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गुरुवार, 13 मार्च 2014

शैलजा पाठक की कविताएँ

शैलजा पाठक की कविताएँ पिछले कुछ समय से पत्र पत्रिकाओं और सोशल मीडिया पर पढ़ता रहा हूँ. समकालीन कविता का क्षेत्रफल जिस तरह से बढ़ा है और स्त्री स्वरों की बड़े पैमाने में आमद हुई है उसने हिंदी कविता के पूरे स्वरूप को बदला है. शैलजा की कविताएँ इस बदलाव का आइनाहैं. बनारस में "पढ़ाई, लिखाई, गवनही' के बाद में मुंबई में "रह रही" शैलजा की कविताएँ एक मुसलसल उदासी से भरी हैं. यहाँ शिल्प के किसी बनाव की ज़रुरत ही नहीं महसूस होती कि एहसासात के ज्वार जैसे उफनते चले जाते हैं.  और यह दुःख और उदासी भी ऊपर से निजी दिखती हुई विस्तार में सामूहिक है. "बनारस हो जाती हूँ" जैसी कविता स्त्री जीवन के साथ के उस अनिवार्य से विस्थापन का ऐसा मार्मिक आख्यान है जो पुरुष दृष्टि से अक्सर अदेखा रह जाता है. पाठक इन कविताओं से गुजरते हुए कुछ दाग अपने हृदय पर देख पाएंगे...  


बनारस हो जाती हूँ
 

एक शब्द विछोह 

पहली बार मन रोया था 
जब अपने प्रायमरी स्कूल को 
अलविदा कहा 
पिछले डेस्क पर छूट गया 
पुराना बस्ता 
गुम गो गया वो अंडे के आकार 
वाला स्टील का टिफिन 
जिसमे अम्मा ठूस के रखा करती थी पूरी अचार
तमाम रंगबिरंगी पेंसिल का खोना पाना 
महकने वाले रबर में सबकी हिस्सेदारी 

उस आखिरी दिन डैनी सर ने 
मेरे गाल को थपथपा के चूम लिया 
वापस दिए मेरे घुंघरू यह कह कर 
कि डांस सिखती रहना 
अतीत के खुबसूरत यादों के 
दरवाजे पर टंगा है घुंघरू 
जब भी यादें अन्दर आती है 
सब छम छम सा हो जाता है 

बड़े और समझदार होने के क्रम में 
हम लगातार बिछड़ते रहे 
स्कूल कॉलेज दोस्त 
फिर वो आँगन भाई का साथ 
पिता की विराट छाती से चिपक कर 
वो सबसे दुलारे पल 

और आखिर में हमेशा के लिए 
बिछड़ गई अम्मा 
बेगाना हो गया शहर 
राजघाट के पुल से गुजरती ट्रेन 
डूबती गंगा ...शीतला माता के 
माथे का बड़ा टिका सारे घाट मुहल्ला 
विश्वनाथ मंदिर का गुम्बद सब बिछड़ गया 

अब रचती हूँ यादों की महकती मेहंदी अपने हाथो में 
चूमती हूँ अपना शहर ..और बनारस हो जाती हूँ ...

निर्णायक

वे निर्णायक की भूमिका में थे 
अपनी सफ़ेद पगड़ियों को 
अपने सर पर धरे 
अपना काला निर्णय 
हवा में उछाला 

इज्जतदार भीड़ ने 
लड़की और लड़के को 
जमीन में घसीटा 
और गाँव की 
सीमा पर पटक दिया 

सारी  रात गाँव के दिये 
मद्धिम जले 
गाय रंभाती रही 
कुछ न खाया 

सबने अपनी सफ़ेद पगड़ी खोल दी 
एक उदास कफन में सोती रही धरती 

रेंगता रहा प्रेम गाँव की सीमा पर 

नफरत 

मैं नफ़रत करती हूँ 
बरसों बाद वापस 
आती तुम्हारी आवाज में उगे है तमाम काटें 

मिलने की बात पर बरगद का वो 
सबसे पुराना पेड़ जल कर खाक 
हो गया सा जान पड़ता है 

उस मोड़ पर जहाँ से मुड़े थे तुम 
एक गहरा कुआँ अचानक से दिखता है मुझे 
जिसके अन्दर बरसों से पड़ी मैं 
तुम्हारा नाम ले ले कर खामोश हो गई थी 

बिनाकुछ कहे तुम एक ऐसी दुनिया में 
थे जहाँ मेरी उदासी के कोई गीत 
तुमने कभी नही सुने 

बड़ी मुश्किल से जीना सिखा है 
नफ़रत करना भी 

कोई हक नही 
मेरा प्यार पाने का 

हाँ नफरत करती हूँ इतना 
जितना टूट कर किया था प्यार कभी 
तुम्हारे दिए जख्मों की टीस 
अभी ताजा है 

इस टीस में पुरानी यादों की 
बची हुई नरम हरी कोपलें है 
मैंने इन्हें गहरे रोपा है 

कह सकोगे ?

मैं अनुभवों को पैना कर रही हूँ 
मैं दुर्गम रास्तो पे खाली पैर चल रही हूँ 
चुभते है कुछ नियम काँटों से 
दरारों को पाटने की कोशिश कर रही हूँ

तुम्हारे हिस्से का सह रही हूँ
अपने हिस्से का नही कह रही 
मैं तुम्हारी चाहरदीवारी में 
तुम्हारे लिए ही रह रही हूं 

आपातकालीन स्थितियों में 
मैं बाहर जाया करती हूं 
सहज ही अपने को भूल कर 
तुम्हारे अहंकारो की 
परवरिश कर रही हूं 

सोचती हूं 
जिस दर्प से थामा था हाथ मेरा 
उसी दर्प से एक बार मेरी आँखों में देखकर 
कह सकोगे .......मैं तुम्हें रानी बनाकर रखूँगा ...



इन्तजार 


एक शब्द इन्तजार 

एक लम्बा सूखा रास्ता 
एक गहरे गढ्डे में सूखी पड़ी नदी 

यादों की परते खुरचती 
नमी तक पहुंचती आवाज 

मंदिर में बेजान जलता दिया 
कांपती जिंदगी की लौ 

तकिये में मौन पड़ी हिचकी 
दस्तक पर हहराता कलेजा 

यकीं पर बरसो से एक ठंडी 
पड़ी आग 

इन्तजार एक शब्द नही 
एक रुदन है 

सूखे चेहरे पर खारे आंसूओं 
का थका सा समन्दर ...


याद 


भूल कर भी नही कहा तुमने 
कि याद करते हुए 
लिखते हो तुम 
कोई उदास कविता 

न ही कह पाई मैं कि जब भी 
याद आते हो 
एक टीस सी होती है 
खुरचती हूँ आँगन की 
मिटटी उकेरती हूँ 
एक जोड़ी आँख 
और डर कर मूँद लेती हूँ पलके 

समय लाता है हर रोज 
मेरे बिस्तर पर एक 
अँधेरी रात ..सलवटों से सवाल 

तुम्हारी बहुत पहले दी 
उन लाल प्लास्टिक की 
चूड़ियों की परिधि में 
घूमती है मेरी कलाई 
और अतीत खनक जाता है ......

कजरी 


ससुराल से पहली बार 
आई कजरी गुम सुम सी है 
कम हंसती है 
अकेले कोने में बैठ कर 
काढ़ती है तकिया के खोल 
पर हरा सुग्गा 

सहमी सी रहती है 
आने जाने वालों से नही मिलती

देर तक बेलती रहती है रोटी 
इतनी की फट जाये 

माई बाप अगली विदाई की 
तैयारी में लगे हैं 
छोटी बहन जीजा को लेकर 
जरा छेड़ती है 

आसपडोस वालों में  किसी" नइ खबर "
की सुगबुगाहट 

ससुराल से वापस आई लड़कियां 
बस लाती है तथाकथित नई खबरें 
ये मान लेते हैं सब 

कोई जानना नही चाहता ..कजरी छुपा लेती है 
वो दाग जो दुखता है हर घडी 

बाप जूटा रहा है विदाई का सामान 

कजरी के मेजपोस पर हरा सुग्गा 
एक काले पिंजरे में बंद है 

सुई चुभती है 
कजरी की उँगलियों से निकलने वाला 
रंग सुग्गा के चोच जितना गहरा है 



बिछड़ना 

बिछड़ने से 
सिर्फ तुम दूर नही हो जाते 

कुछ रास्ते अपने आप को 
भूल जाते हैं 
तालाब का गुलाबी कमल 
मुझसे आँखें फेर लेता है 

हवा में बह रही 
तुम्हारी आवाज 
टकरा टकरा जाती है 
मुझसे 

कम्बखत बेखुदी तो देखो 
ये जानते हुए भी की नही हो तुम 
बढाती हूँ अपना हाथ तुम्हारी तरफ 
आज कहाँ चोट लगा लिया ?
ये भी सुनती हूँ 

मंदिर के मोड़ पर 
तुम मुझे फूल लिए दिखते हो 
सावन में एक हरा दुपट्टा तुमने 
मुझे ओढाया था 

मेरे रास्ते अब मंदिर नही पड़ता 
वो रास्ता भी छीन गया है अब 
समन्दर की कोई लहर नही छू पाती मुझे 
पूरा चाँद भी अधूरा दिखता है मुझे 
होली का अबीर फीका कर गए हो 

तुम्हारे बिछड़ने से मैं दूर रहीं हूँ 
इन खुबसूरत लम्हों से 
मैं बिछड़ गई अपने आप से 

मेरे अंगूठे को जोर से दबाने की टिस 
देखो हुई अभी अभी 

बिछड़ना बस एक भ्रम होता है क्या ?

तुम्हारा जाना 

जब शब्दों में 
चिखने लगी वेदना 

रोम रोम प्रवाहित होता रहा 
तुम्हारे साथ बिताया सफ़र 
करुणा से भरी तुम्हारी आवाज 
तोड़ने लगी दम 

हमारे दिलों में टूटने लगे 
अनगिनत शीशे
चुभने लगी आँखें 
इस बार आंसूं के रंग अलग थे 
किसी ने किसी के नही पोछे 

सबने जिया तुम्हारे जाने का दर्द 

तुम्हारे गुनगुनाते भजनों मन्त्रों की 
छुपी आवाजों से 
कराहती रही मंदिर की 
बेआवाज घंटी 

तुम्हारी टूटती साँसों को 
बचाने आये सभी देवी देवता 
हार कर समां गए तुम्हारे भीतर 
एक झटके ही बड़ा हो गया 
तुम्हारा छोटा बेटा 

हमारे घर में तुम्हारी ममता महकती थी 
मीठा दूध महकता था 

घर की नींव पर तुमने कुछ फूल दबाये थे 
वो अपने साथ ले गई क्या ?

बेरंग उदास दीवारों की महक 
बड़ी भयावह होती है अम्मा .....

बच्चा चाचा 


बच्चा चाचा निर्गुण गाते थे
इतना कमाल की लोग सुनते रह जाते 
कई बार गांव के चौपाल पर 
लोग उनसे निहोरा करते 
और वो वही चौकी पर बैठ 
आँखें बंद किये गाते 
खो जाते और गाना खतम होते 
ही तेज कदमों से 
अपने घर की तरफ 
चले जाते 

कई बार हमारे घर के 
बैठक में चाचा लोग उन्हें 
गाने के लिए घेर लेते 
वो गाना शुरू करते 
तो घर की औरतें दीवारों से सट 
कर बैठ जाती 
अक्सर आंसू पोछती

पर मेरी आँखों ने जो 
देखा वो सिर्फ गाना नही था 
जब भी बच्चा चाचा गाते 
उनकी आँखों में एक सुना रास्ता 
उभरता ..उनकी मुठ्टीयों 
में अतीत पिस रहा होता 
गमछे से बार बार अपने 
सूखे गालों को पोछते 

गाना खत्म होते ही 
कातर हों जाते 
अपना दर्द छुपाते अपनी 
मडई में में जाकर पुराना
बैंजो निकाल कर एक तेज 
धुन छेडते तो कभी 
पुआल में आग लगा 
उठने वाले गुबार को देखते 
कड़वाहट घोंट जाते 

कुदाल फावड़ा उठा 
खेत के पथरीले हिस्से 
पर कोड़ते एक खाली गढ्ढा 
रोपते एक मुरझाया पौधा 

और खुले आसमान के नीचे 
बिखेर देते एक निर्गुण 

चार कहार मिली डोलिया उठावें .........




10 comments:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

सारी रचनाएँ एक से बढ़ कर एक ... !!
होली की अग्रिम शुभकामनायें !!

रामजी तिवारी ने कहा…

'असुविधा' और 'अनुनाद' कविता के ब्लागों की दुनिया के 'काबा' हैं | शायद ही ऐसा कोई युवा स्वर होगा, जो यहाँ आने से रह गया हो | आपके यहाँ आने से मेरी तमन्ना पूरी हुयी | आपको बधाई और 'असुविधा' का आभार |

Kamal Choudhary ने कहा…

पाठक पैदा करने वाली कविताएँ ! एक से बढ़कर एक . कविताएँ व्यष्टि से समष्टिपरक हैं . प्रेम , दर्द और विद्रोह का स्भावाविक सच्चा स्त्री स्वर ...सरल भाषा , भावों और बिम्बों से एक प्रभाव छोड़ जाती कविताओं हेतु हार्दिक बधाई शैलजा जी को . आभार साथी !

' मिसिर' ने कहा…

लगभग सारी कवितायें यहाँ दुबारा पढ़ रहा हूँ ! बहुत अच्छा लिखती हैं शैलजा |बधाई |

Arun Mishra ने कहा…

बहुत अच्छी कविताएं । सुन्दर गहरे भाव । दर्द भरे । वाह ।

प्रदीप जिलवाने ने कहा…

शैलजा को फेसबुक पर अक्‍सर पढ़ा है, अभी हाल ही में शुक्रवार वार्षिकी में भी पढ़ा था। और यहां पर लगभग दर्जन भर कविताएं पढ़ी। शैलजा को पढ़ना एक स्‍त्री के निज को पढ़ना और उसे भावनात्‍मक स्‍तर पर जानना है। दूसरी एक खास बात कि इनकी कविताओं में शब्‍द बहुत कोमल होते हैं। शैलजा, को बधाई और अशोक भाई आपको प्रस्‍तुति के लिए

प्रदीप जिलवाने ने कहा…

शैलजा को फेसबुक पर अक्‍सर पढ़ा है, अभी हाल ही में शुक्रवार वार्षिकी में भी पढ़ा था। और यहां पर लगभग दर्जन भर कविताएं पढ़ी। शैलजा को पढ़ना एक स्‍त्री के निज को पढ़ना और उसे भावनात्‍मक स्‍तर पर जानना है। दूसरी एक खास बात कि इनकी कविताओं में शब्‍द बहुत कोमल होते हैं। शैलजा, को बधाई और अशोक भाई आपको प्रस्‍तुति के लिए

aditya shukla ने कहा…

बेहतरीन कविताएँ!!

neera ने कहा…

बेहतरीन कवितायें! एक से बढ़ कर एक! बार बार पढ़ने का मन करता है...

वर्षा ने कहा…

शैलजा को पढ़कर बहुत अच्छा लगा

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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