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रविवार, 30 दिसंबर 2012

तोतापन, काव्यधर्मिता और रघुवीर सहाय


रघुबीर सहाय की काव्य-धर्मिता
·                     उमेश चौहान



रघुबीर जी आज जीवित होते तो हिन्दी के तमाम शीर्षस्थ कवियों के हमउम्र होते और श्रेष्ठतम समकालीन कवि होते। मृत्यु के उपरांत भी कविता की समकालीनता की दृष्टि से उन्हें आज का श्रेष्ठतम कवि माना जा सकता है। समय-समय पर तमाम आलोचकों ने इस बारे में अपने विचार रखे हैं कि रघुबीर सहाय जी ने कवि-कर्म को किस रूप में देखा, कविता लिखने के बारे में उनकी धारणा या मान्यता क्या थी, उन्होंने अपनी धारणा के अनुरूप गढ़े इस कवि-धर्म को किस प्रकार से साधा और काव्य-धर्मिता से जुड़ी अपनी पंक्तियों के माध्यम से वे कैसे कवियों को भी राह दिखाने वाले एक महत्वपूर्ण कवि बन गए। रघुबीर जी एक जाने-माने पत्रकार व संपादक भी थे अतः अपनी कविताओं में उन्होंने एक पत्रकार की आदत के मुताबिक कविता के बैक स्टेज की भी खूब पड़ताल की और उसकी विसंगतियों तथा दुष्प्रवृत्तियों को उजागर करते हुए उन्होंने काव्य-रचना के उजले संसार में प्रवेश करने के अनेकों द्वार खोले हैं। यहाँ एक नितान्त पाठकीय दृष्टिकोण के साथ रघुबीर जी की काव्य-धर्मिता के बारे में कुछ बातों पर पुनर्विचार किया जा रहा है।

उनकी कविताएँ प्रायः भविष्य की खबरें लेकर आती-सी लगती थीं। वे भारतीय लोकतंत्र की दुरवस्था के प्रति भी सजग थे। जैसा कि एक सच्चे पत्रकार में होता है, देश-काल की चिन्ता उनकी कविताओं का प्रमुख तत्व थी। वे अपने संपादकीय वक्तव्यों में भी कहीं न कहीं अपने भीतर बैठे कवि की बातों को अभिव्यक्त कर रहे होते थे। वे समय से आगे निकलकर विषयों की पड़ताल करते हुए उनमें समकालीन परिस्थितियों के प्रति ही नहीं, भविष्य की कठिनाइयों के बारे में भी पूर्वाभास कराते चलते थे। लिखने का कारण शीर्षक लेख में उन्होंने खुद लिखा है, - पत्रकार के लिए यथार्थ वही है जो संभव हो चुका है। साहित्यकार के लिए वह है जो संभव हो सकता है। वे एक भविष्यदृष्टा कवि थे और अपनी आत्महत्या के विरुद्ध शीर्षक कविता में उन्होंने खुद इस बात की शिनाख़्त इन शब्दों में की है, - समय आ गया है जब तब कहता है संपादकीय/ हर बार दस बरस पहले कह चुका होता हूँ कि समय आ गया है

रघुबीर जी का स्पष्ट मानना था कि कविता को सिर्फ निराशा या नकारात्मकता से ही भरा हुआ नहीं होना चाहिए। आशा, जिजीविषा, मनुष्यत्व की जीत एवं शुभाप्ति-विश्वास ही कविता का लक्ष्य होना चाहिए। उनकी खोज-खबर शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ इसे बखूबी स्पष्ट करती हैं, - यह तुमने क्या लिखा झुर्रियाँ, उनके भीतर छिपे उनके प्रकट होने के आसार, - आँखों में उदासी-सी एक चीज़ दिखती है यह तुमने मरने से पहले का वृत्तांत क्यों लिखा?

वे कविता को सिर्फ शब्दों का आडंबर बना देने के पक्ष में कतई नहीं थे। उनका मानना था कि कविता को जीवंतता से भरा होना चाहिए। उसमें जीवन का प्रवाह होना चाहिए। नैसर्गिकता होनी चाहिए। और सबसे बड़ी बात तो यह कि कविता को सरल होना चाहिए। अपनी आज फिर शुरू हुआ शीर्षक कविता में वे कहते हैं, आज फिर शुरू हुआ जीवन/ आज मैंने छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी/ आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा। यह जो सूरज को देर तक डूबते हुए देखना है, यही वह प्रक्रिया है, जिसमें कविता अनुभव की आँच में धीरे-धीरे पकती है। घट रही घटनाओं का सूक्ष्म-दर्शन एवं दीर्घावलोकन ही किसी जीवन्त कविता को जन्म दे सकता हैं।

किन्तु यह सूक्ष्म-दर्शन किस भावना के साथ किया जाता है, वह भी महत्वपूर्ण है। रघुबीर जी जब अपनी रचता वृक्ष कविता में कहते हैं, - देखो वृक्ष को देखो वह कुछ कह रहा है/ किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा है तो वे इसी भावनात्मक पक्ष की ओर इशारा करते हैं। यहाँ वे स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि नकारात्मकता कविता का लक्ष्य नहीं हो सकती। कविता में वह जिजीविषा होनी चाहिए जैसी पत्ते झड़ते रहने के बावजूद उस बोलते हुए वृक्ष में होती है। कविता में उम्मीद बची रहनी चाहिए। अवशेष को सँभालते हुए प्रगति की कोशिश होनी चाहिए। केवल पतन की आत्म-कथा नहीं।

यह आशा, यह जीने की चाह, यह परिवर्तन या प्रगति की आकांक्षा कहाँ से आती है? कैसे आती है? बकौल रघुबीर जी यह बाहर से आती है। यह विचारों को ग्रहण करने से आती है। यह अच्छे विचारों की ओर लपकने से आती है। उन्हें अपने में आत्मसात करने से आती है। धूप कविता की उनकी पंक्तियाँ देखिए, - देख रहा हूँ/ लम्बी खिड़की पर रक्खे पौधे/ धूप की ओर बाहर झुके जा रहे हैं। आगे वे इसी कविता में धूप के संचरण की बात करते हैं, - और बरामदे में धूप होना मालूम होता है/ जैसे ये बरामदे में धूप-सा कुछ ले आए हों

रघुबीर जी काल्पनिकता-जन्य क्षणिक भावुकता के सार्थक होने में यकीन नहीं रखते थे। बस एक कविता पढ़ी और रो पड़े! एक कहानी पढ़ी और विचलित हो गए! बाद में फिर वैसे के वैसे! कविता क्षणिक भावुकता जगाने वाली नहीं, स्थायी भाव की कारक होनी चाहिए, जिसे पढ़ने के बाद हमें बाहरी दुनिया की पीड़ा समझ में आने लगे और हम उसके यथार्थ के प्रति विचलित होने लगें। किताब पढ़कर रोना शीर्षक कविता में वे कहते हैं, - जो पढ़ता हूँ उस पर मैं नहीं रोता हूँ/ बाहर किताब के जीवन से पाता हूँ/ रोने का कारण मैं/ पर किताब रोना संभव बनाती है। यानी रुलाने वाली किताब से ज्यादा सार्थक होती है वह किताब, जो हमारे भीतर वैचारिक परिवर्तन ला दे, हमारा नज़रिया बदल दे ताकि हम यथार्थ की अनुभूति कर सकें और उस पर विचलित हो सकें।

चूँकि रघुबीर जी पत्रकार व संपादक थे, इसलिए वे अखबारी लेखन को भी बखूबी पहचानते थे। उसमें कितना सच होता है और कितना बनावटी, यह भी वे अच्छी तरह जानते थे। वे जानते थे कि वहाँ भी इस चमकदार दुनिया की चका-चौंध व्याप्त है। वहाँ यथार्थ का खुरदरापन नहीं है। वह इन्सानी चेहरों को गौर से देखने पर ही दिखेगा। वे चेहरा शीर्षक कविता में कहते हैं, - देखो सब चेहरों को देखो/ पहली बार जिन्हें देखा है/ उन पर नज़र गड़ाकर देखो/ तुमको ख़बर मिलेगी उनसे/ अख़बारों से नहीं मिलेगी। वे सौन्दर्य-बोध के पारंपरिक स्वभाव से संतुष्ट नहीं थे। वे नए सौन्दर्य-बोध के हिमायती थे क्योंकि पारंपरिक सौन्दर्य-बोध ने ही समाज का यह आज का अत्याचारी व आतंकपूर्ण वर्तमान गढ़ा है। वे इस कविता में आगे इसी बात की अभिव्यक्ति करते हैं, - कुछ चेहरों को हम सुन्दर क्यों कहते हैं/ क्योंकि वे ताक़तवर लोगों के चेहरों से दो हज़ार साल से/ मिलते-जुलते चले आ रहे हैं/ सुन्दर और क्रूर चेहरे मशहूर हैं दूर-दूर तक/ देसी इलाकों में। वे असली सौन्दर्य की पहचान के लिए सूक्ष्मतर दृष्टि रखने के पक्षधर थे। एक ऐसी दृष्टि जो हर चीज़ की अलग-अलग परख करा दे। अपनी इस कविता में वे आगे इसी सौन्दर्य-बोध का परिचय देते हैं, - सब चेहरे सुन्दर हैं/ पर सबसे सुन्दर है वह चेहरा/ जिसे मैंने देर तक चुपके से देखा हो/ इतनी देर तक कि मैंने उसमें और उसके जैसे/ एक और चेहरे में अन्तर पहचाना हो। तो मित्रो, यथार्थ के इस रघुबीरीय सूक्ष्म-दर्शन के बाद ही हम उस शाश्वत सौन्दर्य को पहचान सकते हैं जो हमें प्रगति के रास्ते पर ले जा सकता है।

रघुबीर जी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते हैं। जहाँ किसी बात के भिन्न-भिन्न अर्थ निकाले जा सकें, वैसा शब्द-जाल खड़ा करना उनका लक्ष्य नहीं था। वे जानते थे कि स्पष्टवादिता हुक्कामों को पसन्द नहीं आती। वह प्रायः दंडित कराती है। किन्तु फिर भी वे सीधी बात कहने में ही यकीन रखते थे। अपनी दो अर्थ का भय शीर्षक कविता में उन्होंने लिखा है, - वे मेरे शब्दों की ताक में बैठे हैं/ जहाँ सुना नहीं उनका गलत अर्थ लिया और मुझे मारा/ इसलिए कहूँगा मैं/ मगर मुझे पाने दो/ पहले ऐसी बोली/ जिसके दो अर्थ न हों

लेखन के बारे में नशे में दया कविता में वे एक बड़ी मज़ेदार बात करते हैं, - घर पे जाकर लिख के रख लूँगा जो मुझमें हो गया/ सोचकर मैं घर तो पहुँचा पर पहुँचकर सो गया। ऐसा हम सबके साथ होता है। यदि मन में कोई विचार आए, कोई भाव जागे और कुछ कविता जैसा छटपटाने लगे तो उसे उसी वक़्त लिख डालो तो लिख डालो, नहीं तो वह वहीं पर छूट जाता है, कहीं खो जाता है।

रघुबीर जी कविता लिखने के व्यक्तिगत प्रभावों की भी बड़ी अच्छी मीमांसा करते हैं। अक्सर कहा जाता है, अमुक तो कवि है, वह अपनी ही दुनिया में खोया रहता है। दूसरों से हिलता-मिलता नहीं। या फिर मेरे जैसे किसी कवि से, जो अपने अन्य कामों में व्यस्त रहता है, लोग अक्सर पूछते हैं, इतनी व्यस्तता के बीच कविता लिखने का समय कैसे निकाल लेते हो? इन सब बातों को समेटते हुए रघुबीर जी ने अपनी कविता शीर्षक रचना में कहा है, - कविता अकेला करती है/ और जब हम बहुत तरह के अन्य काम करते हैं तो/ उनसे कविता में बाधा इसलिए नहीं पड़ती/ कि वे दूसरे प्रकार के काम हैं/ बल्कि इसलिए कि वे हमेशा हमें बाध्य करते हैं/ कि हम दूसरों के साथ काम करें/ जबकि कविता अकेले ही काम करने का तकाजा करती है। कितना सच भरा है रघुबीर जी की इस सीधी-सरल कविता में! कविता अकेले में ही सृजित होती है। कविता रचते समय कवि केवल उसी के साथ जीता है। उस समय वह बिल्कुल अकेला होता है, भले ही उसकी कविता में पूरा संसार समाया हो, पूरी दुनिया की चिन्ताएँ ओत-प्रोत हों। कवि को यह अकेलापन अन्य तमाम व्यस्तताओं के बीच भी मिल ही जाता है भले ही वह उतनी देर के लिए औरों को अपने-आप में खोया-सा लगे।  

अब बात यह आती है कि कविता में लिखा क्या जाय? किन शब्दों में लिखा जाय? क्या वे शब्द कवि के पास हैं जिनसे उसे लिखना है? क्या जिन शब्दों में कवि लिख रहा है, उन्हें वह समझ पा रहा है, जिसके लिए कवि लिख रहा है? रघुबीर जी कुछ ऐसी ही जिज्ञासाओं के साथ अपनी लोग भूल गए हैं शीर्षक कविता में कहते हैं, हम उपन्यास में बात मानव की करेंगे/ और कभी बता नहीं पाएँगे/ सूखी टाँगें घसीटकर खम्भे के पास बैठे हुए लड़के के सामने पड़े हुए तसले का अर्थ/ हम लिखते हैं कि/ उसकी स्मृतियों में फ़िलहाल एक चीख़ और गिड़गिड़ाहट की हिंसा है/ उसकी आँखों में कल की छीनाझपटी और भागमभाग का पैबन्द इतिहास/ उसके भीतर शब्दरहित भय और जख़्मी आग है/ यह तो हम लिखते हैं, पर उस व्यक्ति में है जो शब्द, वे हम जानते नहीं/ जो शब्द हम जानते हैं, उसकी अभिव्यक्ति नहीं, विज्ञापन हमारा है

आज जब कविता इन्सानी सरोकारों को स्पर्श नहीं कर पा रही है और अन्याय के खिलाफ तनकर खड़ी नहीं हो पा रही है, तब उनकी आज की कविता शीर्षक रचना की ये पंक्तियाँ बड़ी समीचीन लगती हैं, - आतंक कहाँ जा छिपा भागकर जीवन से/ जो कविता की पीड़ा में अब दिख नहीं रहा? हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए/ जो कविता हम सबको लाचार बनाती है? यह कवियों के हत्यारों के साथ मिल जाने की जो आशंका है, वह समाज को लाचार बना देती है। समाज की यह लाचारी ही हमें जड़ बना देती है। आज इतना सारा लिखा जा रहा है। इतने सारे लोग लिख रहे हैं। लेकिन समाज रत्ती भर भी नहीं बदलता। यह क्या है? क्या कविता मर चुकी है? या क्या यह समाज ही मर चुका है, इसलिए कविता निष्प्रभावी हो गई है? इसी ऊहापोह को व्यक्त करती रघुबीर जी की आज का पाठ है कविता की ये पंक्तियाँ देखिए, जब एक महान संकट से गुज़र रहे हों/ पढ़े-लिखे जीवित लोग/ एक अधमरी अपढ़ जाति के संकट को दिशा देते हुए/ तब/ आप समझ सकते हैं कि एक मरे हुए आदमी को/ मसखरी कितनी पसन्द है। यह बखूबी बयान करता है उस परिदृश्य को, जो आज कविता के मंच को घेरे हुए है। आज हास-परिहास से बाहर निकलकर संजीदा बातें करने वाला कवि कविता के मंच से निष्कासित है।

आज लेखकीय समाज में भी चतुर सुजानों व स्वार्थी मक्कारों की कमी नहीं है। रघुबीर जी इससे बहुत आहत थे। उन्होंने अपनी स्वाधीन व्यक्ति कविता में ऐसे कागज़ी प्रगतिशील कवियों व मौकापरस्त लेखकों की तगड़ी खिंचाई की है। उनकी इस कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए, - बनिया बनिया रहे/ बाम्हन बाम्हन और कायथ कायथ रहे/ पर जब कविता लिखे तो आधुनिक हो जाये/ खीसें बा दे, जब कहो तब गा दे

कविता की छंद-मुक्ति के आंदोलन के चलते जब कविता मरने लगी तो ऐसे में उन्होंने छंद की खुलकर पैरवी की। लय को वापस लाने का आग्रह किया। अपनी अरे अब ऐसी कविता लिखो शीर्षक कविता में उन्होंने बड़ी मार्मिकता के साथ कहा, - अरे अब ऐसी कविता लिखो/ कि जिसमें छंद घूमकर आय/ घुमड़ता जाय देह में दर्द/ कहीं पर एक बार ठहराय। यह जो घुमड़ता हुआ दर्द है, भाव-बोध है, उसका टिकाऊ होना बहुत जरूरी है। यह जो कविता का ठहराव है वह लय के माध्यम से ही होता है। यह लय ही है जो स्मृति में टिकती है। इसी के सहारे ही कविता के शब्द स्मृति में टिकते हैं। और ऐसा होने पर ही उन शब्दों में निहित भाव तथा विचार हमारे मन में टिकते हैं तथा समाज में एक स्थायी वैचारिक परिवर्तन आने के कारक बनते हैं।

रघुबीर जी आलोचकों की एकांगी दृष्टिकोण के साथ विवेचना करने वाली प्रवृत्ति के भी खिलाफ थे। वे जीवन का सूक्ष्म-दर्शन करते हुए उसके सर्वांगीण चित्रण में यकीन रखने वाले कवि थे। उनके अनुसार कवि का कैनवास व्यापक होता है। उसमें जीवन की विभिन्न अवस्थाएँ, उसके विभिन्न पहलू, उसके विविध यथार्थ समाए होते हैं। उन्हें खंड-खंड में बाँटकर नहीं देखा जा सकता। सारे महाकवियों ने जीवन को इसी व्यापकता के साथ देखा, समझा और वर्णित किया है। फिर आलोचक क्यों उनकी रचनाओं को अलग-अलग खाँचों में बाँटकर देखता है?  उन्होंने अपनी समाधि लेख कविता में इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, - नारी चिड़िया देश जागरण/ बच्चा प्रकृति दुःख वासना/ अलग-अलग डिब्बों में मेरी/ पीड़ाएँ मत बंद कीजिए/ जिन्हें एक में मिला-जुलाकर/ मैंने की थीं ये रचनाएँ। यह कहने आ नहीं सकेंगे/ चले गए हैं स्वर्ग महाकवि

अंत में मैं रघुबीर जी की उस कविता पर आना चाहूँगा, जिसमें उनकी रचना-दृष्टि का निचोड़ है। यह उनकी शुरुआती दौर में लिखी गई एक बहुश्रुत कविता है, जो यह आह्वान करती है कि यदि कवि बनना है, कविता लिखना है, तो परम्परा से आगे निकल कर चलो। कुछ नया सीखो। कुछ नई बात बोलो। एक तरह से देखा जाय तो उनकी यह कविता, नई कविता के लिए एक मंत्र-वाक्य जैसी थी, - अगर कहीं मैं तोता होता/ तोता होता तो क्या होता? तोता होता। होता तो फिर? होता, फिर क्या? होता क्या? मैं तोता होता

रघुबीर जी की कविताओं में सामाजिक विसंगतियों, अन्याय व अत्याचार आदि के विरुद्ध जो प्रतिरोध व संघर्ष की व्याप्ति है, उनका जो स्त्री-विमर्श है, उनकी जो राजनीतिक सजगता है, उनका जो जीवन-दर्शन है, उन तमाम पहलुओं पर भी इसी प्रकार विस्तार से चर्चा की जा सकती है, किन्तु यहाँ मैं उस पर नहीं जा रहा। यहाँ बस थोड़ा-सा यही बताने का उद्देश्य था कि रघुबीर जी ने काव्य-रचना के कर्म और धर्म से जुड़कर क्या कुछ कहा और हमारी पीढ़ी के कवियों को क्या कुछ दिया। स्पष्ट है कि वे इतना कुछ दे गए हैं कि अगर हमने उसका एक थोड़ा सा अंश भी ग्रहण कर लिया तो फिर वह जो बरामदे में धूप सा कुछ ले आने की बात है, वह सार्थक हो जाएगी और हम वहाँ रखे पौधों की तरह लहलहाने लगेंगे। जाहिर है यदि हम रघुबीर सहाय से कुछ सीखेंगे तो फिर तोता नहीं बने रहेंगे। तब हम निश्चित ही कुछ नए तरीके से सोचेंगे और कुछ नई बात बोलेंगे। हम अपनी काव्य-धर्मिता से तोतापन को दूर करके ही रघुबीर जी को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं।    

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परिचय 

जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में
साहित्यिक गतिविधियाँ:

  • पिता की प्रेरणा से बचपन से ही लेखन में रुचि। हिन्दी व मलयालम की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर कविताएं, कहानियाँ व लेख प्रकाशित।
  • प्रकाशित पुस्तकें: गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी (प्रेम-गीतों का संग्रह - 2001), दाना चुगते मुरगे (कविता-संग्रह 2004), जिन्हें डर नहीं लगता (कविता-संग्रह 2009), जनतंत्र का अभिमन्यु (कविता संग्रह 2012) एवं ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम से अनूदित कविताओं का संग्रह 2009)।
  • सम्मान: वर्ष 2009 में भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार तथा 2011 में इफ्को द्वारा राजभाषा सम्मान

सम्पर्क: डी-I/ 90, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली110021 (मो. नं. +91-8826262223), ई-मेल: umeshkschauhan@gmail.com    



2 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

सही है.. रघुवीर सहाय को जानना काव्य धर्म को जानना भी है।

KESHVENDRA ने कहा…

Sunder or samsamyik aalekh.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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