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रविवार, 30 सितंबर 2012

दीपक मशाल की कवितायें



इन दिनों इंग्लैण्ड में रह रहे दीपक मशाल पिछले कुछ बरसों में नेट तथा प्रिंट, दोनों ही माध्यमों में अपनी कविताओं के साथ एक पहचान बना चुके हैं. विज्ञान के विद्यार्थी दीपक की कवितायें सबसे पहले अपनी वैचारिक जद्दोजेहद से आकर्षित करती हैं. इधर की कविताएं पढ़ते हुए आप देख सकते हैं कि अपने निरंतर श्रम और सम्बद्धता से उन्होंने इस जटिल जद्दोजेहद को कविता में दर्ज करने की ज़रूरी कला और भाषा को बरतने का हुनर एक हद तक हासिल किया है, और यह प्रक्रिया लगातार ज़ारी है. असुविधा पर मैं इस युवा कवि का स्वागत करता हूँ.
सिकंदर के खाली हाथ

तमाशबीन बनी ईंटें
और चहलकदमी करते विचार
धूमकेतु के पदचिन्हों पर चलती 
अनावश्यक रूप से अनावृत सोच 
और वो भेड़ों-बकरियों के बाड़े से उपजतीं
बदलाव की शोशेबाज़ियाँ 

विद्रोह की बयार उठती किन्हीं कोनों में
और करती प्रेरित सोयी चट्टानों को
लोग उम्र के ढलान पर आकर भी
डरते ढोने से जिम्मेदारियां 
कहीं बूढ़ी होती आज़ादी पर तंज कसते 
कहीं गुलामी पर 

दिन-बा-दिन कुरूपता की ओर प्रगतिशील 
लोकतंत्र, राजतंत्र और कम्युनिज्म के 
विद्रूप चेहरों से उकताए चोट खाए बाशिंदे

हर शाम पतंगों की तरह आसमां में उग आते
और रात ढलते धराशायी होते परिवर्तन के पीपल
किन्तु सब करते परिक्रमा एक समूह की
कभी द्वीप, कभी देश के नाम पर

प्रयोगशालाओं में 24x7 चलते 
अनंत के पर्याय प्रयोग 
नए-नए समीकरणों के उलझाव से सुलझते भविष्य के जीवन 

बनती-बिगड़तीं, धंसतीं-उभरतीं 
धूल-मिट्टी, ईंटों से लेकर
तारकोल, बजरी, कंक्रीट तक
फिर उससे आगे कंक्रीट, सरिया, सीमेंट को धारण करतीं सड़कें
सड़कों के विकास की यात्रा 
कितना आगे ले जाने का माद्दा सिमेटे हैं नभ/ जल/ थलचर को???

आश्चर्य!!!
आश्चर्य कैसा? 
हर जगह तो है पहरा, याकि कब्ज़ा कहें 
हाँ मेरा, तुम्हारा, हमारा.. हम सबका.. मानव का कब्ज़ा 
गलत है अब जन्तुविज्ञान जो कहता मानव को थलचर 
त्रिलोकी बन शांति, समृद्धि, सम्पन्नता को खोजती
सृष्टि के आदि से जन्मती उसे 
उसे.. ईश्वर को 
ईश्वर को खुद ही बनाती, झुठलाती खुद ही 
बहुआयामी विकास का दंभ भरती असफल सभ्यता 

बात-बात पर बमक पड़ती
हो जाती उद्वेलित ये तथाकथित सभ्यता 
युद्ध को जोड़ती गिनतियों से प्रथम, द्वितीय...
फिर डराती अगली गिनती से.
शाख पर बैठ उसे ही काटते कालिदास पर हँसती तो
मगर ना सीखती उससे.
दोहराती वही मूर्खता... 
नहीं कर पाती
सर्दियों की तरह प्रतिवर्ष लौट आते संदेह को संतृप्त 

फिर-फिर लौटता पतझड़
फिर पंछी प्रवासी होते 
फिर बंजारन बनती प्रजातियाँ 
फिर कई शून्य, पराजित युधिष्ठिर 
नज़रें नीचे झुका तकते चौपड़ की बिसात 
फिर विश्वविजेता सिकंदर के खाली हाथ 
खुलते ताबूत से बाहर आसमान की ओर

आखिर हड्डियों पर चढ़े चमड़े के ढाँचे से अलग
ये स्तनधारी और क्या कर पायेगा सिद्ध स्वयं को...



उम्मीद कायम रहे मानव!!!

विपत्ति के वातावरण में 
जंतु मशीनों पर निर्भर होता प्राणी...
कंक्रीट के अभ्यारण्य में 
होमोसेपियंस* से ज्यादा 
इनके कलपुर्जे अभ्यस्त होते दिखते हैं
तथाकथित महानगरों में प्रकाश के व्युत्क्रमानुपाती 
स्वप्नों के छिलके उतारने को व्याकुल
क्षण-भंगुर जीवन..

वास्कोडिगामा और कोलंबस के जहाज़ों के मस्तूल
और उनमे लगे दिशासूचक यन्त्र 
मनुष्यता को यहाँ तक तो ले आये
अब जाने किस दिशा में ले जाएँ 

एडमंड हिलेरी का ऐतिहासिक पर्वतारोहण
गागरिन का भेद देना धरती की कक्षा को..
कर आना बाहर की सैर
मशीन ने ही तो बनाया संभव आदम के बेटों के लिए 

गणना करने के लिए
कम पड़ने लगे जब अँगुलियों के पोर
जब भोजपत्र ना रहे पर्याप्त 
मस्तिष्क की उपज को सहेजने को
तब केलकुलेटर से कम्प्यूटर तक 
जो तुमने रचे
जो किये आविष्कृत 
अब तुम्हारे अन्दर के कोणों में उजागर कालेपन को 
मिटाने को तुम निर्भर हो 
उस अपने ही सृजन पर 

वो कालिख अब बर्फ सी सफेदी में भले ना बदली जा सके 
मगर आगे उगने वाली कारोंचों
उनको जन्मने वाले 
बड़ी लौ के लम्पों को मिटा तो सकती है...
उन्हें रोक सकती है तुम्हारे इतिहास पर कालिख मलने से 

तुम्हारी उपज..
तुम्हारी मशीन..
ढूंढ सकती है, पहचान सकती है 
छाँट सकती है भीड़ में से झूठ के सिपहसालार
अशांति के रहनुमा 
लालच के सरदारों को..

उम्मीद कायम रहे मानव!!!

*- मनुष्य का जंतुवैज्ञानिक नाम.




मैं कविता कहना चाहता हूँ

मैं कविता कहना चाहता हूँ
हरबार जब भी मुझे 
सच बोलने के लिए दिया जाता है ज़हर 
जब भी एकाकार किया जाता है सूली से
तब मैं कविता कहना चाहता हूँ..

जब भी सच किया जाता है नज़रबंद
झूठ को किया जाता है बाइज्ज़त बरी 
जब ज्ञान को विज्ञान बनने से रोका जाता है

जब चढ़ाया जाता है तख़्त-ए-फांसी 
'अनलहक' कहने पर
जब बुल्लेशाहों को होती है सज़ा
तब मैं कविता कहना चाहता हूँ

मैं कविता कहना चाहता हूँ
हाँ मैं कविता कहना चाहता हूँ 
जब रोटी खरीद पाने की असमर्थता में 
किसी देह को बिकते देखता हूँ 
जब चाय के अनमंजे गिलासों में
स्कूल की फीस देखता हूँ 
तब मैं कविता कहना चाहता हूँ 

मोहल्ले भर की साड़ियों में
फौल लगाती माँ की आधी भरी गुल्लक और 
सूती धोती के छेदों में से जब
बच्चों के भविष्य की किरणें निकलते देखता हूँ
जब दूध की उफनती कीमतों और
चश्मे के बढ़ते नंबर में समानुपात देखता हूँ
जब चार दीयों के बीच
नकली खोये सी दिवाली देखता हूँ
तब मैं कविता कहना चाहता हूँ 

जब किसी के साल भर के राशन की कीमत
ज़मीं से दो फुट ऊपर चलने वालों के
साल के आख़िरी और पहले दिन के बीच के 
तीन-चार घंटों में उड़ते देखता हूँ 
तब मैं कविता कहना चाहता हूँ

जब महसूसता हूँ एक रिश्ता
तकलीफ से इंसान का
जब निर्वाचित पिस्सुओं को 
अवाम की शिराओं से रक्त चूसते देखता हूँ 
जब शक्ति को शोषक का पर्याय होते देखता हूँ 
तब मैं कविता कहना चाहता हूँ 

जब एक मॉल की खातिर
सब्जियों, फलों और अनाज के हक की ज़मीनों पर
सीमेंट पड़ते देखता हूँ 
कागजी लाभों वाले बाँध के लिए 
जंगलों, गाँवों के निशान मिटते देखता हूँ 
गरीब के खेत औ घर का सरकारी मूल्य 
अफसर के मासिक वेतन से कम देखता हूँ
तब मैं कविता कहना चाहता हूँ 

ये कविता अमर नहीं होना चाहती
और ना ही कवि...
फिर भी जब सम्मान-अपमान से विलग हो 
कुछ करना चाहता हूँ 
तब मैं कविता कहना चाहता हूँ
या शायद कहना ना भी चाहूँ तब भी
कविता कहलवा लेती है खुद को 

ये कवितायें लाना चाहती हैं परिवर्तन
निर्मित करना चाहती हैं नई मनुष्यता 

मैं बीज की सी कविता रचना चाहता हूँ
क्रान्ति की नींव रखना चाहता हूँ
क्योंकि जानता हूँ
कल मैं रहूँ ना रहूँ
ये वृक्ष बनेगी एक दिन
एक दिन इस पर आयेंगे फल संभावनाओं के 
एक दिन वक़्त का रंगरेज़ आज के सपने को 
हकीकत के पक्के रंग से रंगेगा जरूर...



 मेरे प्रश्न

मेरे प्रश्न
तुम्हारे विरोध में नहीं
मगर अफ़सोस कि
नहीं कर पाते हैं ये समर्थन भी

ये प्रश्न हैं
सिर्फ और सिर्फ खालिस प्रश्न
जो खड़े हुए हैं
जानने को सत्य
ये खड़े हुए हैं धताने को उस हवा को
जो अफवाह के नाम से ढंके है जंगल

ये सर्दी, गर्मी, बारिश
और तेज़ हवा में डंटे रहेंगे
तब तक
जब तक इनके लिए
मुझ तक भेजे गए तुम्हारे उत्तर के लिए
नहीं हो जाते मजबूर
ये मेरे हाथ, मन और मष्तिस्क
देने को पूर्णांक

सनद रहे
कि ये प्रश्न इन्कार करते हैं
फंसने से
किसी छद्म तानों से बुने झूठ के जाल में
ये इन्कार करते हैं
भड़कने से
बरगलाए जाने से
बहलाए जाने से
फुसलाये जाने से

ये हुए हैं पैदा
सोच के गर्भ से

यूं ही नहीं...
इन्हें उत्पन्न होने को किया गया था निमंत्रित
जानने के हक के अधिकार के द्वारा

और ये अधिकार हुआ था पैदा
स्वयं इस सृष्टि के जन्म के साथ
भले ही तुम्हारे संविधान ने
तमाम लड़ाइयों के बाद ही
इसे दी हो मंजूरी

देखो नीचे खोलकर अपनी अटारी की खिड़की
प्रश्न खड़े हैं
करो पूर्ण उत्तर देकर युग्म
और समयावधि तुम्हें है उतनी ही
जिसमे कि ना जन्मने पायें प्रतिप्रश्न
न मेरे मन में
और न ही प्रत्यक्षदर्शियों के..
उतनी ही
जितने में कि
ना मिल पायें कुछ और स्वर
मेरे स्वर में..

हम संग्रहालय प्रेमी नहीं 


हम संग्रहालय प्रेमी नहीं
क्योंकि नहीं चाहते हम जानना सत्य
हमारे तमाम अंधविश्वासों का 
नहीं चाहते जानना 
झाँक रहा है कौन बदसूरत चेहरा
सामने वाली खिड़की के मखमली परदे के पीछे से 
नहीं देख सकते होते खंडित काल्पनिक इन्द्रधनुष

हमारे लिए मान्यताओं की 'लकीरें' बनाती हैं धर्म
जिनके हम होते हैं 'फ़कीर'
नहीं मांगने होते हमें सबूत जो कहें कि
'इंसान का पूर्वज था बन्दर या उससे भी पहले था चूहा..
या कोई और तुच्छ प्राणी..'

घबराते हैं हम लेने से सबक अपनी असफलताओं से 
नहीं चाहते गंवाना समय ढूँढने में मंत्र सफलता के

नहीं है हमें कोई रूचि देखने में वो प्रमाण
जो युद्ध को परिभाषित करें विभीषिका 
जो कहें कि जंग है एक आगाज़ आदम के अंत की 
और है एक उकसाव 
हव्वाओं को कातर विलाप करने के लिए..

करती हैं तौबा हमारी आँखें देखने से टैंक
स्टेनगन, खोखे हथगोलों के, मिसाइल के नमूने
ये सब दिलाते हैं ये हमें याद 
लड़ी गई पिछली लड़ाइयों की

एक-एक गोली से चिपके दसियों भूत...
भूत सिर्फ उस सैनिक के नहीं
जो बना निशाना सुदर्शन चक्र की तरह घूमती उस जानलेवा धातु का 
बल्कि भूत उनके भी 
जो बच सकते थे मरने से भूखे पेट 
एवज में उस बुलेट को खरीदने में खर्चे गए रोकड़ के 
लेकिन अंतड़ियों को अमन से जीने देने के बजाय 
चुना उन असलहों ने उमेंठना, भभोंड़ना उन्हें.. 
उनमे घुसकर उन्हें फाड़ डालना..
और ऐसे भावुक हालात 
हमारे अन्दर के मृत्यु-शय्या पर पड़े इंसान को 
अक्सर कर देते हैं विवश झुका लेने को नज़रें शर्म से
जो हमारी बाहरी मगरमच्छी खाल को नहीं होता मंजूर.

हमें नहीं देखने होते संग्रहालयों में मौजूद डायनासौर कंकाल
उनका मिट जाना कर सकता है पैदा संदेह 
मनुष्य जाति की अमरता पर

हम बाह्य नग्नता को दे अश्लीलता का सम्बोधन
करना चाहते हैं संतुष्ट 
अपने आंतरिक नंगेपन को 

नहीं चाहते हम सुनना पैरवी यथार्थ की..
भ्रम की मुंदी आँखों का अँधेरा 
रौशनी में सामने बैठी बिल्ली के भय से कुछ तो राहत देता है..
असल में 
हम खोकर ये नैन सावन की हरियाली में
नहीं वापस चाहते पाना बर्फीली सर्दी में
इसलिए बेहतर मानते हैं इंतज़ार फिर से होने का सब हरा

हम रखते हैं 
अपनी अलग-अलग
रंगबिरंगी टोपी वाली टोलियों के
कच्ची-पक्की कहानियों वाले इतिहास 
जिनसे गुज़रना अगली पीढ़ियों का
विपरीत रंगी नाम सुनते ही
भरता रहे उनके लहू में एड्रिनेलिन.. 

रोशनी के दुश्मन में दिखती 
हर तीन नोंक वाली आकृति में ढूंढ लेते हैं हम 
त्रिशूल, चाँद सितारे या कुछ और..
मगर कर देते हैं खारिज हमारी ऐसी सोच ये बेहया संग्रहालय 
ये लगाते हैं धक्का अरबों साल पुरानी इस धरती पर
हमारी कुछ सैकड़ा साल पुरानी संस्कृति को 

देकर के मुट्ठी भर राई के दानों जितनी 
सूक्ष्मदर्शी के नीचे से निकली थ्योरीज 
ये संग्रहालय कर सकते हैं नेस्तनाबूद 
पिछली पीढ़ियों से मिले हमारे दिशाहीन भाषाई संघर्ष 
हमारे आन्दोलन
गोरे-काले के विवाद

नई पुरातात्विक खोजें देती हैं हमें खुशी
गर खा जाएँ वो मेल हमारी खुशहाल कल्पनाओं से 
गहरी नींद में भी हम कर सकते हैं स्वीकार वो सबूत
जो करें बात हमारे मनचाहे मलबे के होने की 
नीचे गैर-सम्प्रदाय की इमारत के 

पर प्रमाण जुटाने का इनका यह सिलसिला थमता नहीं
इसीलिये हमें गुजरते है नागवार ये संग्रहालय 
क्योंकि इनमें संरक्षित इससे आगे की खोजें 
फिर होती हैं झूठ हमारे लिए 

क्योंकि ये खोजें देती हैं प्रमाण 
उस मलबे से भी नीचे मौजूद 
किसी तीसरी जिंदा सभ्यता की विरासत का 

उससे भी बड़ा झूठ होता है इनका वह सच
जो कहता है
'इन सारी इमारतों के नीचे थी कभी कोरी ज़मीन
जिस पर जताने के लिए मालिकाना हक 
भाषा को निर्मित और लिपिबद्ध कर सकने वाला 
कोई दोपाया उस वक़्त तक ना जन्मा था..'

और संग्रहालयों की यही संदेह कराने की प्रवृत्ति
बनाती है हमें उसके प्रति उदासीन

बेमतलब यह संग्रहालय जुटाते हैं साधन यह सिद्ध करने को कि
उस पल जबकि यह कविता रही जा रही है पढ़ी 
जीव विज्ञान के अनुसार 
धरती पर मौजूद हर जिंदा कही जाने वाली चीज
कभी जन्मी थी एक कोशिका से 
और इसमें उनकी मान्यताओं का कोई हाथ ना था
क्यों उस वक़्त तक जन्मा ही न था कोई अंग.. 

ऐसे ही कारणों की है एक अंतहीन फेहरिस्त 
जो हमारे माथे पर एक लेबल चस्पा करती हैं 
जिस पर लिखा है
'हम संग्रहालय प्रेमी नहीं हैं..'



नाम- दीपक मशाल 

जन्म: कोंच- उरई (उ.प्र.) २४ सितम्बर १९८० 
मूल निवास- कोंच (उ.प्र.)
शिक्षा: एम.एससी.(बायोटेक) 
सम्प्रति: क्वीन्स विश्वविद्यालय, बेलफास्ट (यू.के.) में शोधरत 



प्रकाशन - २०१० में शिवना प्रकाशन, सीहोर म.प्र. से 'अनुभूतियाँ' नाम से पहला कविता संग्रह प्रकाशित, इसके अतिरिक्त 'संभावना डॉट कॉम' एवं 'अनमोल संचयन' में रचनाएं शामिल. अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित  

प्राप्त पुरस्कार / सम्मान - अक्षरम, दिल्ली एवं प्रवासी दुनिया द्वारा २०१२ का प्रवासी युवा साहित्य सम्मान, हिन्दयुग्म द्वारा अगस्त २०१२ में 'वो आतंकवाद से डरती है' कविता के लिए यूनिकवि पुरस्कार 

6 comments:

Shyam Bihari Shyamal ने कहा…

जीवंत रचनाएं.. कवि को बधाई..

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत जबरदस्त...शानदार!!

Sandip Naik SAM ने कहा…

nice poems Deepak indeed.........

सोनम ने कहा…

मैं कविता कहना चाहता हूं...दिल को छू लेने वाली पंक्तियाँ...वास्तविकता का दर्पण है आपकी इस कविता की पंक्तियाँ...बधाई...!!!

दीपक 'मशाल' ने कहा…

असुविधा के फ्रेम में जगह देने के लिए शुक्रिया अशोक भाई. पहले अपनी रचनाओं पर संशय होता था कि सच में इन्हें कविता कहूं या नहीं लेकिन यहाँ लगने से संशय बहुत हद तक घटा और विश्वास बढ़ा है कि जो भी लिखा गया है वह कविता जैसा ही कुछ है या कविता के आधुनिक रूप के बहुत करीब है और कविता में जहाँ कहीं चपटें पड़ी थीं वह आपने हल्की हथौड़ी से बराबर कर दीं.. कोशिश रहेगी कि आगे से सार्वभौमिक कविता ही जन्मे..

sarita sharma ने कहा…

इन कविताओं को पढकर सुखद आश्चर्य हुआ.ढुलमुल रवैय्ये के विपरीत दृढ़ता से टिके प्रश्नों सी मजबूत कवितायेँ.कवि नोस्टाल्जिया में मुग्ध न रहकर वर्तमान की विद्रूपताओं पर पैनी निगाह रखता है.वह किसी भी तरह के भुलावे में आने को तैयार नहीं है.सजग दृष्टि की असरदार अभिव्यक्ति.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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