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मंगलवार, 4 नवंबर 2014

मृत्युंजय प्रभाकर की कविताएँ

मृत्युंजय प्रभाकर मूलतः रंगमंच के सक्रिय और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं लेकिन उनका मन कविताओं में भी ख़ूब रमता है. उनका एक कविता संकलन साहित्य अकादमी से प्रकाशित हो चुका है. इसके पहले भी आप असुविधा पर उन्हें पढ़ चुके हैं. इस बार उन्होंने कुछ छोटी कविताएँ भेजी हैं जिनमें ज़िन्दगी के कुछ फलसफाना अनुभव हैं, कुछ राजनीतिक हकीक़तें हैं.





मसला

मसला तो यूँ कुछ भी न था
 
पर कुछ ज़िन्दगी की कसक
 
और कुछ बजबजाती हकीक़तों ने इसे
 
अच्छा-खासा मसाला बना दिया!


अज्ञात

पता नहीं वे कौन सी ताकतें हैं 
जो जीवन को रेगिस्तान में बदल देना चाहती हैं
 
जबकि आदमी घिसटता है
 
लहूलुहान टखनों के साथ
 
एक पोर दूब और दो बूँद पानी के लिए!

सच
अजीब विडम्बना है 
अपनी आहत भावना लेकर
यहाँ हर कोई आखेट पर निकला है!


ज़िन्दगी

जब तक रहूँगा, परेशान करेगी
कदम-कदम पे, जीना हराम करेगी
रोते-हँसते सुबह से शाम करेगी
 
ऐ ज़िन्दगी बता, तू बला क्या है
 
हिंदी

हिंदी का खाता हूँ
हिंदी का पीता हूँ
 
हिंदी में पढ़ता हूँ
हिंदी में लिखता हूँ
हिंदी ही सोता हूँ
हिंदी ही ओढ़ता हूँ
हिंदी में गाता हूँ
हिंदी में रोता हूँ
हिंदी में जीता हूँ
हिंदी में कुढ़ता हूँ।


समय रे समय!
(ह्यूगो चावेज़ को समर्पित)

 समय की खूंटी पर
नंगी लाश टंगी है
खून पसरा है फर्श पर
दीवालों पर छीटें बिखरे हैं
जलते लोथड़े फैले हैं इधर-उधर
जबकि टेबल पर बोतल खुली है 
 
और पलंग पर जांघें
कहते हैं यहाँ सभ्यता बसती है।


बदलाव
(ह्यूगो चावेज़ को समर्पित)

या तो तुम सुनते नहीं
या बात समझ में आती नहीं
कब तक पिसते रहोगे
इस व्यवस्था रूपी दुष्चक्र में
फ़ौरन से पेश्तर इसे बदल डालो



लोकतंत्र


मेरे हाथ में होता
 
तो इस लोकतंत्र पर
कालिख पोत देता
जिसका ईमान दोगला है


त्रासदी

 अजीब अहमक हूँ
 
लोगों से भागता फिरता हूँ
 
और अकेलेपन को कोसता हूँ।


कबूतर

मेरी खिड़की के बाहर
एक जोड़ा कबूतर
देखता हूँ इन्हें
अपने होने की तरह



7 comments:

अपर्णा अनेकवर्ना ने कहा…

sabhi kavitayen achchhi lageen Mrityunjay Prabhakar ji ko shubhkamnayen

मयंक सक्सेना ने कहा…

बढ़िया...आखिरी सबसे बढ़िया कविता....

महाभूत चन्दन राय ने कहा…

mrityunjay bhai kavitayen "dirgh jokhim" ki mang kr rhi hain..inme thoda aur jokhim joda hota to sukun ka asvaad dusra hota

अनुपमा तिवारी ने कहा…

कम शब्दों में कितनी गहराई तक ले जाती हैं मरतुन्जय जी की ये कविताएं,अशोक जी धन्यवाद् कविताए पढवाने के लिए.

कुमार अनुपम ने कहा…

मृत्युंजय की कविताओं पर अभी कुछ नहीं कहूँगा बल्कि उनकी नाटक की प्रस्तुतियों में किसी कारणवश उपस्थित न हो पाने की क्षमा तो यहाँ मांग ही लूं।

vandana gupta ने कहा…

समय की खूंटी पर
नंगी लाश टंगी है
खून पसरा है फर्श पर
दीवालों पर छीटें बिखरे हैं
जलते लोथड़े फैले हैं इधर-उधर
जबकि टेबल पर बोतल खुली है
और पलंग पर जांघें
कहते हैं यहाँ सभ्यता बसती है।
लाजवाब कवितायें मर्मभरी

sheshnath pandey ने कहा…

कविताएँ जब अपने तेवर के साथ लोगों से संवाद करती है तो मुझ पर अपना असर छोड़ती है, इन कविताओं ने ये काम बखूबी किया हैं. बढ़िया कविताएं हैं.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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