अभी हाल में

:


विजेट आपके ब्लॉग पर

बुधवार, 16 जनवरी 2013

बहादुर पटेल की कवितायें


बहादुर पटेल मितभाषी हैं..जीवन में भी और कविता में भी. उनसे बात करते हुए उस तड़प और उस सतत सक्रिय मानस को समझ पाना अक्सर बहुत मुश्किल होता है जिससे उनके साहित्यिक सरोकार संचालित होते हैं. उनकी कवितायें आत्मा में विन्यस्त गहन परिवर्तनकामी संवेदनाओं के तीक्ष्ण आत्मसंघर्ष से उपजती हैं. यह विन्यस्ति जितनी सहज है, उतनी ही उद्वेलनकारी. सागर के ऊपरी तलों पर दिखने वाली शान्ति की तरह. आप ज्यों-ज्यों उनकी कविताओं के भीतर प्रवेश करते हैं त्यों-त्यों न केवल इसकी तहें खुलती हैं बल्कि उस उथल-पुथल का एहसास भी होता है. शायद यही वज़ह हो कि कविता के दरवाज़े पर शोर-गुल मचाकर अपना होना सिद्ध करने वाले समीक्षकों को इसका एहसास कम ही हो पाता है. आज असुविधा पर इस प्रिय कवि-मित्र की कवितायें प्रस्तुत करते हुए अतिरिक्त संतोष की अनुभूति हो रही है.

काज़ुया आकोमोतो की पेंटिंग 'डार्क स्ट्रीट' यहाँ से 


वह अँधेरे से रंग भरता था 

 (मुक्तिबोध को याद करते हुए )


 उसने एक तितली के पंखों में रंग भरा
 और वह उड़ गयी
 तितली के रंगों से सारी धरती
 अनेक रंगों की चादर से ढँक गयी

 सूरज ने उधार लिए
 तितलियों से सात रंग
 मनुष्य ने उन रंगों से कई रंग इजाद किये
 उन्ही से दुनिया लुभावनी हुई

 फिर कुछ रंगों के सौदागर पैदा हुए
 उन्होंने तितलियों के पंखों से रंग चुराना शुरू किये
 जितना रंग वह लेते
 उससे कई गुना रंगीन हो गई वे तितलियाँ

 इसी तरह तितलियाँ आज हमारे जीवन को
 रंगीन बनाने में लगी हुई हैं

 और वह पहला आदमी
 जिसने तितलियों के पंखों में पहली बार
 भरा था रंग
 वह कोई बड़ा कलाकार था
 उसके जीवन में कोई रंग नहीं था
 उसने अपने आंसुओं से रंगों को तरल किया
 उसकी आत्मा में गहरा अँधेरा था
 वह अँधेरे से रंग भरने की कला जानता था
 .


मेरी हँसी

 मैंने हँसना चाहा
 अपने मूल स्वाभाव में हँसना चाहता था
 फीकी हँसी को जानदार बनाने के सारे जतन
 बेकार हो गए

 लोगों की हँसी से
 अपनी हँसी की तुलना की
 बहुत बोगस और नकली लगी

 मैंने एक बच्चे की हँसी से मिलाई हँसी
 एक बूढ़ा भी मिला मुझे
 जिसकी हँसी बच्चे की हँसी से बहुत करीब लगी

 एक स्त्री की उन्मुक्त हँसी से
 भयभीत हुआ
 फिर अपनी हँसी से मिलाया तो लगा कि
 मेरी हँसी को ठीक हँसी बनाने में
 उसकी अहम् भूमिका हो सकती है

 कई सालों तक एक स्त्री ने
 मेरी हँसी को हँसी से भी बड़ी बनाया
 संक्रामक कि हद तक फैलाया मैंने

 एक दिन गहरी अँधेरी रात में
 उस स्त्री की हँसी को
 मैंने रुदन में बदलते हुए सुना

 आज फिर सुन रहा हूँ अपनी हँसी
 ऐसी नकली हँसी आज तक
 इस पृथ्वी पर नहीं सुनी गई.

 .

पाँवों में भंवरा


 कितना कोहरा था मेरे आसपास
 उतना ही धुआँ
 वैसा ही धुंधलापन
 थकान का एक बड़ा हिस्सा मेरे हिस्से में
 मोतियाबिंद की अँधेरी परछाई
 उजाले का सिर्फ एक बिंदु
 उसके आसपास गहरा अँधेरे का वृत्त

 तुम्हारे साथ का एक आकाश मिला मुझे
 जिसमे कई सितारे जगमगाते मिले
 ओस की बूंदे ठहरी रही देर तक मेरी पलकों पर
 पेड़ के हरेपन का सहारा
 देर तक मुझे सहलाता रहा
 तुम्हारी छाया मेरे भीतर को आलोकित करती रही

 बहुत प्यास के बाद
 उतरा तृष्णा के गहरे कुएं में
 अंतहीन सफर के बाद
 कोई एक सूरत मिली मुझे
 जिसकी ऊर्जा का प्रकाश पुंज
 मुझे अपने भीतर समेट लेना चाहता था

 एक पगडण्डी पर बैठा
 करता रहा इंतजार देर तक
 मेरे पाँवों में भंवरा था
 फिर भी बैठा रहा कि तुम जरूर आओगी .

 .

इतिहास की शरण में


 एलोरा कि ये खुबसूरत गुफाएं
 हमें कितनी खामोशी से अपनी और खींचती हैं
 इतिहास बहुत पीछे ले जाता है हमें
 इतिहास को दुरुस्त करना
 या यों कहें कि क्रिया की प्रतिक्रिया
 बहुत खतरनाक है

 आज जो है वो कल इतिहास होगा
 क्या हमने सोचा कि
 हमारी सन्ततियां इसको किस रूप में लेगी
 हम जो देखते हैं
 कितना उजला कितना कितना अँधा है

 हो सकता है कोई पैदा हो
 हमारे समय से बहुत बाद में
 वह हमारी रेखा कि बगल में कोई रेखा खींचे
 हमारे घावों पर नमक बजाय
 गाय के दूध से बना मक्खन रखे

 हमारे समझ की दिशा को
 एक रेखीय कोण में नहीं बदला जा सकता
 पर कोई ऐसा सिद्धांत बनाये
 जो हमारे मनुष्य होने की सीमा में रोके रखे हमें
 हमारी मजबूरियों को सिक्कों की धार से न काट सके

 हम जाना चाहते हैं
 बार-बार इतिहास की शरण में
 जैसे कि बच्चे जाते है पाठशाला में
 जैसे कि हम जाते है नींद के आगोश में
 जैसे सपने चले आते हैं दबे पांव
 जो कभी पूरे नहीं होते
 लेकिन एक आशा हमें दूर तक ले जाती है
 जैसे हम प्रवेश कर रहे हों बार-बार इतिहास में.

 .

जानने को उत्सुक तो हर कोई होता है


किसी को कोई किस तरह जानता है
यह नहीं जान पाता कोई
हम भी नहीं
कोई भी नहीं

कई बार किसी की हरकतों को हम देखते रहते हैं टुकुर-टुकुर
और कोई इस तरह हमारी और देखता है
जैसे वह धंसना चाहता है हमारे भीतर
इतना भीतर कि हम उसकी जद से अपने को बहार नहीं कर पाते
वह हमारी रोशनी में कुछ धब्बे ढूंढना चाहता है
कितना निरीह पाते हैं तब हम अपने आपको

जानने को उत्सुक तो हर कोई होता है
हम भी होते हैं
कई कई बार हम अपने आपको अपनी ही परछाई में ढूंढते रहते है
हम अपने होने के तिलस्म को नहीं तोड़ पाते
हमारी वेदना में कोई कीड़ा रेंगता रहता है
पहचान का कोई सिरा हमारी पकड़ से रहता है बाहर
अपनी गली में हम अनजान से घुमाते हुए अपना पता पूछते रहते हैं
कोई हमसे अपनी पहचान छुपाकर निकल जाता है दूसरी गली में
दरअसल ऐसी कई कई गलियां है जिनमे बेवजह कई लोग भटकते रहते है
दिमाग के किसी कोने में हमारा अपना पता अटका रहता है

कोई बहुत जानने की जिद में अपने को तो भूलता ही है
हमारी स्मृति के टिमटिमाते दिए पर अपनी बौद्धिकता का अँधेरा उडेलता है
दोस्तों उसके बाद भी जलते रहना मुश्किल तो है
पर नामुमकिन भी नहीं
हाँ यह तभी संभव हैं जब हम उसको जाने
और उसको जानना तभी संभव है जब हम अपने आपको जाने.

 .



शब्दों को देता रहता है रौशनी


एक पत्ता हरता है हमारा दुःख कई रूपों में
हहराता हुआ या सूखता हुआ
या अपने पीलेपन के साथ
आखिर में सूखा खनक
हमेशा मंडराती रहती है
उसकी आत्मा हमारे आसपास
हमारे साथ देर तक उड़ता रहता है
लेप बनकर फैल जाता है
हमारे जीवन के समूचे विस्तार में

बहुत दबे पांव आता है हमारे स्वाद में
कोई हड़बड़ी नहीं
सबसे उजास चीजों में भरता है अपना प्रकाश
अपनी ही ज्योति में देखता है अपने आपको
अपना इतिहास खुद लिखता है हमारी कापी किताबो में
सूखता रहता है उन्ही में
शब्दों को देता रहता है रौशनी
जब खुलती है किताब
तो शब्दों से पहले वह कहता है कोई कहानी
अपनी पीठ के निशान दिखाकर देर तक रोता रहता है हमारे सामने
हमारे रोने को कई बार इस तरह सोखता है
और जब बिखरता है तो न किताब समेट पाती है
न हमारा शरीर
हमारी स्मृति के कैनवास बिखर कर एक चित्र की शक्ल लेता है

कितनी तरह से आता है
कितनी कितनी बार आता है
संगीत के कितने राग समेटे रहता है अपने भीतर
उसकी परछाई में जीवन के कितने ही रहस्य छुपे होते हैं
हमारी उदासी उसके हरेपन में तैरती रहती है
हमारे सपनों की तलछट में बैठकर जीवन भर गंधाता रहता है.

--------------------------------------------------------------------


बहादुर पटेल 

देवास में रहने वाले सुपरिचित कवि बहादुर पटेल का एक कविता संकलन 'बूंदों के बीच प्यास' अंतिका प्रकाशन से २०१० में प्रकाशित हुआ है. बहादुर इन दिनों 'ओटला' शीर्षक से होने वाले साहित्य के महत्वपूर्ण आयोजन से जुड़े हैं.

संपर्क - bahadur.patel@gmail.com

 .



16 comments:

'अपनी माटी' वेबपत्रिका ने कहा…

bahaadur jee ki lekhani pasand aayi.

' मिसिर' ने कहा…

एक अबूझ पीड़ा से ,जो चाह कर भी आक्रोश में खुलने की झिझक में ठिठकी रहती है ,लदी हैं ये कवितायेँ ! शिकायतें कतई लाउड नहीं होतीं है !

असुविधा पर बहादुर पटेल की इन कविताओं का आना बहुत अच्छा लगा ! बधाई और आभार !

Amit sharma upmanyu ने कहा…

बहुत खूबसूरत कवितायें! इन कविताओं में एक पीड़ाकारी शान्ति है. जैसे शांत समंदर के गर्भ में घूमता भंवर. "जानने को उत्सुक ..." में बेजोड़ चित्रण है! बहादुर जी को और पढने का इंतज़ार रहेगा.

neera ने कहा…

संवेदनाओं और अंतर्मन की पीड़ा से लदी कविताएं सीधा आत्मा का द्वार खटखटाती हैं... बहादुर जी को बधाई ...अशोकजी का शुक्रिया

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

....पटेल जी की सभी रचनाएँ प्रभावित करती हैं ।

vijay ने कहा…

achhi lagi prastuti ..,....

vandana gupta ने कहा…

दूरदर्शिता को दर्शाती बेहतरीन कवितायें हैं।

संजीव ने कहा…

स्‍वयं सिद्ध कवितायें.

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी इस पोस्ट की चर्चा 17-01-2013 के चर्चा मंच पर है
कृपया पधारें और अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत करवाएं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सार्थक और सटीक!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

रश्मि शर्मा ने कहा…

बहुत मुलायमि‍यत से अपनी बात कहती हैं कवि‍ताएं...बहुत अच्‍छा लगा इन्‍हें पढ़ना।

आनंद कुमार द्विवेदी ने कहा…

संकोच और गहन वेदना की मुखर अभिव्यक्तियाँ हैं पटेल जी की कवितायेँ, सभी कवितायेँ अद्भुत !

आज फिर सुन रहा हूँ अपनी हँसी
ऐसी नकली हँसी आज तक
इस पृथ्वी पर नहीं सुनी गई.

pradeep mishra ने कहा…

Achchee kavitayen.Bahadur bhai badhayee.

Jitendra Srivastava ने कहा…

अच्छी कविताएँ.बहादुर भाई हमारे समय के जरूरी कवी हैं.

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर कविताएँ

Manish Vaidya ने कहा…

बहादुर की कविताएँ अपने समय के समाज और व्यवस्थाओं से लगातार सवाल करते हुए चलती है ..ये बहादुर की प्रक्रति के ही मुताबिक हौले हौले अपना असर छोडती है........

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

फेसबुक से आये साथी

 
Copyright (c) 2010 असुविधा.... and Powered by Blogger.