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शुक्रवार, 13 जून 2014

विकास की क़ीमत इतनी ज़्यादा होती है तो क्या बुरा है अविकसित रहना - प्रदीप मिश्र

बड़े बाँध... विकास...विस्थापन...बर्बादी...विकास...जी डी पी...ऐसे तमाम शब्द पिछले दो दशकों से लगातार हमारे बीच कभी अजनबी तो कभी परिचित की तरह भटक रहे हैं. सरदार सरोवर बाँध और नर्मदा बचाओ आन्दोलन की कहानी किसके लिए अजनबी है? कितने इलाके डूब गए...अब विकास के नाम पर सत्ता में आई सरकार ने उसकी ऊंचाई बढ़ाने का निर्णय ले लिया है. फिर कुछ लोग विस्थापित होंगे, कुछ गाँव क़स्बे स्मृतियों में दर्ज हो जायेंगे..चीख़ पुकारें जश्न के शोर में डूब जायेंगी. हमेशा की तरह सिर्फ कवि होगा इसे खामोशी के साथ दर्ज़ करता हुआ..एक वैकल्पिक इतिहास लिखता हुआ...अनसुना किया जाता हुआ. आज भाई प्रदीप मिश्र की यह कविता...ताकि सनद रहे   





डूबते हरसूद पर पाँच कविताएँ

(एक) - घर

जब भी कोई जाता
लम्बी यात्रा पर
घर उदास रहता
उसके लौटने तक

जब भी उठती घर से
बेटियों की डोली
वह घर की औरतों से
ज्यादा बिफ़रकर रोता

जब भी जन्मते घर में बच्चे
गर्व से फैलकर
अपने अन्दर जगह बनाता
उनके लिए भी

उत्सवों और सुअवसरों पर
इतना प्रसन्न होता कि
उसके साथ टोले-मुहल्ले भी 
प्रसन्न हो जाते

इसी घर पर 
आज बरस रहे हैं हथौड़े
वह मुँह भींचे पड़ा हुआ है
न आह, न कराह
चुपचाप भरभराते हुए
ढह रहा है घर

घर विस्थापित हो रहा है ।


(दो) - छूटा हुआ जूता

सुनसान सड़क पर छूटा हुआ है
एक पैर का जूता

उसे इन्तज़ार है
हमसफ़र पाँव का 
जिसके साथ
टहलने जाना चाहता है
पान की दूकान तक

एक किनारे औंधा पड़ा हुक्का 
सुगबुगा रहा है
कोई आकर उसे गुड़गुड़ाए
तो वह फिर जी जाएगा
भर देगा रग-रग में तरंग

ठण्डा पड़ रहा है चूल्हा
खेतों में खटकर लौटी भूख
को देखकर जल उठेगा
लपलपाते हुए

खूँटी पर टँगा हुआ बस्ता
अपने अन्दर की स्याही से 
नीला पड़ रहा है
उसे लटकने के लिए 
नाजुक कन्धा मिल जाए तो
उसे बना देगा कर्णधार

उजड़ती हुई खिड़कियों के झरोखों
और दरवाज़ों की ओट में पल्लवित प्रेम
विस्थापित हो रहा है
अभी भी मिल जाएँ आतुर निगाहें तो
वे फिर रच देंगे हीर-राँझा

नीम की छाँव में 
धूप के चकत्तों का आकार बढ़ता जा रहा है

खेतों के गर्भ में
बहुत सारी उर्वरा खदबदा रही है

आख़िरी तारीख़ का ऐलान हो चुका है
एक दिन इन सब पर 
फिर जाएगा पानी

इस पानी से बनेगी बिजली
जो दौड़ेगी 
नगर-नगर,गाँव-गाँव
चारो तरफ विकास ही विकास होगा
एक दिन विकसित समाज में 
कोई दबाएगा बिजली का खटका तो
उसकी बत्ती से रौशनी की जगह
विस्थापितों के जूते बरसेंगे
जो पुलिस के डंडे की डर
से छूट गए थे सड़क पर

कोई टेबल लैम्प जलाएगा
पढ़ने के लिए
उसके सामने फैल जाएगी
बस्ते की स्याही
जो खूँटी पर टँगा छूट गया था

कोई कम्प्यूटर का खटका दबाएगा
तो उसके कम्प्यूटर के स्क्रीन पर
उभरेगा मरणासन्न हुक्का 
पूछेगा कहाँ गए वो लोग
जो मुझे गुड़गुड़ाते थे

कोई हीटर का खटका दबाएगा
चाय बनाने के लिए
तो हीटर पर रखी केतली में
उन चूल्हों के ख़ूनभरे आँसू उबलेंगे
जिनकी आग पानी डूब गई

खेतों के गर्भ में खदबदाने के लिए
कुछ भी नहीं बचेगा
सड़ रही होंगी जड़ें

फिर दबाते रहिए बिजली के खटके
गाड़ते जाएँ विकास के झण्डे
वहाँ कुछ नहीं बचेगा
जीवन जैसा ।


(तीन) - डूबता पीपल, तिरती स्लेट

बढ़ रहा है नदी में पानी
चढ़ रहा है गाँव पर

कसमसा रहे है खेत
वर्षों पैदा किया अनाज
अब जम जाएगी उन पर काई
या उनके अंदर बची हुई जड़ें
सड़कर बदबू फैलाएँगी
हो जाएगा जीना मुहाल
मर जाऐंगे खेत
चिल्ला रहे हैं
अरे आओ रे आओ
बचाओ कोई

आधा डूब चुका है बूढ़ा पीपल
और पानी चढ़ रहा है लगातार
वह डूबते हुए आदमी की तरह
अपनी टहनियों को ऊपर उठाए
चिल्ला रहा है

अरे आओ रे आओ
बचाओ कोई
अभी मेरे ज़िम्में बहुत सारी मन्नतें हैं

जिनको पूरा करना है
अपनी छाया में खेलते-कूदते बच्चों को
जवान होते देखना है
बहुत सारे तीज-त्यौहारों में शामिल होना है

एक घर जो बचा रह गया था
सरकारी बुल्डोजरों और हथौड़ों से
न रो रहा है
न बचाव के लिए चिल्ला रहा है
ख़ुद के आँसुओं से
गल रहीं हैं उसकी दीवारें 
और चढ़ रहा है नदी का पानी
घर जल-समाधि लगा रहा है

देखते-देखते डूब गया हरसूद
हाथियों नीचे पानी में
और पानी की सतह पर
एक स्लेट तैर रही है
जिसपर लिखा है कखग।



(चार) - डूब गया एक गाँव हरसूद

एक बार फैली थी महामारी
देखते-देखते
पूरा गाँव खाली हो गया था

यहाँ तक कि जानवर भी नहीं बच पाए थे
महामारी के प्रकोप से

एक बार आया था
बहुत भयानक भूकम्प
धरती ऐसी काँपी थी कि
नेस्तनाबूत हो गया था पूरा गाँव

एक बार गाँव के बीचो-बीच
फूट पड़ा था ज्वालामुखी
जलकर राख़ हो गए थे
गाँव के बाग-बगीचे तक

एक बार आया था प्रलय
ऐसा महाप्रलय कि
उसमें समा गया था पूरा गाँव

इस बार न फैली महामारी
न भूकम्प से थरथराई धरती
न ज्वालामुखी से उमड़ा आग का दरिया
न ही हुआ प्रलय का महाविनाशक तांडव
फिर भी डूब गया एक गाँव हरसूद

हरसूद डूब गया
अपनी सभ्यता-परम्परा और
जीवन की कलाओं के साथ।



(पाँच)- छूटी गीतों की डायरी, रंगोली के रंग

पकिस्तान से विस्थापित होकर
मैं आया था अपने देश में
अपने देश में भी विस्थापित
होता रहा बार-बार

हर बार तोड़ी एक गृहस्थी
हर बार जोड़ी एक गृहस्थी
नई गृहस्थी हमेशा ही पुराने से
कमतर ही रही
अब फिर अस्सी वर्ष की उम्र में
उजड़ रहा हूँ हरसूद से

अस्सी वर्ष की उम्र में
उजड़ना बहुत आसान होता है

बसना नामुमकिन
मुझे सरकार ने दिया है
बहुत सारा मुआवज़ा

मैं आजकल रूपये
ओढ़-बिछा रहा हूँ
खूब चबा-चबाकर खा रहा हूँ 

सौ-सौ के नोट 
लेकिन कम्बख़्त भूख है कि मिटती नहीं
नोटों के गद्दे पर वो नींद नहीं आती
जो कर्ज़ में गले तक डूबे रहने के बाद भी
अपनी झोपड़ी के ज़मीन पर आती थी
मैं हरसूद से विस्थापित हो गया
मेरा जीवन वहीं छूट गया
डूबकर मरने के लिए

मेरी सुहाग की चूड़ियाँ
लोकगीतों की डायरी
रंगोली के रंग
चौक पूरने का सामान
तुलसी का चौरा
सखी-सहेलियाँ
सबकुछ छूट गया हरसूद में
हरसूद डूब गया

और मैं डूबने से बच गयी
या मैं भी डूब गयी
हरसूद के साथ
कौन बताएगा मुझे

मास्टर जी ने कहा था
विकास मनुष्य को बेहतर जीवन देता है
विषय पर लेख लिखने के लिए
मैंने बहुत अच्छा लेख लिखा है

लेकिन मेरी पाठशाला और मास्टर जी 
दोनो छूट गए हरसूद में
अब मैं इस लेख का क्या करूँ


विकास की क़ीमत इतनी ज़्यादा होती है
तो क्या बुरा है अविकसित रहना ।

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(कविता कोष से साभार)

प्रदीप मिश्र (बाएँ) 

शिक्षा तकनीक और विज्ञान की. मन रमता है साहित्य और बच्चों में. एक संकलन "फिर कभी" प्रकाशित. बच्चों के लिए विज्ञान कथाएं तथा उपन्यास लिखे. आजकल इंदौर में हैं...

4 comments:

अरुन श्रीवास्तव ने कहा…

विस्थापन के दर्द को इतनी तीव्रता से उकेरा गया है कि भोग हुआ सा महसूस हो रहा है ! पाठक से ऐसा मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध बना पाना हर कविता उद्देश्य भी है और उपलब्धि भी ! इस लिहाज से बेहद सफल और मर्मस्पर्शी कविताएँ !

Onkar ने कहा…

कमाल की रचनाएँ

Ved ने कहा…

apki kavitaon me jeewan dikhata hai, jeewan aisa jo hamesa aage badhata hua, is samay isi ki jaroorat hai, apko badhai...ved prakash,gorakhpur

प्रदीप कांत ने कहा…

आधा डूब चुका है बूढ़ा पीपल
और पानी चढ़ रहा है लगातार
वह डूबते हुए आदमी की तरह
अपनी टहनियों को ऊपर उठाए
चिल्ला रहा है

अरे आओ रे आओ
बचाओ कोई
अभी मेरे ज़िम्में बहुत सारी मन्नतें हैं
___________________________
इन कविताओं का पहला पाठ प्रदीप मिश्र ने नहीं, मैने किया था और भीतर बहुत कुछ टूट गया था, खासकर पीपल पर ये पढते हुए
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