे
 कठोर स्तन आज भी

 पुरुष की स्मृति में अपनी मौत के बाद भी
 ज्यों की त्यों खड़ी है वह लड़की
 ठीक बाबी  की डिम्पल कपाड़िया की तरह
 आज के अपने वृद्ध और झुर्रीदार
 शरीर के बावजूद

 पुरुष की स्मृति में
 जिस तरह है वह जवान लड़की और
 जिस तरह है डिम्पल कपाड़िया
 अपने सुडौल नितम्बों के साथ
 पुरुष की स्मृति मे कभी नहीं रहती
 अपनी पत्नी के जन्मदिन की
 तारीख

 पुरुष की स्मृति में जब तक रहेगी
 वह सुरंग
 वह काला सांप
 वे सुडौल नितम्ब
 पुरुष की स्मृति में  कभी नहीं टिक पाएगा
 अपने घर पर काम करने आने वाली बूढ़ी औरत का
 ठीक-ठीक नाम
 रसोईघर के डिब्बे में रखी चीजों का
 ठीक-ठीक पता
 पत्नी की धीरे-धीरे गुम होती जा रही
 हंसी के पीछे का कारण
 और वृद्ध पिता को समय पर देनी
 जांडिस  की दवा




प्रधानमंत्री को पसीना


लागों का वह जत्था जो समझते थे
इस लोकतंत्र में अपने होने का मतलब
उनकी हंसी उड़ाने के लिए सामने पड़ी है उसकी लाश
उसकी लाश जिसने पिछले एक सप्ताह से
प्रधानमंत्री से मिलने की कोशिश के बाद
हार कर कर लिया है आत्मदाह

प्रधानमंत्री से मिलना कठिन ही नहीं
नामुमकिन है कहते थे उनके सुरक्षाकर्मी
सुरक्षाकर्मी जिसके सिर पर था सुरक्षाकवच
माथे पर मुकुट और हाथ में भाला और तलवार

वह, जो सात दिनों तक करता रहा मिन्नत
आखिरी दिन मरने से पहले
दिखलाया था अपना वोटर आई कार्ड
अपने नागरिक होने का सबूत

तब अपने मरने से ऐन पहले
मरने का निर्णय लिया था इसलिए कि
उसने देखा था खुद अपना वोटर आई कार्ड
और जिसमें उसके फोटो के बदले चिपकी थी
एक गिलहरी की तस्वीर

वह प्रधानमन्त्री से क्यों मिलना चाहता था
इस सवाल का जवाब खत्म हो गया
उसकी मौत के साथ
ऐसा लग सकता है
लेकिन चूकिं सवाल कभी खत्म नहीं होते
इसलिए हम बिना जाने ही यह बूझ गये हैं कि
क्यों मिलना चाहता था वह प्रधानमन्त्री  से
और हममें से ऐसा कौन है
जो नहीं मिलना चाहता है प्रधानमन्त्री से
इन सवालों के साथ कि
क्यों करवट बदलने पर बजने लगती हैं हड्डियां
क्यों पैरों के जमीन पर सीधे सटने से
तलुवे पर पड़ जाती हैं ठीक सूखे खेत की तर्ज पर दरारें
उस बड़े से पक्षी का नाम क्या है
जिसने झपट्टा मारकर ले उड़ी है
मेरी-उसकी थाली से रोटियां
और पूछने को तो यह भी पूछा जा सकता है कि
कमीज के टूट गये बटन को
दूरूस्त करने के लिए कहां से मिलती है सूई
और कहां से मिलता है धागा

जिस समय उसने छिड़क लिया था
अपनी देह पर मिट्टी का तेल
उस समय उच्चस्तरीय बैठक में शामिल थे प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री कहते हैं हम नागरिक समाज बनायेंगे
प्रधानमंत्री कहते हैं हम बन्द कर देगें
फसलों में कीड़ों का लगना
प्रधानमंत्री कहते हैं हम बन्द कर देंगे बच्चों का रोना

वह जिसकी जली लाश हमारे सामने पड़ी है
वह इस लोकतंत्र पर ही नहीं
प्रधानमंत्री की इन इच्छाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है
और सबसे बड़ा तो चुनाव आयोग के उस प्रचार पर
जो वोट नहीं करने पर हमें शर्मिंदा करता है
अब भीड़ से निकली इस आवाज को कौन दबा सकता है कि
साले और करो वोट

हारने का नहीं भागने का नहीं
यह अक्ल मंदी से सोचने का वक्त है साथी
यह सामने जली पड़ी लाश तो सबको दिखती है
लेकिन यह कोई नहीं है जानता कि
जब उसने अपने उपर डालकर मिट्टी का तेल
लगा ली थी आग
तब उस आग की धधक से बन्द कमरे में
एसी की उस कृत्रिम हवा के बीच
इस कड़ाके की ठंड में भी प्रधानमंत्री की कान के ठीक पीछे से
चू पड़ी थी पसीने की एक बूंद
और प्रधानमंत्री भौचक रह गये थे


राहुल गांधी की बंडी की जेब

राहुल गांधी की बंडी की जेब को देखकर
अक्सर सोचता हूं कि क्या इसमें भी होती होंगी
स्टेट बैंक का एटीएम कार्ड
दिल्ली मेट्रो का स्मार्ट कार्ड या फिर
दिल्ली से गाजियाबाद या फिर फरीदाबाद जाने वाली
लोकल ट्रेन का मासिक पास- एमएसटी
क्या राहुल गांधी भी घर से निकलते हुए सोचते होंगे कि
आज नहीं हंै जेब में छुट्टे पैसे और आज फिर ब्लू लाइन बस पर
पांच रुपये की टिकट के लिए करनी होगी
हील हुज्जत
क्या राहुल गांधी की जेब में भी होती होगी
महीने के राशन की लिस्ट

कितना अजीब लग सकता है जब
राहुल गांधी रुकवा दें किसी परचून की दुकान पर अपनी गाड़ी
और खरीदने लगें मसूर की दाल
एक किलो चना, धनिया का पाउडर, हल्दी
और गुजारिश कर दें  दुकानदार से कि
28 वाला चावल 26 का लगा दो
यह तो बहुत हो गया अजीब तो इतने से भी लग सकता है
जब परचून की दुकान पर पहुंचने से ठीक पहले
स्टेट बैंक के किसी एटीएम पर अपनी गाड़ी रुकवा कर राहुल गांधी
निकालने लगें दो हजार रुपये

सोचता हूं क्या राहुल गांधी भी करते होंगे जमा
डाकघर में जाकर आवर्ती जमा की मासिक किस्त
क्या उन्होंने भी पूछा होगा किसी डाकघर में कि
इस पासबुक से उनको
कितने दिनों में कितनी मिल सकती है राशि
क्या उन्होंने भी कभी सोचा होगा कि
अभी होम लोन थोड़ा सस्ता हो गया है और
इस साल द्वारका सै. 23 में लेकर छोड़ दूं पचास गज ज़मीन
क्या उनके भी सपने में आता होगा उस पचास गज जीमन पर
भविष्य में बनने वाला दो कमरों का घर
और उस घर की सजावट

जो राहुल गांधी के करीब हैं वे जानते हैं
जो उनके करीब नहीं हैं वे भी जानते हैं कि
कुछ नहीं होता है राहुल गांधी की जेब में
एकदम खाली है उनकी जेब
न ही होता है उसमें एटीएम कार्ड
न ही स्मार्ट कार्ड
न ही एमएसटी
और न ही राशन की लिस्ट
राहुल गांधी को न ही जाना पड़ा है आजतक
कभी राशन की दुकान पर
और न ही डाकघर
और न ही सस्ते लोन की तलाश में कोई बैंक
उन्होंने नहीं देखा है अभी तक किसी प्राॅपर्टी डीलर का दरवाजा
एकदम खाली है राहुल गांधी की बंडी की जेब

कितना अजीब लगता है कि
एकदम खाली है राहुल गांधी की बंडी की जेब
उसमें नहीं है भविष्य की आशंका
उसमें नहीं है वर्तमान को जीने और
भविष्य को सुरक्षित रख ले जाने की कोई तरकीब
लेकिन राहुल गांधी खुश हैं
और राहुल गांधी ही क्यों ऐसे बहुत से लोग हैं
जिनकी जेबों में नहीं है कुछ और वे खुश हैं
यह विरोधभास बहुत अजीब है कि जेबें खाली हैं और लोग खुश हैं

लेकिन किसी भ्रम में न पड़ जाएँ
यह विरोधभास सिर्फ चंद लोगों के लिए है वरना
खाली जेबों वाले लोग तो
पटपटा कर मर रहे हैं

                      


बड़ी हो रही है उसकी नफ़रत


हम आज यह जान लें कि
लाल बत्ती पर अपने करतब दिखाने वाला वह बच्चा
एक दिन बड़ा होकर पूछेगा सवाल

वह पूछेगा वोट डालने का मतलब
वह पूछेगा धूल के नाक से फेफड़े में घुसने से
होने वाली बिमारी का नाम
वह मांगेगा अपने बचपने का हिसाब
वह पूछेगा इस देश को प्यार करने का कारण।

वह धूल में सना हुआ
करतब दिखाता भूखा बच्चा एक दिन बड़ा हो जायेगा
साथ ही बड़ी हो जायेगी उसकी नफरत
संभव है वह सीख ले सांपों को पकड़ना
और उसके विष के दांतों को तोड़ना
संभव है उसके हाथ में इन्हीं करतबों से आ जाए
एक बेमिसाल जादू और फिर वह
इस तेज भागती दुनिया को कर दे एक जगह स्थिर
संभव है चलाना सीख ले वह गुलेल
और हो जाये उसका निशाना एकदम पक्का
संभव कुछ भी है
निशाना पक्का हो तो उसके हाथ में
आ सकता है और भी कुछ

हम उसे लाल बत्ती पर देखते हैं
और मूंह फेर लेते हैं
लेकिन एक दिन वह बड़ा होगा
और खूंखार हो जायेगा
तब आप उसे अदेखा नहीं कर पायेंगे।

वह  आपकी लम्बी गाड़ी के कांच को
तोड़ देगा एक पत्थर के वार से।
त त त


बुजुर्ग पिता के झुके कन्धे हमें दुख देते हैं



मेरे सामने पिता की जो तस्वीर है
उसमें पिता एक कुर्ते में हैं
पिता की यह तस्वीर अधूरी है
लेकिन बगैर तस्वीर में आये भी मैं जानता हूं कि
पिता कुर्ते के साथ सफेद धोती में हैं
पिता ने अपने जीवन में कुर्ता-धोती को छोड़कर भी
कुछ पहना हो मुझे याद नहीं है
हां मेरी कल्पना में पिता
कभी-कभी कमीज और पैंट में दिखते हैं
और बहुत अजीब से लगते हैं

मेरी मां जब तक जीवित रहीं
पिता ने अपने कुर्ते और अपनी धोती पर से
कभी कलफ को हटने नहीं दिया
लेकिन मां की जबसे मृत्यु हुई है
पिता अपने कपड़ों के प्रति उदासीन से हो गए हैं

खैर उस तस्वीर में पिता अपने कुर्तें में हैं
और पिता के कन्धे झूल से गए हैं
उस तस्वीर में पिता की आस्तीन
नीचे की ओर लटक रही हैं
पहली नजर में मुझे लगता है कि पिता के दर्जी ने
उनके कुर्ते का नाप गलत लिया है
परन्तु मैं जानता हूं कि यह मेरे मन का भ्रम है
पिता के कन्धे वास्तव में बांस की करची की तरह
नीचे की तरफ लटक ही गए हैं

पिता बूढेे हो चुके हैं इस सच को मैं जानता हूं
लेकिन मैं स्वीकार नहीं कर पाता हूं
मैं जिन कुछ सचों से घबराता हूं यह उनमें से ही एक है

एक वक्त था जब हम भाई-बहन
एक-एक कर पिता के इन्हीं मजबूत कन्धों पर
मेला घूमा करते थे
मेले से फिरकी खरीदते थे
और पिता के इन्हीं कन्धों पर बैठकर
उसे हवा के झोंकों से चलाने की कोशिश करते थे
तब हम चाहते थे कि पिता तेज चलें ताकि
हमारी फिरकी तेज हवा के झोंकों में ज्यादा जोर से नाच सके

हमारे घर से दो किलोमीटर दूर की हटिया में
जो दुर्गा मेला लगता था उसमें हमने
बंदर के खेल से लेकर मौत का कुंआ तक देखा था
पिता हमारे लिए भीड़ को चीरकर हमें एक ऊंचाई देते थे
ताकि हम यह देख सकें कि कैसे बंदर
अपने मालिक के हुक्म पर रस्सी पर दौड़ने लग जाता था
हमने अपने जीवन में जितनी भी बार बाइस्कोप देखा
पिता अपने कन्धे पर ही हमें ले गए थे

हमारा घर तब बहुत कच्चा था
और घर के ठीक पिछवाड़े मेें कोसी नदी का बांध था
कोसी नदी में जब पानी भरने लगता था
तब सांप हमारे घर में पनाह लेने दौड़ जाते थे
तब हमारे घर में ढिबरी जलती थी
और खाना जलावन पर बनता था
ऐसा अक्सर होता था कि मां रसोई में जाती और
करैत सांप की सांस चलने की आवाज सुनकर
दूर छिटककर भाग जाती
उस दिन तो हद हो गई थी जब
कड़ाही में छौंक लगाने के बाद मां ने
कटी सब्जी के थाल को उस कड़ाही में उलीचने के लिए उठाया
और उस थाल की ही गोलाई में करैत सांप
उभर कर सामने आ गया

हमारे जीवन में ऐसी स्थितियां तब अक्सर आती थीं
और फिर हम हर बार पिता को
चाय की दुकान पर से ढूंढ कर लाते थे
हमारे जीवन में तब पिता ही सबसे ताकतवर थे
और सचमुच पिता तब ढूंढकर उस करैत सांप को मार डालते थे

हमारे आंगन में वह जो अमरूद का पेड़ था
पिता हमारे लिए तब उस अमरूद के पेड़ पर
दनदना कर चढ जाते थे
और फिर एक-एक फुनगी पर लगे अमरूद को
पिता तोड़ लाते थे
हम तब पिता की फुर्ती को देख कर दंग रहते थे
पिता तब हमारे जीवन में एक नायक की तरह थे

मेरे पिता तब मजबूत थे
और हम कभी सोच भी नहीं पाते थे कि
एक दिन ऐसा भी आयेगा कि
पिता इतने कमजोर हो जायेंगे
कि अपने बिस्तर पर से उठने में भी उन्हें
हमारे सहारे की जरूरत पड़ जायेगी

मेरे पिता जब मेरे हाथ और मेरे कन्धे का सहारा लेकर
अपने बिस्तर से उठते हैं तब
मेरे दिल में एक हूक सी उठती है और
मेरी देखी हुई उनकी पूरी जवानी
मेरी आंखों के सामने घूम जाती है

मेरे बुजुर्ग पिता
अब कभी तेज कदमों से चल नहीं पायेंगे
हमें अपने कन्धों पर उठा नहीं पायेंगे
अमरूद के पेड़ पर चढ नहीं पायेंगे
और अमरूद का पेड़ तो क्या
मैं जानता हूं मेेरे पिता अब कभी आराम से
दो सीढी भी चढ नहीं पायेंगे

लेकिन मैं पिता को हर वक्त सहारा देते हुए
यह सोचता हूं कि क्या पिता को अपनी जवानी के वे दिन
याद नहीं आते होंगे
जब वे हमें भरी बस में अंदर सीट दिलाकर
खुद दरवाजे पर लटक कर चले जाते थे
परबत्ता से खगड़िया शहर
क्या अब पिता को अपने दोस्तों के साथ
ताश की चौकड़ी जमाना याद नहीं आता होगा
क्या पिता अब कभी नहीं हंस पायेंगे अपनी उन्मुक्त हंसी

मेरे पिता को अब अपनी जवानी की बातें
याद है या नहीं मुझे पता नहीं
लेकिन मैं सोचता हूं कि
अगर वे याद कर पाते होंगे वे दिन
तो उनके मन में एक अजीब सी बेचैनी जरूर होती होगी
कुछ जरूर होगा जो उनके भीतर झन्न से टूट जाता होगा।


परिचय

एक मार्च उन्नीस सौ अठहत्तर को खगड़िया बिहार में जन्म। कविता और कहानी लेखन में समान रूप से सक्रिय। पहला कविता संग्रह ‘कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे’(2009) भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। इसी कविता संग्रह पर साहित्य अकादमी का पहला युवा सम्मान (2012)। इसके अतिरिक्त कविता के लिए ‘अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार’ (2007) और ‘भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार’(2008)। कहानी के लिए ‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार’(2008)। पहला कहानी संग्रह अयोध्या बाबू सनक गए हैं(2011) भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। अपनी कुछ ही कहानियों से युवा पीढ़ी में अपनी एक उत्कृष्ट पहचान। पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित ‘श्रेष्ठ हिन्दी कहानियां(2000-2010) में कहानी संकलित। हापर्स कालिन्स की ‘हिन्दी की कालजयी कहानियां’ सीरिज में कहानी संकलित। कहानी ‘अयोध्या बाबू सनक गए हैं’ पर प्रसिद्ध रंगकर्मी देवेन्द्र राज अंकुर द्वारा एनएसडी सहित देश की विभिन्न जगहों पर पच्चीस से अधिक नाट्य प्रस्तुति। कुछ कहानियों और कविताओं का मराठी, बंग्ला, पंजाबी और उर्दू में अनुवाद। पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस द्वारा पुस्तक ‘श्रेष्ठ हिन्दी कहानियां(1990-2000) का संपादन। इनके अलावा आलोचना की दो-तीन किताबें प्रकाशित।
संपर्कः- - C/O ज्योति चावला, स्कूल आफ ट्रांसलेशन स्टडीज एण्ड ट्रेनिंग, 15 सी, न्यू एकेडमिक बिल्डिंग,  इग्नू, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-110068    मो.- 9810229111
                   


11 comments:

misir arun ने कहा…

सीधी-साड़ी , ठीक-ठाक कवितायें ! कहीं कहीं अनावश्यक विस्तार खटकता है ! बधाई का हक़ तो बनाता ही है !

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

प्रधानमंत्री को पसीना और राहुल गांधी की बंडी पर निगाह ठहर-सी गई। दोनों कविताओं ने प्रभावित किया। विस्‍तार शायद उमाशंकर चौधरी की शैली है...हमारे कुछेक अग्रज कवियों की तरह...इसे कवि की इच्‍छा के रूप में भी देखा जा सकता है।

वन्दना ने कहा…

सभी कवितायें बेजोड और सोचने को मजबूर करती हैं ज़िन्दगी की सच्चाइयों से अवगत कराती हैं साथ ही तीखा प्रहार करती हैं।

Anand Dwivedi ने कहा…

वह तुमसे पूछेगा डर का रंग और
जब तुम उससे कह दोगे झक्क सफेद,
तब वह बंद कमरे में सिरिंज से निकालेगा खून की दो बूंद
और फिर वह पछाड़ खाकर गिर जायेगा
उसी बंद कमरे में।

क्या यह बंद कमरा वाकई लोकतंत्र की लेबोरेटरी नहीं है?

और यह भी ....

यह विरोधभास बहुत अजीब है कि जेबें खाली हैं और लोग खुश हैं

लेकिन किसी भ्रम में न पड़ जाएँ
यह विरोधभास सिर्फ चंद लोगों के लिए है वरना
खाली जेबों वाले लोग तो
पटपटा कर मर रहे हैं

सुंदर कवितायें भैया ..बधाई उमाशंकर जी को !

मैं यानी इन सबका दोस्त .... बस ने कहा…

पुरुष की स्मृति में अब भी है
उस जवान लड़की की देह
जो उसके मकान के ठीक पीछे के मकान में
रहती थी, और जिसे वह
कभी पहले, अपने बाथरूम से बाल्टी के ऊपर खड़े होकर
रोशनदान से झांका करता था,
इस आह के साथ कि वह लड़की
जिस लोहे की रेलिंग पर
अपने दोनों स्तनों को रखकर खड़ी है,
काश वह लोहा मैं ही होता

कवि और कविता दोनों को इस मानसिकता और अनायास ही चली आ रही ऎसी स्थिति से जितना जल्दी हो सके अलग हो जाना चाहिए कविता को अभी जाने कितनी दूरी तय करनी है. कवि को ऐसे समय में जोकि बेहद क्रूर निर्मम और हिंसक है उसे ऎसी घटनाओं की ओर अपनी दृष्टि रखनी होगी जहाँ नई दुनिया बसाने के लिए हमें बहुत जद्दोजहद करनी अभी बाक़ी है .

Onkar ने कहा…

सुन्दर कवितायेँ

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

उमाशंकर जी चौधरी युवा कवि की रचनाएँ बेहद प्रभावित करती हैं ... उनकी रचनाएँ प्रस्तुत करने के लिए आभार ...

hariom rajoria ने कहा…

अशोक कवि का इतना जोरदार परिचय तुमने दिया पर उनकी ये कवितायें अच्छी नहीं लगीं । इनमें उथलापन तो है ही साथ ही अनावश्यक व्योरों की भरमार है । हिंदी मैं ये नया कुछ नहीं जोडतीं ।

अजेय ने कहा…

बड़े जाने पहचाने से चित्र हैं ...... मन्मोहन जी की पसीजती पग, राहुल की खाली जेब वाली बंडी , रेल्लिंग के 'लोहे' पे पर झुकी डिम्पल कपाड़िया ,नितम्ब और स्तन पर फिसलती बूँदें , बस मे अनुराधा पौड्वाल ,काफी जनवादी तेवर हैं .थोड़ी कसावट आ जाय बहुत लोकप्रिय कविताऎं बनेंगी . हरिओम राजोरिया जी , कविताएं मुझे भी अच्छी नहीं लगीं लेकिन ज़रूरी नही कि जो अच्छी न लगे वो महत्वपूर्ण भी नही हो ! हम हिन्दी कविता मे हमेशा नया जोड़्ने की ज़िद क्यों करते हैं ? एक सशक्त विचारधारा की मौजूदगी ही एक कविता को मुकम्मल बनाने के लिए काफी नहीं है क्या ?

कुलदीप "अंजुम" ने कहा…

सीधी सादी सरल कवितायेँ हैं......आसानी से समझी जा सकने वालीं ...सामयिक और सुलभ विषय.....ये इन कविताओं की खूबी है ....बधाई कवी को बहुत बहुत ....पर फिर भी कुछ छूटता लगा !

neera ने कहा…

जिंदगी की सच्ची कहानियां कहती हैं यह कवितायें...

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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