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गुरुवार, 15 अगस्त 2013

प्रांजल धर की नई कवितायें

प्रांजल की कवितायें आप असुविधा पर पहले भी पढ़ चुके हैं. उन्हें इस वर्ष का प्रतिष्ठित भारत भूषण सम्मान मिला है. असुविधा की ओर से उन्हें बधाई. यह सम्मान इस युवा कवि की काव्य क्षमताओं और संभावनाओं का स्वीकार है. इस अवसर पर कुछ नया कहने की जगह मैं वही दुहराना चाहूंगा जो मैंने पहली बार उनकी कवितायें पोस्ट करते हुए कहा था. "प्रांजल हिन्दी की युवतम पीढ़ी के उन कवियों में से हैं जिनकी काव्यचेतना एक तरफ अद्यतन चिताओं और विडम्बनाओं से जुड़ती है तो दूसरी तरह उसकी जड़ें बहुत गहराई से अपनी परंपरा से जीवन रस लेती हैं. विश्व साहित्य के गहरे अध्येता प्रांजल साहित्य के अलावा दर्शनराजनीति और अन्य विषयों की भी गहरी समझ रखते हैं. उनकी कविताओं में एक खास तरह का विट बेहद तरल रूप में आता है जो उनकी अभिव्यक्ति को और अधिक मारक बनाता है. उनके यहाँ जोर जादूई बिम्बों के सहारे चौंकाने पर नहीं है. बल्कि विडंबनाओं को तार-तार कर देने वाले सहज लेकिन मानीखेज बिम्ब उनकी कविताओं की खासियत हैं."    उन्हें एक बार और बधाई और यह उम्मीद की वह लगातार ऐसी कवितायें संभव करते रहेंगे जो हमारे समय और समाज में हस्तक्षेपकारी भूमिकाएं निभा सकें और वैकल्पिक दुनिया की लड़ाई में लगे लोगों के हाथों का हथियार बन सकें.




प्रांजल की यह तस्वीर मिहिर पांड्या ने कविता समय 2 के दौरान जयपुर में खींचीं थी 







अजनबी

तो क्या समझूँ, क्या मानूँ
क्या न समझूँ, क्या न मानूँ
क्या यह
कि वह जंगली आदमी
जो रात में ओढ़ा गया था
मुझे चादर, मेरे पाँव तक;
वह क्रेता था
मेरी भावनाओं का
सहानुभूतियों का
या विक्रेता था
अपने इरादों का, चालों का
घनचक्कर जालों का
या कि कोई दुश्मन था
     पिछले पुराने सालों का?

किसी अजनबी की सिर्फ़ एक
छोटी-सी सहायता
एक ही साथ
कितने बड़े-बड़े सवाल
     खड़े कर जाती है
जिन्हें सोचकर अब
पूरी की पूरी रात
     नींद नहीं आती है।





सूना आकाश

जब भी देखा है शिराय लिली को
उखरूल याद आ गया है
छोटे-से हृदय के भीतर मानो
माजुली समा गया है।
लोहित, सरमती, मानस, काजीरंगा
हाथी, बाघ, गैंडे और कमीज की बायीं बाँह पर बैठा
पूर्वोत्तर का लाचार पतंगा !

बैकाल के ओल्खोन से कम नहीं है
न ही महानायक के सुपीरियर या
मिशिगन वाले ग्रेट लेक्स के गीत से
न ही किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के
स्वर्णिम अतीत से !
न ही होलीफ़ील्ड-टायसन की कुश्ती से
और न ही
माइकल जैक्सन या गोरी नायिकाओं के
कानफोड़ू संगीत से !

तेजू के पास का परशुराम कुण्ड
संतरे, अनन्नास और ताम्बुल के पेड़
ह्वेनसांग के चबूतरे पर सुन्दर पक्षियों का
मनमोहक झुण्ड।

ब्रह्मपुत्र और बराक की घाटियों में
महसूस की है एक भयंकर प्यास –
इतना सूना भी नहीं रहा करता था ये आकाश !





स्वप्न


उस्मान !
यही नाम था उसका,
फटफटिया मोटरसाइकिल
चलाता था मौत के कुँए में;
फिर भी तीन सौ पैंसठ में से
तकरीबन नब्बे दिन तरसता था
भरपेट खाने को,
बेबस था यह कारनामा दिखाने को
क्या बचा यहाँ उसे पाने को ?
उसकी हृदयगति ईसीजी की
पकड़ में नहीं आती।
आ ही नहीं सकती।
हीमोग्लोबिन का लेवल
कम है काफी।
दिन-रात खटकर भी कभी हँसा नहीं
कोई सपना उसकी आँखों में बसा नहीं
ऐसी नाइंसाफ़ी !
क्या करे ? मर-मर कर जिये
या जी-जीकर मरे ?
थोड़े उबाऊ किस्म के ये घटिया
सवाल, फिलहाल
अनुत्तरित मौन के दायरे में चले गये हैं,
अँग्रेजी में कहें तो बी.ए. पास है,
हिन्दी में स्नातक
फिर भी वह स्वप्न तक नहीं देख सकता,
सपनों की फ्रायडीय व्याख्या तो
बड़ी दूर की कौड़ी है !



सुबकते हैं अक्षर

तुम्हारे दुःस्वप्न के आवर्तन से
राह बदल जाती मेरी।
बढ़ जाता भटकाव मेरा।
कुछ सीखा भी नहीं मेरे मन ने
खुद को मसोसने के सिवा।
अनगिनत, पर महदूद कामनाओं के ज्वार में
प्रतिस्नेह की रोशनाई ही आसरा रही
उम्र भर के लिए।
कितना कुछ लिख-लिखकर मिटाया उन्होंने
और ख़त्म कर दी
जतन से बटोरी अपनापे की सारी गाढ़ी रोशनाई।
अब हिचकियाँ लेते सुबकते हैं अक्षर।
..............................................................
पुरस्कृत कविता 
कुछ भी कहना ख़तरे से खाली नहीं

इतना तो कहा ही जा सकता है कि कुछ भी कहना
ख़तरे से खाली नहीं रहा अब
इसलिए उतना ही देखो, जितना दिखाई दे पहली बार में,
हर दूसरी कोशिश आत्महत्या का सुनहरा आमन्त्रण है
और आत्महत्या कितना बड़ा पाप है, यह सबको नहीं पता,
कुछ बुनकर या विदर्भवासी इसका कुछ-कुछ अर्थ
टूटे-फूटे शब्दों में ज़रूर बता सकते हैं शायद।

मतदान के अधिकार और राजनीतिक लोकतन्त्र के सँकरे
तंग गलियारों से गुज़रकर स्वतन्त्रता की देवी
आज माफ़ियाओं के सिरहाने बैठ गयी है स्थिरचित्त,
न्याय की देवी तो बहुत पहले से विवश है
आँखों पर गहरे एक रंग की पट्टी को बाँधकर बुरी तरह...

बहरहाल दुनिया के बड़े काम आज अनुमानों पर चलते हैं,
- क्रिकेट की मैच-फ़िक्सिंग हो या शेयर बाज़ार के सटोरिये
अनुमान निश्चयात्मकता के ठोस दर्शन से हीन होता है
इसीलिए आपने जो सुना, सम्भव है वह बोला ही न गया हो
और आप जो बोलते हैं, उसके सुने जाने की उम्मीद बहुत कम है...

सुरक्षित संवाद वही हैं जो द्वि-अर्थी हों ताकि
बाद में आपसे कहा जा सके कि मेरा तो मतलब यह था ही नहीं
भ्रान्ति और भ्रम के बीच सन्देह की सँकरी लकीरें रेंगती हैं
इसीलिए
सिर्फ़ इतना ही कहा जा सकता है कि कुछ भी कहना
ख़तरे से खाली नहीं रहा अब !
................................................................


प्रांजल धर, 2710, भूतल, डॉ. मुखर्जी नगर, दिल्ली-110009, मो. 09990665881,

ईमेल- pranjaldhar@gmail.com

4 comments:

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

अजनबी सहित सभी कविताएं रेशा-रेशा असप छोडने वालीं हैं । अनतिम कविता तो बेहद मर्मस्पर्शी है । सचमुच द्विअर्थी संवादों ने सन्देह की पारभासी चादर डाल दी है । अनुमानों से सारे व्यापार चल रहे हैं ।

प्रदीप कांत ने कहा…

सुरक्षित संवाद वही हैं जो द्वि-अर्थी हों ताकि
बाद में आपसे कहा जा सके कि मेरा तो मतलब यह था ही नहीं
भ्रान्ति और भ्रम के बीच सन्देह की सँकरी लकीरें रेंगती हैं
इसीलिए
सिर्फ़ इतना ही कहा जा सकता है कि कुछ भी कहना
ख़तरे से खाली नहीं रहा अब !

____________

बिल्कुल सुरक्षित संवाद वही हैं ....


बेहतरीन कविताएँ

' मिसिर' ने कहा…

निशाने से न चूकने वाली और भीतर तक भेद जाने वाली कवितायेँ ...शानदार प्रस्तुति |प्रांजल धर को हार्दिक बधाई !

Kamal Choudhary ने कहा…

Bahut acchhi kavitain . Salaam!!!

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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