अभी हाल में

:


विजेट आपके ब्लॉग पर

रविवार, 3 मार्च 2013

लैटिन अमेरिका से कुछ कवितायें

पिछले दिनों लैटिन अमेरिकी कवियों के मार्टिन एस्पादा द्वारा संपादित संकलन ' पोएट्री लाइक ब्रेड' को पढ़ते हुए कई कविताओं का अनुवाद भी किया...उन्हीं में से कुछ



राबर्टो सोसा की कवितायें
राबर्ट सोसा 


साझा दुःख

हम
दुनिया भर की माँयें और बेटियाँ
यहाँ करती हैं
उनका इंतज़ार

सुनो हमें. उन्हें ज़िंदा ले गए थे वे, हम उन्हें ज़िंदा वापस चाहती हैं
गौर करो हम पर, गिरफ्तार और लापता बाप और बेटे और भाइयों के नाम पर

हम सर उठाये हुए करती हैं उनका इंतज़ार
एकसाथ यूं कि जैसे किसी घाव पर लगे हुए टाँके

कोई नहीं बाँट सकता
कोई नहीं अलगा सकता हमारे इस साझे दुःख को    


स्मृति संख्या १ और २

मेरी सबसे पुरानी स्मृति
शुरू होती है एक जल कर खत्म हो चुकी स्ट्रीटलाईट से
और खत्म होती है एक मुर्दा गली में बहते हुए
सार्वजनिक नल से

मेरी दूसरी स्मृति एक ताबूत से पैदा होती है
हिंसक रूप से मृत ताबूतों का एक जुलूस


खत

मैं दिलासा देता हूँ खुद को कि किसी दिन
किराने की इस बेचारी दुकान का मालिक
मेरे लिखे हुए पन्नों से कागज़ के ठोंगे बनाएगा
जिसमें भविष्य के उन लोगों को देगा काफी और शक्कर
जो ज़ाहिर वजूहात से
आज नहीं ले सकते काफी और शक्कर का स्वाद 





मार्टिन एस्पादा की एक कविता 

चर्च के चौकीदार जार्ज ने अंततः छोड़ दिया काम 

कोई नहीं पूछता
कि कहाँ से हूँ मैं
निश्चित तौर पर
चौकीदारों के देश से ही होउंगा मैं
हमेशा से पोछा लगाया है मैंने इस फर्श पर
उनकी समझ के शहर के बाहर
तुम अवैध अप्रवासियों का कैम्प भर हो, होंडुरास

कोई नहीं ले सकता मेरा नाम
मैं स्नानागार के उत्सवों का मेजबान हूँ
शौचालय को रखता हूँ सरगर्म शराब की प्याली की तरह
नष्ट हो जाता है मेरे नाम का स्पेनिश संगीत
जब मेहमान शिकायत करते हैं
टायलेट पेपर्स के बारे में

सच ही होगा
जो वे कहते हैं
चपल हूँ मैं
पर व्यवहार बुरा है मेरा

कोई नहीं जानता
कि मैं छोड़ रहा हूँ आज रात यह काम
हो सकता है कि पोछा
एक मदमस्त समुद्री फेन की तरह
खुद ही चल पड़े
अपने धूसर रेशेदार जालों से
साफ करता हुआ फर्श
फिर लोग इसे ही कहेंगे जार्ज.



 रॉक डाल्टन की एक कविता 



तुम्हारी ही तरह


तुम्हारी ही तरह मैं
चाहता हूँ प्रेम को, ज़िंदगी को
चीजों की खुशबू को
जनवरी के आसमानी-नीले भू-दृश्य को

और मेरा भी लहू गर्म हो उठता है
और मैं हंसता हूँ आँखों में
और जानता हूँ आंसूओं की कलियों को

मुझे भरोसा है कि बहुत खूबसूरत है यह दुनिया
और रोटी ही की तरह  कविता भी है सभी के लिए

और यह कि मेरी शिराएं नहीं खत्म होतीं मेरी ही देह में
बल्कि जातीं हैं उनके साझा लहू तक
जो लड़ते हैं ज़िन्दगी की खातिर 
प्रेम की खातिर
भू-दृश्यों की खातिर 
छोटी-छोटी चीजों की खातिर 
और सबके लिए रोटी और कविता के खातिर  

10 comments:

रामजी तिवारी ने कहा…

कवितायें दिल में उतर जाती हैं | आपका चयन और अनुवाद दोनों उन्हें और हमारे करीब लाता है | मुझे ख़ुशी है , कि ब्लागों के इस मंच ने समकालीन विश्व कविता से हमारा इतना बढ़िया परिचय कराया है | 'पढ़ते-पढ़ते' 'कर्मनाशा' कबाडखाना' और 'सबद' के साथ-साथ 'असुविधा' का यह प्रयास भी हर अर्थों में मानीखेज है | आपको बहुत बधाई |

' मिसिर' ने कहा…

विश्वस्तरीय साहित्य से हिन्दी के पाठक को जोड़ने के इस प्रयास का स्वागत ...सुन्दर कविताओं का सहज अनुवाद सचमुच सराहनीय है !

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

bahut acchi kavitaon ka chayan kiya hai ashok ji.. inhe hamaari bhasha me hum tak pahunchaane ka bahut bahut shukriya... :)

sarita sharma ने कहा…

आजकल गोर्की का उपन्यास मदर पढ़ रही हूँ.मजदूरों का सत्ता के खिलाफ विद्रोह और उनका दमन किये जाने के दृश्य इन कविताओं के माहौल का चित्रण लगते हैं.महत्वपूर्ण कविताओं का सहज अनुवाद.

vandana gupta ने कहा…

बेहतरीन कवितायें

विजय कुमार ने कहा…

चयन और अनुवाद दोनों उत्तम . बधाई .

Shamshad Elahee "Shams" ने कहा…

अशोक भाई, अब हिन्दी का पाठक विश्व साहित्य से वंचित नहीं रहेगा. आप और मुकेश पटेल इस दिशा में जो सजग पहलकदमी ले रहे हैं वह स्वागत योग्य है. आप साहित्य की सर्वोच्च सेवा कर रहे है . सभी कविताएं स्तरीय इस लिए हैं कि उनका अनुवाद बहुत शानदार किया है आपने. बधाई स्वीकार करे.

अपर्णा मनोज ने कहा…

शानदार कविताएँ ..सहज अनुवाद

Amit sharma upmanyu ने कहा…

बहुत खूबसूरत कवितायें! उतना ही ख़ूबसूरत और सहज अनुवाद. इस श्रंखला को जारी रखें.

प्रशान्त ने कहा…

सजीव अनुवाद....शुक्रिया.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

फेसबुक से आये साथी

 
Copyright (c) 2010 असुविधा.... and Powered by Blogger.