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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

जनतंत्र में कचहरी मृगतृष्णा है गरीब की - जितेन्द्र श्रीवास्तव की ताज़ा कवितायें


जितेन्द्र श्रीवास्तव की ये ताज़ा कवितायेँ कुछ दिनों पहले मेल से मिलीं. उनकी कविताओं से मेरा नाता पुराना है - गोरखपुर के दिनों का. बहुत जल्दी शुरू करके और लगातार बहुत अच्छा लिखते हुए वह अब उस मुकाम पर हैं जहाँ परिचय देने की आवश्यकता नहीं होती. स्मृति उनकी कविताओं का हमेशा से एक बड़ा स्रोत रही है. अपने गाँव-क़स्बे को लगातार अपनी कविताओं में संजोते हुए उन्होंने उनसे अपने समय की बड़ी और व्यापक विडम्बनाओं के पर्दाफ़ाश की कोशिश की है. यहाँ भी एक पूर्व राजघराने की कोठी के मैदान के सार्वजनिक स्थल से निजी संपत्ति में तब्दील होने का जो एक दृश्य उन्होंने खींचा है वह हमारी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का एक बड़ा बिम्ब प्रस्तुत करता है. असुविधा पर उनका स्वागत   

चुप्पी का समाजशास्त्र

उम्मीद थी 
मिलोगे तुम इलाहाबाद में
पर नहीं मिले

गोरखपुर में भी ढूँढा
पर नहीं मिले

ढूँढा बनारस, जौनपुर, अयोध्या, उज्जैन, मथुरा, हरिद्वार
तुम नहीं मिले

किसी ने कहा
तुम मिल सकते हो ओरछा में
मैं वहां भी गया
पर तुम कहीं नहीं दिखे

मैंने बेतवा के पारदर्शी जल में
बार-बार देखा
आँखे डुबोकर देखा
तुम नहीं दिखे

तुम नहीं दिखे
गढ़ कुण्ढार के खँडहर में भी

मैं भटकता रहा
बार-बार लौटता रहा
तुमको खोजकर
अपने अँधेरे में

न जाने तुम किस चिड़िया के खाली खोते में
सब भूल-भाल, सब छोड़-छाड़
अलख जगाये बैठे हो

ताकता हूँ हर दिशा में
बारी-बारी चारो ओर
सब चमाचम है

कभी धूप कभी बदरी
कभी ठंढी हवा कभी लू
सब अपनी गति से चल रहा है

लोग भी खूब हैं धरती पर
एक नहीं दिख रहा है
इस ओर कहाँ ध्यान है किसी का
पैसा पैसा पैसा
पद प्रभाव पैसा
यही आचरण
दर्शन यही समय का

देखो न बहक गया मैं भी
अभी तो खोजने निकलना है तुमको
और मैं हूँ
कि बताने लगा दुनिया का चाल-चलन

पर किसे फुर्सत है
जो सुने मेरा अगड़म-बगड़म
किसी को क्या दिलचस्पी है इस बात में
कि दिल्ली से हज़ार किलोमीटर दूर
देवरिया जिले के एक गाँव में
सिर्फ एक कट्ठे ज़मीन के लिए
हो रहा है खून-खराबा पिछले कई वर्षों से

इन दिनों लोगों की खबरों में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी है
वे चिंतित हैं अपनी सुरक्षा को लेकर
उन्हें चिंता है अपने जान-माल की
इज्ज़त, आबरू की

पर कोई नहीं सोच रहा उन स्त्रियों की
रक्षा और सम्मान के बारे में
जिनसे संभव है
इस जीवन में कभी कोई मुलाक़ात न हो

हमारे समय में निजता इतना बड़ा मूल्य है
कि कोई बाहर ही नहीं निकलना चाहता उसके दायरे से
वरना क्यों होता
कि आज़ाद घूमते बलात्कारी
दलितों-आदिवासियों के हत्यारे
शासन करते
किसानों के अपराधी

सब चुप हैं
अपनी चुप्पी में अपना भला ढूंढते
सबने आशय ढूंढ लिया है जनतंत्र में
अपनी-अपनी चुप्पी का

हमारे समय में
जितना आसान है उतना ही कठिन
चुप्पी का भाष्य

बहुत तेजी से बदल रहा है परिदृश्य
बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं निहितार्थ

वह दिन दूर नहीं
जब चुप्पी स्वीकृत हो जायेगी
एक धर्मनिरपेक्ष धार्मिक आचरण में

पर तुम कहाँ हों
मथुरा में अजमेर में
येरुशलम में मक्का मदीना में
हिन्दुस्तान से पाकिस्तान जाती किसी ट्रेन में
अमेरीकी राष्ट्रपति के घर में
कहीं तो नहीं हो

तुम ईश्वर भी नहीं हो
किसी धर्म के
जो हम स्वीकार लें तुम्हारी अदृश्यता

तुम्हें बाहर खोजता हूँ
भीतर डूबता हूँ
सूज गयी हैं आखें आत्मा की

नींद बार-बार पटकती है पुतलियों को
शिथिल होता है तन-मन-नयन
यदि सो गया तो
फिर उठना नहीं होगा
और मुझे तो खोजना है तुम्हें

इसीलिए हारकर बैठूंगा नहीं इस बार
नहीं होने दूंगा तिरोहित
अपनी उम्मीद को

मैं जानता हूँ
खूब अच्छी तरह जानता हूँ
एक दिन मिलोगे तुम ज़रूर मिलोगे
तुम्हारे बिना होना
बिना पुतलियों की आँख होना है
  

 तमकुही कोठी का मैदान 

 तमकुही कोठी निशानी होती 
महज सामन्तवाद की 
तो निश्चित तौर पर मैं उसे याद नहीं करता 

यदि वह महज आकांक्षा होती
 
अतृप्त दिनों में अघाए दिनों की 
तो यक़ीनन मैं उसे याद नहीं करता 

मैं उसे इसलिए भी याद नहीं करना चाहता
 
कि उसके खुले मैदान में खोई थी मेरी प्राणों से प्यारी मेरी साइकिल
सन उन्नीस सौ नवासी की एक हंगामेदार राजनीतिक सभा में 

लेकिन मैं उस सभा को नहीं भूलना चाहता
 
मैं उस जैसी तमाम सभाओं को नहीं भूलना चाहता
 
जिनमें एक साथ खड़े हो सकते थे हज़ारों पैर 
जुड़ सकते थे हजारों कंधे 
एक साथ निकल सकती थीं हज़ारों आवाजें 
बदल सकती थीं सरकारें 
कुछ हद तक ही सही 
पस्त हो सकते थे निजामों के मंसूबे

मैं जिस तरह नहीं भूल सकता अपना शहर 
उसी तरह नहीं भूल सकता
तमकुही कोठी का मैदान 

वह सामंतवाद की क़ैद से निकलकर 
कब जनतंत्र का पहरुआ बन गया 
शायद उसे भी पता न चला 
ठीक-ठीक कोई नहीं जानता 
किस दिन शहर की पहचान में बदल गया वह मैदान 

न जाने कितनी सभाएं हुईं वहां 
न जाने किन-किन लोगों ने की वहां रैलियाँ 
वह जंतर-मंतर था अपने शहर का 

आपके भी शहर में होगा या रहा होगा 
कोई न कोई तमकुही कोठी का मैदान 
एक जंतर-मंतर 

सायास हरा दिए गए लोगों का आक्रोश 
वहीँ आकार लेता होगा 
वहीँ रंग पाता होगा अपनी पसंद का 

मेरे शहर में 
जिलाधिकारी की नाक के ठीक नीचे 
इसी मैदान में रचा जाता था 
प्रतिरोध का सौन्दर्य शास्त्र 

वह ज़मीन जो कभी ऐशगाह थी सामंतों की 
धन्य-धन्य होती थी 
किसान-मजूरों की चरण धूलि पा 

समय बदलने का 
एक जीवंत प्रतीक था तमकुही कोठी का मैदान 
लेकिन समय फिर बदल गया 
सामंतों ने फिर चोला बदल लिया 

अब नामोनिशान तक नहीं है मैदान का 
वहां कोठियां हैं फ्लैट्स हैं 
अब आम आदमी वहीं बगल की सड़क से 
धीरे से निकल जाता है 
उस ओर
जहाँ कचहरी है 

और अब आपको क्या बताना 
आप तो जानते ही हैं 
जनतंत्र में कचहरी मृगतृष्णा है गरीब की 


  


11 comments:

mithilesh kumar ray ने कहा…

जीतेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ समय की चिंता को रेखांकित कराती है जो विरल है ...

' मिसिर' ने कहा…

बहुत अच्छी कवितायेँ ! अपने समय को सहज,सरल शब्दों में प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं ये ! जितेन्द्र जी को बधाई और अशोक जी का आभार !

Jitendra Srivastava ने कहा…

धन्यवाद अशोक.पहली कविता में एक पंक्ति इस तरह पढ़ी जानी चाहिए- उन्हें चिंता है अपने जान -माल की /इज्ज़त,आबरू की

और दूसरी कविता में अंत से ठीक पहले की पंक्तियाँ हैं-अब आम आदमी वहीं बगल की सड़क से /धीरे से निकल जाता है /उस ओर/जहाँ कचहरी है

प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा.

Jitendra Srivastava ने कहा…

धन्यवाद अशोक.पहली कविता में एक पंक्ति इस तरह पढ़ी जानी चाहिए- उन्हें चिंता है अपने जान -माल की /इज्ज़त,आबरू की

और दूसरी कविता में अंत से ठीक पहले की पंक्तियाँ हैं-अब आम आदमी वहीं बगल की सड़क से /धीरे से निकल जाता है /उस ओर/जहाँ कचहरी है

प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा.

Mahesh Chandra Punetha ने कहा…

मैं तो जीतेन्द्र भाई की कविताओं का पुराना प्रशंसक हूँ पिछले दिनों उनके तीन संग्रहों को पढ़ने का अवसर मिला .अच्छा लगा . ये कवितायेँ पिछली कविताओं से आगे की कवितायेँ हैं.

दिगंबर आशु ने कहा…

बहुत बढ़िया, खास कर तमकुही कोठी मैदान वाली.

बेनामी ने कहा…

मैंने बेतवा के पारदर्शी जल में
बार-बार देखा
आँखे डुबोकर देखा
तुम नहीं दिखे

कविता पढ़ी, किन्‍तु जब पारदर्शी जल है तो ऑंखें डुबोकर देखने की जहमत उठाने की क्‍या जरूरत थी भला ?

ओम निश्चल

Ashok Kumar Pandey ने कहा…

बेहद पसंद आयीं .....तम्कुही मैदान तो वर्तमान पर एक तल्ख़ बयाँ है


पंकज मिश्र

jeetendragupta ने कहा…

पारदर्शी जल में देखा......... फिर 'आंख डुबा कर देखा'
पंक्तियों के तर्क को समझने की ज़रूरत है। मेरा ख्याल है कि कवि अपनी तरफ से 'देखने' की अपनी क्रिया को अधिक संघनित करते जाने को व्यक्त कर रहा है, यानि कही उससे देखने में चूक तो नहीं हो रही है, इसीलिए आंख डुबाने की ज़रूरत भी पड रही है।
मेरा ख्याल है ओम जी अब कवि की ज़हमत समझ में आ गई होगी।

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

मैंने दोनों कविताएं बहुत ध्‍यान से पढ़ीं...प्रभावित हुआ। आगे चलकर जितेन्‍द्र की कविता-यात्रा का प्रस्‍थान बिंदु साबित हो सकती हैं ये कविताएं। मैं इन कविताओं को एक वाक्‍य में प्रस्‍तुत की जा सकने वाली प्रशंसा से आगे भी पढ़ पा रहा हूं। यहां चीज़ें और जितेन्‍द्र का उनसे पेश आने का तरीका बदल रहा है, जिस पर मेरी सीधी नज़र है। मुझे अब जितेन्‍द्र की ऐसी कविताओं का धीरज भर इन्‍तजार होगा।
***
भाई ओम निश्‍चल जी का तर्क भी लाजवाब कर देने वाला लगा है।
***
असुविधा को शुक्रिया।

बेनामी ने कहा…

Nice

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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