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शुक्रवार, 15 मार्च 2013

अनीता भारती की कवितायें


गंभीर अध्येता और चिंतक अनीता भारती की कवितायें उनके वैचारिक संघर्ष का ही हथियार है. यहाँ वही जद्दोजेहद और उत्पीडक सामाजिक संस्थाओं के खिलाफ वही क्रोध से भरा, लेकिन तार्किक प्रतिरोध है जो उनके गद्य में दिखता है. चालू मुहाविरों से आगे ये कवितायें देश और समाज के उस हिस्से तक जाती हैं, जिन पर कविता में बात करना आजकल चलन से बाहर है. ज़ाहिर है कविता के अभ्यस्त पाठकों को इनसे असुविधा होगी ही...इन कविताओं का उद्देश्य भी तो वही है.

 


*आठ मार्च 

बीते सालों की तरह
बीत जायेगा आठ मार्च

भागो कमलासुनीता, बिमला
मुँहअंधेरे उठ
ले चलेगी ढोर-डंगर
जायेगी बेगार करने
खेत खलिहानों में
उठायेगी बांह भर-भर ईंटें
खटेगी दिन भर पेट की भट्टी में
बितायेगी इस आस पर दिन
कि काम जल्दी निपटे---

फिर धूप में बैठ दो पल
एक छोटी सी बीड़ी के सहारे
मिटायेगी थकान
सच, महिला दिवस
इनके लिए अभी सपना है

बीतेगा उनके लिए भी
यह आठ मार्च
जो क्लर्क है, आया है  
टीचर है सेल्सगर्ल है
जो खटती और बजती है
घर-बाहर के बीच
आधे दाम पर दिन-रात
काम करती है
इस उम्मीद से कि प्याला भर चाय
सकून से पी पायेगी
महिला दिवस
अभी भी उनकी ज़रूरत है।

कितनी सरिताएं
कंधों पर झोले लादे
समाज बदलाव के विचार से
लबरेज
अपनी फटी जिन्स पर
आदर्श का मफलर डाल
मानवता के फटे जूते पहन
जायेंगी
गांव- देहातस्लम
और एक दिन
मारी जायेंगी
शायद महिला दिवस
उनसे ही आयेगा-----



* भेददृष्टि 

सच बताओ तुम
क्या सच हमारी जमात
स्त्री विरोधी है ?
स्त्री एकता, स्त्री आंदोलन को
तोड़ने वाली
या फिर उसे विभाजित कर
भटकाने वाली ?

तुम्हारी जमात ने कहा
हमें स्वतंत्रता चाहिए
हमारी जमात ने कहा
स्वतंत्रता हमें भी चाहिए
तुमसे और
तुम्हारे जाति आधारित समाज से

तुम्हारी जमात ने कहा
हमें समानता चाहिए
हमारी जमात ने कहा
समानता सिर्फ़
स्त्री की पुरुष से ही क्यों ?
दलित की सवर्ण से क्यों नहीं ?

तुम्हारी जमात ने कहा
लम्बे संधर्ष के बाद
हम अब
उस मुकाम पर आ गये हैं
कि जहां हम अपनी देह
एक्प्लोर कर सके
हमारी जमात ने कहा
बेशक देह एक्सप्लोर करो
पर उस झाडू लगाती
खेत रोपती पत्थर तोडती
रोज बलत्कृत होने को मजबूर
देह को भी मत भूलो

तुम्हारी जमात ने कहा
अब हम उनकी बराबरी करेंगे
जो हमेशा हमें दबाते आये है
हमारी जमात ने कहा कि
पहले उनको बराबर लाओ
जिनको हमेशा से
सब दबाते आए है

तुमने कहा पितृसत्ता
हमने कहा
ब्राह्मणवादी पितृसत्ता

तुम्हारी जमात ने कहा
बस याद रखो
स्त्री तो स्त्री होती है----
न वह दलित होती है न ही सवर्ण
हमारी जमात ने कहा
समाज में वर्ग है श्रेणी है जाति है
इसलिए स्त्री
दलित है ब्राहमण है
क्षत्रिय है वैश्य है शूद्र है

और बस इस तरह
तुम्हारी और हमारी जमात की
सतत लड़ाई चलती है
अब तुम्हीं बताओ
क्या हम स्त्री विरोधी हैं ?

  
* झुनझुना 

जब भी मैं
आवाज उठाती हूँ
तुम तुरंत
जड़ देना चाहती हो
मेरे मुंह पर
नैतिकतावाद की पट्टी

मैंने तुम्हारे सामने
तुम्हारे बराबर खडे होकर
कुछ सवाल क्या पूछे
कि तुमने मुझे एक तस्वीर की भाँति
कई फतवों से मढ़ दिया
मसलन मर्द की सहेली
औरतों की आज़ादी की दुश्मन
पितृसत्ता की पैरोकार
आदि-आदि

मैने तुमसे पूछा
स्त्री आजादी का मतलब क्या है ?
क्या अनेक मर्दों से
संबंध बनाने की स्वतंत्रता ?
या फिर अपने निर्णय
स्वयं लेने की क्षमता ?
या कोरी उच्छृंखलता ?
तुमने मुझे स्त्री मुक्ति विरोधी
साबित कर दिया

मैंने तुमसे पूछा
हमारे समाज की औरतों पर
रेप दर रेप पर क्या राय है ?
चुप्पी क्यों है तुम्हारी ?
तुमने कहा
कर तो रही है हम
बलात्कार पर बात
जो रोज हो रहा है
हमारे घर पर हमारे साथ
और आस-पास

मैंने पूछा
क्यों नही लाती तुम
अपनी संवेदनशीलता के दायरे में
गरीब टीसती
दलित औरत का दर्द ?
तुमने कहा
अरे रहती है वे हरदम
हमारे साथ
भीड़ में हमारी आवाज बनकर

मैने पूछा भीड़ कब
मंच का अभिन्न हिस्सा बनेगी?
तुमने झट कहा
अभी नही
अभी वक्त नही है
अभी हमें मत बांटो
अभी हमें जाना है बहुत दूर
पहले ही देर से पहुँचे है यहाँ तक
अब तुम आगे से हटो
सब कुछ रौंदते हुए
आगे बढ़ने दो हमें
तुम्हारे बोलने से
हमारी एकता टूटती है
हमारा संघर्ष बिखरता है
अच्छा है तुम चुपचाप
हमारे साथ रहो
आँख मुँह कान पर पट्टी बाँधे
सब्र का फल हमेशा मीठा होता है
जब हम मुक्त होगी तब
तुम्हारा हिस्सा
तुम्हें बराबर दे देगीं

और तुम मुझे हमेशा
सब्र के झुनझुने से
बहलाना चाहती हो
पर अब इस झुनझुने के पत्थर
घिस चुके है
उनकी आवाज घिसपिट चुकी है
सुनो,
अब अपना झुनझुना
बदल डालो ।


4)

* इतिहास

समय की धूल में दबे
हजारों कदमों की परत हटाती हूं
तो उसके अनोखेपन
त्याग और बलिदान पर
मुग्ध हो जाती हूं

पर
दूसरे ही पल मन टीस उठता है
इतने बेशकिमती कदमों में
मेरा अपना कुछ भी नहीं ?
सुबह की धूप
दिन का उजियारा
चमकती स्वच्छ श्वेत चांदनी
कुछ भी हमारा नहीं है ?

लो,
इतिहास से भी हमारा नाम गायब है
बेदखल हैं हम उससे
फाड दिया गया है
हमारे संघर्ष का पन्ना,

हमें शिकायत है
उस अबोध, निर्मम इतिहास से
कि जिसके लिए
हम दिन-रात
सुबह-शाम
आंधी- तूफान में लड़ते रहे
बनाते रहे अपने निशां
वो ही विद्रूपता से
हमारी झुलसी नंगी पीठ पर
हाथ रख कहता है
तुम अपने पैरों से कब चलीं
तुम्हारे पैर थे ही कब?
तुम तो बस हम पर थीं आश्रित
मैंने ही तुम्हें दी
छाया-माया-काया
अब तुम्हें और क्या चाहिए ?


साथियों,
ये इतिहास झूठा है
मुझे इस पर विश्वास नहीं
ये कभी हमारा था ही नही
मैं तुम्हें फिर से खंगालूगी
मैं कटिबद्ध हूँ
क्योंकि ज़रूरत है आज ये बताना
कि इतने ढेर से कदमों के बीच
एक कदम मेरा भी है

 *फर्क 

अरी सुनो बहनों,
थोड़ा पास आओ
मत शरमाओ
शरमा जाने से
किसी के गुनाह कम नही हो जाते

अरी सुनो,
तुम्हे पसंद है
गोरा-गोरा गोल-गोल
सुंदर चांद
और उसकी चांदनी को पीना

हमें पसंद है
परिश्रम की आग में तपे
लाल तवे पर सिकती
रोटी की गंध

तुम्हे पसंद है
तुम्हारे भव्य मंदिर में रखे
दिव्य देव
और हमें पसंद है
उन पर उंगली उठाना

तुम्हे पसंद है
शब्दों के खेल में
जीवन के पर्याय बताना
प्यार सेक्स बलात्कार
यौनिकता पर थोड़ा
रुमानी होते हुए चर्चा छेड़ना
और हमें पसंद है
इस खेल के व्यापार को
एक विस्फोटक डिब्बे में
बंद कर
एक तिल्ली से उड़ा देना

अब बताओ
कितना फ़र्क है
तुम में और हम में ?


लाल तवे पर सिकती
रोटी की गंध

तुम्हे पसंद है
तुम्हारे भव्य मंदिर में रखे
दिव्य देव
और हमें पसंद है
उन पर उंगली उठाना

तुम्हे पसंद है
शब्दों के खेल में
जीवन के पर्याय बताना
प्यार सेक्स बलात्कार
यौनिकता पर थोड़ा
रुमानी होते हुए चर्चा छेड़ना
और हमें पसंद है
इस खेल के व्यापार को
एक विस्फोटक डिब्बे में
बंद कर
एक तिल्ली से उड़ा देना

अब बताओ
कितना फ़र्क है
तुम में और हम में ?


* कोशिश

इक औरत
जो दिखती है
या बनती है

वह कभी बनना
नहीं चाहती
भूमिकाओं में बंधना
नहीं चाहती

उसके ज़मीर को
जज़ीरों में बांधकर
पुरजोर कोशिश की जाती है
कि वह बने औरत
बस खालिस औरत

भूमिकाओं में बंधा
उसका मन
रोता है
चक्की के पाटों में पिसा
लड़ती है वह अपने से हज़ार बार
रोती है ढोंग पर
धिक्कारती है वह  
अपने औरतपन को-----

मेरी मानो,
उसे एक बार छोड़ के देखो
उतारने दो उसे
अपने भेंड़ के चोले को

फिर देखो
कि वह बहती नदी है
एक बार वह गयी तो    
फिर हाथ नहीं आयेगी
हाथों से फिसल जायेगी।



* रहस्य 

मेरी मां के जमाने में
औरतों की होती थी
नन्हीं दुनिया
जहाँ वे रोज
अचारपापड़ बनाते हुए
झांक लेती थी आह भर
आसमां का छोटा- सा टुकड़ा
नहीं कल्पना करती थीं उड़ने की

खुश थीं वे
सोने-चांदी के बिछुए पहन
उन्हें भाता था
आंगन मे लगा तुलसी का पौधा
बर्तनों को
बड़े लाड-प्यार से
पोंछकर रखती थीं
गोया कि वे उनके बच्चे हों
आंगन की देहरी तक था
उनका दायरा
पिताचाचाताऊपडौसी की
निगाह में
वे अच्छी पत्नी, अच्छी औरत थीं

एक दिन उसने
बोझ से दबी अपनी कमर
कर ली सीधी
अचानक
उसके स्वर में आयी थी गुर्राहट :
क्यों ? आखिर मैं ही क्यों ?
आखिर कब तक चलेगी
गाड़ी एक पहिये पर ?
उस दिन मेरी मां के अन्दर
मेरे ज़माने की औरत ने
जन्म लिया------

मेरे ज़माने की औरतें
कसमसाती है
झगड़ती हैंचिल्लाती हैं
पर बेड़ियां नहीं तोड़ पाती है
कमा-कमा कर
दोहरी हुई जाती हैं
उधार के पंख लगाइधर से उधर
घर से दफ्तर,  दफ्तर से घर
फिर लौट आती हैं अपने डेरे में

पर मेरी बेटी
जो हम सबके भविष्य की
सुनहरी नींव है
जो जन्म घुट्टी में सीख रही है
सवाल करना   
कब से ? क्यों ? कैसे ? किसका ?
मुझे पता है
वो हालत बदल देगी
उसमें है वो जज्बा
लड़ने काबराबरी करने का
क्योंकि उसे पता है
संगठनएकता का रहस्य





8)
* आकांक्षा 

सुनो,
नहीं चाहिए हमें
तुम्हारी कृपादृष्टि
नहीं चाहिए
तुम्हारा कामधेनु वरदहस्त
नहीं चाहिए
तुम्हारे शब्द-तमगे
नहीं चाहिए
तुम्हारी प्रशंसात्मक लोलुप नज़रें
नहीं चाहिए
तुम्हारे झुर्रीदार कांपते हाथों का
लिजलिजा स्नेह
अब हमें नहीं करनी
किसी की जी- हजूरी
हम हैं खुद गढ़ी औरतें

हम लड़ेंगे गिरेंगे
लड़खड़ाएंगे
उठेंगे चलेंगे
और अपने ही मजबूत पैरों से
नाप लेंगे दुनिया
हमें चाहिए खुला बादलरहित
साफ आसमान
जो सिर्फ़ अपना हो।






* तुम्हें लगता है 

तुम चाहते हो
तुम्हारे सुर में मिला दे हम
अपना सुर
क्योंकि तुम्हे लगता है
हमारे सुर का अस्तित्व
तभी बचेगा

तुम चाहते हो
तुम्हारे ख्याब में हम
अपने ख्याब जोड़ दे
क्योंकि तुम्हारा मानना है
तभी पूरे होंगे हमारे ख्याब 

तुम चाहते हो
तुम्हारी मंजिल के साथ खींच लाएं हम
अपनी मंजिल
क्योंकि तुम्हारी धारणा है
तभी हमारी मंजिल को
दिशा मिलेगी

तुम चाहते हो
अपने मनपसंद रंग में रंगना हमको
क्योंकि तुम्हे लगता है
सबकी पसंद एक सी होनी चाहिए

पर हमें पसंद है
अपनी तरह के रंग में
रंगे ख्बाव, सुर और मंजिल






* मेरे पक्ष में 

मेरे तुम्हारे बीच में
बीसियों तरह
के फासले हैं-------
उन फासलों को
मैंने बड़ी शिद्दत से
पार करने की कोशिश की
पर नहीं कर पायी
वह फासला हमारे तुम्हारे बीच
किसी गंदे नाले की तरह पसरा पड़ा है
जिसकी बदबू हमारे वजूद को
ढक लेती है

एक फासला
मेरे तुम्हारे बीच
तुम्हारे अधिक इंसान होने
और मेरे इंसान
न समझे जाने का है
जो एक खून भरी खाई की तरह
अटल खड़ा है
जिसमें तुम्हारी परछाईं
हरी घास पर चलते हुए
बाघ की तरह दिखती है
और मेरी एक मासूम छौने की तरह
जिसने अभी-अभी एकदम चलना सीखा है।

एक और फासला
मेरे तुम्हारे बीच
औरत और मर्द होने का है
जो हमारे बीच गहरे कुएं की तरह
पसरा पड़ा है
जिसमें झांकने में तुम्हारी शक्ल
किसी आदमखोर की तरह
दिखती है

आखिरी फासला
तुम्हारे हमारे बीच
जीने मरने की नींव पर
खड़ा है
तुम्हारे जीने की क्रूर लालसा
और हमारे मरने की मजबूरी के बीच
काँटे की टक्कर है

लेकिन यह भी तय है
मेरे अजीज दोस्त
कि इस फासले की जीत
अवश्य ही मेरे पक्ष में होगी



स्यूडो फेमनिस्ट

सुनो,
सूडो फेमनिस्ट !
तुम्हारे स्त्री विचारों ने
फैला दी है चारो तरफ
बास
तुम्हारे अधकचरे विचार
पैदा कर रहे है
समाज में द्वंद
आज़ादी स्वतंत्रता समानता
और मुक्ति के नाम पर
गफ़लत फैला रहे है

एक की आजादी नहीं होती
सबकी आजादी
इसलिए
सबकी आजादी की बात करो
मुक्ति भी
एक दूसरे से जुड़ी होती है
जैसे माला में
मोती से मोती जुडे होते हैं
किसी एक वर्ग के मुक्त होने से
नहीं हो सकते सभी मुक्त

तुम्हारी अपनी कुंठाए
अपनी महत्वकांक्षा
केवल और केवल
अपने बारे में सोचते हुए
आंदोलन और आजादी के
नाम पर
भोगविलास में डूबॆ जीवन के
झंडे गाड़ना बंद करो।

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अनिता भारती दलित-स्त्री साहित्य की गंभीर चिंतक एवं आन्दोलनधर्मी लेखिका हैं. कई किताबें, अनेक महतवपूर्ण किताबों का सम्पादन. दिल्ली में रहती हैं.

सम्पर्क 
मोबाईल-9899700767



















































6 comments:

समर ने कहा…

सत्य से सीधी भिडंत करती यह कवितायें सबको पसंद नहीं आयेंगी.आयें भी कैसे, मुक्तिकारी हीरे से लेकर महिला दिवस ब्यूटी पैकेज और स्पा के दौर में यह कवितायें झाडूवालियों के सपने वाले महिला दिवस, सेल्सगर्ल्स की ज़रूरतों वाले महिला दिवस की, फटी जींस पर आदर्श का मफलर डाले स्कूल जा रही लड़कियों के महिला दिवस की बात कर रही हैं.
अब इन कविताओं में स्तन कैंसर में भी एंद्रियकता खोज लेने वाली अनामिका और पवन करण जैसी सलाहियत होती तो लोग पढ़ते भी, सड़कों पर रगड़ खाती झाडू की आवाज वाला खुरदुरापन कौन पढ़ेगा? सलाह भी यही है.. यह कवितायें तभी पढ़ें जब आप में यथार्थ से मुठभेड़ का साहस हो अन्यथा हिंदी साहित्य की रसरंजित गलियाँ हैं ही

पुष्यमित्र ने कहा…

सीधी-साधी पर सटीक और दमदार कविताएं...पढ़ाने के लिए धन्यवाद

chandra kanta ने कहा…

‘भेददृष्टि’ में ‘तुम्हारी जमात’ और ‘हमारी जमात’ के मध्य संवाद पढ़कर लगा जैसे यह पद्य रंगमंच पर उतर आया हो. ‘झुनझुना’ में यथार्थवादी बिंब व्यवस्था से किये जा रहे प्रश्नों की संवेदना को और घनीभूत कर रहे हैं सबसे ख़ास बात है शब्दों की सहजता जो कहीं भी बोझिल नहीं होते ..
अनीता दी की स्त्री प्रश्न करती है , वह अपना पक्ष रखती है और उन्ही प्रश्नों के माध्यम से व्यवस्था के खोट अनावृत करती है ..कथ्य की विविधता कविता में विषयों के यथास्थितिवाद को तोडती है .इन यथार्थपरक रचनाओं में शिल्प के शास्त्रीय सौन्दर्य को ढूँढना इन रचनाओं से अन्याय करना होगा इनका शिल्प तो इनकी ‘संघर्ष चेतना’ है.पुनः यह साहित्य में उस शास्त्रीयता को एक चुनौती भी है जो शिल्पगत पांडित्य के इर्द गिर्द बुनी गयी है.

Umesh ने कहा…

प्रचलित मानदंडों और संघर्ष के स्थापित मार्गों की शुचिता पर प्रश्नचिन्ह उठाती और समस्याओं पर नए तरीके से सोचने को मजबूर करती कविताएँ …

draradhana ने कहा…

पिछले दिनों अनिता जी का कविता-संग्रह उनसे सस्नेह प्राप्त हुआ था, तभी बहुत सी कविताएँ एक सांस में पढ़ती चली गयी थी. इन कविताओं में जो प्रश्न उठाये गए हैं, कहीं न कहीं हम सब इन प्रश्नों से जूझते रहे हैं, इसलिए अपनी सी लगीं ये कविताएँ. सीधे और सधे शब्दों में संवाद करना इनकी विशेषता है.

draradhana ने कहा…

पिछले दिनों अनिता जी का कविता-संग्रह उनसे सस्नेह प्राप्त हुआ था, तभी बहुत सी कविताएँ एक सांस में पढ़ती चली गयी थी. इन कविताओं में जो प्रश्न उठाये गए हैं, कहीं न कहीं हम सब इन प्रश्नों से जूझते रहे हैं, इसलिए अपनी सी लगीं ये कविताएँ. सीधे और सधे शब्दों में संवाद करना इनकी विशेषता है.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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