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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

युवा नाट्य समारोह 2013:एक रिपोर्ट



  •  मंजरी श्रीवास्तव 




दिल्ली में हर वर्ष जनवरी का मौसम तो भारत रंग महोत्सव की वज़ह से रंगारंग होता ही है पर इस वर्ष तो रंग महोत्सव की इस श्रृंखला को साहित्य कला परिषद्, दिल्ली  ने अपने आयोजन 'युवा नाट्य समारोह' से वसंत यानि फरवरी तक रंगारंग बनाये रखा है।

कई वर्षों के पश्चात होने वाले इस युवा नाट्य समारोह में इस वर्ष दिल्ली के आठ सक्रिय युवा नाट्य निर्देशकों को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का अवसर दिया गया। आठ दिवसीय इस युवा नाट्य समारोह में सुरेन्द्र वर्मा,नील सिमोन, प्रो. अविनाश चन्द्र मिश्र, मोहन राकेश, महाकवि भास, भीष्म साहनी और विजय तेंदुलकर जैसे सुप्रसिद्ध नाटककारों के प्रख्यात नाटकों क्रमशः - क़ैद--हयात, खुसर-फ़ुसर, बड़ा नटकिया कौन, आषाढ़ का एक दिन,प्रतिज्ञा यौगंधरायण, कबिरा खड़ा बजार में, ख़ामोश अदालत जारी है और आधे-अधूरे को युवा निर्देशकों क्रमशः दानिश इक़बाल, कुलजीत सिंह, प्रकाश झा,भूपेश जोशी, भूमिकेश्वर सिंह, गोविन्द सिंह यादव, रोहित त्रिपाठी और चंद्रशेखर शर्मा के निर्देशन में मंचित किया गया।

इस नाट्य समारोह का उदघाटन 11 फरवरी 2013 को सुरेन्द्र वर्मा  द्वारा लिखित एवं दानिश इक़बाल द्वारा निर्देशित नाटक 'क़ैद--हयात' से हुआ और 21 फरवरी को इस समारोह की आख़िरी प्रस्तुति थी मोहन राकेश द्वारा रचित 'आधे-अधूरे' जिसके निर्देशक थे चंद्रशेखर शर्मा।  

क़ैद--हयात महान उर्दू शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के कष्टप्रद संसार पर पकड़ बनाता हुआ नाटक था।इसमें ग़ालिब की तल्ख़ घरेलू ज़िन्दगी, आर्थिक तंगी और इन सबसे ऊपर कातिबा के लिए उनके असफल प्रेम को प्रदर्शित किया गया।यह नाटक तीन अंकों में विभक्त था।पहला अंक ग़ालिब के घर में ही घटता है, जहाँ उनकी पत्नी उमराव है और हमदर्द बहन।साथ ही कर्ज़दार भी हैं जो लगातार ग़ालिब की मानसिक यंत्रणा का कारण बनते हैं।दूसरे अंक में कातिबा और ग़ालिब की अंतरंगता के लिए तीव्र उत्कंठा का चित्रण है। तीसरा अंक एक पूरे वर्ष का लेख-जोखा है, जब ग़ालिब कलकत्ता से वापस लौटते हैं, पेंशन की अपील ठुकरा दिए जाने के बाद वे अपने ही घर में नज़रबंद हैं। कातिबा की मौत पर उनकी आत्मा चीत्कार कर उठती है।        

नाटककार नील साइमन की नाट्य कृति रयूमर्स का हिंदी रूपांतरण 'खुसर-फ़ुसर' शुरू हुआ कुछ धनाढ्य जोड़ों के साथ जो एक दम्पति की पहली विवाह वर्षगाँठ मानाने के लिए उनके रईस इलाके में स्थित घर पर एकत्र हुए हैं। जब वे वहां पहुँचते हैं तो पाते हैं कि वहां कोई नौकर नहीं है, साथ ही उनकी मेज़बान भी लापता है और दिल्ली में एक आलीशान इलाके में रहने वाले उनके मेज़बान ने कनपटी के नीचे से गोली चला कर खुद को मार दिया है। उस समय हास्यात्मक जटिलताएं पैदा होती हैं, जब अपनी उच्चवर्गीय स्थिति को देखते हुए वे यह निश्चय करते हैं की स्थानीय पुलिस और मीडिया की आँखों से इस शाम की घटना को छुपाने के लिए जो भी संभव होगा वे करेंगे।यह दूसरे दिन की प्रस्तुति थी।

निर्देशक प्रकाश झा, जो मैथिली रंगमंच को एक नया आयाम देने और राष्ट्रीय नाट्य फलक पर लाने में पिछले 6-7 वर्षों से अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं, हिंदी नाटक में उनका पहला प्रयास था 'बड़ा नटकिया कौन' जो युवा नाट्य महोत्सव के तीसरे दिन की प्रस्तुति थी। नाटक 'बड़ा नटकिया कौन' आज के उपभोक्तावादी जीवन में व्यक्ति की व्यावहारिक उपस्थिति पर एक सपाट बयान था। आज के जीवन की एक बड़ी विडम्बना यह है कि मंच से कहीं अधिक दैनिक जीवन में हमारे व्यवहार अतिरंजित, असामान्य और नाटकीय होने लगे हैं। ऐसे में किसी पेशेवर नटकिया (रंगकर्मी) की ऊर्जा एक ओर पारंपरिक कलाओं के प्रति सम्मान और संरक्षण के अभाव से, तो दूसरी ओर दैनिक जीवन के नटकियों से जूझने में खप रही है। 'बड़ा नटकिया कौन' ऐसे ही कुछ असली-नकली असामान्य चरित्रों की गाथा थी जिसने गाँव से शहर तक व्याप्त जीवन की सहज-सरल और दिलचस्प पृष्ठभूमि को खुद में समेटा था।

महान संस्कृत कवि और नाट्यकार कालिदास के जीवन पर केद्रित 'आषाढ़ का एक दिन' मोहन राकेश का पहला हिंदी नाटक है और पहला ही आधुनिक हिंदी नाटक भी माना गया है। कालिदास आधुनिक कलाकार का प्रतीक है जो अपनी कला, अपनी उपस्थिति, अपनी स्वतंत्रता, अपनी पहचान के लिए सतत संघर्षरत है। दूसरी ओर मल्लिका है जो कालिदास की सहज प्रेरणा है।जो उसे एक महान कवि/कलाकार बनते देखना चाहती है और उसके लिए त्याग भी करती है।यह कथा है आकांक्षओँ की, प्रेम की, अंतर्द्वंद्व की, त्याग की और भी ना जाने किन मूक अभिव्यक्तियों की। नाटक महाकवि कालिदास के जीवन और काल की एक सशक्त झांकी प्रस्तुत करता है।भूपेश जोशी द्वारा निर्देशित यह नाटक चौथे दिन की प्रस्तुति थी।    

इस समारोह के पांचवें दिन की प्रस्तुति थीमहाकवि  भास द्वारा रचित और भूमिकेश्वर सिंह द्वारा निर्देशित  'प्रतिज्ञा यौगन्धरायण' जो समकालीन राजनैतिक  कुचक्रों और राष्ट्रीय निष्ठां एवं साहस के परिप्रेक्ष्य में कई दृष्टियों से  महत्त्वपूर्ण है। इसमें एक ओर आत्मविश्वासहीन उज्जयिनी नरेश प्रद्योत हैं तो दूसरी ओर पडोसी राज्य कौशाम्बी का पराक्रमी, प्रजावत्सल और लोकप्रिय शासक  है।अपने मंत्रियों और अधिकारियों  के निष्ठाहीन एवं स्वार्थलोलुप रवैये के कारण स्वयं में अक्षम और नितांत असहाय प्रद्योत,छल-कपट का सहारा लेकर वत्सराज को बंदी बना लेता है। यहाँ नाटक में  प्रवेश होता है प्रद्योत की पुत्री राजकुमारी वासवदत्ता का। इधर वत्सराज उद्यन का स्वामिभक्त, एकनिष्ठ और कर्तव्यपरायण महामंत्री यौगन्धरायण अपने स्वामी को बंधन मुक्त कराने की प्रतिज्ञा लेता है। उद्यन और यौगन्धरायण की रीति-नीति और कुशाग्र बुद्धि के कारण प्रद्योत पग-पग  पर  असफल होता है।और वासवदत्ता ..... वह उद्यन के साहस, चरित्र और कौशल पर मुग्ध है। इस तरह नाटक को अनेक समसामयिक प्रसंग मिलते  हैं।              

समारोह के  छठे दिन भीष्म साहनी  द्वारा रचित एवं गोविन्द सिंह यादव द्वारा निर्देशित नाटक  'कबिरा  खड़ा बजार मेंका सफल मंचन हुआ। भीष्म साहनी की यह  नाट्य कृति मध्यकालीन वातावरण में संघर्ष कर रहे कबीर को उनके पारिवारिक और सामाजिक  सन्दर्भों सहित आज भी प्रासंगिक बनाती  है। नाटक का मुख्य लक्ष्य आम जन को यह एहसास कराना है कि ईश्वर हममें से हर एक के भीतर ही बसता है।नाटक के मुख्य पात्र कबीर तत्कालीन समय के सभी प्रचलित धर्मों से बुद्धि की अपील करते हैं, किन्तु वे स्वयं किसी धर्म से सम्बंधित नहीं हैं। कबीर की साहित्यिकता सामाजिक जड़ता को तोड़ने  माध्यम बनती है। कबीर की भूमिका को सफलतापूर्वक निभाया - सुधीर रिखारी ने।  
  
सातवें दिन की प्रस्तुति थी विजय तेंदुलकर द्वारा रचित और रोहित त्रिपाठी द्वारा निर्देशित 'ख़ामोश अदालत जारी है'. यह नाटक  प्रेसीडेंट जॉनसन पर एक मुकदमा है जो अणु बम के ख़िलाफ़ है किन्तु नाटक किसी और ही दिशा में चला जाता है। मंडली में एक कलाकार की उपस्थिति और नए कलाकार की रिहर्सल में ही पूरा नाटक समाप्त हो जाता है।दरअसल वो रिहर्सल किसी व्यक्तिगत जीवन के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। अंत तक आते-आते पूरे माहौल पर एक लम्बी ख़ामोशी छा जाती है। जिस उद्देश्य से मंडली नाटक दिखाने आती है वो उद्देश्य पूरा नहीं होता। इस नाटक के माध्यम से लेखक ने पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की विवशता को दिखाने का प्रयत्न किया है, जो इस समाज के लिए एक कटाक्ष है।        

आठवें दिन की प्रस्तुति थी मोहन राकेश द्वारा रचित चंद्रशेखर शर्मा द्वारा निर्देशित 'आधे-अधूरे'. यह इस समारोह की  अंतिम प्रस्तुति थी। यह नाटक एक मध्यवर्गीय परिवार के बिखराव और इसके सामाजिक, पारिवारिक मूल्यों की गवेषणा करता है। बदलते हुए शहरी जीवन के परिप्रेक्ष्य में यह स्त्री-पुरुष संबंधों का खुलासा करता है। नाटक का कथानक एक अधेड़ औरत सावित्री के इर्द- गिर्द   घूमता है जो अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट नहीं है पर परिस्थितियों से समझौते को भी तैयार नहीं। वो अपने बिखरे परिवार के टुकड़ों को समेटने का भरसक प्रयास करती है पर व्यर्थ ...और इसी कुंठा में वह किसी ऐसे पुरुष को तलाशने में जुटती है जो पूर्ण हो और उसकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित कर सके क्योंकि उसका खुद का पति उसकी ज़रूरतें  कर पाने  में असमर्थ है। उनके अशांत और क्षोभोन्मुख संबंधों की परछाई उनके बच्चों के जीवन पर भी पड़ती है।   

4 comments:

Blogvarta ने कहा…

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आनंद कुमार द्विवेदी ने कहा…

इस बार इस दुर्लभ अवसर का साक्षी होने से मैं चूक गया, मंजरी जी ने काफी हद तक जानकारी दे दी है आभार उनका !

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत शानदार रपट. कभी कभी महानगर में न होना अखर जाता है.

Vandana KL Grover ने कहा…

वाकई रिपोर्टिंग भी एक बहुत बड़ी कला है ..अच्छी और दिलचस्प रिपोर्ट ..

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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