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बुधवार, 19 नवंबर 2014

अस्मुरारी नंदन मिश्र की कविताएँ



अस्मुरारी नंदन मिश्र उड़ीसा के एक केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ाते हैं, खूब पढ़ते हैं और लिखते भी हैं. उनकी कविताएँ एक बेचैन युवा की कविताएँ हैं. तमाम सामाजिक-राजनीतिक विडम्बनाओं और ग़म-ए-दौरां-ग़म-ए-जानां के बीच के द्वंद्व की सहज, ईमानदार और संवेदनशील उपज.  बादल-बसंत और स्वप्न पर धावा बोलती भीड़ के बीच प्यार करने की हिम्मत जुटाती लड़कियों की तरह ही वह बाज़ार और धर्म के चौतरफे हमले के बीच सच को अपने तरीके से कह पाने का साहस जुटाते हैं. असुविधा पर उनका स्वागत 



लड़कियां प्यार कर रही हैं

खिडकियों में लगाई जा रही हैं
मजबूत जालियाँ
परदे को किया जा रहा है
चाक-चौबंद


दरवाजे को दी जा रही है सीख
किस दबाव से खुलना है किससे नहीं
गढ़ी जा रही हैं घर की परिभाषाएं
बतलाया जा रहा है दहलीज का अर्थ
ढोल पर गायी जा रही हैं तहजीबें
बड़े-बड़े धर्मज्ञानी लेकर बैठ चुके हैं धर्म की किताबें पंडित - मुल्ला सभी हो गए हैं एक मत सख्त की जा रही है फतवों की भाषा
कवि गा रहें हैं लाज लिपटे सौन्दर्य के गीत
शान चढ़ तेज हो रही हैं
नजरों की तलवारें


पूरी भीड़ धावा बोल चुकी है- बसंतबादलस्वप्न पर
पार्कों में पहरे दे रहे हैं मुस्तैद जवान
गुलाब की खुशबू घोषित हो चुकी है जहरीली
चौराहों पर जमा हो रहे हैं ईंट-पत्थर
शीशियों में भरी जा चुकी हैं उबलती तेजाब
चमकाई जा रही है पिताओं की पगड़ी
रंगी जा रही है भाइयों की मूछें जिम्मेदारों की एक पूरी मंडली कर रही है संजीदा बहसें


खचाखच भरी खाप पंचायत में
सुनाई जा रही है
सभ्यता के सबसे जघन्य अपराध की सजा
और इन सब के बावजूद
लड़कियां प्यार कर रही हैं...




हमारी बेटियां बनाम तुम्हारी बेटियां

फूलें-फलें
सलामत रहें
जुग- जुग जियें तुम्हारी बेटियां
लेकिन तुम्हारी बेटियों का जिक्र कहीं से भी कोई मरहम नहीं है
मेरी बेटियों के दुखों का ओ अनजान टापू के निवासी!!
मत करो इस्तेमाल अपनी बेटियों के नाम भावनात्मक छल के लिए
सच- सच बताना
जब भी तुमने अपनी बेटियों को मेरी बेटियों के बरक्स खड़ा किया
कितनी चिंता हुई तुम्हे
भावुक बयान देते हुए जब एक पल के लिए भी अपनी बेटियों की तस्वीर उभरी होगी तुम्हारे सख्त जेहन में तुम आश्वस्त हो रहे होगे
मन ही मन जायजा लिया होगा मुकम्मल सुरक्षा- व्यवस्था का
फिर हमारी बेटियों पर लौटे होगे
और तुम्हारे उसी जेहन में तैर गए होंगे चमकते वोट
क्या हमारी बेटियों के साथ तुम्हे जंगल दिखे वे  सड़कें  दिखीं जहाँ  मर्दानगी  के झंडे  लहराते  फिरते  हैं
अपने -अपने  लिंगो पर कुछ  नपुंसक  छुट्टे  सांड
गोलियों के छर्रे
पत्थर के टुकड़े
सरिया खून
कुछ भी दिखा  तुम्हे?तुम किसी  अनछुए  लोक  के निवासी  हो
हमारे  अंधड़  -पानी  --आग तुम तक नहीं पहुँचते तुम ने  जब आँखें  बंद  की
तो सावन था
खोली तो वसंत
ठिठुरता माघजलता जेठ तुम क्या जानो
 
हमारी आवाजों की गूंज पत्थरों से टकराकर
पहुंचती है तुम तक और चौंक चौकं जाते हो तुम खलल है तुम्हारी एकांत साधना में लेकिन मैं क्या करूँ कि मेरे पास एक ही हथियार है
इन आवाजों के प्रभाव को कम करने जब तुम खुले में आये
तब भी तुम्हारे पास था एक सुरक्षित घेरा
तुमने देखा भी नहीं
जंगल क्या उगा रहे हैं सड़कें क्या ढो रही हैं तुम्हारे पास कोई शब्द नहीं था
मेरी आवाज के मुक़ाबिल
और रख दिए अपनी बेटियों के नाम दूसरे पलड़े में तुमने
कि हम तुम्हारे पितृत्व के कायल हो जाएँ
किन्तु
तुम्हारी बेटियों के रास्ते में कंकड़ तक नहीं
हाथों में सुई तक नहीं चुभी
कमीज में बटन लगाते
गोलियां तो उनकी हिफाजत के लिए हैं
और हमारी बेटियां
पत्थरसरिया छर्रे
झेलती रही अपनी योनियों में
न..न..
मेरे दर्द को झूठे मरहमों से दबाने वाले
अनजान सफ़र के यात्री!!
मैं तुम्हारी बेटियों का बुरा नहीं चाहता
जुग- जुग जियें तुम्हारी बेटियां
टूटे तने के साथ खड़े पेड़ आँधियों का आह्वान नहीं करते
एक एक कोपल
एक एक कली
सलामत रहे
आँगन में खुशियाँ बरसे
सपने उड़ान भरे उन्मुक्त आकाश में पूरे ग्लोब को सहला सकें तुम्हारी बेटियां
लेकिन जब भी थोड़ी धूप थोड़ी नमी के लिए
आकाश के एक टुकडे ,इन्द्रधनुष के रंग के लिए
बादल बरसात वसंत के लिए
जमीन हरियाली. अपने घर के लिए
मचलें हमारी बेटियां तो मत खड़ी करो अपनी बेटियां इनके बनाम
तुम्हारी बेटियों के नाम
मेरी बेटियों के घाव का मरहम नहीं है....


गूँगा


1.
बेल्ट की सटसट
कहीं तेज थी
उसकी कई मिली जुली आवाजों से
गुंगिआया
सिसका
और चुप हो लिया
उसके गूँगे पन को पूरी सार्थकता देता
पसरा था
बस्ती का शालीन बहरापन..

2
उसके पास आवाज है
व्याकरण नहीं है
अर्थ है समूल
बरतने का आचरण नहीं है 
हर जगह जीता अपनी ही भाषा में
तानाशाह समय में
यही तो मरण है..

3.
समझ की पहुँच से
काफी दूरी है 
उसकी हर भंगिमा मानो आधी अधूरी है
फिर भी सहला रहे जो
बेमेल इशारों को
उनके लिए वह फकत सस्ती मजूरी है


4
खुद से ही तड़ीपार कोई देस है
आज अदालत में पेश है
भाषा तो है
पर आशा नहीं
इसलिए चुप है
अंधेरा घुप्प है...

5
सोना न चाँदी
मोती न मूँगा है
गूँगा है
गूँगा है



मैं क्या करूँ
वसन्त मुस्करा  रहा है
महाकवि की रचनाओं में
मेरे पास जले जंगल हैं
नायिका की त्रिवली उभार रही बरसात
रुपहले परदे पर
मेरे सामने तेजाबी बारिश में झुलसे चेहरे हैं
होगा कहीं शरद का चाँद
अपनी पूरी गोलाई और शीतलता के साथ
मैं कोहरे ढकी पृथ्वी को हाथ में लिए
अन्मयस्क हूँ
जिसके पहाड़ों  में टूटन है
मैदानों में दरारें
सूखी नदियाँ
पपड़ियाये खेत
समुंदर उद्वेलित बेदर्द मंथन से
हवा हलाहली

सुबह को क्या कहूँ
पियराता जा रहा एक परिचित लाल चेहरा
अखबार कुड़कुड़ा रहा यही खबर—
रात जागी रही रात भर
डर कर...
अपने ही सपनों से सहमे लोग
सुबह-सुबह निकल रहे सजधज कर
दफ्तर
कान दिये जाने के जरुरत से खफा
सरकारी आश्वासन पर
कि
उठाये जा रहे कदम आतंक विरोधी

दिन भर मची है होड़ तेज दिखने की
बीवी – बच्चों से प्यार
समय से ऑफिस
लगन से काम
निश्चिंतता से आराम
हँसी मजाक मुँह लगे दोस्तों के साथ
बहुत देर तक लहराते डोलते रहे हाथ
धौल धप्पे के बाद
एक झलक न आने पाये चेहरे पर
डरावने सपने की
यही है निर्देश
जिस दरवाजे पर जाओ
चाहे जिस से बात करो
मुस्कराते हुये
कस्टमर प्रोडक्ट नहीं मुस्कान भी खरीदता है....

और साँझ,
वही पियराया चेहरा
आ गया किसी धमाके की चपेट में
उड़ गये थके जिस्म के चिथड़े
बिखरे हैं आसमान के खुले चौराहे
लाल लाल थक्के खून के
पड़ते जा रहे काले
उमस से भारी होती प्रतिपल हवा
कि रुकती हुई साँसें
थमती धड़कन
जमती नब्ज
फिर सन्नाटा
सिर्फ सन्नाटा....


क्या करूँ
उमगते उपमान
बौराते  बिम्ब
नहीं मिल पा रहे मुझे
मैं क्या करूँ???
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अस्मुरारी नंदन मिश्र

संपर्क : केंद्रीय विद्यालय रायगड़ा
म्युनिसिपल कॉम्पलेक्स
रायगड़ा
ओडिशा
765001
मो.नं.-- 9692934211

1 comments:

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बेल्ट की सटसट
कहीं तेज थी
उसकी कई मिली जुली आवाजों से
गुंगिआया
सिसका
और चुप हो लिया
उसके गूँगे पन को पूरी सार्थकता देता
पसरा था
बस्ती का शालीन बहरापन.....
aah...isase marmik or kya hoga . ye sabhi kavitaen kharonch kar rakh dene veli hain.

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