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एक थका बोझ लिये आता हूँ. ज़िंदगी चालीस की हो गई और अब तक कुछ भी नहीं कर पाया - तुषार धवल

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चालीस की उम्र यानी हम जैसों के लिए ज़िन्दगी के दूसरे या फिर तीसरे हिस्से की ओर क़दम. थोड़ा ठहरने का वक़्त और फिर चलने से पहले एक साँस ले लेने का. एक मनुष्य के अपने निजी इतिहास में चालीस तक कितने इतिहास होते हैं? एक इतिहास मन का, एक देह का, एक प्रेम का, एक परिवार का. पिता की आकांक्षाओं का तो बच्चों के सपनों को अंखुआते देखने का और इन सबके बरअक्स अपना समय या असल में अपने समय के बरअक्स ये सब! छीजती देह, पकता मन और उमगती उम्मीदों के बीच हर हाल में एक अधूरा सफ़र. 
तुषार की यह कविता उसके दख़ल से प्रकाशित संकलन "ये आवाज़ें कुछ कहती हैं" में है. वैसे तो लम्बी कविताओं का वह पूरा संकलन ही विलक्षण है.गहन तनावों और सान्द्र अनुभूतियों की एक विकल काव्यात्मक अभिव्यक्ति जो तुषार ने हासिल की है, वह हिंदी के समकाल में मेरे देखे में अद्वितीय है. 
यह कविता उस उम्र की कविता है जिसमें मेरी पीढ़ी है इस वक़्त और इसका रचनात्मक विस्तार ऐसा कि साफ़ साफ़ अपना चेहरा देखा जा सकता है. "दिन की मजूरी और रात की बागबानी" करने वालों का चेहरा. एक अदृश्य पिंजड़े की ज़द में आज़ादियाँ तलाशते लोगों का चेहरा. रात रात भर जा…

सत्यापन पर डा रोहिणी अग्रवाल

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आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर

’’बोले विश्वस्त कंठ से जांबवान – रघुबर विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण हे पुरुष सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर। रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त तो निश्चय तुम ही सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो रघुनंदन।’’                                                                                     (राम की शक्तिपूजा, निराला)
’’मौन और मितव्ययिता के कथाकार कैलाश वानखेड़े। दलित अस्मिता को बिना किसी कुंठा, प्रतिशोध और बड़बोलेपन के मनुष्योचित गरिमा से उकेरता उनका कहानी संग्रह ’सत्यापन’। अपनी छिनी हुई जमीन आत्मविश्वासपूर्ण अधिकार से वापस लेने और उस पर तने आसमान में मुक्त उड़ान भरने का साक्ष्य रचती हैं इस संग्रह की कहानियां - विशेषकर ’सत्यापित’, ’