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शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

क्रोध और आँसू की सम्मिलित भाषा में - देवयानी भारद्वाज


देवयानी ने यह कविता मुझे कोई दो दिन पहले भेजी थी. हालिया घटनाओं का असर तो था ही, इस बहाने देवयानी ने यहाँ एक औरत की ज़िन्दगी के उन तमाम कटु अनुभवों को एक अवसादपूर्ण आवेग के साथ रख दिया है. पितृसत्ता की कंटीली जकडन के जख्मों के निशाँ अलग-अलग रूपों में जैसे एक साथ क्रोध और आंसू की सम्मिलित भाषा में चीख रहे हों, न्याय मांग रहे हों वक़्त की अदालत से...
कर्टिस राइकोविच की पेंटिंग यहाँ से साभार 



मेरी शिकायत दर्ज की जाए मी लॉर्ड


कितने साल लगते हैं
एक बलात्कारएक हत्याएक ज़ुर्म की सजा सुनाने में अदालत को 
कितने साल के बाद तक है इजाज़त 
कि एक पीड़ि‍त दर्ज़ कराने जाये 
उसके विरुद्ध इतिहास में हुए किसी अन्याय की शिकायत 

मी लॉर्ड 
मेरे जन्म के बाद मेरी माँ को नहीं दिया गया पूरा आराम और भरपूर आहार 
इसलिये नहीं मिला मुझे पूरा पोषण 
मेरी शिकायत दर्ज की जाये मी लॉर्ड 

भाई को जब दी जाती थी मलाई और मिश्री की डली 
उस वक़्त मुझे चबानी होती थी 
बाजरे की सूखी रोटी 
और सुननी होती थी माँ को दादी की जली कटी 
एक तो जनी लड़की 
वह भी काली कलूटी 
कौन इसे ब्याहेगा 
कहाँ से दहेज जुटायेंगे 
मैं गैर बराबरी और अपमान की शिकायत दर्ज कराना चाहती हूँ मी लॉर्ड
थाने मे जाती हूँ तो सब मेरी बात पर हंसते हैं 
घर वाले भी मुझे ही बावली बताते हैं
अब आप ही बतायें मी लॉर्ड 
क्या आज़ाद हिन्दुस्तान के संविधान में
मेरे लिये बराबरी की यही परिभाषा थी 

मेरी शिकायत दर्ज की जाये मी लॉर्ड 
जयपुर के रेलवे स्टेशन पर 
पच्चीस साल पहले 
जब मेरी उम्र मात्र चौदह साल थी 
एक शोहदे ने टॉयलेट के गलियारे में 
मेरे नन्हे उभारों पर चिकोटी भर ली थी 
और इस कदर सहम गयी थी मैं 
कि माँ तक को बता न सकी थी 
वह अश्लील स्पर्श मुझे अब भी नींदों में जगा देता है 
और मैं बेटी को ट्रेन में अकेले टॉयलेट जाने नहीं देती 
पहुँच ही जाती हूँ किसी भी बहाने उसके पीछे 
मैं उस अश्लील स्पर्श से छुटकारा चाहती हूँ मी लॉर्ड 
मैं इस असुरक्षा से बाहर आना चाहती हूँ
मुझे न अब ट्रेन का नाम याद है
न घटना की तारीख याद है 
मैंने तो उस लिजलिजे स्पर्श का चेहरा भी नहीं देखा 
यदि देखा भी होता तो अब याद न रहता 
लेकिन मेरे सपनो को उस अहसास से आज़ाद कीजिये मी लॉर्ड 
मेरी शिकायत दर्ज की जाये मी लॉर्ड 
मेरी न्याय की पुकार खाली न जाये हुज़ूर 

मेरे बचपन के अल्हड दिनों को 
अश्लील कल्पनाए सौंपने वाले मौसा के विरुद्ध मेरा वाद दर्ज किया जाये मी लॉर्ड 
क्या फर्क़ पडता है कि अब उसे लक़वा मार गया है 
कि वह अब बिस्तर में पड़ा अपनी आखिरी साँसे गिन रहा है 
छह वर्ष से चौदह वर्ष की उम्र तक साल में कम से कम दो बार आते जाते 
मासूम देह के साथ किये उसके खिलवाड़ों ने 
छीन ली जो बचपन की मासूम कल्पनाएँ वे मुझे लौटाई जायें मी लॉर्ड
मुझे ही क्यों सोचना पड़े कि क्या सोचेंगे उसके नाती और पोतियाँ उसके बारे में 
कि बुढापे में ऐसी थू थू लेकर कहाँ मुँह छिपायेगा 

क्यों सोचूँ मैं उन चाचाओंभाइयों और मकान मालिक के बेटों के बारे में 
उन सबको जेल में भर दिया जाये मी लॉर्ड 
कि अपनी मासूम यादों में आखिर कितने जख्‍मों को लिये जीती रहूँ मैं 
मैं उस सहकर्मी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना चाहती हूँ
जो रोज़ाना सामने की सीट पर बैठ कर घूरा करता था 
और रातों को किया करता था गुमनाम फोन कॉल 
उसे गिफ्तार किया जाये और 
मेरे साथ इंसाफ किया जाये मी लॉर्ड

उस लड़के के विरुद्ध भी मेरी शिकायत दर्ज की जाये 
जिसने प्यार को औजार की तरह इस्तेमाल किया 
और जिसने मेरी देह से सोख लिया सारा नमक 

मेरे बच्चों को मेरे ही नाम से जाना जाये मी लॉर्ड 
कि बच्चे मेरे रक्तबीज से बने हैं 
मैं ही अपने बच्चो की माँ हूँ और पिता भी 
बच्चों के नाम के साथ पिता के नाम की अनिवार्यता को समाप्त किया जाये मी लॉर्ड 
कि सिर्फ वीर्य की कुछ बूँदें उसे पिता बना देती है और 
मेरी मांस मज्जामेरे नौ महीने 
मेरा दूध 
मेरी रातो की नींद

सिर्फ एक कर्म जिसके पीछे भी छुपा था प्यार 
या निरी वासना और गुलाम बनाने की मानसिकता 
कैसे उसे दे सकता है मेरे बराबरी का अधिकार 
इस व्यवस्था को बदलिये मी लॉर्ड 
कुछ कीजिये हुज़ूर कि इसमें छुपा अन्याय का दंश अब और सहा नहीं जाता है 

अगर आपका कानून लगा सकता है 
तमाम उम्र सुनाने में अपने फैसले 
तो मेरी तमाम उम्र की शिकायत क्यूँ आज दर्ज नहीं की जा सकती मी लॉर्ड 


देवयानी भारद्वाज 
_________________________________________________
हिन्दी की महत्वपूर्ण युवा कवि. सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय. इन दिनों जयपुर में. उनकी कुछ कवितायें यहाँ भी पढ़ें.

17 comments:

राजेश उत्‍साही ने कहा…

यह पता नहीं कितनी स्त्रियों की व्‍यथा है...यह आवाज केवल कविता में ही नहीं..वास्‍तविक जिंदगी में भी उठनी चाहिए...।

अनिरुद्ध उमट ने कहा…

devyaani ko badhaee...deejiyegaa. is kavitaa ke liye किसी नंगे तार को छूना है इसे पढ पाना.हमारे समाज के लिये ये कविता बहुत गहरी शर्म मे फेंक देती है. हम किस कदर अमांनवीय...हो गये है. ये वही देश है जहाँ बापू अन्य के लिये उपवास करते थे....ओह वह बुजुर्ग.इस बेटी की कविता पढ़ रो देगा...शर्म से कान..आँख बन्द कर लेगा. देव, तुम ने एक लाल दहकती सलाख सी कविता रची है जो मेरे भीतर घुस रही है...कुरेद रही है. मै इस कविता के जरिये तुम्हे याद करता रहूँगा...कोशिश करूँगा बहनो..बेटियो के लिये एक बादल जितनी छाँव अपने शब्दो मे बन पाऊँ....भाई अशोक जी...आप को भी यही कह रहा हूँ जो देव को सम्बोधित है..तुरंत उस तक मेरी भावना पहुंचाए...जीवन बहुत पल भारत का होता, सो विलम्ब न करे.

सलमान अरशद ने कहा…

yek aurat ke derd ka behad ytharth chitran, aur isme jo jajba aur dechaini hay, use salam karta hon, aur ummid karta hon ki ye jajaba hamesha kayam rhe

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बहुत यथार्थपरक एवं संवेदनशील रचना ...

आनंद कुमार द्विवेदी ने कहा…

अगर आपका कानून लगा सकता है
तमाम उम्र सुनाने में अपने फैसले
तो मेरी तमाम उम्र की शिकायत क्यूँ आज दर्ज नहीं की जा सकती मी लॉर्ड
................
वाह देवयानी जी ... आहकितनी लंबी सूची है हमारे गुनाहों की
और न्याय अभी न जाने कितना दूर है }

राघवेन्द्र ठाकुर ने कहा…

Es kavita ko padhkar ehsaas hua ki ek ladki janm se lekar maran tak chupchap kya kya sahti hai.. Aur uski samaj se kya sikayte aur apekshayen hai.. Lekin ye bebasi ab aur nahi... Chup n raho.. Apna haqe maango...

बेनामी ने कहा…

कविता सार्थक है और सामयिक भी। अपनी बात पाठक तक पहुँचाने में सक्षम।

ramji ने कहा…

मारक और जोरदार ...

yadav shambhu ने कहा…

क्या आज़ाद हिन्दुस्तान के संविधान में
मेरे लिये बराबरी की यही परिभाषा थी
जिसने प्यार को औजार की तरह इस्तेमाल किया
और जिसने मेरी देह से सोख लिया सारा नमक
मेरी मांस मज्जा, मेरे नौ महीने
मेरा दूध
मेरी रातो की नींद, ......... भावुक शक्ति के साथ लिखी कविता ..जो लोकतंत्र में पुरुषवादी सत्ता की ज्यादतियों के खिलाफ 'मेरी तमाम उम्र की शिकायत क्यूँ आज दर्ज नहीं की जा सकती मी लॉर्ड ' हम सब को अपने गरेबान में झाकने के लिए मजबूर करती है और हम पुरुष कैसे जबाब दें यह सब हमने अपने सामने होते देखा है ...... लेकिन जबाब को देना ही होगा अपने सामन्ती पन को त्याग कर .... पूरे समाज में प्रगतिशील मूल्यों की स्थापना के लिए संघर्ष को लगातार जारी रखकर ...पितृसत्ता वादी मानसिकता के खिलाफ अपने को मुकाबिल कर ...

कुमार अम्‍बुज ने कहा…

निश्‍चय ही यह ऐसी कविता है जो इधर अनेकानेक आवेगरहित और दृष्टिहीन कविताओं के बीच अलग से पहचानी जा सकती है। भले ही इसमें वे सब बातें ही हैं जो तमाम लेखों और विमर्श में भरी पड़ी हैं मगर यहॉं वे कविता की अपनी भूमिका के साथ विन्‍यस्‍त हो गई हैं और अपना असर छोड़ रही हैं। देवयानी, बधाई।

peer educators ने कहा…

महिलाओं की शिकायत दर्ज नहीं की गई तो तुम उनकी शिकायत दर्ज़ करने का अधिकार ही खो बैठोगे ! शायद दुनिया में कोई औरत नहीं जो इस दंश से नहीं गुज़री हो ! हम सबकी आवाज़ है देवयानी की कविता !!

अनुपमा तिवाड़ी ने कहा…

औरतों की आवाज़ है देवयानी की कविता !!

अनुपमा तिवाड़ी

suman ने कहा…

badhai devyani,sabka dard samet jeevan foonk diya hai aapne is kavita me

suman ने कहा…

badhai devyani,in kavy-panktiyon me aapne badi hi sahjta se stri ki vyatha samet li hai.

' मिसिर' ने कहा…

बेबाक और धारदार कविता ! सारे आरोप दर्ज होंगे आज नहीं तो कल और फैसला भी होगा ! बधाई देवयानी को !

Neelam Sai Pandey ने कहा…

देवयानी जी! पहले तो आपको बहुत बहुत धन्यवाद इस कविता के लिए! आपने तो जैसे निचोड़ कर रख दिया है सब कुछ. मुझे लगता है कि इस पीड़ा को हमारे देश की हर लड़की ने सहा है. इस कविता को पढ़ते वक़्त ऐसा लग रहा था जैसे जाने कितनी लड़कियों का दर्द आपने बयां कर दिया हो. बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें. यह कविता मेरे दिल के काफी करीब है.

sushila ने कहा…

“कि सिर्फ वीर्य की कुछ बूँदें उसे पिता बना देती है और
मेरी मांस मज्जा, मेरे नौ महीने
मेरा दूध
मेरी रातो की नींद, ”
और

“अगर आपका कानून लगा सकता है
तमाम उम्र सुनाने में अपने फैसले
तो मेरी तमाम उम्र की शिकायत क्यूँ आज दर्ज नहीं की जा सकती मी लॉर्ड “

देवयानी ने हर जननी, अबोध बालिका और स्त्री की वेदना को मुखरित किया है। यह एक प्रतिनिधि कविता है क्योंकि यह किसी एक नारी का अनुभव नहीं समस्त जाति की पीड़ा है!

उन्हें हार्दिक बधाई !

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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