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रविवार, 16 मार्च 2014

कामरेड रामआसरे की मूर्ति

युवा कथाकार आदित्य प्रकाश की यह कहानी कथन में प्रकाशित हुई थी (मैदान के बाहर नाम से ). भ्रष्टाचार के नाम पर चले अन्ना आन्दोलन का हिस्सा रहे आदित्य ने उसे बहुत करीब से देखा था. बल्कि भीतर से. आज जब वह आन्दोलन टुकड़ों में बिखर गया है और एक सर्वथा नवीन रूप ले चुका है, इस कहानी को पढ़ना उसे समझने में बेहद मददगार होगा.






तभी एक धमाका हुआ और एक सत्तर साल का नौजवान कहीं से चिल्लाता हुआ सड़क पर आ गया ..उसके अगल बगल बहुत सारे लोग साथ साथ चल रहे थे. उनमे से कइयो ने तो मुखोटे भी पहन रखे थे.फिर वो एक खाली ऊँची सी जगह पर चढ गया और जोर जोर से चिल्लाने लगा. उसने ऊँची आवाज में कहना शुरू किया कि ये लोग जो तुम्हारे ऊपर बैठे हैं ..सब तुम्हारे नौकर हैं और तुम लोग जो नीचे बैठे हो वो सब के सब राजा हो...ये लोग अब से वहीँ करेंगे जो तुम लोग कहेंगे. सब तरफ हल्ला मच गया और लोगो ने कानाफूसी शुरु कर दी. कोई कहा रहा कि क्या सचमुच में ऐसा ही होगा अब? अगलवाले भाई ने बगल वाले से पुछा कि ..आपको क्या लगता हैं जी ..मानेंगे ये लोग? बगलवाले ने खीसे निपोरते हुए जवाब दिया ..मैं क्या जानू भाई ..आज छुट्टी का दिन था, बीवी बच्चो के साथ घूमने निकला था. शोर सुना तो चला आया इस तरफ ..अब चलता हूँ, कल सुबह ही ऑफिस जाना हैं और बात पूरी होते होते सरक गया वहां से. तभी मुखौटा पहने एक आदमी ने नया बगल वाला लाकर वहाँ बिठा दिया. ऊपर खड़ा वो सत्तर साल का नौजवान अब भी चिल्ला रहा था और उसके पीछे वाले जोर जोर से नारा लगा रहे थे. लोग आते जा रहे थे और जाते जा रहे थे लेकिन मेला लगा हुआ था.

बिल्लू के पापा सुबह से ही सब कुछ देख रहे थे टीवी पर ..हर चैनल पर यही था. वही सत्तर साल का नौजवान हर तरफ छाया था. उसके पीछे खड़े लोग एक एक करके कैमरे पर आते और इंटरव्यू के नाम पर चिल्लाते हुए दुनिया बदलने की सुचना देकर वापिस चले जा रहे थे. जब अरोरा साहब उब गए एक ही बात सुनकर तो चीखते हुए बोले.. चाय लाओ बिल्लू कि माँ, किचन से बिल्लू कि मम्मी चींखी -बस यहीं करो दिनभर, सामने वाला सिन्हा दिखा था आज मुझे चैनल पर..सुबह से बिहारिन सबको यही बता रही थी और एक तुम हो जो दिन भर यही पड़े रहते हो किसी लायक नहीं हो. जाके घूम आओ और हाथ लगे तो एकाध इंटरव्यू भी दे देना. खानदान में कोई तो टीवीपर आ जायेगा. अरोरा साहब का माथा ठनका..हैं ये क्या..सच में..मैं भी जाता हूँ. तुम देखना मुझे ..सबको पछाड दूँगा. जल्दी से कपडे पहिने और बिना चाय का हाल पूछे निकल पड़े घर से..सीढ़ियों से निकलते ही टकरा गए मुझसे. मैं अभी किसी और ही मूड में था. ऑफिसवालों का बस चले तो जान ले ले हमारी. मैंने भी गलती से नमस्ते कर लिया ..वैसे ये मौके बेहद कम ही आते हैं लेकिन आज तो सामने ही था. अरोरा साहेब ने बिना जवाब दिये कहा ..इस महीने से बिजली का बिल छह रूपये पर यूनिट होगा. अगर मंजूर नहीं हैं तो कमरा खाली कर दो. कहीं से लड़ के ही आ रहा था और अच्छी तरह से जानता हूँ की कमरा तलाशना वैसे ही हैं जैसे अपनी जात कि प्रेमिका तलाशना. मैंने जो हैं उसी से काम चलाने वाली नीयत से कहा ठीक हैं अंकल ..कोई बात नहीं और दरवाज़े के ताले को उमेठ दिया. 

कमरे में सुबह से अखबार मेरी तरफ मुह बाए पड़ा था. खबर भी झाँक रही थी उसी तरफ से..एक जगह नजर अटक गयी. खबर थी कि अगले बहत्तर घंटे पानी नहीं आयेगा. सांस अटक गयी मेरी ..लगा कि किसी गहरी खायी में गिर गया. किसी तरह से खुद को अलग किया अपने कपड़ो से और बचे खुंचे पानी से आँखे और चेहरे को ठंडक दी. तौलिए से पोछते हुए सोचता रहा कि ये साला अरोरा का बच्चा बस दबाए जा रहा हैं. एक टंकी लगवा देता तो क्या घट जाता. चारों फ्लोर का किराया खा रहा हैं और ना ही कुछ खर्च कर रहा हैं और ना ही कोई सहूलियत दे रहा है. फिर अखबार कि तरफ नजर गयी...अगली बड़ी खबर उसी सत्तर साल के नौजवान कि थी. उन्ही की तस्वीरों से अखबार पटा पड़ा था. एक ख़याल आया मन में कि चलो वहीँ चलते हैं ..सब कुछ तो मिल रहा हैं. पानी भी हैं वो भी डिब्बा बंद ..और क्या चाहिए? जल्दी से चप्पले डाली और निकल पडा. जब पहुंचा तो हजारों कि भीड़ थी ..नौजवान अब भी चिल्ला रहा था. उसकी बातें हथौड़े कि तरह पड़ रही थी ..हर कोई जागा सा दिख रहा था. उसकी बातों में वो सब लोग थे जिन्हें कोई नहीं जानता था. शायद मेरे जैसे ही लोग ..जिन्हें घर पे पानी नहीं मिलता लेकिन यहाँ एक पूरी बोतल हाथ में थमा दी गयी थी. एक झटका सा लगा मुझे ..ये तो सच कह रहा हैं. सालों पहले भी एक बुड्ढा नौजवान था ..लाठी टेक कर चलता था लेकिन कभी किसी को उस लाठी से मारा नहीं उसने. सब उसके पीछे पीछे चलने लगे और वो उसके बदले आज़ादी दे गया था हमको. ये बुड्ढा भी बार बार कह रहा था उसी बूढ़े नौजवान का नाम लेकर कि ..देखो सब मिटा दिया इन लोगो ने जो उसने दिया हमें ..लूट लिया तुम्हारा सब कुछ..अगर बचना चाहते हो तो हमारे साथ आओ. हम मजबूर कर देंगे इन सबको..आओ अपनी ताकात दिखाओ. हर तरफ कैमरे लगे थे ...तालियाँ जोर जोर से बज रही थी. मैंने भी तालियाँ बजानी शुरू कर दी ..और जोर जोर से चिल्लाने लगा. शायद दिन भर का गुस्सा नारों में ही निकलना चाहता था. मेरा जोश देखकर एक नौजवान मेरे पास आया और कहने लगा कि ..आप सचमुच कुछ बदलना चाहते हैं ...मैंने दम भर के जवाब दिया ..हाँ बिलकुल. उसने फिर कहा कि हमारे साथ आयें और इस बदलाव के हिस्सेदार बनें. मैं तुरंत तैयार हो गया ...सब कुछ भूल गया था उस वक्त मैं . ना सुबह के ऑफिस का ख्याल था और ना ही बढे हुए बिजली के बिल का. वो मुझे अपने साथ उसी ऊँची जगह ले गया और अपने लोगो से कहने लगा कि ये भी हमारे साथ हैं. हम सब बातें करने लगे ..मार्क्स, गांधी, लेनिन, और वो सत्तर साल का नौजवान हमारी बातों में छाये हुए थे. मुझे लगा कि अगर ऐसा हो गया तो अरोरा मुझसे फ़ालतू पैसे नहीं ले पायेगा, फिर तो पानी भी आएगा दिन भर. शायद ऑफिस में भी सब कुछ ठीक हो जाएगा. तभी एक लीडर जैसे आदमी ने मुझसे कहा कि थोडा खतरा हैं ..खबर हैं कि इन्हें गिरफ्तार करने पुलिस आने वाली हैं. सब चौकन्ने हो जाओ ..अगर इन्हें पकड़ लिया तो रही सही उम्मीद भी निकल जायेगी हाथ से. कुछ उत्साही लड़के कहने लगे ..गोलिया चला देंगे अगर इन्हें छुआ भी तो. उसने सबको इशारे से चुप कराया और कहा नहीं ..ऐसा कुछ नहीं करना हैं. अगर ये गिरफ्तार हो गए तो हम सब भी साथ चलेंगे ...ज्यादे से ज्यादे लोगो को इकठ्ठा करेंगे और उनसे गिरफ्तारी दिलवाएंगेलेकिन खुद नहीं होंगे लेकिन. बता देंगे कि हम चुप नहीं रहेंगे ..डरेंगे भी नहीं ..अब हमें कोई रोक नहीं सकता. सब ने फिर से नारे लगाये और अपनी अपनी प्रस्तावित जगह पर जाकर जम गए. बोतल खाली हो चूकी थी और प्यास बढती जा रही थी. जितना सोचता था ..उतनी ही प्यास बढ़ रही थी.

उस रात सुबह जल्दी ही आ गयी और पुलिस भी. सब शोर मचा रहे थे ..कैमरे चमक रहे थे. हर आदमी कुछ कह रहा था ..और साथ में पूछ भी रहा था कि किसने दी इसकी इजाजत..ऐसे आदमी को गिरफ्तार कर रहे हैं. सुबह हटी भी नहीं थी कि आसमान रोने लगा ..हम फिर से नारे लगाने लगे. पता नहीं उन्हें कहाँ ले गए ..कोई नहीं जान पाया था. मुझे उस लीडर कि बात याद थी ..मैंने अपनी जगह चुन ली. मुझे लाठी वाले कि समाधी याद आई ...और अपना विरोध जताने के लिए उससे बेहतर कोई जगह नहीं सूझी. चिल्ला चिल्ला के लोगो को बुलाया ..एक ही बात सबको बार बार बताई. लोग जेल जाने को तैयार थे. बसे आ रही थी ..सड़के खाली कर दी गयी थी और एक बड़े से खेल के मैदान को जेल बना दिया गया था. अपने ही लोग अपने जैसे लोगो को कैद कर लेना चाहते थे, चुप करा देना चाहते थे. हर कोई आज जेल जाने में गर्व महसूस कर रहा था. मैं बार बार लाठी वाले कि समाधि को देखता और मन मन ही सोचता कि क्या सोच रहे होगे आप ये सब देखकर ..आपने तो बाहर वालो से लड़ाई लड़ी और आज हमें अपने ही लोगो से लड़ना पड़ रहा हैं. अच्छा हुआ जो आप आज नहीं हो ..वैसे भी आपको तो इन लोगो ने बरसो पहले गाड दिया था. पता नहीं अब आप हो भी या नहीं ..आखें भर जाती सोच सोचकर लेकिन बारिश उन्हें बाहर नहीं आने देती. जिनपर जिम्मेदारी थी हमें ले जाने कि वो भी चुप थे ..हर कोई एक दूसरे से इज्ज़त से बात कर रहा था. एकाध बड़े अफसरों ने कानमें कहा ..बंद कर दो अब ये सब. कोई फायदा नहीं होगा. ऊपर से ऑर्डर हैं सबको बाँध लेने का ..मैं हर बार अनसुना कर देता और नए लोगो को बुलाने लगता. तभी फोन कि घंटी बजी .ऑफिस से था. आज मेरे अंदर हिम्मत थी और सिरे से नकार दिया कि नहीं आ सकता. जो ठीक लगे सो करो ..बहुत सह लिया. कुछ नए लोग आ रहे थे ..पुलिस वाले हाथ बंधे खड़े थे. मीडियावाले अपने कैमरों पे चौकन्ने हुए पड़े थे..मैं एक किनारे खड़ा था. दिन आधे से ज्यादे बीत चूका था ..एक पुलिस वाले ने मुझसे कहा कि अब घर जाओ ..वर्ना तुम्हे भी ले जायेंगे. मैदान भर गया हैं ..अंदर जगह नहीं हैं. सब को रोड पे ही छोड़ देंगे. पैदल घर आना पड़ेगा. मुझे उसपर पूरा भरोसा था कि वो झूठ कह रहा हैं.

तभी उसी वक्त एक गाडी रुकी भीड़ के पास और कोई और भी शामिल हो गया हम सब में. अब मेरी बारी थी और सब के साथ बस में बिठा दिया गया. शीशे के पार से फिर नारों कि आवाज आने लगी. मैं पूरी ताकत से कांच खोला कि बस चल पड़ी वहां से ..मेरे बगल में कोई और भी आ चूका था. नारों कि आवाज़ धीमी नहीं हुयी..और बस चलती रही. हर तरफ लोग जमा हुए थे ..बारिश का पानी भी हर तरफ बिखरा था. लोग और बरसात रुकने को राज़ी नहीं थे. हम सबके सामने नया सवेरा था ...उम्मीद थी और आसमान हमारे पास था. बस अब भी चल रही थी ..नारे अब भी थे. एक किनारे लोगो का हुजूम था और दूसरी तरफ बसे थी, जो उन्हें लायी थी. मेरा भरोसा पानी के साथ बह गया. मैदान सचमुच भर चूका था. मैं भी थक चूका था. उस भीड़ ने मुझे कमजोर कर दिया और मैं चुप हो गया. क्या मेरी मेहनत बेकार गयी? सवाल थे कि अब आगे क्या ..जवाब कहीं नहीं था. पैरों से चलकर किसी ओर जाना हो नहीं पा रहा था. फिर भी हिम्मत थी अंदर ..हिम्मत ने ही तो ये सब कुछ करा लिया मुझसे वरना.. मैं कहाँ और ये बबाल कहाँ? जाना नहीं चाहता था लेकिन रुक भी नहीं पा रहा था. तभी किसी ने मुझसे धीरे से कहा ..अब क्या होगा?  मैं भी तो यहीं जानना चाहता था. उसे देखकर कुछ अजीब तो नहीं लगा लेकिन आसान भी नहीं था..एक खूबसूरत लड़की मेरी तरफ जवाब के इन्तेज़ार में देख रही थी. उसे देखकर मुझे जवाब नहीं सुझा बस इतना कहा कि अब अंदर जगह नहीं हैं ..वापिस घर चली जायें. उसने मेरी बात सुनी या नहीं या सिर्फ शोर सुना. कुछ नहीं मालूम. मैं मुडना भी चाहता था और उसे देखना भी ..दोनों नहीं कर पा रहा था. उसने फिर कहा कि आगे क्या करना है? मैंने सँभलते हुए कहा ..मुझे पूछना होगा कि क्या करूँ ..मैं नहीं जानता. आप चाहो तो घर जा सकती हो. उसने फिर कहा और आप? शायद मैं भी ..हताश नहीं था मैं लेकिन थका हुआ जरुर था. हम बिना मुड़े एक ही तरफ बढ़ने लगे और उसने अपन फोन हाथ में ले लिया. मैंने कई कोशिशे कि उसे देखने कि ..देखा भी ..वो बेहद खूबसूरत थी. उतनी ही गोरी और गीले भूरे से बालों में और भी दमक थी. मैंने खिसियाते हुए कहा कि अब पैदल ही घर तक जाना होगा ..शायद मेट्रो भी बंद कर दी हैं. उसने झट से जवाब दिया ...कोई बात नहीं ..मेरा ड्राइवर गाडी ले के आ ही रहा हैं. आप जहाँ कहोगे वहां ड्रॉप कर दूंगी. फटी आखों से देखता रहा उसे मैं ..क्या कह रही हैं ये? गाडी हैं इसके पास और यहाँ तक आ गयी हैं. तभी उसने हाथ दिया और कार हमारे सामने वाली सड़क पे थी. ये वही कार थी जो उस वक्त आई थी, ये वही थी जो मेरे बगल में बैठी थी. हम दोनों ने सड़क पार कि और जल्दी से गाडी में घुस गए. अब भी आसमान बरस रहा था.

मुझें नहीं मालूम कि दुनिया अगर एक रोज बदल जायेगी तो कैसी होगी ..क्या एहसास होगा वो? लेकिन अभी जो था उसे मैं शब्दों में नहीं कह पाउँगा. कार कि सीट पे पसरा हुआ था मैं और डरा भी था कि कहीं नाराज होकर उतार ना दे मुझे. उसका मन टटोलने के लिहाज से मैंने पूछ ही लिया ..आप सचमुच गिरफ़्तारी देने ही आई थी? उसने हलके से कहा –क्यूँ मैं नहीं दे सकती गिरफ्तारी? आप ही तो बुला रहे थे सब को ..मै भी आ गयी. मैंने फिर खिसियानी हंसी के साथ कहा ..दिल्ली कि लड़कियों को देखा नहीं ये सब करते हुए इसलिए पूछ लिया. उसने हलके से कहा ..मैं दिल्ली वाली नहीं हूँ ..मैंने कहा ओह्हो..कहाँ से आई हैं आप? उसके जवाब ने मुझे हिला दिया..नार्वे से आई हूँ ..एअरपोर्ट से सीधा यही आ गयी. एक बार को मुझे लगा कि बेवकूफ बना रही है मुझे..दिल्ली वाली ही तो लगती हैं और झूठ भी साफ़ बोल रही हैं. उसने फिर कहना शुरू किया ..माम-डैड यहीं मुंबई में है और मैं ओस्लो में पढ़ती हूँ. जब सुना इसके बारें में तो पापा ने कहा कि आओ देखो हमारे देश में भी रिवोलूशन होने वाला हैं. इसलिए चली आई. मैं अब भी उसे फटी आखों से घूर रहा था..हिम्मत बाँधी और उससे फिर पुछा ..रास्ते में कही गिरफ्तारी नहीं हो रही थी जो सीधा राजघाट आ गयी आप? उसने बड़ा आसान सा जवाब दिया ..पापा ने राजघाट का नाम लिया था और बताया भी था कि वहां चली जाना एक बार ..मैंने ड्राईवर से यही लाने को कहा और यहाँ आप लोग दिख गए. आपको देखा नारा लगाते हुए ..मुझे लगा कि आप ही लोग हो. फिर उन्होंने गाडी में बिठा दिया सो चली आई. आप कि वजह से राजघाट अंदर नहीं जा सकी. भींगने के बावजूद मुझ पर घडो पानी पड़ गया था. मैंने माफ़ी मांगते हुए कहा कि ..मुझे लगा कि आप मुझे बेवकूफ बना रही हैं. आप तो सचमुच उतनी दूर से आई हैं..शायद मैं नहीं आता कभी. पता नहीं क्या सोचकर उसने अपना पर्स खोलकर, टिकट हाथ में ले लिया...और हँसते हुए कहा कि अब भी यकीन नहीं हुआ.मेरे पास कोई जवाब नहीं था..हाथ जोड़ लिए. खिडकी के बाहर देखते हुए खाली पेट का ख़याल आया. फिर पूछ ही बैठा कि कहाँ रुकी हैं आप? अपने ही सवाल ने मुझे डरा दिया लेकिन बात निकल गयी सो कुछ नहीं कर सकता था. जवाब भी आ गया ..जोर बाग में दोस्त के यहाँ रुकूंगी. क्या कह सकता था मैं?

एक सपने जैसा था सब कुछ ...कल रात से ..कुछ बदल देने का आगाज़, खुद का बडबोलापन और फिर ऐसी खूबसूरत लड़की सिर्फ वहीँ मिल सकता हैं ये सब कुछ. लेकिन उसने मेरा फोन नंबर माँगा और मैंने दिया भी. सड़क के एक किनारे उतार कर चली गयी...मुझे वापिस अरोरा साहेब के कमरे पे पहुंचना था. घर के बाहर का मौसम बदल चूका था, हर तरफ एक ही खबर लगी हुयी थी. दरवाज़े कि आवाज़ मेरे अलावा और भी किसी ने सुनी ..सीढ़ियों से आवाज़ आई. अरोरा साहेब दरवाज़े पर थे..बिल्लू कि मम्मी भी साथ में थी. दोनों का मुस्कुराता चेहरा देखकर मैं डर गया. समझ नहीं सका.. क्या वाकई दुनिया बदल गयी? या उसी सपने में हूँ जिसमे मिली थी मुझे ..क्यों सोच रहा था इतना सबकुछ. अरोरा जी ने गले लगाया तब नींद टूटी, जोर जोर से कहने लगे ...आज सुबह से तुझे बीसियों बार टी वी पर देख चूका था, सीना चौड़ा कर दिया तुने मेरा. वाहे गुरु जानता हैं मैंने तुझे कभी बिल्लू से कम नहीं समझा. मैं अब भी सपने में ही था. ये क्या हो रहा हैं? बिल्लू कि मम्मी कहने लगी ..ये तो कब से तेरे पास जाने को कह रहे थे लेकिन मैंने ही मना किया कि बारिश रुक जाए तो चले जाना. बारिश थम गयी और साफ़ साफ़ दिखने लगा. ये प्रेम युहीं नहीं जागा हैं. अरोरा साहेब अब भी बोले जा रहे थे..मैं वी सो ओथे रात नु पुत्तर पर तू मेनू वेख्या ही नहीं, अज तू गिरफतारियां करवा रिहा सी..मैदान भर गया सी पर उन दे होसले घटे नहीं सन  ..हूण ता आर या पार कर देणा हैं. जद तू जायेंगा मेनू वी नाल ले जाई. बात खतम हुयी ..मैं घर के अंदर और वो सीढ़ियों पर.  मुझे मैं फिर खास लगने लगा ..इन सबकी वजह से नहीं ..शायद उसी कि वजह से. कमरा अब भी वैसे ही था बस बाथरूम में पानी नया था.

पिछला वक्त कैसे बीता सोचते सोचते शाम आने लगी..फोन बजा. सिर्फ नजर भर देखा ..मैनेजर का नंबर चमक रहा था. एक बार तो टाल गया लेकिन सूरू सर का ख़याल आया और उठा लिया. आवाज आई ..कहाँ हैं लाल? रुंधे गले से जवाब नहीं निकला. फिर गरजी आवाज ..कुछ बोलता क्यूँ नहीं बे? एक झटका लगा, मैं भी गरज पडा..घर पे हूँ क्या हुआ? फिर सूरू सर ने अपने अंदाज में पूछ ही लिया ..आज क्यूँ नहीं आया बे? डेस्स को तो तुने उडा ही दिया था ..बेचारा मेरा पास रोनी शकल ले आया और कहने लगा कि अल्टर ने मना कर दिया कि अब नहीं आएगा, जो ठीक लगे कर लो. मुझे बता क्या हुआ? फिर कुछ कहा बाप ने तेरे? आखें भर आई थी बाप के नाम से ..आवाज़ नहीं निकली. कुछ देर कि शांति के बाद फिर उन्ही कि आवाज़ ..कुछ हैं तो बता ..मैं देख लूँगा सब कुछ. मैंने हिचकी लेते हुए कहा ..नहीं दादा बस कल से बाहर था. सुबह भी घर नहीं आया इसलिए आज नहीं आ पाया. ये सुनकर दादा बोल पड़े .. गर्लफ्रेंड का लफड़ा हैं क्या? छुट्टी चाहिए तो मुझसे बोल देता ..कभी मना भी किया हैं किसी को. मेरा जवाब सपाट था ..नहीं दादा गर्लफ्रेंड कहाँ हैं ...छोड़ गयी पिछले साल ही. कल रात से दुनिया बदलो लोग बदलो आंदोलन में था. उनको गिरफ्तार भी कर लिया इसलिए हमने जेल भरो शुरु किया. आज भी वहीँ था पूरा दिन ..कुछ और नहीं किया. दादा हसने लगे ..कह भी रहे थे ..अबे तुझे ये क्या हुआ? क्या पड़ गया इन चक्करों में? तू तो नहीं जेल गया ना साले. छुडाने भी नहीं आऊंगा वहीँ सड़. कुछ हल्का हो गया था मैं ये सब सुनकर ..जवाब भी दिया. नहीं दादा मुझे तो छोड़ दिया उन्होंने इन्फैक्ट सबको छोड़ दिया बाद में. अब देखते हैं उन्हें कब तक छोड़ेंगे? दादा ने चीखते हुए कहा ..ड्रामा बंद कर और कल से ऑफिस आजा. कुछ नहीं होगा इन सबसे. बेवकूफ नहीं बनना हैं तुझे. सुबह मिल मुझसे. फोन कट चूका था. मैं सोचना बंद कर चूका था. आखें ऊपर कि ओर थी और दिमाग तलुवों में ..फिर फोन बजा. आवाज भी आई ..नहीं जान पाया कौन था दूसरी तरफ ..अरे उसी लीडर का फोन था. वो बोलता रहा. बहुत बढ़िया काम किया आपने आज..सब लोग तारीफ कर रहे थे. सात मिनट से ज्यादे लंबी बाईट दिखाई तुम्हारी सबसे तेज चैनल ने. कार्यालय पर आ जाओ आगे का प्लान डिस्कस करना हैं. सब आ रहे हैं ..जब तक उन्हें छोड़ेंगे नहीं हम चुप नहीं बैठेंगे. दिमाग अब भी तलुवों में ही था और पैरों में भयानक दर्द. इतना भी नहीं सोच पाया कि क्या सोचू? किधर जाऊ ..

शाम फिर आ चुकी थी दरवाजों पर ..अब रात कि शकल दिखने लगी थी लेकिन मेरे अंदर कि बेचैनी खाए जा रही थी..क्या करूँ , कहाँ जाऊ. फिर निकल पडा, पैरों में सिर्फ चप्पले थी. कार्यालय तक आकर लगा कि कहीं कुछ गलत तो नहीं कर रहा हूँ ..सर झटक दिया जब वहाँ अपने ही जैसे तमाम लोगो को देखा. कई लोगो ने हाथ मिलाया और तारीफ भी कि ..किस चीज कि नहीं जानता था. कई नए चेहरे थे, उस रात नहीं थे. नए होंगे लेकिन प्रभावशाली लोग थे. वहीँ लीडर फिर मिला ..उसने जोर से आवाज करते हुए मेरी तारीफ भी कि और बाकियों ने तालियाँ बजायी. मैं अकेला नहीं था ...सबके लिए ऐसा ही था. खबर बनी हुयी थी ..लोग बहस कर रहे थे. मुझे कल सुबह ऑफिस भी जाना था और रात गहराती जा रही थी. अब तक उन्हें छोड़ा नहीं गया था. बड़ी जेल में उनके लिए तैयारियां हो रही थी. हम भी तैयार थे. मैं खुद को तैयार कर लेना चाहता था ..कल सुबह ऑफिस जाना हैं. दादा कि धमकी बार बार कानों में गूंज रही थी इन नारों के साथ. वक्त को खंगाला अपने फोन में ..दस बज चुके थे. मैं बाहर आना चाहता था. रात कि तैयारियां शुरू हो चुकी थी. बड़ी जेल के बाहर धरने और मोर्चे कि तैयारियां हो रही थी. फोन बज उठा और बस यूँही उठा लिया ..उस ओर कोई और ही था. पहचानना मुश्किल था और इस भीड़ में तो और भी ज्यादे..बाहर आ ही गया और ध्यान से सुनने लगा. वही लड़की दिन वाली ..उसकी आवाज ..उसका चेहरा सब कुछ आखों के आगे फैला हुआ था. वो जानना चाहती थी कि मैं कहाँ हूँ..मैंने वही से जवाब दिया जहाँ मैं था..वो खुश हो गयी थी ...मैं भी क्यूंकि यहीं मुझसे मिलने आने वाली थी. मैं अब कहीं जाना नहीं चाहता था. इन्तेज़ार किया ..वो आई भी. हम फिर मिलें. लोग बड़ी जेल तक जाना चाहते थे, हम भी गए. सारी रात प्रार्थनाओ और नारों में बीत गयी. हम बातें नहीं कर पाएं..शायद वो मुझसे बात नहीं करना चाहती थी. पर उसने कुछ कहा था मुझसे..मेरे बारें में क्या बताओगे लोगो से. क्या जवाब हो सकता था ..मैंने पुछा ..क्या बताऊ आप कहो? उसने कहा कुछ भी नहीं ..कह देना पुरानी दोस्त हैं. मुझे लगा ये भी सही हैं. ढेरो दोस्त थे ..उसके भी और मेरे भी. सब मिल रहे थे ..गा रहे थे और नारे लगा रहे थे. नीद से दुरी किये आज दूसरा दिन हो चूका था ..अब वो पास आ रही थी. मैं बिना बताएं घर आ गया. जब आँख खुली तो फोन बज रहा था ..दादा थे दूसरी तरफ. चिल्लाने लगे ..साले आज भी नहीं आया, नौकरी नहीं करनी तो साफ़ साफ़ मना कर दे. क्या चाहता हैं? मैंने दबे से कहा ..आँख नहीं खुली. रात में जेल के बाहर धरने पर था. सुबह आया हूँ. मुझे कुछ दिनों कि छुट्टी दे दो सर, मैं इन दिनों ऑफिस नहीं आ पाउँगा. मन नहीं लगेगा मेरा. दादा ने कहा ठीक हैं, जब तेरा मन हो तो आजाना. फोन कट चूका था. दिन के ग्यारह बज रहे थे. बाथरूम में पानी फिर नहीं था. किसी तरह बस हाथ मुंह धोया और चल पडा. आज तो इस अरोरा के बच्चे से फैसला कर लेना हैं. रोज रोज का ये ड्रामा बर्दाश्त नहीं होगा. ऊपर पहुँचते ही अरोरा साहेब कि आखें चमक उठी, बोलने लगे ..ओए तू आ गया, बड़ी जेल जा रहा हैं. साथ साथ चलते हैं. मैंने बिना जवाब दिए कहा ..पानी नहीं आ रहा हैं अंकल, कुछ करो. ऐसे कैसे काम चलेगा. बदलती आवाज में जवाब दिया उन्होंने ..मैं क्या करूँ ..मैंने कहा कि मेरा अलग मोटर लगवा दो. ऐसे काम नहीं चल पायेगा. वो कुछ बोले नहीं. हम दोनों टीवी कि तरफ देखने लगे..खबर वही थी. मैं मुड चूका था बाहर के लिए, उनकी आवाज आई. तू जा रहा हैं वहाँ ..मेनू भी ले चली अपने नाल..हाँ मैं जा रहा हूँ आप आ जाओ. थोड़ी देर में हम सड़क पे थे और कुछ देर बाद धरने वाली जगह पर. रात जैसा ही माहौल था वहाँ..हर तरफ भीड़ थी, नारे थे, कैमरे थे, मीडिया थी. हम अब भी कार्यकर्त्ता ही थे. लीडर ने समझाया कि सब लोग अपनी अपनी जगह पर जम जाओ. मीडियावालों से बात करने का कोई भी मौका मिले तो बातें करो. ज्यादे से ज्यादे लोगो को जोड़ो अपने साथ. हमें दबाव बढ़ाना हैं तभी कुछ होगा. मुझे ये दबाव का तरीका सही लगने लगा. सच कहूँ तो हर तरीका सही लगने लगा.

आप खुद को सालों एक कमरे में कैद कर सकते हैं, एक ऐसे कमरे में जिसमे अंदर आने का दरवाजा हैं. बाहर जाने के लिए आप उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते. खिडकी कि जगह एक ऊँचे रोशनदान ने ले ली हैं और कमरे में कोई भी कुर्सी ऐसी नहीं जो आप को उस रौशनदान के पार दिखा सके कुछ. फिर एक दिन जोर कि आंधी में सारी दीवारें गिर जाती हैं. उस रोशनदान का कद इतना बढ़ जाता हैं कि आप चक्कर खाकर गिर जाते हैं और अगर ऐसे वक्त में अँधेरा हो जाए तो ..आप राह पा जाते हैं. ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ भी..दीवारें गिर चुकी थी, रौशनदान भी. रास्ता भी मिल गया था या सिर्फ भ्रम था. वैसे सोचने के लिए वक्त किसके पास था. बार बार नारों कि आवाजे हमें जगा देती और शोर में मिला देती. मेरा फोन बजने लगा था ..उसी का फोन था..मैं अब तक उसका नाम नहीं पूछ पाया था. उसने सवाल किया: कहाँ हो आप? जवाब भी दिया ..उसने फिर कहा मैं आ रही हूँ वही मिलते हैं. मैं इन्तेज़ार करने लगा. लोगो से बातें करते करते आवाज बदल चुकी थी. कमरे कि दीवारें बह चुकी थी. मैं आजाद था. उसके आते ही मै पूछ बैठा ..मैं अब तक आपसे आपका नाम नहीं पूछ पाया और आप ने भी नहीं पुछा मुझसे. उसने कहा, मुझे मालूम हैं तुम्हारा नाम तो फिर क्यूँ पूछना. वैसे मेरा नाम शाम्भवी हैं. और भी कुछ जानना हैं मेरे बारें में .. दीवारें याद आ रही थी, कितना सुकून था वहाँ. कहाँ आ गया हूँ मैं भी..क्यूँ पूछ लिया, बिना नाम के भी तो काम चल ही रहा था. मैंने हलके से कहा, नहीं बस यूँही पूछ लिया था कोई और बात नहीं थी. दो दिन हो चुके थे मिले हुए लेकिन नाम भी नहीं जान पाया था. वैसे मेरी आदत नहीं हैं किसी से पूछने कि. मेरा डरा हुआ चेहरा और आवाज़ दोनों उसके पार जा चुके थे और मैं अलग खड़ा था दोनों से.पता नहीं क्या सोचते हुए पूछ बैठी वो, इतनी सारी बातें जो तुम करते हो, उस दिन राजघाट पर, फिर मीटिंगों में.. याद कैसे रहता हैं? एक और चीज नोटिस कि कुछ अब्सेंट माइंड भी हो तुम, छोटी छोटी बातें भूल जाते हो. उसकी आखों से पार झाकते हुए कहा, शायद वो मुझे इग्नोर कर देती हैं, बड़ी बातें तो सिर्फ एक बहाना हैं. हम बहुत सारी चीजे सिर्फ बहानो में जीते हैं. उसने हस्ते हुए कहा, स्टाप दिस बुलशिट फिलासफी ...आई हेट इट. ये फिलासफी नहीं हैं, सच में..बड़ी बड़ी बातें याद रहे कोई जरुरी नहीं लेकिन छोटी बातें भूलने के लिए ही होती हैं. अब तो लग रहा हैं कि सिर्फ बातें ही हो रही हैं कुछ और नहीं. बुलावा आया था ...एक मीटिंग थी. सब घेर कर खड़े थे ..कई मुखोटे वाले लोग बोले जा रहे थे, पहले खुशखबरी सुनाई गयी. उन्हें छोड़ा जा रहा हैं...हम खुश हो गए. लगा कि जीत गए अब तो लेकिन एक मुखोटे वाले ने कहा हमने उन्हें सलाह दि हैं कि अब आप दबाव बनाओ ..आज नहीं निकलेंगे जेल से, अपनी मर्ज़ी से बाहर आयेंगे. मीटिंग खतम हो चुकी थी.

आखों में शाम का रंग आ चूका था और दिल के साथ पेट भी खाली था ..शाम्भवी घर जाना चाहती थी. मैं उसका साथ चाहता था. खाली दिल जोर जोर से उछल रहा था...मैंने उससे कहा कुछ खाए हम लोग. उसने कहा ..तुम कुछ खाते भी हो..अनशन खतम हो गया तुम्हारा. दिल गुरुत्वाकर्षण के नियमों के खिलाफ ऊपर ही रह गया ..नीचे नहीं आया. ठंडी आह भरते हुए कहा कि अब उन्हें छोड़ा जा रहा हैं,लेकिन अब वही मना कर रहे हैं. कहने को तो जीत हैं ये लेकिन किसकी और कैसी? अब ये लोग दबाव बनाने कि बात कर रहे हैं, कुछ अजीब लग रहा हैं. कुछ छिपाया जा रहा है. उसने कहा ...लेट्स ईट समथिंग. लीव इट. सामने रखा गरमा गर्म चिकन नग्गेट्स और चिकन महाराजा मैक अपनी खुशबु में सब कुछ भुला देना चाहता था. जब प्लेटे खाली हो गयी तो पेट भर चूका था दोनों का. हर तरफ से आवाजे आ रही थी सिर्फ हम खामोश थे..मैंने पहल कि ..फिर अब क्या करना हैं ..तुम्हे तो घर जाना होगा अपनी दोस्त के पास. उसने पर्स में कुछ ख्गालते हुए कहा, नहीं तो. क्यूँ ..क्या प्लान हैं? मेरे पास कोई प्लान नहीं था उसके लिए ..लापरवाही से कहा, घूमते हैं ..मैं अभी घर नहीं जाना चाहता. कोई ना कोई घेर ही लेता हैं. यही पास में अग्रसेन कि बावली हैं, कभी गए हो वहां? उसने मुस्कुराते हुए कहा ..आई एम् नॉट फ्रॉम देल्ही, यू रिमेम्बर! बिना कुछ समझे मैंने कहा ..चलिए फिर. हम अगले पल ही उठ खड़े हुए और निकल चुके थे. हम फिर बातें कर रहे थे ..मेरा दिल उछलता ही जा रहा था. कई बार आवाज़ रुक जाती इस डर से कि कहीं बाहर ना आ जाए..मैं खुश रहना चाहता था. उसके साथ रहना चाहता था. हमारी बातें में मेरे पास सिर्फ सवाल थे ..जवाब के लिए उसकी आखें थी. मैं ढेर सारे और बहुत से जवाब तलाश रहा था. उसकी बातों में पूरी दुनिया थी ...दुनिया में मैं और मेरे करीब वो. सीढ़ियों पर पत्ते बिखरे थे..बहुत गहरे तक जाती इन सीढ़ियों ने सदियाँ देखि हैं यही बैठ कर ..आज हम भी आये थे इनसे मिलने. मैं कुछ कहना नहीं चाहता था ..लेटना चाहता था इन सीढ़ियों पर. खैर बैठकर बाते करते रहे हम ..वो बताती रही अपने देश और लोगो के बारें में. उसका देश सचमुच बहुत सुन्दर होगा ..लोग सुन्दर होंगे..मौसम सुन्दर होगा..उसी कि तरह. पहले मुझे लगा कि सिर्फ हम दोनों हैं लेकिन रात हमारे करीब आ चुकी थी. अब वहां रुक नहीं सकते थे ...मैं उसे उसके घर तक छोड़ कर आना चाहता था. वो मना करती रही लेकिन मैं फिर भी गया. इसलिए नहीं कि उसका घर देखना चाहता था बल्कि उसके साथ कुछ देर और रहना चाहता था.

लौटकर फिर वही घर और अपने लोग ...बाकि कुछ भी नहीं. मैं आज जोर जोर से हसना चाहता था, खुश रहना चाहता था, कुछ गाना भी चाहता था. लेकिन क्या ...कुछ भी जो मन में आयें. कोई बोल नहीं याद आ रहे थे उस वक्त लेकिन याद आ गया ग़ालिब की वो नज्म ...दिले नादान तुझे हुआ क्या हैं आखिर इस दर्द की दवा क्या हैं ..जी भर गुनगुनाया उसे या यूँ कहूँ की गाया. पिछले कई दिनों के कपड़ो का अम्बार लगा हुआ था. उनको देखकर कोई बुरा ख़याल नहीं आया मन में, बाथरूम में बाल्टियाँ भरी हुयी थी और नल भी चल रहा था. इससे बेहतर वक्त नहीं होगा कभी इनके लिए और कपडे धुल डाले. अगले कई रोज तक वक्त न मिल पाता और कहीं कहीं न मन में ये भी था की उसके सामने गंदे कपड़ो में न जाऊ. रात भागी जा रही थी और मैं धीरे धीरे अपने कामो से फारिग हुआ जा रहा था. जब वापस आया कमरे में तब तक फोन कई बार बजकर बंद हो चूका था. शायद शाम से बजे जा रहा था और साईंलेंट मोड में होने कि वजह से कभी ध्यान नहीं गया उस ओर. जब नम्बर्स देखे तब सचा कि दुनिया दिखाई दि. चार बार दादा का फोन था, दो अनजाने नंबर थे. एक बार घर का नंबर भी था उसी लिस्ट में. साझ नहीं आ रहा था कि किसे फोन करूँ पहले..दादा के नाम से भी डर लग रहा था. फिर भी हिम्मत जूटा कर घुमा दिया उनका नंबर..क्या करेंगे ज्यादे से ज्यादे नौकरी ही तो जायेगी. तब कि तब देखेंगे. दादा कि पुरानी कालर टोन आई लव यौर मम्मी बजती रही..मन में आया क्या गाना हैं ये भी..तभी दादा कि आवाज आई उस ओर से: कहाँ हैं मेरे लाल ...जिन्दा हैं तू तो, मुझे लाग मर गया होगा अब तक तो. मैंने हसकर कहा ..अब नहीं मरूंगा दादा, क्या हो गया कैसे याद किया. उनकी तडपती आवाज़ आई ...याद तो हम तुझे करते ही हैं बस तुही नहीं सुनता हैं. खैर कैसा चल रहा हैं तेरा अनशन ...कुछ खा ले साले मर जाएगा. अच्छा लगा सुनकर ..कोई तो हैं जिसे चिंता हैं भले ही कोई भी कारन हो. फिर से पूछ ही बैठे वो ..कब तक आएगा अब ऑफिस ..अब तो उन्हें छोड़ रहे हैं. विक्की से बात कर ली थी मैंने, समझा लिया उसे ..मान गया और कह रहा था कि चलो कोई तो हैं जिसमे इतनी हिम्मत हैं. आ जायेगा ..जाएगा कहाँ? फिर भी ये बता कि कब तक आएगा. मेरे सपाट सा जवाब: अभी नहीं जनता लेकिन जल्दी ही ..देखिये दादा कुछ और दिन दे दो बस. आ जाऊंगा. उन्होंने कहा ..जब आना हो तो बता दियो. चल मुझे एक टीम हर्डल लेनी हैं. तेरा इस महीने का स्कोरकार्ड नहीं बनेगा. डिफाल्ट भी नहीं मिलेगा तुझे. चल बाय. फोन कट चूका था..स्कोरकार्ड वाली बात दिमाग में घुमती रही. अपने आप ही मन गणित लगाने लगा. कैसे होगा अगले महीने सब कुछ ...बैठा गया बिस्तर पर..सारे खर्चे एक एक करके हाजिरी दे रहे थे. फोन का कैलकुलेटर देखना चाहता था तभी बाकि नम्बरों पर नजर चली गयी. और एक अनजान नंबर पर फोन घुमा दिया. फोन उठा ..पीछे बहुत सी आवाजे एक साथ थी. वही लीडर था उस ओर ..उसने कहा कि कहाँ चले गए थे आप बिना बताये. कम से कम बोल तो जाते. मैंने छिपाते हुए कहा ..थोड़ी तबियत अजीब सी लग रही थी इसलिए घर आ गया था. आप कहो क्या हो गया. उसने कहा एक जगह डिस्कसन के लिए भेजना था, आप मिले नहीं. खैर सुबह थोडा जल्दी आ जाना. आज आराम कर लो. कल सुबह मीटिंग हैं सबकी. मैंने जवाब दे दिया.

छत निहारना कई बार हमारी मजबूरी ही नहीं होती हैं बंद कमरे के भीतर बल्कि उम्मीद जैसी होती हैं. बंद रास्तो कि तरफ से मोड़ा हुआ मुह ऊपर को ही निहारता हैं. अगले नंबर का ख़याल आया ..वहां भी मिला दिया. क्या पता कौन हो .. जिसने फोन उठाया वो बहुत जाना पहचाना लगा पर फिर भी पूछ बैठा..कौन फोन किया था आपने? आवाज आई संगीत कि तरह ..मैं हूँ, क्या हुआ तुमने फोन नहीं उठाया. समझ गयी थी कि किसी से उलझ रहे होगे. मुस्कुराना लाज़मी था...आपका नंबर सेव नहीं किया था इसलिए ..बाकी अपने कपड़ो से उलझा हुआ था, आज उन्हें भी साफ़ कर दिया. हसने लगी वो ..बहुत खूब ..खुद ही कर लेते हो सब कुछ. मन नहीं हुआ इस सवाल का जवाब देने का ..उल्टा सवाल कर दिया आप क्या कर रहे हो? बस यूँही डैड से बात कि मैंने एंड हे वास वेरी हैप्पी दैट आई एम् हियर. सारी डिटेल्स दे दि उन्हें ..आई टोल्ड हिम एबोउट यू आल्सो. यौर व्यूस एंड आइडियोलॉजी..ही वास वैरी हैप्पी. मिलना भी चाहते हैं तुमसे. जवाब नहीं सूझ रहा था. फिर भी कह दिया ..उनको भी बता दिया मेरी बेवकूफियों के बारे में. हसने लगी..नहीं उन्हें अच्छा लगा कि मैं तुमसे मिली यहाँ. और कहो डिनर कर लिया. जवाबों से कई बार बड़ी खीझ होती हैं लेकिन आप उनके पार नहीं जा सकते ..खैर जवाब दिया. अब मन नहीं हैं कुछ बनाने का इसलिए यूँही सो जाऊंगा. खाया तो था आपके साथ. सुबह जल्दी ही जाना हैं. मीटिंग हैं वहीँ. आप चलोगे ..उसने जवाब दे दिया ...देखूंगी. अभी थक गयी हूँ. पता नहीं सुबह उठ भी पाऊँगी या नहीं. आप बता देना मुझे क्या हुआ वहां पर. मैंने हाँ ही कहा. फिर पुछा उसने अकेले रहते हो तो क्या करते हो खाली वक्त में..जवाब मेरे मन का था. ढेर सारी किताबें हैं..उन्हें ही पढता हूँ. अच्छा खासा वक्त बिना लड़े बीत जाता हैं. इनदिनों वान गॉग कि जीवनी लस्ट फॉर लाइफ पढ़ रहा हूँ. उसने चौकते हुए कहा ..जीवनी..ये क्या हैं? मैंने कहा ..उनकी लाइफ स्टोरी बाई इरविंग स्टोन. उसने कहा .. गुड. कितनी किताबें हैं तुम्हारे पास? मैंने कहा तकरीबन हज़ार के करीब ..क्यूँ? उसने कहा ..मेरे डैड के पास भी हैं ऐसे ही. मैं उसे खुश होकर अपनी किताबों के बारें में बताता रहा जैसे वो अपने देश के बारें में बता रही थी. रात एक बार फिर खुशनुमा हो गयी थी और मैं खुश ..कुछ देर बाद दोनों ने एक दूसरे को विदा कहा. वो सो गयी होगी और मैं उम्मीद वाली छत कि ओर देखता रहा.

सुबह मीटिंग में कुछ खास नहीं हुआ, आगे कि बातें होती रही. नए नारे निकाल लिए सबने ..नए लोग सामने आ गए थे. खबर मिली कि कल यहाँ से सीधे राजा मैदान जाकर आमरण अनशन करेंगे. सब लोग नहीं करेंगे अनशन बल्कि कुछ खास लोग ही बैठेंगे और बाकी सब ख्याल रखेंगे एक दूसरे का. वहां सब कुछ का इंतज़ाम होगा आप लोगो के लिए तैयार रहना होगा हम सबको इस आखिरी लड़ाई के लिए. बातें खत्म हो गयी ..दिमाग में यही चल रहा था कि कल क्यूँ ..आज ही क्यूँ नहीं शुरू करते. एक साथी से ये बात कही तो वो भड़क गया ..दबाव कम नहीं करना हैं बल्कि और बढ़ाना हैं. सरकार चल कर आएगी घुटनों के बल देखना सब लोग..फिर नारे लगे उसकी बातों पर. खुली आखों वाले ख़्वाब अब परेशान कर रहे थे मुझे ..जैसे जैसे रौशनी बढती गयी आखें बंद होती गयी. फिर से फोन बजा ..शाम्भवी का नंबर चमक रहा था. सब कुछ साफ़ था अगले ही पल..जल्दी से उठाया..वहीँ चिर परिचित आवाज और सवाल ..कहाँ हो? सीधा जवाब ..यहीं जहाँ मीटिंग होती हैं वहीँ ..अभी खतम हुई हैं. बस वो वहीँ आ चुकी थी ..उसे एक बार जी भर कर देखना चाहता था लेकिन डरता था कि कहीं कोई और ना देख ले. खैर संभाल लिया खुद को. लंबी चली मीटिंग ..क्या क्या डिस्कस किया आप लोगो ने. मैंने कहा कल जायेंगे यहाँ से..राजा मैदान सब लोग..और हम लोग अनशन नहीं करेंगे. बल्कि कुछ खास लोग ही बैठेंगे इस बार. शाम्भवी ने हँसते हुए कहा कि तुम क्या करोगे ..तुम्हारा काम खत्म हो गया फिर तो. बहुत अजीब सी लगी ये बात ..कोई जवाब नहीं दिया मैंने. लेकिन बिना कुछ सोच कर कह दिया ..नहीं इस बार सब कुछ का बंदोबस्त रहेगा वहां और हमें एक दूसरे का ख़याल रखना होगा. सरकार घुटनों के बल चलकर आएगी. तुम देखना हम जीतेंगे. मैंने कहा तो जरुर ये सब लेकिन कहीं ना कहीं मन में एक उहापोह था. कैसे होगा सब कुछ. वैसे भी कई लोग खिलाफ थे इसके ..खैर देखेंगे. इतनी बड़ी लड़ाई में तो ये सब कुछ होता ही रहता हैं हमने एक किनारे बैठ जाने का फैसल किया ..प्रस्ताव उसकी तरफ से ही था. बातें होती रही ..वो कहती रही मैं सुनता रहा. आज वो कुछ अजीब सी बातें कर रही थी. क्या पता उसे अब यहाँ अच्छा ना लग रहा हो..वैसे भी दूर से आई हैं और कौन हैं उसका इस शहर में. मुझे तो आदत पड़ चुकी हैं अकेलेपन कि. हम बातें कर रहे थे दुनिया भर के बड़े बड़े नेताओ के बारें में, आंदोलनों के बारें में..शहरो के बारें में..लेकिन कुछ खालीपन सा था आज हम दोनों कि आवाज में. दोपहर तक का वक्त यूँही कट गया ..भूख लगी थी और ना सोने कि वजह से आखें मुंदी जा रही थी. उसने कहा चलो कुछ खाते हैं अब तो ..सब अनशन खतम हो गया. मैं भी उठ चूका था तब तक..आस पास में बहुत सारे लोग भंडारों में खाना खिला रहे थे. हम वहां नहीं गए ..एक बात थी मन में कि कहीं खाने के बाद नींद ना आ जाए. लेकिन कह नहीं पाया उससे. सड़क जहाँ मुड कर ख़तम हो जाती हैं वहीँ से बाजार शुरु हो जाता हैं और भरी भरी सी दुकाने भी. कई खाली पेट वाले चेहरे उसकी तीमारदारी में लगे होते हैं. हम दोनों भी उन्ही में से एक थे और उसने पिज्जाहट की और इशारा किया. तृप्ति इतनी आसानी से नहीं मिलती ..हाथों से लेकर दाँतों तक को श्रम करना पड़ता हैं ...शरीर की ढेरो मांसपेशियां दौडती हैं साथ में जेब भी कशमकश करती हैं. खैर सब कुछ बीत जाता हैं और हम भूल जाते हैं. हमें चैन मिला और हम भूल गए.

उसके पास फिर कुछ सवाल थे, मैं सिर्फ उसके लिए तैयार कर रहा था खुद को. दोनों का अपना रास्ता था और ज़मीर ...उसने पूछ ही लिया अब आज क्या करोगे ..क्या सोचा हैं? तुम कुछ और भी करते हो इसके सिवाय? जवाब न देना सबसे आसन तरीका हैं अगले कई सवालो के प्रजनन के लिए..हार कर उसने कह ही दिया. चलो आज कहीं फिर घूमते हैं ..मैंने फुसफुसा कर कहा घर चलें. उसकी आखों में एक रंग आकर चल गया सिर्फ हम दोनों ने ही देखा. सांस छोड़ते हुए उसने पुछा ..किसके घर? मेरे घर चलना चाहोगे तुम?  मैं कहीं भी जा सकता हूँ तुम्हारे साथ ऐसा कुछ कह नहीं पाया उस वक़्त ..फिर फुसफुसाया ..मेरे घर चल सकोगी तुम..अपने हाथो की चाय पिलाऊंगा तुम्हे..तुम्हे पसंद आएगी. चाय जैसा खौला और तरल जवाब दिया उसने..मैं चाय नहीं पीती. काफी बनानी आती हैं. कोई ऐसा जवाब नहीं देना चाहता था जो हमारे बस में न हो ..सिर्फ यही कहा ...तुम सिखा देना. उसने कहा चलो इसी बहाने तुम्हारी किताबें भी देखने को मिल जायेंगी. बिना कुछ कहें दूर से आते एक ऑटो को हाथ दिखा दिया. उसके करीब बैठकर उसे जी भर देखने का मन था ...लेकिन पता नहीं कहा से दरवाज़े पर लटका ताला मेरी आखों के सामने आ गया. धीरे से अरोरा साहेब भी पत्नी समेत सामने आगये. चीनी का खाली डिब्बा फिसलता जा रहा था. सब कुछ इसी वक़्त ...अभी ...घर का पता बता कर आखें बंद कर ली थोड़ी देर के लिए. उसने भी आखें मुद कर मुझे किनारा दे दिया.

घर के बाहर ऑटो की आवाज भी डरा रही थी लेकिन कुछ पलों के बाद हम दोनों घर के भीतर थे. अजीब सी आखों से वो सब कुछ निहार रही थी. फिर बड़े आराम से कहा ..काफी बड़े से घर में रहते हो तुम..क्या जरुरत हैं तुम्हे इतने बड़े घर की? मैंने दार्शनिक से अंदाज में जवाब दिया ..मेरी दुनिया बहुत ही छोटी हैं ..बेहद सिमटी सी शायद इसलिए मैं इतने बड़े घर में रहना चाहता हूँ. उसने मुस्कुरा करा कहा ..ओहो मार्क्स ने तुम्हे पागल कर दिया हैं पूरी तरह से. मैंने कहा मार्क्स का क्या दोष जो मेरा दायरा बेहद छोटा हैं और घर बड़ा. कुछ कहा नहीं उसने इस बात पर ..सिर्फ किताबों की आलमारी में झांकती रही. उन्हें हिलाया डूलाया और पन्नो के एक ढेर को उठा कर देखें की कोशिश भी की. एक किताब को हाथों का सहारा देकर खंगाला भी ..कुवर नारायण का कविता संग्रह था. कुछ पन्ने पलटे इधर उधर .. कई जगह रुकी और बढ़ गयी. मुझे पुकार कर कहा उसने ..यही पढ़ते हो तुम..मैं खुद को जानना चाहता था उसके लिए. हाशिए का गवाह संग्रह था उनका ..सामने कविता की पंक्तियाँ भी थी ..एक नजर में पढ़ गया उन्हें ..

मामूली जिंदगी जीते हुए
जानता हूँ कि
मैं दुनिया को बदल नहीं सकता
न लड़ कर उससे जीत ही सकता हूँ ..

उसने मुझे चुप करा दिया आखों से ..सिर्फ आखों से कहा नहीं कुछ भी. किताबों को वहीँ अकेला छोड़कर हम दुसरे कमरे में चले गए. मेरा बिस्तर देखा उसने ..बिना सिलवटो का, बिना किसी निशान के..छत को घूरता हुआ अकेले में. उसने अपनी आखें न फेरी उस तरफ से हमें वहां पाकर भी ..खैर वो बैठ ही गयी उसपर. कहने लगी कभी ऐसे किसी के कमरे पर नहीं गयी हूँ मैं ..ख़ास तौर पर लडको के वो भी जो तुम्हारी तरह अकेला ही रहता हो. मैने खड़े खड़े जवाब दिया ..यहाँ भी कोई नहीं आता कभी, न तुम, न तुम्हारे जैसा कोई और न ही कोई और. उसकी आखों में फिर एक रंग आकर चला गया था. फिर से चाय का बहाना किया मैंने ..उसने कहा बना ही लाओ. मैं भी देखु कैसी चाय बनाते हो जो इतनी दूर पिलाने लाये हो.

चाय बन कर आ गयी ..बहुत ही हल्की शक्कर कि ..उसने धीरे से सिप किया. आखें घुमाते हुए बोल पड़ी. चाय तो सच में अच्छी बनाते हो. किसने सिखाया?  उसने बिस्तर पर बैठे कई किताबें पलट डाली थी. मेरे हाथ में चाय का प्याला धीरे धीरे हिल रहा था. उसने किताबों कि तरफ से नजर फेरकर मुझे भी देखा और फिर कहा खड़े क्यों हो बैठ जाओ या मार कर भागने का इरादा हैं. जवाब निकल ही आया..तुम्हे छूकर कहीं जा नहीं पाऊंगा. उसकी आखें और प्याला दोनों थम गए. मुझे एक पल को लगा कहाँ भाग जाऊ लेकिन चेतन हो गया उसी पल में..आखें थमा दी उसकी आखों में. क्या वक़्त था वो ..कुछ याद नहीं ठीक से ..प्याला रखने कि एक आवाज थी और उसके खड़े होने कि सरसराहट. नींद से आखें बड़ी हुई जा रही थी..सब कुछ जोर जोर से चल रहा था. मैं उसकी बाहों में दुबका हुआ था. कौन जाने क्या हो गया था मैं उस वक़्त..बहुत जोर जोर से रोने लगा ...कुछ था भीतर जो जमा हुआ था. पिघल कर बहने लगा आखों से..उसका नमक होठों तक फैला हुआ था. उसने अपने होठो से मेरे होठों को पोछना शुरू कर दिया. बहुत गहरी नींद में सो जाना चाहता था. सब कुछ फिर से सिकुड़ने लगा ..और उसने मुझे सहारे से लिटा दिया. सर को चूमती हुयी बोलने लगी..इतनी बड़ी बड़ी बातें करते हो और बच्चो कि तरह रोते हो. यही सीखाती हैं तुम्हे सारी किताबें. बोलो ..अब चुप हो जाओ ..मुझे नहीं मालूम था कि तुम ऐसे भी हो. कितना चिल्लाते थे वहां..कोई ऐसे देख ले तुम्हे तो क्या सोचेगा. मैंने माफ़ी मांगी, उसे अजीब लगा.. आई स्वेयर आई एम् नॉट गोना से दिस तो एनीवन. प्लीज़ चुप हो जाओ. हिचकियाँ थम गयी थी. आखें सामान्य हो चुकी थी मैंसिर्फ उसे ही देखना चाहता था, उसके साथ उसके करीब ..और कुछ भी नहीं. किसी तरह से तूफ़ान शांत हुआ ..बहुत दिनों से भीतर रुका हुआ था.

चाय का कप भी शांत हो गया था मेरी तरह..बिलकुल ठंडा, निर्जीव. हम दोनों भी खामोश थे एक दुसरे में सिमटे हुए. मेरी आखें कुछ देख नहीं पा रही थी. शायद उसकी आखें भी कुछ नहीं देख रही थी. थोड़ी देर बाद उसकी आवाज सुनाई दी मुझे ..आज मैं तुम्हारे पास ही रहूंगी, मुझे घर नहीं जाना हैं. तुम्हे कोई तकलीफ तो नहीं ..बिना कुछ कहें मैं उससे फिर लिपट गया. शाम के रास्ते जब रात आती है तब उसकी उम्र बढ़ जाती हैं और बंद कमरों के भीतर जब चाँद दिखाई नहीं देता तब खिड़कियाँ रात भर रोती रहती हैं सर पीट पीट कर. हम रात भर सिर्फ अँधेरे में एक दुसरे को टटोलते रहे..एक दुसरे को अपने ही भीतर खंगाल रहे थे. काश कि कोई एक लहर मिल जाती और बह जाते उसके साथ..लेकिन बाढ़ कि लहर देर तक नहीं रूकती अपने घाटो को तोड़ने के बाद. उसकी रफ़्तार को रुकना ही होता हैं अगली बार के लिए. सुबह का इंतज़ार आज नहीं था. बस रात कि जरुरत थी.

फोन का बजना बंद ही नहीं हो रहा था, पता नहीं कौन याद कर रहा था मुझे. ये मेरा फोन नहीं था ..उसका फोन बजे जा रहा था. मैंने उसे धीरे से जगाया ..उसके चेहरे पर आखें अटक सी गयी थी. लगा गलती कर दी ..अब जाग कर चली जायेगी. काश कि यूँही नींद में रहती और मैं उसे देख सकता. उसकी नजर मुझसे मिली ..एक नया सा रंग आकर गुजर गया फिर एक बार. फोन हाथोंमें लेकर वो दुसरे कमरे में चली गयी. मैं उसके पीछे जाने कि हिम्मत नहीं कर पाया.  वो लौट कर आ गयी. उसकी आखों में मुझे कई रंग अलग अलग से दिखे ..हमेशा कि तरह अपना भरम लगा. हमारे पास कहने को कुछ नहीं था लेकिन हर बार कि तरह उसने चुप्पी तोड़ी. मुझे घर जाना होगा ..मेरी फ्रेंड परेशान होगी. मुझे लगा उसी का फोन होगा. उसे मुझसे अलग होना था. दोनों तैयार थे थोड़ी देर में ..सब कुछ सामान्य चल रहा था बस बातें नहीं हो पा रही थी. अपराध बोध नहीं था लेकिन कुछ तो था किसी और ही रंग का.

घर से बाहर निकलने पर अजीब सा वाकया हुआ ..मेरी झुकी हुयी आखें आज ऊपर कि और थी और मैं अब उसे अपनी मर्ज़ी से देख भी पा रहा था.  ऑटो से उतरने पर उसने बहुत हल्की सी आवाज में कहा ...यू ओके ना बेबी मैंने सर हिलाया..डोंट वरी. मैं कुछ नहीं कहूँगी किसी से..नोबडी विल एवर नो एबाउट दिस. मैंने सांस खीचकर कहा ..आई एम् सॉरी. उसने अपने हाथों से मेरे गालों को सहलाया और बिना कुछ कहे चली गयी. मेरे शरीर के हर हिस्से पर अब भी उसका स्पर्श थमा हुआ था.

लोग एक बार फिर से सडको पर आ गए थे..बारिश फिर से हो रही थी, नारे फिर से तैयार हो गए थे...मुझे इसका कोई फायदा नहीं दिख रहा था आज. पानी आ तो रहा हैं आज..कभी कभी अगर नहीं भी आता हैं तो इसमें शोर मचाने कि क्या जरुरत हैं किसी को. मैं फिर से भीड़ में चल रहा था..लेकिन आज बात कुछ अलग ही थी अन्दर ..शाम्भवी कि आखें मुझे अन्दर तक भिगाए हुए थी. कई बार दिल मुह तक आ जाता चलकर ..शायद कुछ कहना चाहता था. फोन पर बार बार उँगलियाँ फिरती लेकिन हर बार घूमकर वापिस आ जाती. मन में था कि एक बार फिर मुझसे मिलने आ जायें ..अब उसे जाने नहीं दूंगा. शाम आ गयी थी ..उसकी कोई खबर नहीं आई. मन में आया कि उसके पास चला जाऊ. हर बार कोई रोक लेता. इंतज़ार करते करते सब कुछ बीत गया. खुद को रोक नहीं पाया..नंबर मिलाने के बाद किसी तरह फोन को कान के पास ले गया. उधर से स्विच ऑफ कि घोषणा जारी थी. एक बार को दिल बैठ गया ..कुछ हो तो नहीं गया. समझाया खुद को ..शायद सो रही होगी. हो सकता हो कि नाराज भी हो ..किसी तरह से घर पहुंचा. दरवाजे के भीतर आखें बार बार उसे ही ढूढ़ रही थी. बिस्तर अब भी छत को निहार रहा था. हिम्मत नहीं हुयी कि उसके करीब जाऊ. इतनी बेचैनी पहले कभी नहीं थी. कई ख़याल एक साथ आ रहे थे ..हर ख़याल का एक अनूठा डर था मन में. कमरे में चक्कर काटते हुए एक बार फिर से उसका नंबर मिला दिया. अब भी वही घोषणा जारी थी. खुद को समझा पाना मुश्किल था. जिन किताबों को छुआ था उसने ..उन्हें फिर से देखने लगा ..कहीं उन्ही में छिपी हुयी ना मिल जायें. रात के साथ साथ उसकी आखों में फिरता हर रंग आखों के साथ घूमता रहा. कहीं वाकई में मुझसे नाराज तो नहीं हो गयी. रात भर बाहर रहने कि वजह से कहीं घर वालों को खबर ना हो गयी हो. या फोन ना करने कि वजह से कहीं ये ना समझ बैठी हो कि मैंने सिर्फ उसे इस्तेमाल किया. मैंने खुद को गालियाँ देकर समझाया ..फिर नया सा रंग आ गया..नोर्वे से आई हैं ..कहीं इन सबको बस खेल ना समझ बैठी हो. उसके देश में ये सब बहुत सामान्य होगा..लोग जल्दी ही भूल जाते होंगे. फिर गालियाँ दी ..वो यहीं से हैं. माँ बाप मुंबई में ही हैं ..कुछ तो संस्कार होंगे. कहीं मुंबई तो नहीं चली गयी बिना बताएं..सर झटक कर सब कुछ हटाने कि कोशिश कि. कुछ भी अलग नहि हुआ. रात भर हर ख़याल आता जाता रहा. मैं आज रात कई बार जिया और मरा भी. आखें बंद होती तो लगता कहीं वो मुझे देख तो नहीं रही किसी कोने से ..फोन बार बार खंगालता. लेकिन सब कुछ सुन्न था. दो रातों के बीच में जिनदगी इतनी बदल जायेगी कभी सोचा नहीं था.
चार बजे से वहीँ खड़ा हो गया जहाँ कल उसे छोड़ा था. रात भर के सारे रंग अब भी चेहरे पर पुते हुए थे. मैं चाह कर भी खुद को अलग नहीं कर पा रहा था. खुद को कोसता रहा ..कम से कम उसका घर तो देख लिया होता. किसी और का नंबर ले लिया होता. उसके किसी दोस्त का ही सही ..कहाँ तलाशु उसे. कौन बताएगा मुझे ...उम्मीद के लिए सिर्फ आसमान निहार सकता था. मालूम था कि कोई भगवान नहीं हैं ऊपर..साँसों को आक्सीजन कि जरुरत हैं सिर्फ ..जियूँगा तो उसे देख भी पाउँगा. एकाध लोगो से हिम्मत करके उसका नाम भी पुछा ..सेहत के फिक्र्मंद मुझे कोई जवाब नहीं दे पाएं. कइयो कि आखों में शक भी तैरता पाया. कुछ एक सिक्योरिटी गार्डो से पुछा ..पिछले रोज के उसके कपडे भी बताएं. उन्होंने भी मुझे नाउम्मीद कर दिया. समंदर में अपनी आख का आँसू तलाशना जैसा था ये. किस्से पूछु जो पहचान जाए मेरी आख का आँसू. कई बार फोन भी मिलाया ..अब तक वही बातें दुहरायी जा रही थी उस और से...कैसे समझाऊ उसे कि नहीं अब सब कुछ बदल गया हैं. सात बजे तक धुप आ गयी ...नौ बजते बजते चटक हो गयी. रात भर ना नींद थी और ना ही सुकून ..अब सिर्फ रौशनी थी. मैं बीते हुए कल में सुबह नहीं आने देना चाहता था. आज रात के साथ सुबह भी सवार थी मुझ पर. मैं बार बार अपने शारीर के हिस्सों को छूकर उसका स्पर्श तलाशता रहता. वो अब भी वहीं था फिर वो क्यूँ नहीं थी. मैं किससे पूछु?

थककर नहीं कुछ सोचकर घर लौट आया, हर रंग धीरे धीरे गहरा होता जा रहा था. मैं उन्हें हटाने के लिए चेहरे को धोता रहता लेकिन रंग और गहरा होता जाता. मैं खुद को देख नहीं पा रहा था. आखें नोंच डाली, चेहरे पर कई निशान बना डाले. बार बार पोछता पर कहीं कोई फर्क नहीं था. आखें भरी थी ..फिर से बहने लगी..जोर जोर से जैसे कोई पहाड़ी नदी गरज रही हो. मन के भीतर कोई और भी बैठा था जिसे ये आवाजे बहुत बेचैन कर रही थी. आज कोई रोकने वाला भी नहीं था. जी भर कर रोया..उस रात का रुका हुआ सब कुछ बह गया. कब आखें बंद हो गयी ..जान नहीं पाया. उसी कमरे में फर्श पर पाया खुद को ..शाम का धुंधलका चारो और लगा. साफ़ साफ सा दिख रहा था सब कुछ...रंगों से जले चेहरे पर घाव अब भी थे. किसी ने फोन का द्याल दिला दिया. कई मिस काल्स थी..उसका नंबर कहीं नहीं था. दो बार दादा ने फोन किया था. तीन बार उसी लीडर का फोन था. एक नया नंबर था...उसे जल्दी से घुमा दिया. बिना कुछ कहें काल कट गयी..कई बार मिलाया.. वही हाल. फिर से शाम्भवी का चेहरा आखों के सामने था. जल्दी से उसका नंबर मिला दिया. क्या तूफ़ान था ..लेकिन वही घोषणा सुनकर सब कुछ टुकडो में बिखर गया. मैं और सर नहीं मारना चाहता था ...एक बार को मान में आया कि कहीं वो राजा मैदान ना चली गयी हो..मुझसे नाराज ना हो. जल्दी से लीडर को फ़ोन मिलाया. उसने फोन उठाते ही कहा ..आप हमेशा कि तरह फिर से गायब हैं ..जब जरुरत होती हैं तब आप मिलते नहीं. मैं आपका भविष्य बनाना चाहता हूँ और आप को बाकी कामो से फुर्सत नहीं मिलती. कहाँ हैं अभी आप? मैंने धीरे से कहा ..थोड़ी तबियत ख़राब थी..इसलिए आराम कर रहा था. अभी सो कर जगा हूँ. उसने कहा: अभी आ सकते हैं आप? हाँ में जवाब दिया ...उसने कहा ..यही मिलिए मुझ्से.बड़े से मैदान मैं बड़ा सा पंडाल सजा था ...ऊँचे मंच से उद्घोष हो रहा था. भारत माता जी जय के नारे लग रहे थे. मैदान में चारो और भीड़ थी ..मुझे लगा सब यहीं हैं ..बस मैं ही चला गया था. कितना मुर्ख हूँ मैं भी ..अभी लडाई ख़तम नहीं हुयी हैं. मैं मैदान में शाम्भवी को तलाश रहा था ..कहीं नहीं मिली मुझे. मैं लीडर के पास गया ..उसने जलती आखों से मुझसे पूछताछ कि. सिर्फ तबियत के बारें नहीं पुछा. चेहरे के घाव शायद उसे दिखे ही नहीं होंगे ..उसकी नजर बड़ी दूर तक देखती हैं. सब कहते हैं. उसके हिसाब से वो मुझ पर और भरोसा नहीं कर सकता ...मुझे नहीं मालूम कि मैं किस पर करूँ?

सब ओर शोर था, नारे थे देशभक्ति थी ...मैं भी वहीँ था सिर्फ वही नहीं थी.पागलो कि तरह मैदान के चक्कर काटता रहा, सारी जमीन आसमान के आसुओंसे भींग कर पसीज रही थी और चपल्लो पर अपना असर छोड़े जा रही थी. तकरीबन दो घंटे से ज्यादे का वक़्त गुजर चूका था और आसमान अब भी रोने कि तैयारी में हुलस रहा था. मैं भी रोना चाहता था जोर जोर से ..एक उम्मीद थी कि मुझे चुप कराने वाला सुनकर वापस आ जायेगा. आसमान रोता रहा और मैं चुपचाप उसे निहारता रहा. मैं उसी कमरे कि तलाश में फिर से जाना चाहता था पर उससे पहले उस लीडर से आखिरी बार मिलना चाहता था. उसने मुझे वहीँ पाकर जलती निगाहों से एक बार देखा. फिर कुछ सोचते हुए कहने लगा..आप के साथ और भी कोई था, कहाँ हैं वो मोहतरमा. मैं बड़े ही सपाट से स्वरों में जवाब दिया मुझे नहीं मालूम क्यूँ?  कुछ हुआ हैं क्या? उसने मज़ाक बनाते हुए कहा नहीं ...मुझे लगा कि चलो किसी का तो फायदा हुआ. सुलगते दिल कि आंच आखों तक पहुच गयी और लपटों कि तर्ज में कहा..क्या मतलब? उसने बेफिक्री में जवाब दिया ..हमें तो लगा था कि आप का घर तो बस गया, इस आन्दोलन ने किसी कि तो जिंदगी बसा दी. वैसे वो कहाँ से थी? मैंने ठंडी लकड़ियों सा सिकुड़ चूका था इस के बाद और बस इतना ही कह पाया ..नार्वे से आई हैं. वो कुछ हिल सा गया ...और जोर जोर से कुछ तलाशने लगा अपने ब्लैकबेरी पर. बिना मेरी ओर देखे उसने कहा कि नार्वे में क्या करती हैं, मेरा सपाट सा जवाब था ..पढ़ती हैं. उसने अब मुझे आखों से खंगाला और खुली आखों से पुछा अभी कहाँ हैं? मैं भी तो वही खंगाल रहा हूँ..पर आखों को फिराते हुए कहा ..नहीं मालूम, काफी वक़्त बीत गया हैं ..मुझसे मिली नहीं. परसों आखिरी बार सुबह देखा था उसे...तब से नहीं. उसने फोन को कान पर लगाया और उधर से आवाज का इंतज़ार करने लगा. फिर उसकी आवाज मेरे कानो में घुमने लगी.. अरे नार्वे वाली पार्टी से कोई आने वाला था इंस्पेक्शन के लिए, उसका क्या हुआ? उस ओर कि आवाज मैं नहीं सुन सका. फिर उसी कि आवाज आई ..अच्छा अच्छा, कोई बात नहीं. वैसे कब तक फ़ाइनल हो जायेग? उस ओर कि आवाज ने फिर कुछ कहा होगा और इसने फिर जवाब दिया, नहीं मुझे लग रहा थी कि कोई आया था और शायद वापिस भी जा चूका हैं अब तक, हो सके तो पता करवाओ. फिर उधर कि आवाज सुनकर उसने फोन काट दिया. उसने फोन को जेब में रखते हुए, हलकी मुस्कान के साथ कहा...तुम्हारी चिड़िया उड़ गयी अब होश में आ जाओ.

मैं होश के लायक नहीं था, क्या उसके भी लायक नहीं था या कुछ के भी लायक नहीं हूँ. उसे जाते हुए देखकर मैंने कुछ कहने कि कोशिश कि. मैं घर जा रहा हूँ. कुछ तबियत ठीक नहीं लग रही हैं. कुछ काम हो तो रुकूँ. उसने बिना मुड़े जवाब दिया ..जाओ अब तुम्हारी जरुरत नहीं हैं.

मैं बैठना चाहता था, उसे भी चाहता था..लेकिन पसीजी जमीन पर ये मुश्किल था. मैं मैदान से बाहर कि तरफ आने लगा. 









3 comments:

Pranjal Dhar ने कहा…
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Pranjal Dhar ने कहा…

अच्छी कहानी है। असुविधा को और आदित्य जी को बधाइयाँ।
सादर,
प्रांजल धर

Pranjal Dhar ने कहा…
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