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शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

मंजरी श्रीवास्तव की कवितायें

मंजरी श्रीवास्तव की कवितायें पिछले करीब सात-आठ सालों में हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं और पिछले पुस्तक मेला में उनकी इजाडोरा पर लिखी लम्बी कविता पुस्तिका के रूप में भी आई थी. यहाँ पाब्लो नेरुदा, खलील जिब्रान, कुंअर नारायण के लिए लिखी कविताओं और फिर दो प्रेम कविताओं को पढ़ते हुए आप उनकी कविताओं के मूल स्वर 'प्रेम' की पहचान कर सकते हैं. यह एक ऐसे कवि का रचना संसार है जो प्रेम के मुहाविरे में बात करता है, और ज़िन्दगी की तमाम बदसूरती के बरक्स प्रेम की एक समानांतर दुनिया खड़ा करना चाहता है. असुविधा पर मंजरी का स्वागत.







पाब्लो नेरुदा के लिए
                                                                                      

पृथ्वी के एक छोर पर खड़े होकर 
तुमने फैलाईं
अपनी अपरिमित, असीमित बाँहें 
और समेट लिया अपनी बाँहों में 'इस्ला नेग्रा', 'मेम्यार' के अंचल से लेकर 
पूरा विश्व 
पूरी पृथ्वी
पृथ्वी को अपनी बाँहों में समेटकर चूमते हुए 
तुमने लिखीं 
बीस प्रेम कविताएँ
और लिखा 
निराशा का एक गीत
बीस वर्ष की अपनी बाली उमर में 

आज की रात भी 
उतनी ही प्रासंगिक हैं 
तुम्हारी लिखी 
सबसे उदास कविताएँ 
जो तब की रातों की जान हुआ करती थीं 
नेरुदा 

शुरू हुईं तुम्हारी कविताएँ
एक तन में 
किसी एकाकीपन में नहीं 
किसी अन्य के तन में 
चाँदनी की एक त्वरा में 
पृथ्वी के प्रचुर चुम्बनों में
तुमने गाए गीत
वीर्य के रहस्यमय प्रथम स्खलन के निमित्त
उस मुक्त क्षण में 
जो मौन था तब.
तुमने उकेरीं रक्त और प्रणय से अपनी कविताएँ 
प्यार किया जननेन्द्रियों के उलझाव से 
और खिला दिया कठोर भूमि में एक गुलाब
जिसके लिए लड़ना पड़ा आग और ओस को 
और इस तरह समर्थ हुए तुम गाते रहने में.

तुमने मुक्त कर डाला प्रेम को वर्जनाओं से
देह की वर्जनाओं को तोड़ते हुए 
तुमने रचा काव्य सर्जना का वह रूप
जो काम- भावना का पर्याय था.

तुम्हें नहीं पसंद आईं कभी 
रूह की तरह पाक-साफ़ कविताएँ 
तुमने तोड़ डालीं कविताओं की 'वर्जीनिटी
और लगा दिए साहित्य के पन्नों पर 
खून के धब्बे 
कविताओं का 'हाइमेन' विनष्ट कर 
तुमने कर डाली सौंदर्यशास्त्र की व्याख्या 
एक ऐसे नए रूप में 
जिसे आज भी देख लेने भर से 
तेज़ हो जाती है ख़ून की रफ़्तार 
रगों में 
तुमने कविताओं पर लगा दिए दाग़ 
जूठन के
खर-पतवार के 
धूल-धक्कड़ के
और कल-कारखाने की कालिख कलौंछ के
और इन 'कुरूप' कविताओं को 
लोकल से ग्लोबल बनाकर 
समेटा इस कुरूपता के सौंदर्यशास्त्र को
अपनी बाँहों में
पश्चिमी से पूर्वी गोलार्द्ध तक
और बन गए विश्वकवि

तुमने पैदा किये ख़ून में शब्द 
और शब्द से ही दिया ख़ून को ख़ून 
और ज़िंदगी को ज़िंदगी 
आज भी हमारे रगों के ख़ून में ज़िन्दा है 
तुम्हारे ख़ून की गरमाहट
नेरुदा

अभी तक बचाकर रखी है तुमने 
अपनी प्रेम कविताओं में 
प्रेम के मुहाने पर 
आँसुओं के लिए थोड़ी-सी जगह 
और प्रेम की क़ब्र भरने के लिए 
अपर्याप्त मिट्टी 
प्रेम के स्याह गड्ढों को पाटने के काम रही है 
आज भी 
आँसुओं से गीली वह मिट्टी 

किसी ने देखा और तुम्हें बतलाया 
समय का खेल देखना 
तुम्हारी ज़िंदगियों के प्रहर
मौन के ताश के पत्ते
छाया और उसका उद्देश्य
और तुम्हें बतलाया 
की क्या खेलो 
ताकि हारते जाओ
और तुम हारते रहे अपनों से 
जो नहीं जानते थे 
कि
तुम लड़े रोशनी के बीच उनके अंधेरों से 

तुमने पैदा किया शब्द को 
रक्त में 
पाला स्याह तन में
स्पंदन दिया अपनी थरथराती उँगलियों से
और उड़ाया अपने काँपते रसीले होंठों से
यही शब्द और सामान्य जन की वाणी 
दोनों मिलकर बने तुम्हारी कविता
तुमने किया 
अपनी उन अनजान कविताओं से रूखे स्नेह से प्यार 
सिर्फ़ इसलिए 
क्योंकि 
तुम्हें लगता था 
कि
तुम्हारा सारा दुर्भाग्य इस कारण था 
कि एक बार उसने छितरा दिए थे तुम पर 
अपने केश
और ढँका था तुम्हें 
अपनी छाया में.
अपने इस रूखेपन को दूर करने के लिए 
तुमने माँगा था 
पृथ्वी से, अपनी नियति से 
वह मौन 
जो कम-से-कम तुम्हारा अपना तो था.

सह सके तुम मौन का विशाल बोझ
धारण करते ही मौन
काँप उठे तुम
बेध गई तुम्हें तेज़ हवा
और उड़ गया फ़ाख़्ते के साथ तुम्हारा हृदय 
ढह गया मौन का प्राचीर 
पर 
यक़ीन है मुझे 
जीवित हो अब भी तुम कल की राख़ में 
और अगर हो गए हो मृत 
तो भी जन्म लोगे 
कल की राख़ से.


ख़लील जिब्रान के लिए 



ख़लील
मेरे प्यारे ख़लील 
सुन रहे हो मेरी आवाज़ तुम 
या नहीं…….
मैं सलमा हूँ
तुम्हारी सलमा 
सलमा करामी
तुम्हारे प्यार ने दुबारा धरती पर आने को मजबूर कर दिया मुझे 
उस बिशप ने मुझे तुम्हारी पत्नी बनने दिया 
यह एक तरह से अच्छा ही हुआ 
नहीं तो तुम सिर्फ़ मेरे ख़लील ही रह जाते
ख़लील जिब्रान बन पाते 
मैं उस बिशप के भतीजे की पत्नी बनी ज़रूर 
पर मेरे दिल में हमेशा तुम्हारी तस्वीर रही 
जिब्रान बनकर तुमने कहा था -
"प्रेम जब भी तुम्हे पुकारे, उसके पीछे चल पड़ो,
यद्यपि उसके रास्ते बीहड़ और दुर्गम हैं."
और तुम्हारी इस अनंत पुकार पर 
चल पड़ी मैं 
प्रेम के बीहड़ और दुर्गम रास्ते पर 
और पहुंची यहाँ तक
तुमने कहा था
"यह कभी मत सोचो कि तुम प्रेम का मार्गदर्शन कर सकते हो,
यदि तुम सुपात्र हो तो प्रेम स्वयं ही तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा."
और आज भी 
मेरा मार्गदर्शन कर रही हैं तुम्हारी प्रेम सम्बन्धी बातें .
तुमने उसी ज़माने में फिर कहा-
"प्रेम किसी पर आधिपत्य नहीं जमाता
और ही किसी के आधिपत्य को स्वीकार करता है 
प्रेम के लिए प्रेम ही पर्याप्त है."
और मैंने तोड़ डाले सारे बंधन आधिपत्यों के 
और इतने युगों के बाद वापस आयी हूँ धरती पर
तुम्हारे और 
सिर्फ़ तुम्हारे लिए.
अपने हिसाब से तुमने कभी अपने प्रेम को मेरे पैरों में 
बेड़ियों की तरह नहीं पहनाया 
तुमने मेरे मन का प्याला प्रेम से इतना भर डाला कि
आज भी तुम्हारे प्रेम के बीज जीवित हैं 
मेरे मन में
मेरे शरीर में
मेरे हृदय में आज भी चटक रही हैं तुम्हारे प्रेम की  कलियाँ 
और इन कलियों की खुशबू से महक रही हैं मेरी साँसें .
आज भी मैं मना रही हूँ खुशियाँ 
और 
मौसम की अलमस्त बहारों से गुज़रते वक़्त 
हमेशा मेरे साथ होते हो तुम 
और जब शरद में चुनते हो अंगूर 
मदिरा बनाने के लिए
मदिरा बनकर मैं ही भर जाती हूँ अनंत के पात्रों में संचित होकर.
सर्दियों में जब भी निकालते हो उस मदिरा को पीने के लिए 
तो हर प्याले के लिए तुम्हारे हृदय में होता है एक गीत 
जिसमें विद्यमान होती है 
शरद की 
अंगूर की 
अंगूर के बगीचे की 
निचुड़ते हुए रस की और 
मेरी मधुर स्मृतियाँ ....

आज भी मेरी नज़रों से जब ओझल होते हो तुम 
घर से निकल कर काम पर जाने के लिए 
तो बन जाते हो वह बाँसुरी
जिसके हृदय  से गुज़रती है समय की साँस
हर पल 
और बदल जाती है 
एक अनहद संगीत में .
ज़िन्दगी को तुम समझते हो प्यार से 
और प्यार को श्रम के माध्यम से 
ज़िन्दगी को श्रम के माध्यम से प्यार करते हुए ही 
जान लेते हो तुम बारीक़ी से 
उसके अन्तरंग रहस्यों को 
और 
बतला देते हो मुझे भी 
प्रेम से प्रेरित कर्म का रहस्य 
जहाँ,
जब इंसान ख़ुद से ख़ुद  को बांधता है और
एक-दूसरे से बांधता है तो 
वह स्वयं को ईश्वर से बांधता है

तुम बतलाते हो प्रेम से प्रेरित कर्म की परिभाषा :-
"यह अपने हृदय से खींचकर काते गए सूत से कपड़ा बुनना है,
मानो तुम्हारी प्रेयसी ही पहननेवाली हो उसे ."
"यह इतने प्यार से भवन का निर्माण करना है,
मानो तुम्हारी प्रेयसी ही रहनेवाली हो वहाँ."
"यह इतनी कोमलता से बीज बोना 
और इतने आनंदित होकर फलों का संचय करना है ,
मानो तुम्हारी प्रेयसी ही खानेवाली हो वे फल."
"यह अपने हाथों किये गए प्रत्येक कर्म को 
अपनी दिव्यता की ऊर्जा से भर देना है ."
"और ऐसा महसूस करना है, मानो समस्त निर्जीव सत्ताएँ
तुम्हारे आस-पास खड़ी तुम्हारे कर्मों को निहार रही हैं ."

तुमने बुने मेरे लिए अपने प्रेम के सूत से 
पारंपरिक और आधुनिक झीने परिधान 
तुमने बनाये मजदूर बनकर मेरे लिए 
ख़ूबसूरत डुप्लेक्स फ्लैट 
तुमने तब लगाई थी जो बोनसाई आमों की 
वो दे रही है तब से अबतक फल सिर्फ़ मेरे लिए 
और तुमने सचमुच भर दी इतनी दिव्य ऊर्जा मेरी रूह में 
कि  मैं रोक ही नहीं पायी अपने आप को 
वापस धरती पर आने से 
और सचमुच सभी आधिपत्यों का विरोध कर 
मेरा यहाँ आना 
निहारती रह गयी सारी सजीव और निर्जीव सत्ताएँ


अब जब मैं वापस आयी हूँ तुम्हारे लिए
तुमने बदल डाला है पवन के स्वरों को एक गीत में 
और 
प्रगाढ़ कर डाला है अपने प्रेम से उस गीत की मिठास को 
तुमने प्रेम को कर्म के रूप में दृष्टिगोचर  बनाकर 
वर्षों पहले कही अपनी ही बात की 
कर डाली है पुनर्व्याख्या 
एक नए तरीके से.
तुमने मुझे कर डाला है इस बार 
स्थिर , संतुलित और अडिग 
क्योंकि इस बार मैं होकर आयी हूँ ख़ाली
तुमने मुझे कर डाला है 
नग्न और निर्बाध 
मेरे ही अंगों से .
कर डाला है मुक्त 
मेरे ही दोहरे व्यक्तित्व से.
कर डाला है मौन अपनी ही तरह 
जो मेरे दिनों और रातों के रहस्य का ज्ञाता है.
तुम छू रहे हो अब भी 
मेरे स्वप्नों की नग्न काया
अपनी काँपती,थरथराती उँगलियों से 
और आज भी पैदा कर रहे हो मुझमें वही सिहरन 
प्रेम का वही रोमांच 
जो कभी सदियों पहले पैदा किया था.
तुमने जगा दिए हैं मेरी आत्मा के अदृश्य जलस्रोत 
जो कल- कल ध्वनि के साथ सदियों से अबतक 
मिल रहे हैं तुम्हारे प्यार के समंदर में.
तुम अब भी, अनायास ही शामिल हो जाते हो
मेरे हृदय की छोटी - छोटी ख़ुशियों के ओस - कणों में,
मेरी खिलखिलाहटों में,
मेरे आँसुओं में,
मेरी वेदना, मेरी पीड़ा में भी 
महसूस करती हूँ मैं कि
तुम दुबारा से जी उठे हो मेरे होंठों में 
मेरे वर्तमान में 
स्मृति - विभोर होकर मैं कर रही हूँ आलिंगन अतीत का 
और 
प्रेमातुर होकर भविष्य का 
एकाकार हो रही हूँ तुम्हारी आत्मा के साथ 
तुम्हारी आकांक्षाओं, तुम्हारी अनुभूतियों और 
तुम्हारी अनंत सत्ता के साथ 
हम अभिन्न हैं 
आज भी 
सरिता और सागर की तरह 
है ख़लील....
बोलो....?



प्रेम के लिए 
                                                                                 

याद है कुँवर नारायण 
तुमने कहा था 
मैं मुसलमानों से नफ़रत करने चला 
तो ग़ालिब सामने  गए
मैं अंग्रेज़ों से नफ़रत करना चाहता था 
मगर हर बार शेक्सपीयर सामने जाते थे.

मैं जानती हूँ 
तुम्हारे भी जीवन का सार या सारांश है मुहब्बत 
जहाँ कोई सरहदें,बाड़े या काँटे के तार नहीं 
कबूतरों की परवाज़ है बस 
जहाँ बादलों के रथ में एक छोटी-सी 
चाँदी की कश्ती पर बैठी अप्सरा
समाप्त होने वाले प्रेम का उजाला 
चुपके से उछालती रहती है तुम्हारी ओर

जानती हूँ
अपनी कविताओं से ऐसे ही प्रेम का सन्देश
बाँचते रहे हो तुम भी 
लेकिन प्रेम के एहसास से पहले 
तुम्हारी कविता में एक शब्द नफ़रत का भी आया है 
कैसे जन्मा होगा यह शब्द
तब कितना तड़पे होगे तुम 
वाजश्रवा के बहाने जो प्रेम की लौकिकता के दर्शन 
बींधता रहा हो
वहाँ कैसे हो सकता है कोई भी स्थान 
किसी भी तरह के नफ़रत के लिए 
चलो कुछ देर के लिए प्रेम को एक ओर रखते हैं
आरंभ करते हैं नफ़रत से एक संवाद  
सोचती हूँ
कोई भी व्यक्ति नफ़रत करना चाहता ही क्यों है,
क्यों जन्मा है यह शब्द ?

क़ुदरत की हसीन चाँदनी के शिकारे में
नीले आसमान के नीचे थिरकते 
पानी पर बहते शिकारे में 
जैसे हर बार तलाश कर लेती हूँ 
प्रेम की हज़ारों सीपियाँ 

मेरे जीवन का एक-एक शब्द है प्रेम
ठीक वैसे ही
जैसे 
मेरी कविता का एक-एक शब्द है प्रेम 
जैसे एक के बाद दूसरा शब्द
जलालुद्दीन रूमी के शब्दों में कहूँ
तो प्रेम की बाँसुरी बन जाती है 
मेरी कविता की हर पंक्ति 
अपनी दूसरी पंक्ति को 
प्रेम से चुम्बन देती है
और शायद कविता का अंतिम शब्द लिखे जाने तक प्रेम
शरीर और आत्मा के सारे चमत्कारों को तोड़कर 
नए प्रतीकों की चादर बिछाता है
नए अलंकारों के फूल उस चादर पर सजाता है
और नई उपमाओं में किसी नव-दंपत्ति की तरह 
एक-दूसरे से लिपट कर सो जाता है.

मैं प्रेम के बिना जी ही नहीं सकती
जैसे यह कहूँ कि प्रेम के बिना कुछ भी नहीं कर सकती .
सुबह,सूर्य की पहली रूमानी किरणों के आँखों में पड़ने तक
और 
मेरे चादर फेंकने से उठने तक 
केवल प्रेम की ही जलकुम्भियाँ होतीं हैं मेरी मुट्ठी में.
दफ़्तर छोड़ने, घर को लौटने और
शातिर सड़क की चहल-पहल में
केवल प्रेम भरे सपने देखती हूँ मैं.
मेरे लिए प्रेम का कोई आरंभ नहीं है
और ही कोई अंत
और प्रेम से कम या प्रेम से ज़्यादा भी कुछ नहीं मेरे लिए
मेरे लिए जीवन भी प्रेम है 
और मृत्यु भी 
एक अनदेखी मौत 
जिसे मैं स्वयं भी देख नहीं सकूँगी कुँवर नारायण 
एक अनदेखी सिहरन की गुफाओं में उतर रही हूँ 
शून्य में
तब भी केवल प्रेम है 
बेहद अन्धकार में
या शून्य में डूबते सन्नाटे में



 और दो प्रेम कविताएँ
                                         

.

तुम बेहद उदास मौसम में 
फूलों का तोहफ़ा लेकर आए मेरे लिए 
ख़ासतौर पर तब 
जब मेरे दिलो-दिमाग़ पर छा गया था पतझड़ 
मैं अपनी देह में अपने समस्त पतझड़ के साथ सिमटी हुई 
जैसे रास्ता भूल गई थी 
भूल गई थी कि जीना क्या है...
जीवन अपनी ढेर सारी चुनौतियों में 
साँप, सीढ़ी और कुआँ कैसे बन जाता है.

अपने जागते वजूद में 
किसी भी तरह की अग्नि के प्रवेश को रोकती थी मैं 
दमन करती थी अपनी नाग-इच्छाओं का 
अलमस्त दोपहरिया या रात्रि के निःशब्द सन्नाटे में 
भीगे आसमान की चादर को देखते हुए 
तपते कमान-सी देह में 
ढेरों पतझड़ रखकर स्वयं को भूल जाती थी मैं 
फिर सुबह के निर्मम उजाले में निकल पड़ती थी
दमित इच्छाओं के साथ 
नंगे पाँव किसी अनजान सड़क पर.

तुमने मुझे बताया कि 
प्रेम केवल प्रेम नहीं होता 
एक शब्द नहीं होता 
सिर्फ़ एक ख़ुशनुमा एहसास भी नहीं होता प्रेम 
एक जीती-जागती कविता है प्रेम
संगीत के सातों सुर और राग होते हैं प्रेम में.

एहसास कराया तुमने कि 
देह केवल देह नहीं होती 
एक 'अज्ञातवास' होता है देह में
देह से जोड़कर लिखी जा सकती है दुनिया की सबसे सुन्दर कविता...सबसे सुन्दर आसमानी आयत.

अब मैं अपनी देह में देने लगी हूँ जगह एक 'अज्ञातवास' को 
भीगे बादलों के अद्भुत संसार में 
नीले काग़ज़ पर लिखने लगी हूँ 
दुनिया की सबसे भावुक कविता
पतझड़ को रख आई हूँ 'अज्ञातवास' में 
अचानक तुम्हे ओढ़कर मैं 'तुम' बन गई हूँ
या फिर एक उड़नपरी 
और अब...अब...तुम्हारी समस्त ऊर्जा और प्रेम को अपने पंखों में चिपकाए 
तुम्हारे प्रेम की बारिश में भीगी एक तितली.

.

हाँ, चमत्कार कर सकता है प्रेम 
अनंत चमत्कार 
एक कभी ख़त्म होने वाला जादू है प्रेम 
यह तुम्हीं ने समझाया.

ग्लोबल गाँव के घने सन्नाटे और इक्कीसवीं शताब्दी के घने कोहरों में 
जहाँ केवल जाग रहा था आतंक और 
हत्या कर दी गई थी प्रेम की समस्त परिभाषाओं की  
तुम आए 
तुम्हारा स्वागत 
सन्नाटे और गहन एकांत में जलाए तुमने 
प्रेम के बुझने वाले दीपक 
मेरे वजूद को विशाल कर दिया हिमालय की तरह ...ऊर्जावान, तटस्थ 
बताया कि सचमुच चमत्कार कर सकता है प्रेम
अपनी उँगलियों के पोरों में बसा ली तुमने मेरे बीमार देह की महक
अपने अस्तित्व में समेट लिए तुमने
मेरे पास शेष रह गए मृत्यु के कुछ क्षण 
होठों के फूल में छिपा ली मेरी चुभन 
खोल दी प्रेम की बारिश 
भीगने दिया मुझे अनंत गहराईयों तक 
इस बारिश ने मुझे ज़िंदा कर दिया है दुबारा 
फिर-फिर जी  उठी  हूँ मैं 

अपने प्रेम की बारिश से 
तुम मुझे जीवित कर रहे हो सिर्फ़ 
या दे रहे हो एक नया जन्म 
या फिर.... कोई चमत्कार कर रहे हो तुम
मैं चमत्कृत हूँ.

तुमने शब्दों को
बेहद उदास होते बोझल शब्दों को 
प्रेम, देह और चमत्कार का रास्ता सुझाया 
तुम्हारा स्वागत.

13 comments:

Vimal Chandra Pandey ने कहा…

जानती हूँ
अपनी कविताओं से ऐसे ही प्रेम का सन्देश
बाँचते रहे हो तुम भी
लेकिन प्रेम के एहसास से पहले
तुम्हारी कविता में एक शब्द नफ़रत का भी आया है
कैसे जन्मा होगा यह शब्द
तब कितना तड़पे होगे तुम
वाजश्रवा के बहाने जो प्रेम की लौकिकता के दर्शन
बींधता रहा हो
वहाँ कैसे हो सकता है कोई भी स्थान
किसी भी तरह के नफ़रत के लिए
चलो कुछ देर के लिए प्रेम को एक ओर रखते हैं
आरंभ करते हैं नफ़रत से एक संवाद
सोचती हूँ
कोई भी व्यक्ति नफ़रत करना चाहता ही क्यों है,
क्यों जन्मा है यह शब्द ?.....behtareen, bhitar tak bhigone wali kavitayen ! padh kar lagta hai ki haan ham bhi to yahi kahna chahte the Neruda se Kunwar ji se....bahut badhai aap donon ko

Anand Dwivedi ने कहा…

वाह ! यह हैं प्रेम कवितायें यह है प्रेम दर्शन... मेरा सौभाग्य कि मैं मंजरी जी को एक बार साक्षात सुन चुका हूँ पर उनकी गहनता का भान मुझे आज ही हुआ है ... असुसिधा और अशोक जी, कमाल का चयन है आभारी हूँ आज की कविताओं के लिये !

Vandana KL Grover ने कहा…

एक युवा की लेखनी की परिपक्वता अद्भुत और बेजोड़ है .. मंजरी रूह तक पहुंची हैं अपने विषय के ..और उनकी रचनाएं भी रूह तक पहुँचती हैं ..

बेनामी ने कहा…

एक युवा की लेखनी की परिपक्वता अद्भुत और बेजोड़ है .. मंजरी रूह तक पहुंची हैं अपने विषय के ..और उनकी रचनाएं भी रूह तक पहुँचती हैं ..

' मिसिर' ने कहा…

अद्भुत कवितायेँ ! प्रेम पर एक दार्शनिक मीमांसा प्रस्तुत करती है कवितायेँ ! बधाई मंजरी जी को !

दीपक 'मशाल' ने कहा…

बहुत बढ़िया... सच है खलील जिब्रान की 'ब्रोकेन विंग्स' एक अलग ही दुनिया में ले जाती है.. यही उनके दूसरे लघुउपन्यासों के साथ भी है... नेरुदा की प्रेम कवितायें तो क्या लाजवाब हैं, उनकी एक कविता 'गर तुम भूल जाओ मुझे(हिन्दी अनुवाद)' को मैंने भी हिन्दी में बदला है. मंजरी की कवितायें हिन्दी कविता के सुनहरे भविष्य के लिए इंश्योरेंस पॉलिसी की तरह हैं. आभार आपको, उनको शुभकामनाएं.

mannkikavitaayein ने कहा…

शुक्रिया अशोक जी, आपकी वज़ह से असुविधा पर कविता के मर्म को समझने वाले गुणी पाठकों से मैं रूबरू हो सकी.आपने मेरी कृति को सराहा, ज़र्रानवाज़ी का शुक्रिया.उम्मीद है ये मोहब्बत बनी रहेगी. मंजरीशुक्रिया अशोक जी, आपकी वज़ह से असुविधा पर कविता के मर्म को समझने वाले गुणी पाठकों से मैं रूबरू हो सकी.आपने मेरी कृति को सराहा, ज़र्रानवाज़ी का शुक्रिया.उम्मीद है ये मोहब्बत बनी रहेगी. मंजरी

shesnath pandey ने कहा…

यक़ीन है मुझे
जीवित हो अब भी तुम कल की राख़ में
और अगर हो गए हो मृत
तो भी जन्म लोगे
कल की राख़ से.

दीपक अरोड़ा ने कहा…

बहुत सुंदर ,बहुत गहरी ..........आत्मा की गहराई से निकली एक चमत्कृत करती कविता . कवि को इससे बेहतर समर्पण क्या होगा ....जो कोई उसकी काव्य रचना पर यूँ विस्तार से लिखे . प्रभावित किया ......भीतर तक .बधाई।

दीपक अरोड़ा ने कहा…

बहुत सुंदर ,बहुत गहरी ..........आत्मा की गहराई से निकली एक चमत्कृत करती कविता . कवि को इससे बेहतर समर्पण क्या होगा ....जो कोई उसकी काव्य रचना पर यूँ विस्तार से लिखे . प्रभावित किया,भीतर तक .बधाई।

mridula pradhan ने कहा…

badi khoobsurti ke sath likhi hai......bahot sunder....

lalitya lalit ने कहा…

sundar kavita manjari,badhai.

lalitya lalit ने कहा…

sundar kavita,badhai.manjari ji.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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