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जितेन्द्र श्रीवास्तव की नई कविताएँ

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जितेन्द्र श्रीवास्तव पिछले लगभग ढाई दशकों से हिंदी कविता में सक्रिय हैं. इस बीच उन्होंने लम्बी यात्रा की है, जिससे हिंदी का पाठक भलीभांति परिचित है. एक तरफ उन्होंने कविताओं में लगातार नए भावबोधों को प्रवेश दिया है तो दूसरी तरफ आलोचना के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण काम किया है. छात्र जीवन में मेरे सीनियर रहे जितेन्द्र की कविताओं से अपने पुराने और गहन परिचय के चलते इन कविताओं ने मुझे चौंकाया. इनमें एक बड़ा मद्धम और परिचित सा राग है. लोक की बनावटी धारणा के समक्ष लोक का एक उदात्त रूप, अंधेरों में उम्मीद ढूंढ लेने की बेआवाज़ जीजिविषा...जब वह कहते हैं "डर विलोम होता है प्रेम का" तो बहुत धीमे लेकिन दृढ़  खंडन करते हैं  "भय बिनु होंहि न प्रीति" का और इस तरह परम्परा में शामिल होकर उसका अस्वीकार भी और परिस्कार भी.  
फ़िलहाल मैं जितेन्द्र भाई का असुविधा के लिए कविताएँ उपलब्ध कराने के लिए आभार प्रकट करते हुए कविता और पाठकों के बीच से हटता हूँ.




दुनिया के सबसे हसीन सपने हमेशा देखे जाते हैं अंधेरे में ही

अंधेरे में कुछ नहीं दिखता न घर न पेड़न गड्ढ़ेन पत्थर न बादलन मिट्टी न चिड़ियाँ-चुरुँग हाथ …