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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

शुभम श्री की कविता - बुखार, ब्रेक अप, आइ लव यू



शुभम श्री की इस कविता का पाठ सबसे पहले एक असुविधा पैदा करता है. हिंदी के मुझ जैसे पाठकों का इसे पढ़कर चौंकना बिलकुल सहज है. प्रेम कवितायें जैसी हमने पढ़ीं (और लिखीं भी हैं), उसके बरक्स यह कविता बिलकुल अलग भाषा, अभिव्यक्ति और भाव-बोध वाली है. कहूं कि यह हिंदी के 'जेनरेशन एक्स' की कविता है. उसके सोचने की प्रक्रिया, उसकी भाषा, उसकी समझ और उसके बोल्डनेस से उपजी. इसीलिए यह बहुत ध्यान से पढ़े जाने की मांग करती है, शब्दों से बिदकने की जगह एक नई पीढ़ी के आगमन की धमक की तरह देखे और महसूस किये जाने वाले धीरज भरे पाठ की दरकार है यहाँ. इससे ज़्यादा कुछ कहना एक तरह की 'कंसेंट बिल्डिंग' होगी. तो मैं आपको अब कविता के साथ अकेले छोड़ता हूँ.... 




बुखार, ब्रेक अप, आइ लव यू 


104 डिग्री
अब पुलिस मुझे आइपीसी लगाकर गिरफ़्तार कर ले
तो भी नहीं कहूंगी कि मैंने तुमसे प्रेम किया है
प्रेम नहीं किया यार
प्रेम के लायक लिटरेचर नहीं पढ़ा
देखो, बात बस ये है कि..
..कि तुम्हारे बिना रहा नहीं जा सकता ।
कहो तो स्टांप पेपर पे लिख के दे दूं
नहीं.. नहीं..नहीं..

-----

मैंने तुम्हारे दिमाग का दही बनाया है
लड़ाई की है, तंग किया है ?
हां किया है
तो लड़ लो
(वैसे तुमने भी लड़ाई की है पर अभी मैं वो याद नहीं दिला रही)
तुम भी तंग कर लो
ब्रेक अप क्यों कर रहे हो ?
ये मानव अधिकारों का कितना बड़ा उल्लंघन है
कि
आधे घंटे तक फ्रेंच किस करने के बाद तुम बोलो-
हम ब्रेक अप कर रहे हैं !
102 डिग्री
अफसोस कि मैं कुछ नहीं कर सकती
तुम्हारा नहीं चाहना
इस नहींको हां कैसे करूं, कैसे ?
प्लीज बोलो ना
नहीं दुनिया का सबसे कमीना शब्द है
उससे भी ज्यादा है ब्रेकअप

-----

अब एक प्यारे से लड़के की याद में
होमर बनने का क्या उपाय है दोस्तों ?
चाहती हूं वो लिखूं..वो लिखूं.. कि
आसमान रोए और धरती का सीना छलनी हो
पानी में आग लगे, तूफान आए
पर रोती भी मैं ही हूं, सीना भी मेरा ही छलनी होता है
आग तूफान सब मेरे ही भीतर है
बाहर सब बिंदास नॉर्मल रहता है
काश पता होता
प्यार कर के तकलीफ़ होती है
काश
(हजारों सालों से कहते आ रहे हैं लोग लेकिन अपन ने भाव कहां दिया.. देना चाहिए था )
99 डिग्री
तुम्हें याद है जब एग्जाम्स के वक़्त मुझे ज़ुकाम हुआ था
कैसे स्टीम दिला दिला कर तुमने पेपर देने भेजा था
और बारिश में भीग कर बुखार हुआ था
तो कितना डांटा था
अब भी बुखार आता है मुझे
आंसू भी आने लगे हैं आजकल साथ में

-----

कितनी आदतें बदलनी पड़ेंगी
खुद को ही बदल देना पड़ेगा शायद
जैसे कि अब बेफ़िक्र नहीं रहा जा सकता
खुश नहीं हुआ जा सकता कभी
और
सेक्स भी तो नहीं किया जा सकता

-----

वो सारी किसेज जो पानी पीने और सूसू करने जितनी जरूरी थीं ज़िंदगी में
किसी सपने की मानिंद गायब हो गई हैं..
ओह कितनी यादें हैं, फिल्म है पूरी
कभी खत्म न होने वाली
मेरी सब फालतू बातें जिनसे मम्मी तक इरिटेट हो जाती थी
तुम्हीं तो थे जो सुन कर मुस्कुराया करते थे
और तुम, जिसकी सब आदतें मेरे पापा से मिलती थीं
और वो मैसेज याद हैं
हजारों एसएमएस.. मैसेज बॉक्स भरते ही डिलीट होते गए
उन्हें भरोसा था कि खुद डिलीट होकर भी
उन्होंने एक रिश्ते को सेव किया है
दुनिया का सबसे प्यारा रिश्ता..
तुम चिढ़ जाओगे कि ये सब लिखने की बातें नहीं हैं
क्यों नहीं हैं ?
तुम्हारे प्यारे होठों से भी ज्यादा प्यारे डिंपल
और उनसे भी प्यारी मुस्कुराहट की याद
मुझे सेक्स की इच्छा से कहीं ज्यादा बेचैन करती है
तुम्हारे शरीर की खुशबू जिसके सहारे हमेशा गहरी नींद सोया जा सकता है
वही तुम, जिसे निहारते हुए लगता है-
काश इसे मैंने पैदा किया होता..
जिंदा रहने की चंद बुनियादी शर्तें ही तो हैं न
हवा, पानी, खाना और तुम
तुम..
101 डिग्री
मैं उन तमाम लड़कियों से
जो प्यार में तकिए भिगोती हैं और बेहोश होती हैं
माफी मांगना चाहती हूं
वो सभी लोग जो बीपीएल सूची के राशन की तरह
फोन रीचार्ज होने का इंतजार करते हैं
जो ऑक्सीजन की बजाय सिगरेट से सांस लेते हैं
वोदका के समंदर में तैरते हैं
हमेशा दुखी रहते हैं
उन पर ली गई सारी चुटकियां, तंज, ताने, मजाक
मैं वापस लेती हूं
104 डिग्री
और तुम
तुम तो कभी खुश नहीं रहोगे
रिलेशनशिप..अंडरस्टैंडिंग.. ईगो.. स्पेस..
नहीं जानती थी मैग्जीन्स से बाहर भी
इन शब्दों की एक दुनिया है

------

तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मैं कबूल करती हूं
हां, मुझमें हजारों कमियां हैं
मैंने तुम्हें जंगलियों की तरह प्यार किया है
कि तुम्हें गले लगाने के पहले
फ्लैट की किस्त और इंश्योरेंस पॉलिसी नहीं जोड़ी
अपना साइकोएनालिसिस नहीं किया
हां, मुझे नहीं समझ आता ब्रेक अपका मतलब
नहीं आता !
तुम्हें गुस्सा आता है तो आए
लेकिन
आइ लव यू
जितनी बार तुम्हारा ब्रेक अप, उतनी बार मेरा आइ लव यू..

२३ अप्रैल, १९९१ को जन्मी शुभम श्री जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय में परास्नातक कर रही हैं. उनकी कुछ कवितायें   हिन्दी समय   में प्रकाशित हो चुकी हैं. 



संपर्क:1 कोयना, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली,110067
फोन:09818920474
ई-मेल:shubhamshree91@gmail.com



46 comments:

' मिसिर' ने कहा…

शिक्षित मध्यवर्गीय युवा की आधुनिक भाषा जो पारंपरिक हिंदी और अंग्रेजी के फ्यूजन से बनी है ,में लिखी प्रेम कवितायेँ ! काल्पनिक वायवीयता से निकल कर व्यावारिक होती हुई ..कुछ कुछ कैजुअल -सी !

***Punam*** ने कहा…

amazzingly amazzing......

Daddu ने कहा…

सबसे पहले तो शुक्रिया अशोक भाई और असुविधा को ऐसे प्रयोगों के लिए ...
कितनी आदतें बदलनी पड़ेंगी
खुद को ही बदल देना पड़ेगा शायद
जैसे कि अब बेफ़िक्र नहीं रहा जा सकता
खुश नहीं हुआ जा सकता कभी
और
सेक्स भी तो नहीं किया जा सकता

सिर्फ कविता के शब्द या तत्त्व नहीं हैं ये ...प्रेम कि स्थिति से उपजा विकार जिसे बहुत ही आसन से शब्दों में बाँध दिया गया हैं. यहाँ पर परम्परावादी कविता के अंश सूक्ष्मदर्शी से भी तलाशने पर नहीं मिलेंगे और आज आवश्यकता उसी कि हैं. प्रेम के पुराने गढ़े सिधांत इस संचार के युग में, जहाँ सिर्फ एक मैसेज से सम्बन्ध बनते या समाप्त हो जाते हैं के लिए कहीं कोई जगह ही नहीं बची हैं. आप प्रेम कि ऐसी अनियमितताओ के लिए कई कारणों को गिन सकते हैं पर उससे मुक्त नहीं हो सकते. एक और बेहद जरुरी बात ..स्त्री विमर्श पर बात करने वालों के लिए भी. इसे सिर्फ उन्मुक्तता या जेनरेशन एक्स का बोल्डनेस कह कर किनारा नहीं किया जा सकता. हर तरफ से स्त्री मुक्ति कि बात करने वालों के लिए ये समझना भी जरुरी हैं कि बिना सेक्सुवालिटी पर चर्चा किये बात पूरी नहीं होगी.
आभार असुविधा का ऐसे प्रतिभाओ से परिचय करने के लिए.

मुकेश पाण्डेय चन्दन ने कहा…

आज की हकीकत बड़ी खूबसूरती से बयां की है . हालाँकि ये कविता न होकर एक सच है ..........जिसे शब्दों में पिरोया गया है . पता नहीं क्यों एक टूटे दिल से ही अच्छी कविता क्यों निकलती है ?
सादर......

prkant ने कहा…

ज़बरदस्त । कई बार पढ़नी पड़ेगी । पहली बार में तो खोपड़ी में हथौड़ा बजाती है ... धम्म धम्म धम्म ।

mukti ने कहा…

मुझे तो बहुत अच्छी लगी कविता. क्योंकि मुझे ऐसी ही कविताएँ अच्छी लगती हैं जो मिश्री की तरह मुँह में डालते ही घुलती जाएँ, सरल भाषा, सहज भाव सब कुछ अपना-अपना सा.
और मुझे इसकी भाषा चौंकाती नहीं है. मुझे आदत है ऐसी बातों की :)

Deepali Sangwan ने कहा…

disappointed for the first time wid shubham.. somehow.. Nahi baandh paai mujhe.. Ye meri personal ray ho sakti hai.. Shubham meri bahut pyaari si dost hain.. Shayad isi lie main bebak keh sakti hun.. I hope u wont mind shubhhi

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ने कहा…

कुछ अलग तो है इन कविताओं में

Brajesh Kanungo ने कहा…

कविता यह तो बता रही है कि प्रेम की अभिव्यक्ति किसी भाषा या कविता के निर्धारित अनुशासन की मोहताज नही होती, बस फूट पडती है जैसे फूट पडता है प्रेम।

शायक आलोक ने कहा…

शुभम की यह दूसरी कविता है जो मुझे पढने को मिली है. पहली कविता मैंने पढ़ी थी जो उसने सैनिटरी नैपकिन पर लिखी थी. इन दो कविताओं के आधार पर दो आम बातें मैं कह सकता हूँ शुभम श्री के कवित्त के बारे में- पहली है साहस और दूसरी है सनसनी. कविता को कविता की तरह प्रस्तुत करने का जो एक रचनात्मक दवाब होता है कवि के ऊपर उससे मुक्त है शुभम और कविता के गुण दोष के बजाय जो उसे कहना है वहां अपनी पूरी उर्जा खर्च करती है. मुझे याद है कि मैंने वह नैपकिन वाली कविता पर नोट्स बनाया था तो दो तीन लड़कों ने मुझसे सवाल पूछा था कि अगर हमने इस तरह के विषय वस्तु पर लिखा तब भी क्या आप समीक्षकों की नजरे इनायत इसी उदारता से होगी और तब मैं चुप रहा था. जिस जेनरेशन एक्स वाली भाषा की बात की जा रही है कमोबेश इसी भाषा में एक युवा 'रक्षित एन सी' ने शायकमीक्षा के दूसरा सप्तक के लिए एक कविता भेजी थी. किन्तु जैसा संभावित था उस कविता ने किसी का ध्यान नहीं खिंचा.

विशेष भाषा-विषय-शैली में प्रस्तुत यह कविता और ऐसी कवितायें स्वीकृति के लिए किसी लिटमस टेस्ट को पास करें तो ही बात हो.. अन्यथा मैं बड़े विश्वास से कह रहा रहा हूँ कि वाकई बुखार में की गयी बकवास ही है यह.. जो थोडा सा मजा मिल रहा है वह इसलिए कि बात सेक्स और फ्रेंच किस की भी हुई है और पढ़ते समय पाठक कवयित्री को कई छवियों में इमेजिन कर रहा होगा. [ यहाँ चेहरे पर एक फूहड़ स्मायल भी ले आइये..] मैं सोचता हूँ कि ऐसी सनसनी वाली कवितायें तभी कविता कही जा सकती हों जब कविता कहीं पहुँच रही हो.. मतलब कि कविता की ग्राह्यता का दायरा कहाँ तक है.. मैसेज क्या मिला..

अब आईये.. मेरी एक तल्ख़ टिप्पणी भी .. कविता पर सिर्फ कहने के लिए कुछ नहीं कहा जाय ..जैसा अमूमन यहाँ इस कविता के नीचे होना संभावित है.. अगर विपिन कहती हैं कि यह आवाज़ सुनी जाए तो उन्हें इस कविता के बहाने कारण भी बताना चाहिए कि क्यों सुनी जाए..क्या ख़ास पाया उन्होंने इसमें जिसके आधार पर सुने जाने की पैरोकारी.

आपने कविता के साथ अकेले छोड़ा है अशोक सर.. इसलिए मेरी इतनी बात.. उम्मीद है कि संवाद सकारात्मकता में आगे बढेगा.. मेरी कविता 'मस्टरबेशन ' और रक्षित की कविता 'पोल्का डोट वाली लड़की' भी यहाँ मौजूद इन्ही उदार/ प्रोग्रेसिव पाठकों से द्वारा पढ़े जाने की मांग करती है.

अपर्णा मनोज ने कहा…

कविता में ऐसी भाषा की आदत नहीं है.. पर असुविधा की यह तर्ज़ अच्छी ही लगी क्योंकि घर के कोने से अक्सर ऐसी ही तर्ज़ गाहे बगाहे सुनाई देती रही है..और मुझ जैसी धुनी प्रौढ़ा को यह काफी स्पेस दे रही है. शुभम को पहली बार पढ़ा..यहाँ नवाचार से ज्यादा ताज़गी है और इसका तो हमेशा स्वागत है..

गौतम राजरिशी ने कहा…

wowwwww....simply wow !!!

शुक्रिया अशोक भाई इन अनूठी कविताओं से मुलाक़ात करवाने के लिए| अनर्गल-सी कविताओं के हुजूम में शुभम की ये कवितायें जायका तो बदलती ही हैं, हिन्दी कविता के नए स्कोप को भी और और एक्सटेंशन देती हैं|

शुभम की कविताओं के संकलन का अब बेसब्री से इनतजार...!

indianrj ने कहा…

कविता क्या है, भावनाओं का निर्बाध बहाव है जो अपने साथ लिए जाता है. बार-२ बहने को मन करता है.

Digamber Ashu ने कहा…

1991 के बाद जन्मी और नव-उदारवादी परिवेश में पली-बढ़ी पीढ़ी के अनुभव और भाषिक संवेदना का आईना है यह कविता. अच्छा-बुरा या सही-गलत कहने की स्थिति में अभी नहीं हूँ, फिर भी...

Anand Dwivedi ने कहा…

ये भाषा हमारे आसपास है हमारे जीवन को बराबर छूती है ...कविता में क्यों नहीं आ सकती ?
बहुत कमाल की कवितायेँ है शुभम जी की....आज कल वैसे भी सपाटबयानी बहुत अच्छी लगती है और नई कविता का ट्रेंड भी है

"ये मानव अधिकारों का कितना बड़ा उल्लंघन है
कि
आधे घंटे तक फ्रेंच किस करने के बाद तुम बोलो-
हम ब्रेक अप कर रहे हैं !"
...
शुभम जी को बहुत बहुत बधाई हलचल मचा देने के लिये !

ramji ने कहा…

शुभम श्री को पढ़ा ...मुझे भाषा को लेकर कोई एतराज नहीं है ..नयी पीढ़ी इससे भी तीखी भाषा बोलती है ..शुभम ने फिर भी इसमें शालीनता बरती है ...तो उसके लिए बधाई..| लेकिन मुझे ऐसा लगा कि जैसे इस नयी दुनिया का प्रतिसंसार रचते हुए भी , और सार्थक तरीके से रचते हुए भी यह कविता प्रेम की एक सामान्य कविता बन कर रह गयी है ...जहाँ बात - बेबात पर प्यार और ब्रेक-अप होना आम हो चला हो , वहां इस जुड़ाव की ख्वाहिश सुकून तो देती है , लेकिन काश ....कुछ और डूबा गया होता , इस समुन्दर में ........ओह ..... ! .....किसी भी दौर में इससे मोती चुने जा सकते हैं ..... फिर भी अच्छा लगा इससे गुजरना ...| ...

सागर ने कहा…

लेकिन चलनी कैसे दूषे सूप को, हममें खुद बहत्तर छेद. फिर भी, कहने को ऐसी कई कवितायें मैंने भी लिखी हैं.

शुभम को पहली बार हिंदी समय पर पढ़ा था और बहुत प्रभावित होकर कई दोस्तों को भी पढवाया था. बहुत उम्मीद बंधती है जब मेरे आलस को और आराम मिलता है कि कोई वही बात किसी ना किसी तरह से कह देता है.

लेकिन यहाँ बात बिलकुल जुदा है. ये कवितायेँ तो मुझे 'बेहद' स्तरहीन लगीं. किसी नौसिखिये हॉस्टल स्टुडेंट कि डायरी में अटके कुछ कोंसेप्ट और आइदिआज़ बसेड जिसकी बीच कि लाइन बस चौंकाती भर हैं बांकी पूरा कथ्य और शिल्प अपने संशय में डोलता नज़र आता है. जहाँ तक प्रयोग कि बात है मुझे ये भी नहीं लगता. ये कोई प्रयोग नहीं है.

इस मुकाबले सेनिटरी नैपकिन और हिंदी समय पर कि अन्य कवितायेँ बेहद सधी हुई, विचारणीय और उद्वेलित करने वाली है.
ये अजीब ही है :-

"काश पता होता
प्यार कर के तकलीफ़ होती है
काश
(हजारों सालों से कहते आ रहे हैं लोग लेकिन अपन ने भाव कहां दिया.. देना चाहिए था )
99 डिग्री
तुम्हें याद है जब एग्जाम्स के वक़्त मुझे ज़ुकाम हुआ था
कैसे स्टीम दिला दिला कर तुमने पेपर देने भेजा था
और बारिश में भीग कर बुखार हुआ था
तो कितना डांटा था
अब भी बुखार आता है मुझे
आंसू भी आने लगे हैं आजकल साथ में"


बेहद कमजोर, एक आम सी कविता.

कुछेक लाइन बहुत चौंकाती है लेकिन चौंकाना भर कब से कविता हो गयी कैसे ?
असुविधा का बड़ा आदर है और मुझे ये मंच बहुत बड़ा लगता भीहै. आज असुविधा हुई.

सुन्दर सृजन (sundar) ने कहा…

बदलते समय आर परिवेश की बदलती कविता , अपने आप में इंपल्सिव (impulsive) और (सबमिसिव)submissive भी, पूंजीवादी सभ्यता जनित उपभोगपरक जीवन-शैली के बाइप्रोड्क्ट के रूप में आत्मपरक रचना| हालांकि कविता भावी काव्य-भाषा में संभावित बदलाव की ओर भी संकेत करती है | एक बेहतरीन प्रेम कविता |

दीपक 'मशाल' ने कहा…

माफी चाहता हूँ लेकिन मैं औरों के साथ ना जाकर वही कहूँगा जो दिल और दिमाग ने पहली दृष्टि में सोचा, 'यह कविता एक अपरिपक्व मस्तिष्क की महाविद्यालयी भावनाओं से अधिक और कुछ नहीं लगी.. यह एक अनुभव जरूर कह सकते हैं क्योंकि मेरा खुद का या कई दूसरे युवाओं का अनुभव इस सबसे बहुत अलग नहीं है... हाँ कविता इस बात की पुष्टि करती है कि अधिकाँश युवाओं के अनुभव एक से ही हैं.. भाषा समकालीन है और साहित्य के लिए नई कही जा सकती है लेकिन विषय में या प्रस्तुतीकरण में नवीनता नहीं कह सकते क्योंकि कुछ ब्लॉग पर भी इस तरह की कवितायें देखी जा सकती हैं, वहाँ भी लिखने वालों की उम्र १८ से २६-२७ के बीच की ही है. ऐसा भी नहीं कि मैं रूढ़िवादी हूँ और यह भी नहीं कि मुझे किसी शब्द से परहेज और आपत्ति हो क्योंकि मैं अनामिका जी की ब्रेस्ट कैंसर पर लिखी कविता के समर्थन में हूँ और उसे एक जरूरी कविता भी मानता हूँ.. फिर भी कह सकते हैं कि मुझे कविताओं की समझ नहीं या मेरी समझ जरा एक दूसरे या तीसरे-चौथे प्रकार की है.. लेकिन आज की तारीख तक मेरा मानना है कि कुछ समय बाद कवयित्री को खुद ही यह कविता काफी ढीली और अजीब सी लगेगी. इन भावनाओं से बेहतर कविता बनने की गुंजाइश है लेकिन इसमें और भी शेड्स डालने की आवश्यकता है.. फिलहाल तो यह कविता एक नई बहस और कविताई में एक नए स्वाद को जन्म देने का माद्दा जरूर रखती है'.. नज़र में लाने के लिए शुक्रिया अशोक भाई.. लेकिन प्रभावित ना होने के लिए एकबार फिर क्षमा मांगता हूँ.

Nawal Kishor Kumar ने कहा…

kalpna aur yatharth se pratyaksh sakshatkar. Sundar kavita. Congrats

शेष ने कहा…

(स्पष्टीकरणः यह टिप्पणी एक कविता नहीं समझने वाले के द्वारा लिखी गई है। इसलिए इसे अपनी जिम्मेदारी पर पढ़ें।)

विरोधाभासों का सम्मिश्रण कई बार एक साफ तस्वीर को भी धुंधला कर देता है। निर्माण की प्रक्रिया में टूटना-बिखरना मुमकिन है, लेकिन अगर वह उलटी दिशा में चल पड़ता है तो यह गोता लगाना व्यापक भ्रम पैदा करेगा। शब्द और भाषा के स्तर पर "विद्रोह" हर गली में मिल जाएगा जहां हर दूसरा-तीसरा आदमी मां-बहन की वीभत्स गालियों के बिना बात नहीं करता है। लेकिन क्या वह विद्रोह है? यथास्थितिवाद की वकालत के लिए या उस दिशा में जाते हुए भी कई बार इस तरह की "विद्रोही" भाषा का इस्तेमाल किया जाता है या उसकी वकालत की जाती है। इसलिए भाषा का विद्रोह अगर एक ठोस वैचारिक धरातल पर खड़ा नहीं है तो वह एक "व्यवस्थागत" भ्रम के बरक्स नए भ्रम की व्यवस्था रचेगा।

" ‘नहीं’ दुनिया का सबसे कमीना शब्द है/ उससे भी ज्यादा है ‘ब्रेकअप’"

कैसे...?

‘नहीं’ कैसे दुनिया का सबसे कमीना शब्द है। खासतौर पर स्त्री संदर्भों में, जहां ‘नहीं’ कहने का हक तक नहीं दिया गया, उसके "नहीं" को भी "हां" के रूप में देखा गया और पुरुष-स्वामित्व स्वतः "हां" के कुचक्र में स्त्री को खत्म मानता रहा है, वहां ‘नहीं’ कहना कैसे दुनिया का सबसे कमीना शब्द है? और अगर पुरुष "नहीं" कहता है तब तो उसे अपने "नहीं" के लिए एक अतिरिक्त ताकत के बतौर देखा जाना चाहिए।

प्यार करके तकलीफ होना लाजिमी है। यह स्वाभाविक है। लेकिन जब कोई आधे घंटे तक फ्रेंच किस करने के बाद "ब्रेकअप" करने की घोषणा करता है, तो खूब रो लीजिए, सीना भी छलनी हो जाने दीजिए, लेकिन उसकी घोषणा को उसके मुंह पर मारने की हिम्मत भी करिए। खासतौर पर तब, जब जान दे देने की "रिवायत" को खारिज कर चुकी हैं। बल्कि तब तो और भी...। फिर उसके "नहीं" को "हां" में बदलने के लिए "प्लीज" की गुहार क्यों?

आदतें बदलना खुद को बदल देना ही होता है। यह खुद-ब-खुद होता है, हम चाहें, न चाहें। वहां "व्यवस्था" को जोर नहीं चलता। कई चीजें "प्राकृतिक अनुकूलन के सिद्धांत" के हिसाब से भी होती हैं। और जब सेक्स नहीं कर पाने का अफसोस परेशान कर सकता है, और अपने इस अधिकार को लेकर कोई शुबहा नहीं है तो उसे आधे घंटे तक फ्रेंच किस करके "ब्रेकअप" की घोषणा करने वाला कुछ भी करके छीन नहीं सकता। स्त्री के लिए यह रास्ता ज्यादा आसान है। हां, भरोसे के लायक पुरुष नहीं हैं इस दुनिया में!

शेष ने कहा…

पानी पीना और सुशू करना जिंदा रहने के लिए जरूरी है, किसी को किस करना दुनियावी और अर्जित किया हुआ सुख है। और जो चीजें जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं, उन्हें दुनियावी सुखों के बरक्स देखना एक खास तरह के नींद की सूचना देता है, जहां सपना आना और उसका गायब होना ही नियति है।

सेक्स अपने भीतर प्रयोग और खोज का विषय है। सेक्स केवल एक शक्ल में आदिम स्थितियों में था। सेक्स जरूरत है, अनिवार्यता नहीं, अपराध नहीं। प्यारे होठों, प्यारे डिंपल और प्यारी हर मुस्कराहट के पीछे सेक्स की इच्छा चुपके-से हिलोरें मारती रहती हैं और उस इच्छा में प्यारे होठों, प्यारे डिंपल और प्यारे मुस्कराहट आखिरकार डूब जाते हैं, एक याद की तरह...। उससे उपजी बेचैनी के जन्म का सिरा ढूंढ़ना बहुत मुश्किल नहीं है। विद्रोह की भाषा में बतियाने वाले इससे हिचकते भी नहीं हैं। और यह उसी भावुकतावाद का एक आडंबर है कि जिसे पैदा नहीं कर पाने का अफसोस है, उसी को कभी खुश नहीं रह पाने का शाप भी। जनाब असली दुनिया मैगजीनों में नहीं, उसके बाहर है जहां रिलेशनशिप.. अंडरस्टैंडिंग.. ईगो.. स्पेस.. की परीक्षा होती है। इसे पढ़ के नहीं, जी कर ही महसूस किया जा सकता है, उससे ताकत ली जा सकती है।

और जब आधे घंटे तक फ्रेंच किस करने के बाद "ब्रेकअप" थोपा जाए तो जहां दुगने उत्साह के साथ दोगुनी मात्रा में वैसा ही "ब्रेकअप" वापस करने की जरूरत है, वहां "ब्रेकअप" शब्द "नहीं" से भी "कमीना" कैसे हो गया? क्या यह वापसी है, वापस लौटना है? क्या "संवेदना" के इसी हथियार से मानव-अधिकारों के दमन की "व्यवस्था" नहीं की गई है? और यह किससे छिपा हुआ है कि किनके मानव-अधिकारों का हनन हुआ है या उनकी न्यूनतम जरूरतों तक को अधिकारों में शुमार नहीं किया गया है? और जब वही आधे घंटे तक फ्रेंच किस करने के बाद "ब्रेकअप" बोलता है तो उसके "नहीं" को "हां" में बदलने की जिद क्यों? ऐसे आंसू मध्यकाल की नायिका की आंखों में भी क्या शोभा देते हैं?

यह तो अपनी ईमानदारी है कि किसी को गले लगाने के पहले फ्लैट की किस्त और इंश्योरेंस पॉलिसी नहीं जोड़ी और अपना साइकोएनालिसिस नहीं किया। (तमाम साइकोएनालिसिस धरे के धरे रह जाते हैं, जब प्यार हमला करता है) और जंगलियों की तरह प्यार करना भी एक ईमानदार ताकत ही है। लेकिन इसके बावजूद अगर कोई हजारों की कमियों का इल्जाम दे रहा है और "ब्रेकअप" थोप रहा है, वह अगर एक बार भी "ब्रेकअप" थोपे तो पहली और आखिरी बार उसका "ब्रेकअप" सूद सहित वापस करिए, जितनी बार वह "ब्रेकअप" थोप रहा है, उतनी बार उसके बदले "आइ लव यू" वापस कर किसका भला किया जा रहा है? कब तक इस "ब्रेक अप" का मतलब नहीं समझ आएगा?

Santosh ने कहा…

फेसबुक पे चली बहस से लेकर यहाँ तक ..एक बात कामन हैं ! वही आह , उह और अस्प्रश्यता के नखरे ! हर कविता क्रांति नहीं गढ़ती और न ही हर कविता सबके लिए होती हैं ! प्रेम कविताओं में कब तक प्लोटेनिक लव की तलाश में रहेंगे लोग जहाँ प्रेम में केवल रूहानियत के बरबक्श बात करने की इजाजत थी /है ! शुभम श्री की ऊपर की कविताओं में कुछ बिम्ब सटीक बने हैं और अभिवयक्ति बहुत ही सामायिक है ! कविता की बहस तलबता इससे भी जाहिर होती है की ऊपर २२ कमेन्ट आ चुके हैं ! कविता के प्रति अपनी अरुचि बताने के लिए तत्पर लोगों को पहले कम ही देखा है असुविधा पर ! आखिर क्यों ?? अशोक जी को कवियत्री की उम्र और उसका छात्र होना नहीं बताना चाहिए था !

रंजना ने कहा…

जैसा युग, वैसी कविता...जब युग को स्वीकार लिया तो ऐसे गद्यों को भी कविता रूप में स्वीकारना ही पड़ेगा...

पर एक बात मेरी समझ में नहीं आता..कुछ हटके, कुछ अलग दिखने और करने की चाह यदि अधोगामी हो, तो भी उसे इतना मान और महत्त्व मिलना चाहिए क्या...?

Premchand Gandhi ने कहा…

इन कविताओं को पढ़कर मेरे भीतर कुछ नया नहीं जुड़ा... या तो मेरी संवेदनाएं, कविता की परखने की क्षमता या कि ऐसे भयावह नयेपन को स्‍वीकारने की कूव्‍वत ही कमज़ोर है या कि ये कविताएं न होकर एक विचित्र किस्‍म का आत्‍मालाप है... माफ़ करें। नये स्‍वरों का स्‍वागत करने को हमेशा आतुर रहता हूं, लेकिन वे स्‍वर तो हों... शुभमश्री जैसे कवि चौंकाने वाली जिस वृत्ति के शिकार हैं, वह आत्‍महंता है...

Amit sharma upmanyu ने कहा…

अच्छी कविता है! नयी पीढ़ी की भाषा और अभिव्यक्ति भिन्न है तो निसंदेह ग्राह्यता भी अलग ही तरीके से काम करेगी. जहां तक बात "किस" और "सेक्स" शब्दों के उपयोग और उन्हें पढ़ने के दौरान कौन क्या कर रहा होगा इस बारे में जो कहा गया है, वह कम-से-कम उस पीढ़ी पर तो फर्क नहीं डालता जहां किस और सेक्स ओलिम्पस पर्वत जितनी बड़ी बात तो नहीं हैं. बाकी यह ज़रूर सही है कि पुरुष लेखकों की "भिन्न" रचनाओं को उतना "साहसी" का तमगा या "विशेष ट्रीटमेंट" नहीं मिलता जितना महिला लेखिकाओं को. कारण? पता नहीं! वैसे यह मुद्दा महिला-पुरुष के अलावा विषय के चुनाव और "अनुभूति के स्तर" के फर्क पर भी निर्भर करता है. और स्पष्टतः, ध्यान देने वाले के कुछ विशेषाधिकारगत कारण तो होते ही हैं.

Mohan Verma Dewas ने कहा…

इन सरल सहज प्रेम अभिव्यक्तियों को किसी साहित्यिक चश्मा लगा कर पड़ने की जरुरत नहीं हे..बल्कि अच्छी सहज कवितावो.की तरह लिया जाना चाहिए..

मोहन वर्मा

arun dev ने कहा…

मुझे लगता है हिंदी कविता में एक ऐसी पीढ़ी दस्तक दे रही है जो पारम्परिक अर्थ में हिंदी कविता के आस्वाद और संस्कार से अलग है. यह किसी भी स्कूल के कवि नहीं है. संचार माध्यम की सर्वसुलभता के कारण ऐसे और भी मेहमान आने वाले हैं. देखना यह है की यह प्रवृति अपना सौंदर्य शास्त्र कैसे गढती हैं. यह प्रेम का महानगरी मध्यवर्गीय युवा संस्करण है'

Tripurari Kumar Sharma ने कहा…

शुभम की कविताएँ... पहले भी पढ़ चुका हूँ...इन कविताओं में जो रंग है...जो भाषा है...थोड़ी देर के लिए अचम्भित ज़रूर करता है मगर यह हमारे समय की कविता है...हमें इसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए...शभम को बधाई...लेखन जारी रहे...यही दुआ है...!

बेनामी ने कहा…

umda kavita mitr... lage rahiye... nayi tarah ki abhivyakti...

प्रफुल्ल कोलख्यान ने कहा…

मुझे यहाँ बस दो बतें कहनी हैं। पहली यह कि भाषा में अभिव्यक्त हर संवेदनशील अनुभव काव्य होता है, इस अर्थ में यह कविता है। कविता आत्माभिव्यक्ति भी होती है, निजी भी हो सकती है लेकिन कविता वह तब होती है जब वह आत्म को अतिक्रमित कर अनात्म (कह लें मम से निकलकर ममेतर) की आत्माभिव्यक्ति बन पाती है; कवि का निजी जब पाठक का निजी बनता है तब कविता होती है।

Prafulla Kolkhyan ने कहा…

मुझे यहाँ बस दो बतें कहनी हैं। पहली यह कि भाषा में अभिव्यक्त हर संवेदनशील अनुभव काव्य होता है, इस अर्थ में यह कविता है। कविता आत्माभिव्यक्ति भी होती है, निजी भी हो सकती है लेकिन कविता वह तब होती है जब वह आत्म को अतिक्रमित कर अनात्म (कह लें मम से निकलकर ममेतर) की आत्माभिव्यक्ति बन पाती है; कवि का निजी जब पाठक का निजी बनता है तब कविता होती है।

अजेय ने कहा…

मै जिस जगह रहता हूँ, जिस समाज मे मेरी बरतनदारी है , वहाँ का यह न तो कथ्य है, न ही वहाँ की भाषा है. फिर भी सेनेटरी नेप्किन वाला आक्रोश अभी तक याद है. यहाँ कविता काफी ग्रो हुई लग रही है.भाव मे तो है ही , टोन मे भी फर्क़ है. मुझे इन दिनो महसूस हुआ है कि स्वागत कहना नई पीढ़ी के लिए कारुणिक , दया भाव सा है .कविता को जब अपने स्पेस मे आना होता है तो बेझिझक, बिना इजाज़त , बिन्दास हो कर आ जाती है. उस का आप क्या कीजिएगा? न स्वागत कर सकते हैं, न बेदखल. तो स्वागत वगैरह कुछ नहीं,.... निस्सन्देह यहाँ एक नया कवि आया है ... नई कविता ले कर. शुभम लिखती रहें. हम उसे पढ़ना चाहेंगे. लेकिन हमारे पढ़ने का कारण महज़ कविता का विषय या इतर घटक कतई नही होगा जिस के संकेत ऊपर टिप्पणियों मे इंगित है. हम हिन्दी मे कविता को ऊँचा जाते हुए देखना चाहते हैं और नई पीढ़ी के साथ उड़ना सहज है. नवाचार अच्छा जहै, हर हाल में .

ishshita ने कहा…

Bhawnayen jab nirbadh ho kar behti hain... tab aisi hi bhasha man me ugti hai....Aisi bhasha apne aap hi kavita hoti hai.....Fark bas itna ki wah bol rahi hai....Hamari pidhi me suvidha asuvidha ka khyal rakhne ki koshish me sach sweekarne se door rahe adhiktar log.... Jo bhasha ye pryog me la rahi hai, vah aaj ke sach ki swikriti hi to hai... Aaj ka jeevan apni in swikritiyon k saath in sab prem ki takleefon ki baat keha hua dard me bhi.. anek kunthao'n se mukt hai.... hamare samay ki suvidhajanak bhasha... aur sanskriti bhi kitni kunthao'n ko janm de gai.... khabar nahi.... Aaj k yuvaon se baat karna achchha lagta hai. Hamse kahi'n adhik swasth ahi unki mansikta!

ishshita ने कहा…

Bhawnayen jab nirbadh ho kar behti hain... tab aisi hi bhasha man me ugti hai....Aisi bhasha apne aap hi kavita hoti hai.....Fark bas itna ki wah bol rahi hai....Hamari pidhi me suvidha asuvidha ka khyal rakhne ki koshish me sach sweekarne se door rahe adhiktar log.... Jo bhasha ye pryog me la rahi hai, vah aaj ke sach ki swikriti hi to hai... Aaj ka jeevan apni in swikritiyon k saath in sab prem ki takleefon ki baat keha hua dard me bhi.. anek kunthao'n se mukt hai.... hamare samay ki suvidhajanak bhasha... aur sanskriti bhi kitni kunthao'n ko janm de gai.... khabar nahi.... Aaj k yuvaon se baat karna achchha lagta hai. Hamse kahi'n adhik swasth ahi unki mansikta!

Shanker Bakshi ने कहा…

नयी कविता , साहसिक प्रयास

Shanker Bakshi ने कहा…

नयी कविता , साहसिक प्रयास

Kanchan Arya ने कहा…

aadhunik prem ka sachha rup dikhaya hai aapne is kavita ke dwara..thanx

Avdhesh Nigam ने कहा…

अब व्यंजना में नहीं
अभिधा में व्यक्त होता है प्यार
रात में चढ़ता है
सुबह उतर जाता है बुखार |

Digvijay Tiwari ने कहा…

इस तरह की कवितायेँ हिंदी साहित्य में साहित्यिक पिछड़ेपन के लिए याद की जाएँगी।

Vivek Mishra ने कहा…

एक नये जीवन संदर्भ से उठी बेबाक जीवन की बेबाक टिप्पणी है | कविता नई भूमि पर नये तेवर के साथ जन्मी है | किसी एक कोण से न तो जीवन को देखा समझा जा सकता है और न ही कविता को | हमारे जीवन में इतने उतार-चढ़ाव होते हैं कि उसे स्वयं समझ लें और जगत को समझा ले यही एक रचना की पहली जरूरत होती है| वह दी गई स्थितियों में तोड़फोड़ कर एक अपनी ही दुनिया रचती है | कविता जीवन को जीकर ही लिखी जाती है और जीये गये जीवन में यदि सच की पोर सजी होती है तो आप से रचना सहज ही बात करती है |

ashok anurag ने कहा…

likhne ke liye shabd hi nahi mil rahe, just say waah, ab is waah ko jitna ho sake multiply kar do

बेनामी ने कहा…

Ye ek kavita hi nhi ek sachh h.......sabdo ko likhane Ki himat kabile tarif h...bahot bahot badhai

Vijay Gauraw ने कहा…

अभिव्यक्ति के लिहाज से कविता सामायिक है! शहरी युवा वर्ग को इससे 'रिलेट' करने में कोई परेशानी नहीं है! आधुनिक प्रेम की हास्यास्पदता को उसी खिलंदड़ेपन के साथ व्यक्त किया गया है! फ्रेंच किस का प्रयोग जहाँ कविता के भाव-प्रवाह में सटीक है ; वहीँ 'सेक्स भी तो' या 'सेक्स की इच्छा' जैसे शब्द व्यर्थ ही सिर्फ शॉक वैल्यू के लिए जोड़े गए लगते हैं! बिना 'साइकोएनालिसिस' किये पढना मज़ेदार है!!

Vijay Gauraw ने कहा…

अभिव्यक्ति के लिहाज से कविता सामायिक है! शहरी युवा वर्ग को इससे 'रिलेट' करने में कोई परेशानी नहीं है! आधुनिक प्रेम की हास्यास्पदता को उसी खिलंदड़ेपन के साथ व्यक्त किया गया है! फ्रेंच किस का प्रयोग जहाँ कविता के भाव-प्रवाह में सटीक है ; वहीँ 'सेक्स भी तो' या 'सेक्स की इच्छा' जैसे शब्द व्यर्थ ही सिर्फ शॉक वैल्यू के लिए जोड़े गए लगते हैं! बिना 'साइकोएनालिसिस' किये पढना मज़ेदार है!!

बेनामी ने कहा…

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