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शनिवार, 5 जनवरी 2013

यह लगभग नामुमकिन है कि कोई लेखक अपनी रचना प्रक्रिया बता सके- कुमार अम्बुज



 ख्यात कवि कुमार अम्बुज से प्रीति सिंह परिहार का यह साक्षात्कार किंचित संपादित रूप में प्रभात खबर में प्रकाशित हुआ था. कवि की अनुमति से यहाँ यह अविकल रूप में...





*  आपके लेखन की शुरुआत कैसे हुई, ये एहसास कब और कैसे हुआ कि आपको लिखना है, इसके पीछे क्या प्रेरणा थी?

कुमार अम्बुज - प्रीति जी, काश, इन चीजों का कोई ठीक-ठीक उत्तर दिया जाना संभव होता। प्रेरणाएँ दरअसल अपनी व्यग्रता, असहायता, आकांक्षा, आशा, असफलता और निराशा के केंद्रों या परिधियों में ही कहीं छिपी रहती हैं। धीरे-धीरे वे अपनी गिरफ्त में लेती जाती हैं। उसका कोई प्रथम बिंदु याद करना अपने माथे पर लिए जाने  वाले पहले चुंबन को याद करने जैसा असंभव काम है।

*  पहली रचना जो आपकी कलम से निकली?

कुमार अम्बुज -  जो संकलित हैं उनमें से ‘पढ़ाई’ और ‘आत्मकथ्य की सुरंग में से’ कविता के कुछ हिस्से, जो पहले संग्रह ‘किवाड़’ में हैं।
अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताइए? कोई रचना कैसे जन्म लेती है और उसे आकार देने की प्रक्रिया क्या होती है?

कुमार अम्बुज - यह लगभग नामुमकिन है कि कोई लेखक अपनी रचना प्रक्रिया बता सके। वह केवल अपनी आदतों, मुश्किलों और दिनचर्या का ही बयान कर सकता है। बहरहाल, इस बारे में मेरा विस्तृत नोट भी है जो अभी ‘कवि ने कहा’ सीरीज में आरंभिक वक्तव्य के रूप में दिया है तथा अन्यत्र भी प्रकाशित है। उन्हीं बातों को यहाँ दोहराना उचित नहीं। 

* आपके लेखन की मूल चिंता क्या है?
कुमार अम्बुज- अपना समाज। और राजनीति। नागरिक प्रतिरोध। और अपना अवसाद।

* आप अपनी पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठ भूमि का अपनी रचनाशीलता से क्या संबंध पाते हैं?
कुमार अम्बुज- यदि मेरे प्रारंभिक जीवन और पारिवारिकता में किंचित गरीबी, उपेक्षा, रूढ़ियाँ, ग्रामीण एवं कस्बाई परिवेश और अनिश्चितताएँ न होतीं तो अनेक अनुभवों से वंचित रह जाता। तमाम तरह के प्रश्नों से भी फिर उस तरह से उलझने के लिए प्रेरित न होता, जैसा कि दरअसल हुआ। फलस्वरूप एक वैचारिक तैयारी में भी जुटना पड़ा। ये सब रचनाशीलता का हिस्सा होते चले जाते हैं।

* साहित्य लेखन में कल्पना की भूमिका कितनी जरूरी लगती है आपको?
कुमार अम्बुज - दृष्टि, विचार और औचित्य के बिना कल्पना निरी कल्पना होती है। कल्पना से ज्यादा मैं कहूँगा कि लेखन में स्वप्नशीलता की कहीं अधिक महत्वपूर्ण और प्रभावी भूमिका है।

*आपकी नजर में आपके लेखन का सबसे मुश्किल पक्ष क्या है?
कुमार अम्बुज- ठीक अगली रचना लिखना।

*आपने कवि होना ही क्यों चुना जबकि आप बेहतरीन गद्य भी लिखते हैं, ‘इच्छाएं’ इसका प्रमाण है?
कुमार अम्बुज - इस तरह प्रशंसा के लिए धन्यवाद। लेकिन प्रत्येक रचनाकार की एक सीमा और एक ताकत होती है। मेरी यह ताकत और यह सीमा शायद कवि होने में ही कहीं विन्यस्त है, ऐसा भ्रम मुझे लगातार रहा है।

*आपने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि एक कहानीकार, उपन्यासकार और आलोचक की तुलना में कवि इस संसार में अधिक मिसफिट या अवसादग्रस्त व्यक्ति होता है. ऐसी कौन सी बाते हैं जो उसे मिसफिट या अवसादग्रस्त बनाती हैं?
कुमार अम्बुज - कवि की संरचना में स्वप्नशीलता और आकुलता का, भावुकता और अवसाद का, उम्मीद और असंतोष का, धरती और आकाश का, वासना और ईष्र्या का, होने और न होने का, अजीब सा मिश्रण होता चला जाता है। शायद यहीं कहीं आपके प्रश्न का उत्तर है।

* क्या रचना पूरी होने के बाद भी कभी किसी अधूरेपन या अपनी बात ठीक से न कह पाने के एहसास से गुजरना पड़ता है?
कुमार अम्बुज- कभी-कभी जरूर ही। लेकिन फिर ज्यादा कुछ उपाय हो नहीं सकता।

*ऐसी कोई रचना जिसे लिखने के बाद सबसे अधिक सुकून का अहसास हुआ हो?

कुमार अम्बुज- अपनी पिछली पाँच-सात रचनाओं को लेकर ही मैं सर्वाधिक खुशी महसूस कर पाता हूँ। फिर उनसे एक दूरी बनती चली जाती है। फिर भी, ‘जंजीरें’, ‘क्रूरता’, ‘अमीरी रेखा’, ‘शाम’, ‘मेरा प्रिय कवि’, ‘रात तीन बजे’, ‘उपकार’, ‘अन्याय’, ‘यहाँ पानी चाँदनी की तरह चमकता है’, माँजता है कोई मुझे, जैसी चालीस-पचास कविताओं को लिखने का सर्जनात्मक संतोष कुछ ज्यादा दिनों तक रहा, जो अब सोचने से याद किया जा सकता है। ‘कहना-सुनना’, ‘संसार के आश्चर्य’, ‘गुमने की जगह’, ‘माँ रसोई में रहती है’ और ‘बारिश’ जैसी दस-बारह कहानियों को लेकर भी शायद यह कह सकता हूँ।


* हिंदी साहित्य में किन लेखकों का लेखन प्रभावित करता रहा है? ऐसा कोई लेखक या रचना जिसे आपने बार-बार पढ़ा हो और उससे प्रेरित हुए हों?
कुमार अम्बुज- तुलसीदास और कबीर। फिर मुक्तिबोध। प्रेमचंद, रेणु, अमरकांत, श्रीकांत वर्मा, ज्ञानरंजन। शेखर जोशी की ‘कोसी का घटवार’, अज्ञेय की ‘रोज’ जैसी कहानियाँ कविताओं की तरह भी पढ़ता रहा हूँ । रघुवीर सहाय, धूमिल विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे, चंद्रकांत देवताले, केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, ज्ञानेन्द्रपति, भगवत रावत, विमल कुमार के शुरूआती संग्रहों की कविताओं को भी मैं अकसर पढ़ता हूँ । इसी तरह श्रीकांत वर्मा, आलोकधन्वा, अरुण कमल, राजेश जोशी, देवी प्रसाद मिश्र, अनीता वर्मा की कुछ कविताएँ। ‘अँधेरे में’ कविता बार-बार।

* विश्व साहित्य में किसे पढ़ना पसंद करते हैं और कौन सी रचना को अपने करीब पाते हैं?
कुमार अम्बुज-  वाॅल्ट व्हिटमैन, नेरुदा, रिल्के, शिम्बोस्र्का, अमीखाई और गद्यकारों में दोस्तोएव्स्की, चेखव, गोर्की, पेसोआ, मुराकामी, और इधर पामुक और यो मान भी। यों एक लंबी सूची है। कथा में बोर्खेस अप्रतिम, चुनौतीपूर्ण हैं। आदर्श बनाने की हद तक परेशान करते हैं।

*आपके समकालीनों में किनकी रचनाएं पसंद हैं, और क्यों? कोई ऐसी रचना जिसका जिक्र पाठकों से करना चाहें?
कुमार अम्बुज-  कुछ नाम तो ऊपर आ ही गए हैं। ‘क्यों’ का जवाब दिए बिना कहूँ तो लगभग तीस से अधिक वे नाम आएँगें जो अपने-अपने सर्जनात्मक कारणों से पिछली चैथाई सदी से चर्चा में रहते आए हैं। इसलिए एकदम नयों में देखें तो विमल चंद्र पाण्डेय, मनोज कुमार झा, नीलोत्पल, अमित उपमन्यु की रचनाओं ने ध्यान आकृष्ट किया है। हरिओम राजोरिया, शिरीष कुमार मौर्य और अशोक कुमार पाण्डेय जैसे कवि अपनी दृष्टिसंपन्नता और कहन के कारण भी ध्यानाकर्षण योग्य हैं।

*साहित्य की वर्तमान स्थिति पर क्या कहना चाहेंगे?
कुमार अम्बुज- हिन्दी भाषा को जिस तरह से कामकाज से, प्राथमिक और उच्चतर शिक्षा से बहिष्कृत कर दिया गया है उससे हिंदी साहित्य के लिए भी संकट है। इससे नयी पीढ़ी की हिंदी के श्रेष्ठ साहित्य से परिचय और उत्साह की मुश्किल भी बनती चल जाएगी। यों साहित्य की वर्तमान स्थिति नवोन्मेषी है। बहुतेरे लेखक सामने आ रहे हैं। उम्मीद से और थमकर उन्हें एक पाठक की तरह पढ़ना दिलचस्प है।

*वर्तमान समय में समाज का सबसे बड़ा संकट क्या है और लेखक की इस संकट के समय में क्या भूमिका देखते हैं?
कुमार अम्बुज-  पूँजीवाद। और उससे उत्पन्न तमाम उपभोक्तावादी, विस्मयकारी असमानता के तथा अन्यायी समाज के लक्षण। और अन्य नैतिक, शहरी और ग्रामीण जीवन के पारिवारिक संकट। लेखक को गहरी वैचारिक दृष्टि और प्रतिबद्धता के साथ अपनी पक्षधरता जाहिर करना चाहिए। ऐसे समय में कलावादी गलियारों में टहलना लगभग अपराध है।

*लेखन से इतर और क्या करना पसंद है आपको, लिख नहीं रहे होते हैं तो क्या करना पसंद है?
कुमार अम्बुज-  फिल्में। ऐसी फिल्में जो मैं व्यस्ततावश या अनुपलब्धता के कारण या सीमित जानकारी की वजहों से पहले नहीं देख सका था। आलस में पड़े रहना, झपकियाँ लेना और सोना, एक ही श्रेणी के ये तीन काम प्रमुख हैं, जिन्हें निबटाना पड़ता है। इसी बीच में पढ़ना भी हो जाता है। फिर संध्या यानी पत्नी से नोंकझोंक और गपशप। यों, रात का आसमान देखना सबसे प्रिय है। कृष्ण पक्ष का विशेष तौर पर

*इन दिनों क्या नया लिख और पढ़ रहे हैं?
कुमार अम्बुज-  इधर कुछ नए कहानी और कविता संग्रह आए हैं, उन्हें पलट रहा हँू। कुछ कहानियों के बारे में और कुछ कविताएँ लिखने के बारे में सोचता रहता हूँ। कई महीनों से सोच रहा हूँ। फिलहाल, इसी सोचने को लिखना मानिए। सोचना, लिखने का पहला पायदान तो है ही।


4 comments:

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

रोचक साक्षात्कार ....

addictionofcinema ने कहा…

achhe aur imandaar jawab jaise ki unke jaise imndaar kaviyon se apeksha hoti hai. Apne rachnakarm ko lekar baaki kavi kitne hi khatkarm suna daalte hain. shukriya

Onkar ने कहा…

सहज-सरल

neera ने कहा…

सरल, सटीक, अल्प शब्दों में प्रभावशाली साक्षात्कार ...

अब्बुज जी का यह कहना "ऐसे समय में कलावादी गलियारों में टहलना लगभग अपराध है।"

कटघरे में खड़ा कर देता है

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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