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शनिवार, 8 सितंबर 2012

रविकांत की कवितायें

अपने पहले कविता संकलन 'यात्रा' से पहचान बना चुके युवा कवि रविकांत की कवितायें इस दुष्काल में एक संवेदनशील युवा का हस्तक्षेप हैं. जिन्होंने उनकी लम्बी कविता 'इन कविताओं का कवि एक सपने में मारा गया' पढ़ी है, वे पुराने आदर्शों के विखंडन के इस काल में रविकांत की संवेदना के स्रोतों की सटीक पहचान कर सकते हैं. आज यहाँ उनकी कुछ  कवितायें...


इतिहास

इस झील को ऐसे पहले नहीं देखा था !

तैरती नौकाएं
शिकारे
हॉउस बोटें
बतखें
सैलानी
कैमरे
और, ज्यादा से ज्यादा
झील के एक ओर निकला जाता
पानी में पनपता घास-जाल ....

खुला मौसम
नीला आसमान
ठंडी हवा....

लेकिन...

क्या कुछ डुबा दिया गया इस झील में !!
इतिहास कुछ इतना ही बताता है-
एक साथ मारे गए
विरोधियों के बालों की पोटली
का वज़न - सात मन,
उनके
धर्म-ग्रन्थ
पाण्डुलिपि
और
चिन्ह...

आज इस झील को देख कर
याद आ रहे हैं
अलग-अलग शहरों के
कुंएं, पोखर, तालाब, बावड़ी
पेड़, चौक, गली, मैदान
कितनी ही रेलें....
लाखों के रेले....

अनंत किस्से
दर्द के समंदर
घृणा के बगूले...

पूर्वजों का संघर्ष व कशमकश
और
मुहब्बत को लेकर
हमारा अनिर्णय....

सारी कायनात को
बाँहों में ले कर बैठा हूँ
मन उदास है.


अनफ्रेंड


जल्द ही मैंने फेसबुक पर रहने की तमीज़ सीख ली

जल्द ही मैंने जान लिया की ये निठल्लों का देश नहीं
ठीक पृथ्वी के आकार का एक घर है नया

हम यहाँ रहें बेलौस
घर के संस्कारों को त्यागे बिना.

जल्द ही मैंने जाना कि इस पर
रिश्ते जुड़ते तो हैं नए
पर
ये अपने सबसे करीबी रिश्तों में भी
ला दे सकता है खटास

आप जान भी नहीं पाते कि
आपका
गाहे-ब-गाहे किया गया
अपनी दोस्तों के स्टेटस
या फोटो पर
एक-दो लाइक
किसी को कितना नागवार गुज़रता है.

मैं तो सच में
ये सब तब ही जान पाया
जब मेरी सच्ची दोस्त ने
एक दिन मुझे कर दिया - अनफ्रेंड.

इस अनफ्रेंड किये जाने की चुभन
आप वास्तव में नहीं समझ सकते.
समझ सकता है सिर्फ वो
जो हुआ हो कभी
किसी अपने से
- अनफ्रेंड


अंशुल त्रिपाठी के लिए

हम दो दोस्त अपने अस्तित्व को साझा करते थे
हमारे पास एकदूसरे को पुरस्कृत करने की संजीवनियाँ थीं
हम एकदूसरे के विषय थे
हम कितनी ही देर एक-दूसरे की तारीफ और निंदा कर सकते थे
हमारे पास बात-चीत की एक सामान्य दुनिया थी जिसे हम किसी कोने में छिपा कर
रखते थे
और मौका मिलते ही उस कोने में सरक जाते थे

मै अन्य दोस्तों के बीच उसका मजाक उडाता था तो दोस्त उस पर सम्मान के साथ
हँसते थे
वह जानता था की हंसने वाले दरअसल ख़ुशी के आंसू के साथ जल रहे हैं

मै उसके पास दौड़-दौड़ के जाता था
वह मेरे पास कम आता था
मै जानता था कि बेदखली के मेरे इस समय में वह मेरा सिंहासन है
मुझे पाते ही वह मेरे सब गुणों पर रौशनी डाल देगा
वह मुझे देखते ही समझ जाता कि अब उसे नैराश्य के कूंए से निकलना ही होगा

हम एक-दूसरे पर खीझते थे गजब , सिर्फ तब
जब हम एक-दूसरे से मिले बिना रह लेते थे

हम जानते थे कि हमारे रास्ते अलग हैं
स्वभाव अलग हैं
लाभ-लोभ भी अलग किसिम के हैं
पर इतना भी बहुत था कि हम एक-दूसरे को समझते हैं
और उठा लेते हैं एक-दूसरे को वहां से जहाँ से हम उड़ना चाहते हैं...

हमारे बीच बहोत कुछ टूटा-मुरझाया
हमें सँभालने वाले कुछ दोस्त इधर-उधर हो गए
साझे लाभ नहीं रहे
हमारे बीच के आकाश में धुंएँ की शक्ल में न जाने क्या-क्या भर गया
मुक्त ह्रदय पर पड़ने थे सो बंधन पड़ गए
समय कभी टूटा, कभी चिटका, कभी सील गया, कभी शुष्क हो गया निरा
पर हमारा विश्वास परस्पर....
क्या कहूँ
रबड़ सा नहीं कह सकता
फौलाद सा कहना अपने दोस्त का एक बार फिर से मजाक उड़ाना ठहरेगा
हमारे बारे में बस यूँ समझिये कि
हमने साथ-साथ कभी
कोई फिल्म नहीं देखी
खेल नहीं खेला
हम सिर्फ बातें करते थे
घूमते थे साथ कि बात करेंगे
घर के सौदे लाते थे साथ कि बात करेंगे
पढ़ते थे थोडा सा
ज़रा सी गज़लें सुन लेते थे
एक-दूसरे कि जिम्मेदारियां मिल के निपटा देते थे
ताकि हमें मिले मोहलत
हम कुछ बहुत ज़रूरी बातें करना चाहते थे
हमारी बातें आज भी ख़त्म नहीं हुई हैं
हम कुछ सबसे ज़रूरी बातें करने से तो रह ही गए हैं.

हम एक-दूसरे से मिलना चाहते हैं
अभी इसी वक्त.

6 अगस्त 12 , 25:45 HR






समय

आस पास थे तुम तो चर्चा तुम्हारी थी
मेरे ख्यालों में तुम थे

आस पास थीं परेशानियाँ तो जूझता था उन्हीं से
वही संगी साथिने थीं

शहर था पहले इलाहबाद तो घूमता था उसी की गलियों में

अपना शहर छूटा तो दूसरे शहर की सडकों पे आ गया

जब जो काम आता है सामने उसे ही करता हूँ

ख़ाली समय में क्या करता हूँ ?
इस सवाल से बचता हूँ.

8 comments:

turtle.walks ने कहा…

अंशुल त्रिपाठी के लिए लिखी कविता सबसे अच्छी लगी, व्यग्तिगत कविताएँ लिखने के लिए जहाँ हमें शैली शब्द चयन तो ध्यान में रखना ही पड़ता है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कि हम कितनी ईमानदारी से अपने उस व्यक्ति विशेष के साथ जुडाव और मित्रता की सीमाओं को आत्मपरक करते हुए उसे लिख सकते हैं, उस लिहाज़ से मुझे यह कविता बहुत अच्छी लगी

Anand Dwivedi ने कहा…

पूर्वजों का संघर्ष व कशमकश
और
मुहब्बत को लेकर
हमारा अनिर्णय....
___________________

हम सिर्फ बातें करते थे
घूमते थे साथ कि बात करेंगे
घर के सौदे लाते थे साथ कि बात करेंगे
------
कविताओं का हर शब्द ईमानदार है और शायद यही खींचता है पाठक को अपनी तरफ |
रविकांत जी को बधाई और आगे की यात्रा के लिये शुभकमनाएं |

Amit sharma upmanyu ने कहा…

ऊपर के दोनों टीपकारों की समीक्षा से सहमति के साथ, "अनफ्रेंड" के अलावा बाकी कवितायेँ बढ़िया हैं.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत ही प्रभावी ... सच से जुडी ... सच को कहती ... कमाल की राक्स्ह्नाएं है रवि जी की ...
बधाई ...

रविकांत ने कहा…

आप सबका आभारी हूँ मित्रों.... असुविधा का शुक्रिया...

कुमार अनुपम ने कहा…

रविकांत यारबास हैं और उतनी ही सिद्दत से दोस्तों को याद भी करते हैं. अंशुल के लिए लिखी कविता को मैंने कई बार उनकी बातचीत में एक अचानक कसक की तरह महसूस किया है. "इतिहास" कविता अतीत में दफना दिए गए वास्तविक इतिहास को बहुत सम्वेदनशीलता से महसूस करती है. यह कश्मीर की यात्रा अब मनुष्यता की यात्रा में तब्दील हो जाती है जिसे कवि पुरखों की तरह याद करता है. प्रायोजित इतिहास पुस्तकों के लेखे को आइना दिखता हुआ. एक कवि की ज़िम्मेदारी इस से अधिक और क्या हो सकती है.

केशव तिवारी ने कहा…

Rawikant behatreen.kawitayen.ansul per likhi kawita behatreen.ansul k sath mere bhi allahabad me aawara gardi k kisse han.

sarita sharma ने कहा…

रविकांत की कवितायेँ अलग अंदाज की हैं.'इतिहास' में झील अनेक स्मृतियाँ जगाती हुई अतीत में ले जाती है.'अनफ्रेंड' का अनुभव सबका साझा लगता है जिसमें फेसबुक पर दोस्ती के रिश्ते की क्षणभंगुरता है तो 'अंशुल त्रिपाठी के लिए' सच्ची दोस्ती की मिसाल देती है जिसमें दोस्तों की बातें कभी खत्म ही नहीं होती और लगता है कुछ अनकहा बचा रह गया है.'समय' में अलग अलग शहरों में समय काटने का फर्क दिखाया गया है. ये कवितायेँ सहज और प्रवाहमय होने से पाठकों को अपनी सी लगती हैं.

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