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शनिवार, 30 नवंबर 2013

गौतम राजरिशी की ग़ज़लें


गौतम राजरिशी हिंदी की दुनिया में अब अपरिचित नहीं. ब्लाग्स पर तो खैर उनकी ग़ज़लें शाया होती ही रही हैं, इधर कई सालों से लगातार उनकी कहानियाँ और ग़ज़लें हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में भी छपती रही हैं. ग़ज़ल के फ़ार्म को बखूबी साधते हुए बेहद सादगी और मासूमी से वह न सिर्फ जज़्बात की शायरी करते हैं बल्कि इंसानी मसाइल पर भी पुरअसर टिप्पणी करते जाते हैं. भाषा निर्बाध कि न उर्दू के अल्फाज़ से परहेज़ न हिंदी के और ज़रुरत पड़ने पर स्थानीय भाषाओं से भी लफ्ज़ आकर उनकी शायरी में बड़ी ख़ूबसूरती से पैबस्त हो जाते हैं. हिन्दुस्तानी और गंग-ओ-जमनी जुबान-ओ-तहजीब के इस जहीन नौजवान शाइर का असुविधा पर इस्तकबाल.


(एक)

चुभती-चुभती सी ये कैसी पेड़ों से है उतरी धूप
आंगन-आंगन धीरे-धीरे फैली इस दोपहरी धूप

गर्मी की छुट्‍टी आयी तो गाँवों में फिर महके आम
चौपालों पर चूसे गुठली चुकमुक बैठी शहरी धूप

ज़िक्र उठा है मंदिर-मस्जिद का फिर से अखबारों में
आज सुब्‍ह से बस्ती में है सहमी-सहमी बिखरी धूप

बड़के ने जब चुपके-चुपके कुछ खेतों की काटी मेंड़
आये-जाये छुटके के संग अब तो रोज़ कचहरी धूप

झुग्गी-झोंपड़ पहुंचे कैसे, जब सारी-की-सारी हो
ऊँचे-ऊँचे महलों में ही छितरी-छितरी पसरी धूप

 बाबूजी हैं असमंजस में, छाता लें या रहने दें
जीभ दिखाये लुक-छिप लुक-छिप बादल में चितकबरी धूप

घर आया है फौजी, जब से थमी है गोली सीमा पर
देर तलक अब छत के ऊपर सोती तान मसहरी धूप


(दो)
 देख पंछी जा रहें अपने बसेरों में
चल, हुई अब शाम, लौटें हम भी डेरों में

सुब्‍ह की इस दौड़ में ये थक के भूले हम
लुत्फ़ क्या होता है अलसाये सबेरों में

अब न चौबारों पे वो गप्पें-ठहाकें हैं
गुम पड़ोसी हो गयें ऊँची मुँडेरों में

बंदिशें हैं अब से बाज़ों की उड़ानों पर
सल्तनत आकाश ने बाँटी बटेरों में

देख ली तस्वीर जो तेरी यहाँ इक दिन
खलबली-सी मच गयी सारे चितेरों में

जिसको लूटा था उजालों ने यहाँ पर कल
ढ़ूँढ़ता है आज जाने क्या अँधेरों में

कब पिटारी से निकल दिल्ली गये विषधर
ये सियासत की बहस, अब है सँपेरों में

गज़नियों का खौफ़ कोई हो भला क्यूं कर
जब बँटा हो मुल्क ही सारा लुटेरों में

भीड़ में गुम हो गये सब आपसी रिश्ते
हर बशर अब कैद है अपने ही घेरों में


 (तीन)

हैं जितनी परतें यहां आसमान में शामिल
सभी हुईं मेरी हद्दे-उड़ान में शामिल

बढ़ा है शह्र में रुतबा ज़रा हमारा भी
हुए हैं जब से हम उनके बयान में शामिल

उछाल यूँ ही नहीं बढ़ गई है लहरों की
नदी का ज़ोर भी है कुछ, ढ़लान में शामिल

धुआँ, गुबार, परिंदे, तपिश, घुटन, ख़ुश्बू
हैं बोझ कितने, हवा की थकान में शामिल

थीं क़िस्त जितनी भी ख़्वाबों की बेहिसाब पड़ी
किया है नींद ने सबको लगान में शामिल

बुझी ज़रूर है, लेकिन धुयें की एक लकीर
है अब भी शम्अ के सुलगे गुमान में शामिल

सुना है नाम से तेरे हैं बिकते अफ़साने
मुझे भी कर ले कभी दास्तान में शामिल

कुचल के रख दो भले तुम सवाल सारे अभी
कभी तो होगे मेरे इम्तिहान में शामिल

ज़रा-सी दोस्ती क्या काफ़ियों ने की हमसे
किया ग़ज़ल ने हमें ख़ानदान में शामिल


 (चार) 
इस बात को वैसे तो छुपाया न गया है
सबको ये मगर राज़ बताया न गया है

पर्दे की कहानी है ये पर्दे की ज़ुबानी
बस इसलिए पर्दे को उठाया न गया है

हैं भेद कई अब भी छुपे क़ैद रपट में
कुछ नाम थे शामिल सो दिखाया न गया है

अम्बर की ये साजिश है अजब, चाँद के बदले
दूजे किसी सूरज को उगाया न गया है

हर्फ़ो की ज़ुबानी हो बयां कैसे वो क़िस्सा
लिक्खा न गया है जो सुनाया न गया है

कुछ अहले-ज़ुबां आए तो हैं देने गवाही
आँखों से मगर खौफ़ का साया न गया है

ये रात है नाराज़ जो देखा कि हवा से
दो-एक चरागों को बुझाया न गया है


(पाँच) 

बहो, अब ऐ हवा ! ऐसे कि ये मौसम सुलग उट्ठे
जमीं और आस्माँ वाला हर इक परचम सुलग उट्ठे

सुलग उट्ठे ज़रा-सा और ये, कुछ और ये सूरज
सितारों की धधक में चाँदनी पूनम सुलग उट्ठे

लगाओ आग अब बरसात की बूंदों में थोड़ी-सी
जलाओ रात की परतें, ज़रा शबनम सुलग उट्ठे

उतर आओ हिमालय से पिघल कर बर्फ ऐ ! सारी
मचे तूफ़ान यूँ गंगो-जमन, झेलम सुलग उट्ठे

झिझोड़ो सब को, गहरी नींद में सोये हुये हैं जो
कि अलसाया हुआ मदहोश ये आलम सुलग उट्ठे

हटा दो पट्टियाँ सारी, सभी ज़ख़्मों को रिसने दो
कुरेदो टीस को इतना कि अब मरहम सुलग उट्ठे

मचलने दो धुनों को कुछ, कसो हर तार थोड़ा और
सुने जो चीख़ हर आलाप की, सरगम सुलग उट्ठे

मचाओ शोर ऐ ख़ामोश बरगद की भली शाखों
है बैठा ध्यान में जो लीन, वो 'गौतम' सुलग उट्ठे

                                                                                                                                                                                                                                                                                 (छः) 
 हवा जब किसी की कहानी कहे है
नये मौसमों की जुबानी कहे है

फ़साना है जिस्मों का बेशक ज़मीनी
मगर रूह तो आसमानी कहे है

तुझे चल, ज़रा-सा मैं मीठा बना दूँ
समन्दर से दरिया का पानी कहे है

डसा रतजगों ने है ख़्वाबों को फिर से
सुलगती हुई रातरानी कहे है

लटें चंद चांदी की बख़्शीं तुझे, जा
विदा लेती मुझसे जवानी कहे है

है चढ़ने लगी फिर से ढ़लती हुई उम्र
तेरी शर्ट ये ज़ाफ़रानी कहे है

नयी बात हो अब नये गीत छेड़ो
गुजरती घड़ी हर पुरानी कहे है


 (सात)

न समझो बुझ चुकी है आग, गर शोला न दिखता है
दबी होती है चिंगारी, धुआँ जब तक भी उठता है

बड़े हो तुम कि तुम तो चाँदनी से घर सजाते हो
हमारी झुग्गियों में चाँद भी छन-छन के चुभता है

गया वो इस अदा से छोड़ कर चौखट कि मत पूछो
 हर इक आहट पे अब देखो ये दरवाजा तड़पता है

बना कर इस क़दर ऊँचे महल, तू छीन मत मुझसे
हवा का एक झोंका जो मेरी खिड़की में रहता है

चलो, चलते रहो, पहचान रुकने से नहीं बनती
बहे दरिया तो पानी पत्थरों पर नाम लिखता है

वो बचपन में कभी जो तितलियाँ पकड़ी थीं बागों में
बरस बीते, न अब तक रंग हाथों से उतरता है

बता ऐ आस्माँ कुछ तो कि करने चाँद को रौशन
तपिश दिन भर लिये सूरज भला क्यूँ रोज़ जलता है

कहो मत खोलने मुट्ठी हमारी, देख लो पहले
कि कैसे बंद मुट्ठी से यहाँ तूफ़ान रिसता है

किताबें बंद हैं यादों की जब सारी मेरे मन में
ये क़िस्से ज़ेह्‍न में माज़ी के रह-रह कौन पढ़ता है

कई रातें उनींदी करवटों में बीतती हैं जब
कि तब जाकर नया कोई ग़ज़ल का शेर बनता है




14 comments:

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

गौतम ने हिन्‍दी में ग़ज़ल कहने का अपना मुहावरा अर्जित किया है वरना तो लोग दुश्‍यन्‍त की लकीर पीटते रहे या बाद में अदम के स्‍वर में बोलने की अटपटी कोशिशें की गईं। जिनके अपने स्‍वर थे उनके पास कहने को कुछ नहीं था। गौतम के पास स्‍वर,अपनी भाषा, अपना लहजा है और कहने के लिए भी बहुत कुछ.....उसे पढ़ना हमेशा सुखद अहसास होता है। वो ग़ज़ल कहने की कला जानता है पर कहन में कलाप्रवीण की तरह उपस्थित नहीं होता, अगल-बगल के किसी आत्‍मीय की तरह बोलता-बतियाता है। एक कठिन जीवन चुनते हुए उसने विधा इतनी नाज़ुक चुनी है - इसे भी समझा जाना चाहिए।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (01-112-2013) को "निर्विकार होना ही पड़ता है" (चर्चा मंचःअंक 1448)
पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (01-112-2013) को "निर्विकार होना ही पड़ता है" (चर्चा मंचःअंक 1448)
पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

बेहद की खूबसूरती ,अभिनव रूपकत्व लिए हैं तमाम गज़लें।

Onkar ने कहा…

एक से बढ़कर एक

गौतम राजरिशी ने कहा…

नवाज़िश करम शुक्रिया मेहरबानी...आप सबों का !

Ankit Joshi ने कहा…

मेरे महबूब शायर। गौतम साहब की ग़ज़लें पढ़ने वाले को अपने जादुई तिलिस्म में क़ैद कर लेती है और यक़ीन मानिये उस क़ैद से छूटना भी कोई नहीं चाहता। हर शेर चहलकदमी करता हुआ साथ चलता है और न जाने कब होंठ पर गुनगुनाने के लहजे में अपनी शक्ल ढूँढ लेता है पता ही नहीं चलता।

Ankit Joshi ने कहा…

मेरे महबूब शायर। गौतम साहब की ग़ज़लें पढ़ने वाले को अपने जादुई तिलिस्म में क़ैद कर लेती है और यक़ीन मानिये उस क़ैद से छूटना भी कोई नहीं चाहता। हर शेर चहलकदमी करता हुआ साथ चलता है और न जाने कब होंठ पर गुनगुनाने के लहजे में अपनी शक्ल ढूँढ लेता है पता ही नहीं चलता।

नवनीत नीरव ने कहा…

बढ़िया साधा है आपने शब्दों को गजलों के रूप में..पहले भी पढ़ा है आपको...आज भी पढ़ा...बेशक..उम्दा.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

गौतम के बारे में कुछ भी कहना सूरज को चिराग दिखाना है , ये मुहावरा हालाँकि बहुत घिसा पिटा है लेकिन गौतम के लिए इस से बेहतर दूसरा कोई मुहावरा दिमाग में आता ही नहीं है . ग़ज़ल सदियों से लिखी जा रही है लेकिन कोई भी ग़ज़लकार बड़ा सिर्फ अपने कहन के ढंग से होता है वर्ना तो सदियों से ना इंसान में कोई मूलभूत बदलाव आया है न हालात में। उन्हीं घिसी पिटी बातों को नए ढंग से कहने का हुनर सबको नहीं आता और जिसे आता है उसे हम "गौतम" के नाम से जानते हैं। वो जितना बड़ा शायर है उतना ही लाजवाब इंसान भी है।
ईश्वर उसे हमेशा ऐसा ही बनाये रखे --आमीन

प्रदीप कांत ने कहा…

उम्दा ग़ज़लें

डिम्पल मल्होत्रा ने कहा…

बाबूजी हैं असमंजस में, छाता लें या रहने दें
जीभ दिखाये लुक-छिप लुक-छिप बादल में चितकबरी धूप


बढ़ा है शह्र में रुतबा ज़रा हमारा भी
हुए हैं जब से हम उनके बयान में शामिल
जिक्र हमारा हमसे बेहतर है कि उस महफ़िल में है।
ब्लॉग में कुछ एक लोग ही है जिनकी गज़ले अच्छी बहुत अच्छी होती है उनमे से एक गौतम जी। गहन अध्यात्म सुफिआना सादगी और ज़िंदगी से भरी

Jayant Chaudhary ने कहा…

"फ़साना है जिस्मों का बेशक ज़मीनी
मगर रूह तो आसमानी कहे है"

यह ओ कमाल है.. अद्भुत है...

Udan Tashtari ने कहा…

सटीक...वाह!

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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