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शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

फ़लस्तीन : कुछ कविताएँ

फ़लस्तीन....कितने ही बरसों से इंसानी रूह की देह से बहता लहू. इंसानियत जहाँ इस क़दर शर्मसार हुई कि उसके आँसू सूख गए...ये कविताएँ यों ही यहाँ वहाँ से इकट्ठा कर ली हैं. जिनके अनुवादक का नाम नहीं मिला उन्हें ऐसे ही दे रहा हूँ अनुवादकों से क्षमा याचना के साथ...


तस्वीर यहाँ से साभार 


फलस्तीनी बच्चे के लिए लोरी 
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मत रो बच्चे
रो रो के अभी
तेरी अम्मा की आँख लगी है
मत रो बच्चे
कुछ ही पहले
तेरे अब्बा ने
अपने गम से रुखसत ली है
मत रो बच्चे
तेरा भाई
अपने ख्वाब की तितली पीछे
दूर कहीं परदेस गया है
मत रो बच्चे
तेरी बाजी का
डोला पराये देस गया है
मुर्दा सूरज नहला के गए है
चंद्रमा दफना के गए है
मत रो बच्चे
अम्मी,अब्बा,बाजी,भाई
चाँद और सूरज
तू गर रोयेगा तो ये सब
और भी तुझे रुलायेंगे
तू मुस्कयेगा तो शायद
सारे एक दिन भेस
तुझ से खेलने लौट आयेंगे

*फैज़ अहमद फैज़

मैं वहाँ से आया हूँ

मैं वहाँ से आया हूँ और मेरे पास स्मृतियाँ हैं,
मैं औरों की तरह नश्वर हूँ और मेरे पास माँ है,
और है एक घर अनेक खिडकियोंवाला,
मेरे पास भाईबंधु हैं और एक कारागार भी है,
जिसकी खिड़कियाँ सर्द हैं.

वह लहर भी मेरी है जिसे अभी-अभी समुद्री चिड़िया ने निगल लिया है,
मेरे पास मेरे विचार हैं,
और एक अतिरिक्त घास की पत्ती भी.

शब्दों के दूर तक फैले किनारे पर बैठावह चन्द्रमा भी मेरा है,
और चिड़ियों की अनकही उदारताऔर जैतून वृक्ष की अकल्पनीय अनश्वरता भी.
जिस भूमिपर मैंने तलवारों के साये में गति पाई है
उसका जीवंत शरीर अब निष्क्रिय बोझा भर है.

मैंमैं वहाँ से आया हूँ.
मैंने खुले आकाश को उसकी माँ को सौंप दिया हैजब वह माँ के लिए विलाप कर रहा था.
और मैं भी रोया,
लौटते बेसब्र बादल को अपनी पहचान बताने के लिए.

मैंने रक्त के आँगन में लिथड़े सारे शब्द सीख लिए हैंताकि भंग कर सकूँ नियमों को.
मैंने सारे शब्दों को कंठस्थ कर उन्हें खंडित कर दिया है ताकि नवीन शब्द-सृजन कर सकूँ:

मातृभूमि... .!


तुम हत्यारे हो

उन्होंने उसके मुँह पर जंज़ीरें कस दीं
मौत की चट्टान से बांध दिया उसे
और कहा-- तुम हत्यारे हो
उन्होंने उससे भोजन, कपड़े और अण्डे छीन लिए
फेंक दिया उसे मृत्यु-कक्ष में
और कहा-- चोर हो तुम
उसे हर जगह से भगाया उन्होंने
प्यारी छोटी लड़की को छीन लिया
और कहा-- शरणार्थी हो तुम, शरणार्थी
अपनी जलती आँखों
और रक्तिम हाथों को बताओ
रात जाएगी
कोई क़ैद, कोई जंज़ीर नहीं रहेगी
नीरो मर गया था रोम नहीं
वह लड़ा था अपनी आँखों से
एक सूखी हुई गेहूँ की बाली के बीज़
भर देंगे खेतों को
करोड़ों-करोड़ हरी बालियों से

महमूद दरवेश 



मौत उनके लिए नहीं

अल अरब जाने के रास्ते 
मुर्दे उठ खड़े होते हैं रात में 
उतरते हैं पहाड़ियों से 
सदियों पुरानी पगडंडियों से 
घरों के पीछे से
अंगूर के बागीचों से 
यादों में 
मासूम नीदों में 
अजान में 
धूल से अंटे,
ओढ़े कफ़न मौत का
एक के बाद एक
बढ़ते हैं मुर्दे 
ढलानों से उतरते 
झाड-झंखाड़ पार करते 
उठाते वह सब कुछ 
छोड़ गए जो दरिन्दे 
माँ के आंसू ,
औरजो उंगलियाँ नहीं पोंछ पाई 
चंद ओस की बूंदे 
उठेंगे मुर्दे बार-बार
चलेंगे अहिस्ता ,धीरे-धीरे 
धरती के बोझ से बोझिल 
तालाबों और पुराने रास्ते से 
सही रास्ते पर
तालाब की खामोशी के बीच 
मेहराबों के नीचे,खँडहर में ,
बैठेंगे मुर्दे 
याद नहीं आएगा कुछ भी 
जमीन के नीचे बहता दरिया 
सुनाई पड़ती है घोड़ों की हिनहिनाहट 
मुर्दे देंगे पहरा रात भर 
उनके लिए भला रात क्या
निगाहें टिकी हैं उनकी 
मकानों पर .

-हसन ज़कतान 
(अनुवाद-राधा रमण अग्रवाल)

गाज़ा, जहाँ समय अब भी खड़ा है

हमें मत बताओ कि एक वर्ष बीत गया ...
 हमने जीवन को तारीखें देखकर मापना बंद कर दिया है
बहुत पहले से हमारे लिए समय स्थिर हो गया है
हिंसक विनाश और अथाह दुःख ने इस पर विराम लगा दिया है

और इस बर्बादी के बीच मिलनेवाले कुछ शांत क्षणों में हम 'क्रिसमस' नहीं मनाते,
न ही झूठी प्रसन्नता के लिए 'ईद' '
नए वर्ष की शुभाकांक्षा' देकर हम स्वयं को मूर्ख नहीं बनाते
कोई भी अवसर कभी भी हमारा नहीं,
वह तो भविष्य की अनिश्चितताओं से घिरा है

व्यतीत कल ही, हमारा आज है
यहाँ समय जड़ है और एक ही तारीख़ वर्ष है जो हमारा जीवन धारण नहीं करता,
न हमारे सम्मिलित दुखों को, न बचे रहने की कामना को

हमें मत बताओ कि एक वर्ष बीत गया...

न्याय के ध्वस्त होते ही हमारी घड़ियाँ बंद हो गयीं थीं.
दशको के दमन ने ग्रहण का अँधेरा फैला रखा है ...
अब कोई समय की बात नहीं करता
समय की अनुपस्थिति में हम ठहर से गये हैं
हम तुम्हारी तरह जीवन को दिनों से नहीं तौलते
आलिंगनों की ऊष्मा ही हमारे जीवन की वाजिब गणना है.

हमारा मूल्य प्रेमी हृदय की मात्र एक स्पंदन,
हमारा अस्तित्व हमारे होने की ज़िद है.

इसलिए हमें मत बताओ कि एक वर्ष बीत गया...

समां साबावी 

5 comments:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर संकलन ।

कैलाश नीहारिका ने कहा…

कविताएँ जैसे ...दर्द की दास्तान के अविरल आँसू जो बहते-बहते सूख रहे हों, सूखते-सूखते नमकीन धार-से उभर आए हों !

कैलाश नीहारिका ने कहा…

कविताएँ जैसे ...दर्द की दास्तान के अविरल आँसू जो बहते-बहते सूख रहे हों, सूखते-सूखते नमकीन धार-से उभर आए हों !

वर्षा ने कहा…

किेतना मुश्किल और खौफनाक वक़्त गुज़र रहा है गज़ा में, जो खुद को बार-बार दोहराता है, वहां की तस्वीरें विचलित करती हैं और कविताएं जख्मों पर मरहम रखती हैं।

Vaanbhatt ने कहा…

बेहतरीन संकलन...

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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